कुटज – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्‍या। पूर्व और अपार समुद्र – महोदधि और रत्‍नाकर – दोनों को दोनों भुजाओं से थाहता हुआ हिमालय ‘पृथ्‍वी का मानदंड’ कहा जाय तो गलत क्‍यों है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। इसी के पाद-देश में यह जो श्रृंखला दूर तक लोटी हुई है, लोग इसे ‘शिवालिक’ श्रृंखला कहते हैं। ‘शिवालिक’ का … पढ़ना जारी रखें कुटज – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

Andhkaar se joojhna hai_hajari prasad dwivedi_literature in india

अंधकार से जूझना है – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

दीवाली याद दिला जाती है उस ज्ञानलोक के अभिनव अंकुर की, जिसने मनुष्‍य की कातर प्रार्थना को दृढ़ संकल्‍प का रूप दिया था – अंधकार से जूझना है, विघ्न-बाधाओं की उपेक्षा करके, संकटों का सामना करके। पढ़ना जारी रखें अंधकार से जूझना है – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

ताली तो छूट गई – अज्ञेय

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप शहर घूम-घामकर घर लौटे हों और तब आपको याद आया हो कि चाबियों का गुच्छा तो आप कहीं और छोड़ आये हैं? सवाल प्रतीकात्मक ही है, क्योंकि उसका रूप यह भी हो सकता है कि घर केवल एक कमरा रहा हो और चाबियों का गुच्छा केवल एक ताली, और कहीं और छोड़ आने की बजाय आपने … पढ़ना जारी रखें ताली तो छूट गई – अज्ञेय