भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है

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डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है. यह हिंदू शासकों के लिए भी उतना ही सही है, जितना कि मुस्ल‍िम शासकों के लिए. अतीत के लिए भी, आज के लिए भी.

ग़ौरी, गज़नवी, चंगीज़, तैमूर, दुर्रानी, अब्दाली जैसे मुस्ल‍िम आक्रांता लूटखसोट की फ़िराक़ में थे. हिंदुस्तान पर राज करने की उनकी नीयत ना थी.

ख़ास तौर पर 1739 में पहले नादिर शाह और फिर 1761 में अहमद शाह ने तो हिंदुस्तान की केंद्रीय सल्तनत को उसके घुटनों पर झुका दिया था.

अनेक इतिहासकारों को अचरज होता है कि नादिर शाह महज़ “तख़्तेताऊस” की लूट से ही ख़ुश था, जबकि चाहता तो हिंदुस्तान की बादशाहत उसके नाम होती!

चंगीज़ो तैमूर के वंशज बाबर ने अपने लश्कर का रुख़ हिंदुस्तान की ओर इसलिए मोड़ा था, क्योंकि समरकन्द को जीतने में वो लगातार नाकाम रहा था. लेकिन चंगीज़ो तैमूर के उलट उसने हिंदुस्तान में खूंटा गाड़ दिया, जैसे उससे पहले गाड़ा था मामलूक़ों, तुग़लकों, खिलजियों और लोदियों ने.

लेकिन अवाम?

इतिहासकार इस समूची परिघटना को “कॉन्क्वेस्ट” के तर्क के साथ याद रखते हैं और निहायत ग़ैरसहानुभूतिपूर्ण तरीक़े से अवाम के अंतर्तम पर बात करने से इनकार करते हैं.

जिसकी तलवार, उसका ज़ोर!
जिसकी लाठी, उसकी भैंस!

तब सदियों तक चले “हिंदू जेनोसाइड” की तो बात ही क्या करें, जब कश्मीर में पंडितों के जेनोसाइड को ही रद्द करने के लिए महाकविगण कमर कसे हों!

ये तमाम सिलसिला जैसे भुला देने लायक़ हो और “प्रतिशोध के काव्य-न्याय” का, “सामूहिक अवचेतन की तुष्टि” का यहाँ कोई महत्व ही ना हो, जिसे कि “सामाजिक न्याय” की व्यवस्था की धुरी माना गया!

हुक़ूमत और अवाम के रिश्तों को लेकर लोहिया की बात सही है और “ग्रेट मुग़ल्स” के राज में भी हिंदुस्तान में “ह्यूमन राइट्स इंडेक्स” बहुत ऊपर चला गया हो, वैसा नहीं था.

अकबर के राज में बहुत अमन था, कलाओं का बहुत विस्तार था, गंगा जमुनी का स्वर्णकाल था, ऐसा कहते हैं, लेकिन हिंदू बहुसंख्य समाज यवनों के राज में मनोवैज्ञानिक रूप से मुतमईन कैसे रह सकता था? हमारा इतिहास इस मनोवैज्ञानिक बेचैनी का अध्ययन करने के बजाय उस पर संगीन चुप्पी साध लेता है.

आज अगर अरब देशों पर कोई हिंदू या यहूदी राजा अधिकार कर ले और बेहतर सुशासन स्थापित कर दे, तो क्या वहां के मुसलमान इस पर राज़ी ख़ुशी से रहेंगे?

आज़ादी की लड़ाई में “गंगा जमुनी” का “पर्सपेक्टिव” बदल गया था और अब वे दोनों मिलकर एक “साझा दुश्मन” से लड़ रहे थे. तो क्या उस साझा दुश्मन का वजूद ही उस भाईचारे का परिप्रेक्ष्य था? और अगर, वह शत्रु परिदृश्य से हट जाए तो?

आज़ादी के समय हिंदू मुसलमान दोनों ही समान रूप से ग़रीब और पसमंदा इसलिए भी थे कि अधिकतर मुसलमान तो “कनवर्टेड” थे. वे वही थे, जो उनसे पहले हिंदू हुआ करते थे, और हुक़ूमत के मेवे उन तक नहीं पहुँचे थे.

आज अकसर भारतीय मुसलमान कहते हैं कि हम तो “कनवर्टेड” हैं, इसलिए हम तो इसी देश के मूल निवासी हैं. लेकिन यह बात 1947 में उनको याद क्यों नहीं आई थी, जब उन्होंने अपना अलग मुल्क मांगा था?

मुझे बार बार लगता है हिंदुस्तान का इतिहास एक नए “नॉन सेकुलर” और “मोर एनालायटिकल पर्सपेक्टिव” के साथ लिखे जाने की ज़रूरत है.

हमें एक भ्रामक इतिहास पढ़ाया जाता रहा है.

“अ पोलिटिकली मोटिवेटेड एंड अपोलोजेटिक रीडिंग ऑफ़ हिस्ट्री”. इसको दुरुस्त करना ज़रूरी है!

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सुशोभित सक्तावत

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क्या बच्चों का सही तरीके से इलाज नहीं होता है? : रवीश कुमार

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गोरखपुर के बीआरडी अस्तपाल में बच्चों के मरने की घटना से एक बात साबित हो गई. 12 अगस्त को 48 घंटे में 30 बच्चों की मौत के बाद हम सबने ख़ूब बहस की, चर्चा की, मुख्यमंत्री से लेकर सरकार को घेरा, फिर चुटकुले बनाए और उसके बाद सब नॉर्मल हो गया. सिस्टम भी समझ गया कि ये लोग पहले गुस्सा करेंगे फिर चुटकुला बनाकर नॉर्मल हो जाएंगे. आजकल हम और आप सिस्टम के बदलने पर नॉर्मल नहीं होते, बल्कि सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने के बाद नॉर्मल हो जाते हैं. नॉर्मल हो गए तभी तो गोरखपुर के उसी अस्पताल से बच्चों के मरने की खबर आ रही है, अब तो कई और अस्पतालों से ऐसी खबरें आने लगी हैं. एक असर अच्छा हुआ है कि कुछ दिन के लिए ही सही अखबारों के पत्रकारों ने अस्पतालों में बच्चों की मौत पर ध्यान देना शुरू किया है. थोड़े दिन में वे भी नार्मल हो जाएंगे क्योंकि बदलेगा तो कुछ भी नहीं.

राजस्थान के बांसवाड़ा में 90 बच्चों की मौत
राजस्थान के बांसवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में जुलाई-अगस्त के महीने में 90 बच्चों की मौत हो गई है. इनमें से 43 की दम घुटने से मौत हुई है. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने ज़िला कलेक्टर को जांच के आदेश दिए हैं. जुलाई महीने में 50 बच्चों की मौत हुई है. अगस्त में 40 बच्चों की मौत हुई है. बच्चों की मौत sick newborn care unit में हुई है, ये एक तरह का बच्चों का आईसीयू होता है. अप्रैल में भी 20 और मई में 18 बच्चों की मौत हो गई है. कितनी आसानी से मैं भी संख्या गिन रहा हूं जैसे दो का पहाड़ा हो. जिनके घरों में मौत हुई होगी, कितनी उदासी होगी. उन्हें क्या ऐसा भी लगता होगा कि सिस्टम ने उन्हें फेल किया. उनके बच्चों की जान बच सकती थी. इन बच्चों और इनकी माओं में कुपोषण कारण बताया गया है. राजस्थान के जनजातीय महिलाओं के लिए पुकार कार्यक्रम चलता है. दावा किया जाता है कि इसके तहत बहुत से बच्चों की जान बचाई भी गई है.

जमशेदपुर में तीन महीने में 164 बच्चों ने गंवाई जान

जमशेदपुर के कोल्हान झेत्र में एक अस्पताल है महात्मा गांधी मेमोरियल अस्पताल में मई जून जुलाई अगस्त में 164 बच्चों की मौत हुई है. अस्पताल की रिपोर्ट कहती है कि जून महीने में 60 बच्चों की मौत हो गई थी. जांच तो मई और जून में हुई मौत के बाद ही होनी चाहिए थी, लेकिन जब खबर आई की 30 दिनों में 64 की मौत हुई है तो हड़कंप मच गया. जांच के लिए चार सदस्यों की कमेटी भी बन गई. हमें बताया गया कि कुपोषण के कारण ज्यादातर बच्चों की मौत हो रही है. ये सभी ग्रामीण क्षेत्र के हैं.

रांची के रिम्स में भी 133 बच्चों की मौत

यही नहीं रांची के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में भी 28 दिन के भीतर 133 बच्चे मर गए. एक अखबार ने लिखा है कि आठ महीने में 739 बच्चों की मौत हो गई है. मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार से छह हफ्तों के भीतर जवाब देने के लिए कहा है. अखबार में छपे बयानों में रिम्स के निदेशक ने कहा है कि हम 88 प्रतिशत बच्चों को बचा लेते हैं. 13 प्रतिशत बच्चों की मौत हो जाती है. क्या यह सामान्य आंकड़ा है. राज्य के मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन जांच नाम की सक्रियता कहीं गोरखपुर की घटना के बाद तो नहीं बढ़ी है. अस्पताल के निदेशक ने कहा है कि ज़्यादातर बच्चे बिना ऑक्सीजन और बिना किसी नर्सिंग के लाए जाते हैं, इसलिए भी दम तोड़ देते हैं. यह तो और पोल खुल गई हमारे सिस्टम की.

पैमाने पर फेल नजर आएंगे राज्य

सवाल है कि क्या हम भी सरकार से स्वास्थ्य को लेकर सवाल करते हैं और क्या सरकार आपके सामने इस बारे में कोई दावे करती है. अगर आप ठीक से खरोंच कर देखेंगे तो देश के तमाम राज्य इस पैमाने पर फेल नज़र आएंगे. इसलिए सरकार बनाम सरकार का खेल खेलने से कोई लाभ नहीं होने वाला है. गोरखपुर को लेकर जब हंगामा शांत हो गया तब हमारे सहयोगी कमाल ख़ान ने एक और रिपोर्ट की. यह बात बिल्कुल सही है कि तीस सालों से गोरखपुर में एक्सिफ्लाइटिस की समस्या है. टीकाकरण की योजना है मगर इसके बाद भी इस बीमारी से होने वाली मौत कम नहीं की जा सकी है.

बच्चों के वार्ड में गूंजती है दर्दनाक चीख

ये कमाल खान के ही शब्द हैं कि बच्चों के वार्ड में हर थोड़ी देर बाद किसी मां की दर्दनाक चीख गूंजती है, जो वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा चीर देती है. एक मां वो रोती है जिसके बच्चे की मौत हो गई है और बाकी माएं इस अंदेशे से चीखती हैं कि कहीं उनका बच्चा भी न मर जाए. मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल कहते हैं कि बच्चे गंभीर हालत में आते हैं इसलिए मर जाते हैं. मरने वाले बच्चों को सिर्फ एन्सिफ्लाइटिस नहीं होती है और भी बीमारियां होती हैं. अकेले इस मेडिकल कालेज में इस साल 1346 बच्चों की मौत हो गई है. एक महीने में तो 386 बच्चे मर गए. अस्पताल के प्रिसिंपल का कहना है कि सभी ज़िम्मेदारी के साथ ड्‌यूटी कर रहे हैं. इस समय मरीज़ों की संख्या भी बहुत है.

2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत हुई 

हमने स्वास्थ्य सेवाओं पर सीएजी की रिपोर्ट का प्राइम टाइम में कई बार ज़िक्र किया है. एक बार और सही. गांवों में स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने के लिए 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत हुई थी, ताकि पैदा होने के वक्त बच्चे और मां की होने वाली मौत को रोका जा सके. सीएजी ने 2011 से मार्च 2016 तक का हिसाब किताब किया है. आपको जान कर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि सरकारों को भी यह जानकर कोई फर्क नहीं पड़ा कि 27 राज्यों ने इस मद का पैसा खर्च ही नहीं किया. 2011-12 में खर्च न होने वाली राशि 7,375 करोड़ थी जो 2015-16 में बढ़कर 9509 करोड़ हो गई. 6 राज्य ऐसे हैं जहां 36.31 करोड़ की राशि किसी और योजना में लगा दी गई. जब से बच्चों की मौत की रिपोर्टिंग बढ़ी है सरकार अपनी तैयारी नहीं बताती है. जांच कमेटी बन जाती है दो चार तबादले और निलंबन से हम लोग खुश हो जाते हैं. हम जानना चाहेंगे कि किस तरह से फंड में कमी की गई, उसका क्या असर पड़ा.

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वक़्त के साथ बदलते बाबाओं के अवतार

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आज एक बाबा ने कहर ढा रखा है। रेप के आरोप में दोषी पाए गए हैं और उनके भक्त दो राज्यों में आपातकाल जैसे हालात लाने पर उतारू हैं। 25 से ज़्यादा जानें जा चुकी हैं और जगह-जगह आगजनी की खबरें सामने आ रही हैं। हर कोई सोच रहा है कि बाबा में ऐसा क्या है जो लोग जान लेने-देने पर उतारू हैं। दरअसल यह बाबा बाकियों से अलग हैं, नाम है बाबा गुरमीत राम रहीम जी इंसां.. हर धर्म से कुछ न कुछ उधार ले लिया है और राम, रहीम से पहले इंसान होने का दावा करते हैं। यह कूल टाइप बाबा हैं, रॉकस्टार हैं और मल्टी-टैलंटेड भी। अब जब रेप के आरोप में गिरफ्तार किए गए हैं तो पंजाब और हरियाणा को जलने के लिए छोड़ दिया है।

समझना जरूरी है कि एक के बाद एक बाबा और उनके अलग-अलग अवतार आते कहां से हैं। दरअसल बाबाओं से पहले संत महात्मा और भगवान का कॉन्सेप्ट आया। भगवान की परिकल्पना ही इसलिए की गई थी जिससे लोगों का जब खुद पर भरोसा टूटने लगे तो किसी तीसरी शक्ति पर भरोसा करके काम पूरा करने की हिम्मत करें। पहले यह शक्ति तकलीफ के वक़्त याद की जाती थी, फिर इसका नाम लेकर डराया जाने लगा। बात तो तब बिगड़ी जब भगवान को धरती पर उतारने का दावा करके अलग-अलग तरह के सेंटर खोल दिए गए। यहां लोगों को तकलीफ के वक़्त खुशी मिलने उम्मीद में और तकलीफ न होने पर डराकर बुलाया जाने लगा।

अगला कदम भगवान के सेंटरों में काम करने वालों ने उठाया और भगवान से सीधा कनेक्शन होने का दावा करने लगे। जिन लोगों का अट्रैक्शन पहले भगवान और फिर उनके सेंटरों तक ही था, अब भगवान के दूतों से अट्रैक्ट होने लगे। ये दूत संत और बाबा बनकर लोगों की मदद करने लगे। कुछ सच में दूसरों की मदद करना चाहते थे और कुछ अपनी। रोज़ सैकड़ों लोग उनके सामने सिर झुकाने लगे और उन्हें लगने लगा कि वह खुद ही भगवान हैं। भक्तों को भी इस बात पर यकीन करने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

पहले ऋषि, महात्मा और सन्यासी होते थे जो सब कुछ छोड़कर सत्य की तलाश में जंगल और पर्वतों पर निकल जाते थे। वह हमेशा सत्य और ईश्वर की तलाश में लगे रहे लेकिन उतना सुख-शांति न पा सके, जितना नए जमाने के बाबाओं को बिना जंगल गए ही मिल गया। जंगल जाने में कोई फायदा नहीं मिलता इसलिए अब बाबा जंगल और पर्वतों के बजाय लोगों के बीच में रहने लगे हैं। लोगों की डिमांड और अपनी जरूरतों के हिसाब से बाबा ने अपना नाम रखना, मेकअप करना और प्रसाद देना शुरू कर दिया है। अब नए अवतार हैं राधे मां, गोल्डन बाबा, निर्मल बाबा, बिजनस बाबा, फ्रॉड बाबा और राम रहीम सिंह इंसां…

यह बाबा भगवान की नहीं अपनी भक्ति करवाते हैं। ये बाबाओं के अपडेटेड और लेटेस्ट वर्जन हैं। मॉल में शॉपिंग करने वालों और फाइव स्टार होटल में रहने वालों को पेड़ के नीचे या फूस की झोपड़ी में बैठे बाबा रास नहीं आने इसलिए नए बाबा आसमान से उड़कर या लाइट्स से सजे रंगबिरंगे स्टेज से निकलकर आते हैं। प्रसाद बताशों का नहीं, चॉकलेट और पेस्ट्री का होता है। भक्तों की अपने भगवान से बात करने की चाह ये बाबा पूरी कर रहे हैं। भक्त अपने नए भगवान के साथ अठखेलियां कर सकते हैं, उनके हाथ से प्रसाद खा सकते हैं। चंद दान-दक्षिणा के बदले राधे मां अपने भक्तों की गोदी में बैठकर उन्हें दुलार सकती हैं, आई लव यू कह सकती हैं… कहां मिलेगा ऐसा भगवान! बाबा राम रहीम को ‘पापा जी’ कहने वाले उनके रॉक म्यूजिक पर ठुमके लगाते हैं और खुद को भगवान का रूप कहने वाले अपने पसंदीदा कैरक्टर के साथ सच्चा सुख उठाते हैं।

बाबा बदलते गए लेकिन भक्त नहीं बदले। भक्त कल भी अपने भगवान के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकते थे, आज भी नहीं सुनेंगे। भक्त कल भी अपने भगवान के लिए जान लेने-देने की हिम्मत रखते थे, आज भी रखते हैं। चुनौती बहुत बड़ी है क्योंकि चुनौती है नए भगवान पैदा न होने देने की… जो बदलते माहौल में लगभग नामुमकिन हो चुका है। पुराने भगवान तस्वीरों और मूर्तियों में हैं जिन्हें अपडेट नहीं किया जा सकता और नए भगवान हर जगह तैयार हो रहे हैं… जिनसे सवाल नहीं किए जा सकते।

(उपरोक्त विचार लेखक के अपने हैं| इससे लिटरेचर इन इंडिया समूह का कोई सम्बन्ध नहीं है|)

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सुना है कि सलीम “मुसलमान” है.

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मेरे देश के गदगद लिबरल बौद्धिकों ने यह पता लगा लिया है कि अमरनाथ यात्रियों की बस को जो सलीम चला रहा था, वह “मुसलमान” है.

इससे पहले वे ये पता लगा चुके थे कि अमरनाथ गुफा की “खोज” एक मुसलमान चरवाहे ने की थी. मैं तो समझता था कि पुरास्थलों की “खोज” पुराविद् करते हैं.

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तो क़िस्सा क़ोताह यह है कि तीर्थयात्रियों की बस पर आतंकवादियों द्वारा हमला बोला गया. तीर्थयात्री “हिंदू” थे लेकिन आतंकियों का कोई “मज़हब” नहीं था!

जिस कश्मीर में यह हमला हुआ, वहां कोई “मज़हबी मुसीबत” नहीं है. यानी ऐसा हरगिज़ नहीं है कि पाकिस्तान का हाथी निकल जाने के बाद कश्मीर की पूंछ की जो मांग की जा रही है, उसके मूल में कोई “मज़हब” हो.

आतंकवाद का कोई “मज़हब” नहीं होता.
पाकिस्तान का कोई “मज़हब” नहीं होता.
कश्मीर का कोई “मज़हब” नहीं होता.

हुर्रियत का भी कोई “मज़हब” नहीं होता, जिसके अाह्वान पर इसी कश्मीर में पांच लाख मुसलमान सड़कों पर उतर आए थे, ताकि अमरनाथ यात्रियों को निन्यानवे एकड़ ज़मीन नहीं दी जाए!

“पांच गांव तो क्या सुई की नोक जितनी भूमि भी हिंदू तीर्थयात्रियों को नहीं दी जाएगी”, जिन पांच लाख लोगों ने सड़कों पर उतरकर यह कहा, उनका कोई “मज़हब” नहीं था!

केवल सलीम का “मज़हब” था!
केवल सलीम “मुसलमान” था!

लेकिन यह “केवल” इतना अकेला भी नहीं था. मसलन, जुनैद भी “मुसलमान” था. अख़लाक़ भी “मुसलमान” था.

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मुसलमान केवल तभी मुसलमान होता है जब वह या तो मज़लूम होता है या मददगार होता है. जब मुसलमान ज़ालिम होता है या दहशतगर्द होता है तो वह मुसलमान नहीं होता!

दूसरी तरफ़ हिंदू केवल तभी हिंदू होता है जब वह गुंडा गोरक्षक होता है. जब वह गुजरात, मालेगांव, बाबरी, दादरी होता है. लेकिन मरता हुआ हिंदू “धर्मनिरपेक्ष” होता है!

आतंक का धर्म नहीं होता लेकिन आतंक का रंग ज़रूर होता है. भगवा आतंक!

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तो क़िस्सा क़ोताह यह है कि “हिंदू धर्म” के तीर्थयात्रियों की बस पर जब “बिना किसी धर्म” के आतंकवादियों ने हमला किया तो बस को जो ड्राइवर चला रहा था उसका एक “धर्म” था!

मेरे लिबरल बंधु इस इलहाम से गदगद हैं.

वे कह रहे हैं : “सलीम मुसलमान था इसके बावजूद उसने हिंदुओं की जान बचाई!”

“डिस्पाइट बीइंग अ मुस्लिम!”

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जब नरेंद्र मोदी ने शेख़ हसीना के बारे में इसी तर्ज़ पर कहा था कि “डिस्पाइट बीइंग अ वुमन” तो जो हंगामा बरपा था, वह किस किसको याद है?

वॉट डु यू मीन, मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! डिस्पाइट बीइंग अ वुमन! तो क्या औरतें प्रधानमंत्री नहीं बन सकतीं!

अगर इजाज़त हो तो मैं इसी तर्ज़ अपने सेकुलर बंधुओं से पूछना चाहूंगा :

वॉट डु यू मीन, डियर लिबरल्स! डिस्पाइट बीइंग अ मुस्लिम! तो क्या मुसलमान किसी की जान नहीं बचा सकते!

यानी आप क्या उम्मीद कर रहे थे, सलीम गाड़ी खड़ी कर देता और आतंकियों के साथ मिलकर तीर्थयात्रियों को गोलियों से भून देता?

मेरे मुसलमान भाइयो, देखो आपके सेकुलर शुभचिंतक आपके बारे में किस तरह के ख़याल रखते हैं!

आपकी नेकी पर जो चौंक उठे क्या वो आपका दोस्त हो सकता है, तनिक तफ़्तीश तो करो!

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इतने पारदर्शी, इतने हल्के, इतने लचर आपके तर्क हैं मेरे सेकुलर दोस्तो, कि जिस दिन हिंदुस्तान तंग आकर एक गहरी सांस छोड़ेगा, उड़ जाओगे!

आतंक का कोई मज़हब हो या ना हो, सेकुलरिज़्म का ज़रूर कोई ईमान नहीं होता.

तुम बेईमान हो, मेरे सेकुलर दोस्तो! क्या ही सितम है कि तुम इतने बेलिहाज़ हो!

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सुशोभित सक्तावत

क्या “अयोध्या”, क्या “अमरनाथ”

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अमरनाथ यात्रा के प्रति कश्मीरियों का द्वेष अयोध्या के प्रति मुस्ल‍िमों के द्वेष से कम नहीं है, ऐसी धारणा अगर बन गई है, तो यह निर्मूल नहीं है। अमरनाथ इधर पिछले नौ सालों से कश्मीर का “अयोध्या” जो बन गया है।

और यही कारण है कि अमरनाथ यात्र‍ियों पर हमला करने के अनेक मायने होते हैं। आतंकी कहीं भी हमला कर सकते थे, लेकिन अमरनाथ यात्र‍ियों को मारने का अपना एक कुत्सित सुख और संतोष होता है।

हम बहुत जल्दी अपने निकट-अतीत को भूल जाते हैं और तात्कालिक संदर्भों में ही चीज़ों को देखने की कोशिश करते हैं, जबकि मेरा अनुभव यह रहा है कि इतिहास अपनी निरंतरता और पर्यवेक्षण के अपने परिप्रेक्ष्य के कारण हमें किन्हीं नीयतों के बारे में हमेशा ज़रूरी सबक़ देता है। अस्तु।

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नौ साल पुरानी बात है! वर्ष 2008 के ये ही दिन थे, जब अमरनाथ यात्रा विवाद ने जम्मू-कश्मीर में एक सरकार गिरवा दी थी, संघर्षों में 38 लोगों की मौत हो गई थी और 1989 के उग्रवाद के बाद का सबसे बड़ा वैमनस्य कश्मीर घाटी में देखा गया था।

कल ही मैं बता रहा था कि कश्मीर किस तरह से शैवों की धरती रही है। द्रविड़ों के शैववादी कश्मीर तक आकर अद्वैतवादी हो जाते हैं, वह तो ख़ैर एक अधिभौतिक प्रवर्तन है, किंतु अमरनाथ में बर्फानी बाबा का पिंड जमते ही आषाढ़ पूर्णिमा से रक्षाबंधन तक श्रद्धालुओं का जत्था एक दूसरी ही भावना के वशीभूत होकर दर्शन करने चला आता है। भारत-देश में होने वाले अनेक मेलों-खेलों, जत्रा-जत्थों का वह भी एक हिस्सा सदियों से रहा है।

लेकिन 26 मई 2008 को जम्मू कश्मीर सरकार ने “श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड” को तीर्थयात्रियों के लिए अस्थायी आवास के निर्माण के लिए कोई सौ एकड़ ज़मीन देने का निर्णय लिया, और तब शुरू हुआ तमाशा।

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सबसे पहले पर्यावरणविद् आए, जिन्होंने इससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुंचने की बात कही, जबकि उसी दौरान पुंछ से शोपियान तक जो सड़क बनाई जा रही थी, उससे सैकड़ों एकड़ वनभूमि के सर्वसम्मति से नाश पर किसी को ऐतराज़ ना था।

फिर आए “हुर्रियत” के लीडरान। सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज़ फ़ारूक़ ने बलताल से अमरनाथ तक “प्रोटेस्ट मार्च” निकालने का ऐलान किया और यासिन मलिक ने धौंस दी कि वह तब तक कोई निवाला हलक़ के नीचे नहीं उतारेगा, जब तक कि यह सौ एकड़ ज़मीन अमरनाथ यात्रियों को देने का निर्णय वापस नहीं ले लिया जाता। यासिन मलिक ने कहा : “आप लोग तो पूरी कश्मीर घाटी को ही एक हिंदू तीर्थस्थल बनाने पर आमादा हैं!”

सुलगने के लिए हमेशा तत्पर रहने वाली वादी फिर कहां पीछे रहने वाली थी? जल्द ही कश्मीर घाटी में प्रदर्शन शुरू हुए। एक-एक रैली में पांच-पांच लाख लोग उमड़े।

तालीम, तरक़्क़ी, रोज़गार के लिए यह क़ौम कभी सड़कों पर उतरकर आई हो, किसी को याद आता है? भ्रष्टाचार या बलात्कार के विरोध में कभी वैसा हुआ हो? इस्लामिक हिंसा की किसी घटना, जो कि दुनिया के किसी ना किसी कोने में रोज़ ही होती है, के विरोध में “नॉट इन माय नेम” जैसा कोई शगूफ़ा लेकर ये सड़कों पर उतरे हों? याद करके बताइए। और फिर इसके सामने यह याद कीजिए कि जहां जहां ये सड़कों पर जत्था बनाकर हुजूम में उतरेंगे, वहां या तो पथराव करेंगे, या दंगा करेंगे, या किसी आतंकवादी की लाश को सलाम ठोंकेंगे, वैसे कितने वाक़ये अभी आपको फ़ौरन याद आ रहे हैं?

समाज की संरचनाओं में नीयत का बड़ा महत्व होता है। नेकनीयत अलग तरह से काम करती है और बदनीयत अलग तरह से काम करती है। और मेरा ऐसा मानना है कि हिंदुस्तान के लोगों का अंतहीन डर, अविश्वास, घृणा और अंदेशा जीतने के लिए आपको बदनीयती का एक बड़ा-सा पहाड़ खड़ा करना होता है। उस पहाड़ को अनेक सालों के उद्यम से बहुत मेहनत से खड़ा किया गया है।

यह कोई फ़िरकापरस्त अफ़वाह नहीं, यह ज़मीनी हक़ीक़त है!

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अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने तीर्थयात्रियों को सौ एकड़ ज़मीन दी, उसमें इतने बवाल का क्या मतलब था? किंतु दुर्भावना! किंतु बदनीयत! अयोध्या में जैसी बदनीयत दिखाई गई, वैसा ही मन का मैल!

तब कश्मीर घाटी से आवाज़ गूंजी : “यह हमारी स्वायत्तता पर हमला है!”

“स्वायत्तता”, हम्म्म। यानी “ऑटोनमी”। ये “ऑटोनमी” बहुत मज़ेदार लफ़्ज़ है, जो आपकी इंसानी फ़ितरत के बारे में बहुत तफ़सीलों से जानकारियां देता है।

मसलन, हमें अपने लिए एक “ऑटोनमस” पाकिस्तान चाहिए, हमें अपने लिए एक “ऑटोनमस” बांग्लादेश चाहिए। कश्मीर इंडिया में रहेगा, लेकिन इंडिया में रहकर भी वह “ऑटोनमस” रहेगा। धारा 370 इस अलगाव का क़ायदा होगा। अलग निशान, अलग विधान, अलग प्रधान होगा। देश के नियम उस पर लागू नहीं होंगे और “जीएसटी” को जम्मू-कश्मीर में कैसे लागू किया जाए, उस पर कुछ इस अंदाज़ में फ़िक्रमंदियों के साथ मगजपच्ची की जाएगी, मानो ये जम्मू-कश्मीर कोई पड़ोसी मुल्क़ हो!

ये जो अपनी थाली, अपना लोटा, अपना चौका अलग लेकर भाईचारे का मुज़ाहिरा करने की दोमुंही फ़ितरत है, उससे केवल भोले-भाले सेकुलरान को ही भुलावा दिया जा सकता है, पूरी दुनिया को नहीं।

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2008 के विवादों ने तब कांग्रेस-पीडीपी की ग़ुलाम नबी आज़ाद सरकार गिरवा दी थी, राज्यपाल बदल गए थे और गवर्नर रूल लागू हो गया था, “हिंदू बहुल जम्मू” और “मुस्ल‍िम बहुल कश्मीर” का द्वैत अपने सबसे वीभत्स रूप में सामने आ गया था, और मौक़ा देखकर पाकिस्तान की “सीनेट” ने भी सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित करवा दिया था कि कश्मीर में मुसलमानों की संपत्त‍ियों पर जो ग़ैरजायज़ क़ब्ज़ा हिंदुओं के द्वारा किया जा रहा है, उसकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भर्त्सना की जाए!

“मुसलमानों की संपत्त‍ियों पर हिंदुओं का ग़ैरजायज़ क़ब्ज़ा”, आर यू किडिंग मी! श्राइन बोर्ड को सौ एकड़ ज़मीन देना संपत्त‍ियों का अनैतिक अधिग्रहण हो गया, जैसे कश्मीर के जंगलों का एक-एक पत्ता मुसलमानों की जायदाद हो, जबकि सच तो ये है कि हज़ारों सालों से वहां हिंदुओं का आना-जाना रहा, दाना-पानी रहा, नाते-रिश्ते रहे, और पहाड़ों पर हमेशा उनके देवता विराजित रहे!

दुर्भावनाओं की भला कितनी मिसालें गिनाई जाएं?

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यह सच नहीं है कि अमरनाथ यात्री कश्मीरियों की आंखों में खटकते हैं, अब यह संदेश देने का ज़िम्मा कश्मीरियों का ही है।

कल से सुन रहा हूं कि मुसलमानों ने अमरनाथ गुफा खोजी, मुसलमान यात्रियों की सेवा करते हैं, इतना भाईचारा है, कितना सौहार्द है। लेकिन मुझे ये कल्पनाएं और प्रवंचनाएं नहीं, दिन की रौशनी की तरह साफ़ सच्चाइयां चाहिए।

जिस कश्मीर घाटी में लाखों लोग दहशतगर्दों के मजमों में उमड़ते हैं, उतने ही लोग मुझे अमरनाथ यात्रियों के समर्थन में भी सड़कों पर चाहिए। आप कहते हैं कि अमन है और भाईचारा है! चलिए मान लेते हैं। अब आप दिखाइए कि कहां पर है! और अगर आप नहीं दिखा सकते, तो जिस दुर्भावना के तर्क हम निरंतर दे रहे हैं, उस पर सहमति में सिर हिलाइए, क्योंकि ख़ामख़यालियों और ख़ुशफ़हमियों से हक़ीक़तें नहीं बदल जाती हैं।

अमरनाथ यात्रियों पर आक्रमण करके आतंकवाद ने अपनी नीयत का परिचय दिया है और सद्भावना की ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। कमबख़्त, “गंगा-जमुनी” में भी एक “युग्म” है, वह कोई एकल अवधारणा नहीं है। इतिहास ने एक और मौक़ा तथाकथित सौहार्द की पुष्ट‍ि का दिया है, सरकारी बयानों जैसी निंदा से काम नहीं चलने वाला है। अपनी बेदाग़ नीयत का बेधड़क परिचय दीजिए! आइए, हम देख रहे हैं!

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क्योंकि आतंकवाद का भले ही हो, लाशों का कोई मज़हब नहीं होता है।

लाशें केवल लाशें होती हैं, अधखुली आंखों से शून्य में ताकती हुईं।

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सुशोभित सक्तावत

अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता

Image result for amarnath attack 2017जिस कश्मीर में मानवाधिकार के नाम पर ज्यूडिशियली खुद संज्ञान ले कर एक पत्थरबाज आतंकी को दस लाख का मुआवजा देने की सरकार को सिफ़ारिश करती हो उस कश्मीर में अगर अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में गल्फ फंडिंग और क्रिश्चियन मिशनरी फंडिंग पर पल रहे एन जी ओ बात बेबात देश को गृह युद्ध में धकेलने को लगातार युद्धरत हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।

जिस देश में लेखक और पत्रकार अपना जमीर बेच कर विचारधारा के नाम पर कश्मीरी पंडितों के विस्थापित होने पर बरसों से चुप्पी साध कर सेक्यूलरिज्म के नाम पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के पालन – पोषण में दिलोजान से लगे हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश के राजनीतिज्ञ सिर्फ़ वोट बैंक के लिए देश और समाज बांटने के लिए हर क्षण तैयार खड़े मिलते हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।

जिस देश में किसी भ्रष्ट राजनीतिज्ञ को सेक्यूलरिज्म के नाम पर तमाम सारे लोग सेफगार्ड बन कर , दीवार बन कर रक्षा में खड़े हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में लोग सिर्फ़ हिंदू मुसलमान , आरक्षण की राजनीति को ही प्रोग्रसिव होना मान लेते हों तो तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।

जिस देश में कुछ लोग गाय का मांस खाने के लिए ही पैदा होते हों , जान दे कर भी गाय का मांस खाने का ज़ज्बा रखते हों , गाय बचाने के नाम पर इंसान की जान ले लेना ही धर्म समझते हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में केरल , बंगाल हों , बशीर हाट और मालदा की सांप्रदायिकता पर फैशन और पैशन की हद तक ख़ामोशी हो तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । कश्मीर के पत्थरबाज आतंकियों को जो लोग नादान बच्चा कह कर सीना फुला कर बैठते हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।

आश्चर्य हो भी भला क्यों । अब तो इन घटनाओं पर मुझे दुःख भी नहीं होता । संवेदनहीनता की नाव में बैठ गया हूं मैं । आप क्या कर लेंगे मेरा ?

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दयानंद पाण्डेय
हिंदी साहित्य: आदिकाल

हिंदी साहित्य: आदिकाल

आदिकाल सन 1000 से 1325 तक

हिंदी साहित्य के इस युग को यह नाम डॉ॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिला है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे वीर-गाथा काल नाम दिया है। इस काल की समय के आधार पर साहित्य का इतिहास लिखने वाले मिश्र बंधुओं ने इसका नाम प्रारंभिक काल किया और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बीजवपन काल। डॉ॰ रामकुमार वर्मा ने इस काल की प्रमुख प्रवृत्तियों के आधार पर इसको चारण-काल कहा है और राहुल संकृत्यायन ने सिद्ध-सामंत काल।

इस समय का साहित्य मुख्यतः चार रूपों में मिलता है :

1. सिद्ध और नाथ साहित्य
2. जैन साहित्य
3. चारणी-साहित्य
4. प्रकीर्णक साहित्य

सिद्ध और नाथ साहित्य

यह साहित्य उस समय लिखा गया जब हिंदी अपभ्रंश से आधुनिक हिंदी की ओर विकसित हो रही थी। बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी उस समय सिद्ध कहलाते थे। इनकी संख्या चौरासी मानी गई है। सरहपा (सरोजपाद अथवा सरोजभद्र) प्रथम सिद्ध माने गए हैं। इसके अतिरिक्त शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, कण्हपा, कुक्कुरिपा आदि सिद्ध सहित्य के प्रमुख् कवि है। ये कवि अपनी वाणी का प्रचार जन भाषा में करते थे। उनकी सहजिया प्रवृत्ति मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति को केंद्र में रखकर निर्धारित हुई थी। इस प्रवृत्ति ने एक प्रकार की स्वच्छंदता को जन्म दिया जिसकी प्रतिक्रिया में नाथ संप्रदाय शुरू हुआ। नाथ-साधु हठयोग पर विशेष बल देते थे। वे योग मार्गी थे। वे निर्गुण निराकार ईश्वर को मानते थे। तथाकथित नीची जातियों के लोगों में से कई पहुंचे हुए सिद्ध एवं नाथ हुए हैं। नाथ-संप्रदाय में गोरखनाथ सबसे महत्वपूर्ण थे। आपकी कई रचनाएं प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त चौरन्गीनाथ, गोपीचन्द, भरथरी आदि नाथ पन्थ के प्रमुख कवि है। इस समय की रचनाएं साधारणतः दोहों अथवा पदों में प्राप्त होती हैं, कभी-कभी चौपाई का भी प्रयोग मिलता है। परवर्ती संत-साहित्य पर सिध्दों और विशेषकर नाथों का गहरा प्रभाव पड़ा है।

जैन साहित्य

अपभ्रंश की जैन-साहित्य परंपरा हिंदी में भी विकसित हुई है। बड़े-बड़े प्रबंधकाव्यों के उपरांत लघु खंड-काव्य तथा मुक्तक रचनाएं भी जैन-साहित्य के अंतर्गत आती हैं। स्वयंभू का पउम-चरिउ वास्तव में राम-कथा ही है। स्वयंभू, पुष्पदंत, धनपाल आदि उस समय के प्रख्यात कवि हैं। गुजरात के प्रसिध्द जैनाचार्य हेमचंद्र भी लगभग इसी समय के हैं। जैनों का संबंध राजस्थान तथा गुजरात से विशेष रहा है, इसीलिए अनेक जैन कवियों की भाषा प्राचीन राजस्थानी रही है, जिससे अर्वाचीन राजस्थानी एवं गुजराती का विकास हुआ है। सूरियों के लिखे राम-ग्रंथ भी इसी भाषा में उपलब्ध हैं।

चारणी-साहित्य

इसके अंतर्गत चारण के उपरांत ब्रह्मभट्ट और अन्य बंदीजन कवि भी आते हैं। सौराष्ट्र, गुजरात और पश्चिमी राजस्थान में चारणों का, तथा ब्रज-प्रदेश, दिल्ली तथा पूर्वी राजस्थान में भट्टों का प्राधान्य रहा था। चारणों की भाषा साधारणतः राजस्थानी रही है और भट्टों की ब्रज। इन भाषाओं को डिंगल और पिंगल नाम भी मिले हैं। ये कवि प्रायः राजाओं के दरबारों में रहकर उनकी प्रशस्ति किया करते थे। अपने आश्रयदाता राजाओं की अतिरंजित प्रशंसा करते थे। श्रृंगार और वीर उनके मुख्य रस थे। इस समय की प्रख्यात रचनाओं में चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो, दलपति कृत खुमाण-रासो, नरपति-नाल्ह कृत बीसलदेव रासो, जगनिक कृत आल्ह खंड वगैरह मुख्य हैं। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण पृथ्वीराज रासो है। इन सब ग्रंथों के बारे में आज यह सिद्ध हुआ है कि उनके कई अंश क्षेपक हैं।

प्रकीर्णक साहित्य

खड़ी बोली के आदि-कवि अमीर खुसरो इसी समय हुए है। खुसरो की पहेलियां और मुकरियां प्रख्यात हैं। मैथिल-कोकिल विद्यापति भी इसी समय के अंतर्गत हुए हैं। विद्यापति के मधुर पदों के कारण इन्हें ‘अभिनव जयदेव’ भी कहा जाता है। मैथिली और अवहट्ट में भी इनकी रचनाएं मिलती हैं। इनकी पदावली का मुख्य रस श्रृंगार माना गया है। अब्दुल रहमान कृत ‘संदेश रासक’ भी इसी समय की एक सुंदर रचना है। इस छोटे से प्रेम-संदेश-काव्य की भाषा अपभ्रंश से अत्यधिक प्रभावित होने से कुछ विद्वान इसको हिंदी की रचना न मानकर अपभ्रंश की रचना मानते हैं।

आश्रयदाताओं की अतिरंजित प्रशंसाएं, युध्दों का सुंदर वर्णन, श्रृंगार-मिश्रित वीररस का आलेखन वगैरह इस साहित्य की प्रमुख विशेषताएं हैं। इस्लाम का भारत में प्रवेश हो चुका था। देशी रजवाड़े परस्पर कलह में व्यस्त थे। सब एक साथ मिलकर मुसलमानों के साथ लड़ने के लिए तैयार नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि अलग-अलग सबको हराकर मुसलमान यहीं स्थिर हो गए। दिल्ली की गद्दी उन्होंने प्राप्त कर ली और क्रमशः उनके राज्य का विस्तार बढ़ने लगा। तत्कालीन कविता पर इस स्थिति का प्रभाव देखा जा सकता है।

Bhasha Bahta Neer by kubernath rai

भाषा बहता नीर

‘भाषा बहता नीर’। भाषा एक प्रवाहमान नदी। भाषा बहता हुआ जल। बात बावन तोले पाव रत्ती सही। कबीर की कही हुई है तो सही होनी ही चाहिए। कबीर थे बड़े दबंग और उनका दिल बड़ा साफ था। अतः इस बात के पीछे उनके दिल की सफाई और सहजता झाँकती है, इससे किसी को भी एतराज नहीं हो सकता।

बहुत कुछ ऐसी ही स्थिति है कबीर की उक्ति की भी, ”संस्‍कृत कूप जल है, पर भाषा बहता नीर।” भाषा तो बहता नीर है। पर ‘नीर’ को एक व्‍यापक संदर्भ में देखना होगा। साथ ही संस्‍कृत मात्र कूप जल कभी नहीं है। कबीर के पास इतिहास-बोध नहीं था अथवा था भी तो अधूरा था। इतिहास-बोध उनके पास रहता तो ‘अत्‍याचारी’ और ‘अत्‍याचारग्रस्‍त’ दोनों को वह एक ही लाठी से नहीं पीटते। खैर, इस अवांतर प्रसंग में न जाकर मैं इतना ही कहूँगा कि संस्‍कृत की भूमिका भारतीय भाषाओं और साहित्‍य के संदर्भ में ‘कूपजल’ से कहीं ज्यादा विस्‍तृत है। वस्‍तुतः उनके इस वाक्‍यांश, ‘संस्‍कृत भाषा कूपजल’ का संबंध भाषा, साहित्‍य से है ही नहीं। यह वाक्‍यांश पुरोहित तंत्र के‍ खिलाफ ढेलेबाजी भर है जिसका प्रतीक थी संस्‍कृत भाषा। इस संदर्भ में ‘संस्‍कृत कूप जल’ वाली बात भ्रामक है। और दूसरे अंश ‘भाषा बहता नीर’ से संयुक्‍त होने के कारण अनेक भ्रमों की सृष्टि करती है। और कबीर की भाषा-संबंधी ‘बहता नीर’ सं संयुक्‍त होने के कारण अनेक भ्रमों की सृष्टि करती है। और कबीर की भाषा-संबंधी ‘बहती नीर’ वाली ‘थीसिस’ स्‍वीकारते हुए भी समूचे कथन के संदर्भ में कुछ स्‍पष्‍टीकरण आवश्‍यक हो जाता है।

संस्‍कृत कूपजल मात्र नहीं। उसकी भूमिका विस्‍तृत और विशाल है। वह भाषा-नदी को जल से सनाथ करने वाला पावन मेघ है, वह परम पद का तुहिन बोध हैं, वह हिमालय के हृदय का ‘ग्‍लेशियर’ अर्थात् हिमवाह है। जब हिमवाह गलता है तभी बहते नीर वाली नदी में जीवन-संचार होता है। जब उत्तर दिशा में तुषार पड़ती है तो वही राशिभूत होकर हिमवाह का रूप धारण करती है। जब हिमवाह पिघलता है जो नदी जीवन पाती है, अन्‍यथा उसका रूपांतर मृतशय्या में हो जाता है। हिमालय दूर है, हिमवाह नजरों से ओझल है, पर जानने वाले जानते हैं कि यह तृषातोषक अमृत वारि जो गाँव-नगर की प्‍यास बुझाया हुआ सागर-संगम तक जा रहा है, हिमालय का पिघला हुआ हृदय ही है। यदि यह हृदय-कपाट बद्ध या अवरुद्ध हो जाए तो नदी बेमौत मारी जाएगी। ऐसा कई बार हुआ है। एक दिन था जब सरस्‍वती नदी हरियाणा अंचल से बहती हुई सिंध में जाकर सरजल में मिलती थी। परंतु बाद में उसको पोषित करने वाले ग्‍लेशियरों का मुख भिन्‍न-दिशा में हो गया, वे सरस्‍वती से विमुख होकर यमुना में ढल गए, आज भी यमुना की ओर ही वे जल-दान प्रेरित कर रहे हैं। फलतः यमुना लबालब हो गई, सरस्‍वती की मृत्‍यु हो गई (आज की यमुना में ही सरस्‍वती का जल प्रवाहित है। पर साधारण मनुष्‍य को भूगोल की इतनी बारीक जानकारी नहीं। अतः धार्मिक दृष्टि से त्रिवेणी संगम पर एक कल्पित अंत-सलिला का प्र‍तीक सरस्‍वती कूप बना दिया गया।) वस्‍तुतः सरस्‍वती का जल अब भी हम पा रहे हैं, परंतु इस जल का अब गोत्रनाम ‘यमुना जल’ है… हिमवाह के अतिरिक्त नदी के बहते नीर का दूसरा स्रोत हैं परम व्‍योम में विचरण करने वाले मेघ। पर बरसाती नदियों के लिए ही। बड़ी नदियों का जल स्रोत तो हिमवाह है। तो कहने का तात्‍पर्य यह है कि संस्‍कृत ‘कूपजल’ नहीं, भाषा और संस्‍कार दोनों की दृष्टि से यह हमारे बोली और जीवन के प्रवाहमान रूपों के लिए व्‍योम-मेघ या हिमवाह स्‍वरूप है। हिंदुस्‍तानी आकाश में मेघ है, हिंदुस्‍तानी हिमालय का हृदय निरंतर गल रहा है, इसी से हिंदुस्‍तानी जलधाराओं में मीठा बहता पानी निरंतर सुलभ है। इसी तरह देखें तो कहना पड़ेगा कि संस्‍कृत एक प्राणवान स्रोत के रूप में भाषा-संस्‍कृति आचार-विचार पर दृष्टि से अस्तित्‍वमान है। इसी से ‘यूनान, मिस्र, रोम’ के मिट जाने पर भी हम नहीं मिटे हैं। हमारा अस्तित्‍वमान है। हमारा अस्तित्‍व कायम है।’

यों कबीर की बात जो पाजिटिव (हाँ – धर्मी) अर्थ है उसे मैं शत-प्रतिशत मानता हूँ कि लेखन में बोलचाल की भाषा का प्रयोग लेखन को स्‍वस्‍थ और सबल रखता है। एक उचित संदर्भ में प्रयुक्‍त होने पर यह बात बिलकुल सही है। परंतु जब इसी बात का उपयोग हिंदी को जड़-मूल से छिन्‍न (रूटलेस) करने के लिए बदनीयती से किया जाता है तो बात आपत्तिजनक हो जाती है। संदर्भ बदल देने से किसी भी बात का स्‍वाद और प्रहार भिन्‍न हो सकता है।

जब ‘भाषा बहता नीर’ का उपयोग कूट तर्क के लिए फिराक गोरखपुरी या कुछ नए लोग भी (जो खुद तो वैसी ही भाषा लिखते हैं जैसे हम और आप) करते हैं तब ये इस बात को एक दुराग्रह के रूप में परिणत कर देते हैं। अतः कबीर की बातों का केवल सत्‍यग्राही अर्थ ही मुझे मंजूर है, चाहे यह बात हो या कोई और बात। स्‍वयं कबीर ने संस्‍कृत का उपयोग किया है अपनी भाषा में। कबीर बहुत बड़े आदमी हैं। उनके खिलाफ कुछ कहना छोटे मुँह बड़ी बात जैसी हिमाकत होगी। परंतु कबीर भी कहीं न कहीं जाकर ‘आम आदमी’ ही ठहरते हैं और ‘संस्‍कृत भाषा कूपजल’ वाली बात उसी ‘आम आदमी’ की खीझ है जबकि दूसरा वाक्‍यांश खीझ नहीं एक सूझ है। मैं भी मानता हूँ कि भाषा बहता नीर है, भाषा मरुतप्राण है, खुले मैदान की ताजी हवा है, भाषा चिड़ियों के कंठ से निकला ‘राम-राम के पहर’ में सबेरे का कलरोर है, पशुओं के कंठ से रँभाता हुआ आवाहन है, उसका हुंकार है, लोलुप श्‍वापदों के कंठ से निकला महातामसी गर्जन भी है। भाषा बच्‍चे की तोतली बोली भी है, माँ की वात्‍सल्‍य-भरी साँसें भी हैं, विरह-कातर शोक-उच्‍छ्वास भी है और मुदितचक्षु सुख के क्षणों का मौन-मधु भी है। वज्र की कड़क से लेकर शब्‍दहीन मौन तक के सारे सहज स्‍वाभाविक व्‍यापारों को भाषा अपने स्‍वभाव से धारण करके चलती है। इसी भाषा को वाक रूपा कामधेनु या भगवान मानकर वंदित किया है।

”देवी वाचमजयंत देवाः तां विश्‍वरूपा पशवो वदंति” (अथर्व शीर्ष)। इसी बात को कबीर आदिभूत ‘जल’ के बिंब का आश्रय लेकर कहते है, ‘भाषा बहता नीर’ और यह सर्वथा युक्तिपूर्ण बात है। पंरतु किसी भी सार्वभौम सत्‍य की तह में तह होती है। अतः क्रय-विक्रय हाट-बाजार एवं व्‍यावसायिक आवश्‍यकताओं से बाहर आकर जब हम साहित्‍य-सर्जना के स्‍तर पर आते हैं, इस सार्वभौम सत्‍य ‘भाषा बहता नीर’ के सारे अंतर्निहित पटलों को खूब समझकर ही हमें इसे स्‍वीकार करना चाहिए। मैंने कबीर के इस भाषा-सिद्धांत को अपने लेख में इसके ‘सतही अर्थ’ में नहीं बल्कि ‘सर्वांग अर्थ’ में ही स्‍वीकृत किया है। मैंने अपने लेखन में न केवल बाजारू हिंदी बल्कि भोजपुरी से भी, जो मेरी अपनी बोली है, शब्‍द मुहावरे, भंगिमाओं की अभिव्‍यक्ति को माँग के अनुसार बेहिचक ग्रहण किया है। मैंने पूर्वी यू.पी. यानी गंगातीरी काशिका क्षेत्र की लोक-संस्‍कृति को केंद्रित करके एक पुस्‍तक लिखी है ‘निषाद बाँसुरी’। इस किताब में मैंने भारतवर्ष की पुनर्व्‍याख्‍या करने की चेष्टा कह है, आर्येतर तत्वों पर जोर देकर। लोक-संस्‍कृति के विभिन्‍न दिकों को प्रस्‍तुत करते समय गाँव-देहात की शब्‍दावली का मैंने बेहिचक प्रयोग किया है। कबूतरबाजी, अड्डाबाजी, चोरी, नौकायन के शब्‍दों से लेकर गाँव-देहात के अनेक मुहावरे उसमें आ गए हैं। उसमें ही नहीं, बल्कि संपूर्ण लेखन में मैंने शब्‍द-संपदा को महत्‍व दिया है। जो शब्‍द जन-समाज के कंठ से निकला है, वह कभी भी, कहीं भी, ‘अपवित्र’ नहीं। अपवित्र या अश्‍लील स्‍वयं शब्‍द नहीं होते, बल्कि संदर्भ या उद्देश्‍य अपवित्र या अश्‍लील होते हैं, ऐसा मैं मानकर चलता हूँ।

अतः ‘भाषा बहता नीर’ एक सही कथन होने के साथ-साथ सतही नहीं, गंभीर कथन है। इस कथन की गंभीरता पर जरा विचार करें। क्‍या यह ‘बहता नीर’ महज आज का यानी 1981 का ही ‘बहता नीर’ है। इतनी स्‍थूल और सतही दृष्टि से सोचना कबीर के एक महावाक्‍य को पुनः लॅंगड़ा और बौना कर देगा होगा। ‘भाषा बहता नीर’ है तो इसमें किसी भी युग, किसी भी क्षेत्र का शब्‍द अंतर्भुक्‍त हो सकता है। शर्त यही है कि (1) अभिव्‍यक्ति की माँग उस शब्‍द की हो, (2) वह शब्‍द वाक्‍य में सहजता से खप जाए, देवता के प्रसाद की पवित्र थाली में रखा हुआ ‘आमलेट’ जैसा विश्री न लगे, (3) अल्‍प प्रयत्‍न के बाद ही समझ में आ जाए। यों तीसरी शर्त का क्षेत्र भी संदर्भ के अनुसार निर्धारित हो सकेगा। हर जगह ‘दो आने तंबाकू दो’ जैसी सरल बोधगम्‍य अभिव्‍यक्ति से काम नहीं चल सकता। परंतु हमारा आदर्श सहजता और बोधगम्‍यता ही होना चाहिए। बिना जरूरत भाषा को दुरूह करना कबीर के इस महावाक्‍य की प्रकृति के प्रतिकूल होगा। पर जहाँ जरूरत हो, वहाँ भाषा के समग्र प्रवाह से, सर्वकालव्‍यापी प्रवाह से शब्‍द लेने का हमारा अधिकार होना चाहिए। जो हमें इस अधिकार से वंचित करने के लिए कबीर की इस बात का सीमित बौना अर्थ लगाते हैं, वे किसी कूट मतलब से ऐसा कर रहे हैं। सर्वदा 1981 के बाजार में चालू शब्‍दों से ही हमारा काम नहीं चल सकता। लेखक फिल्‍मकार नहीं, वह शिक्षक भी है। उसका कर्तव्‍य जनमानस को ज्यादा से ज्यादा समृद्ध करना है। और इस दृष्टि से वह नए शब्‍द अपने पाठकों को सिखाएगा ही। उसका दायित्‍व फिल्‍म-निर्माता के व्‍यवसायी दायित्‍व से बड़ा है।

कहने का तात्‍पर्य यह कि भाषा को अकारण दुरूह या कठिन नहीं बनाना चाहिए। परंतु सकारण ऐसा करने में कोई दोष नहीं। गोसाईं जी जब दार्शनिक विवेचन करने बैठते हैं तो उसी ‘मानस’ की भाषा में ऐसी पंक्तियाँ भी लिखते हैं, ”होइ घुणाक्षर न्‍याय जिमि, पुनि प्रत्‍यूह अनेक।” या कबीर को खुद जरूरत पड़ती है तो योगशास्‍त्र और वेदांत की शब्‍दावली ग्रहण करते हैं। हर जगह लुकाठी हाथ में लिए सरे बाजार खड़े ही नहीं मिलते। मानसरोवर में डूबकर मोती ढूँढ़ते समय की भाषा बाजार वाली भाषा नहीं। एक आधुनिक गद्य से उदाहरण दूँ और क्षमा किया जाए कि अपने ही लेखन से उद्धृत कर रहा हूँ। ”मैंने नदी की ओर अनिमेष लोचन दृष्टि से देखा।” यहाँ पर ‘अनिमेष और लोचन’ को क्षमा कर देने पर भी पाठक पूछेगा, यह ‘अनिमेष’ लोचन दृष्टि क्‍यों? क्‍या ‘अनिमेष लोचनों से देखा’ पर्याप्‍त नहीं होता? मेरी समझ में पर्याप्‍त नहीं होता? पहली बात तो मुझे यह लगी कि वाक्‍य की अंतर्निहित लय एक और शब्‍द माँगती है, अतः ‘दृष्टि’ शब्‍द मैंने भर दिया। दूसरी बात यह है कि ‘लोचनों’ अर्थात् दो लोचनों से देखना। यह दृष्टि के घनीभूत एकीकरण का बोध नहीं देती जो अनिमेष-लोचन दृष्टि देती है, दोनों आँखों का संयुक्‍त बल लेकर उपस्थित ‘एक’ दृष्टि के रूप में। परंतु यह दोनों कारण उतने सटीक नहीं भी लिए जा सकते हैं पर तीसरा और मूल कारण ऐसा लिखने का यह है कि ‘अनिमेष लोचन-दृष्टि’ बौद्ध साहित्‍य में उस दृष्टि का नाम है जिससे बुद्ध ने पहली बार बोधिवृक्ष को निहारा था। थके, हारे, निराश गौतम बुद्ध ने जब महाअरण्‍य के बोधिवृक्ष पर पहली नजर डाली तो लगा कि यही वृक्ष उनका परम आश्रय है, यहीं पर परम विराम है, और परम शांति है और उसे वे निर्निमेष निहारने लगे। ‘मैंने नदी की ओर अनिमेष-लोचन-दृष्टि से देखा’ में ऐसे ही विशिष्‍ट रूप से निहारने की क्रिया का संकेत है, नदी को परम आश्रय, परम प्रियतमा, परम देवता के रूप में ग्रहण करते हुए। इतना बड़ा भाव ही वहाँ अव्‍यक्‍त रह जाता यदि मैं लिखता, ”मैंने अनिमेष लोचनों से देखा” या ”मैंने एकटक नदी की ओर देखना शुरू किया”। यों बिना इस गूढ़ अर्थ को जाने भी वाक्‍य को समझा जा सकता है। इसलिए मैंने इस बिंब का प्रयोग करने में कोई हानि नहीं देखी-आखि़र ये शब्‍द तो हिंदी के ‘बहता नीर’ के ही अंग हैं, कोई ‘जर्फरी तुफरी’ तो नहीं जो कोई न समझे और निबंधकार का काम होता है पाठक के मानसिक-बौद्धिक क्षितिज का विस्‍तार। वह फिल्‍म प्रोड्यूसर नहीं कि पाठक की बुद्धि-क्षमता की पूँछ को पकड़े-पकड़े चले। साहित्‍यकार पाठक की उँगली पकड़कर नहीं चलता, बल्कि पाठक साहित्‍यकार की उँगली पकड़कर चलता है। सनातन से यही संबंध रहा है, आज जनवादीयुग का सस्‍ता नारा उठाकर इस संबंध को परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

‘बाढ़ें कथा पार नहिं लहऊॅं’। अतः अंत में मुझे यही कहना है कि हिंदी की भूमिका आज बहुत बड़ी हो गई है। उसे आज वही काम करना है जो कभी संस्‍कृत करती थी और आज जिसे एक खंडित रूप में ही सही अंग्रेजी कर रही हैं उच्‍च शिक्षित वर्ग के मध्‍य। उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान का वाहन बनना है, उसके अंदर वैसी आंतरिक ऋद्धि-सिद्धि लानी है जो भारत जैसे महान और विशाल देश की राष्‍ट्रभाषा के लिए अपेक्षित है। अतः ‘बहता नीर’ का चालू सतही अर्थ न लेकर उसे एक व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में देखना होगा, जिसका आभास ऊपर दिया जा चुका है। सधुक्‍कड़ी और चुनाव-भाषणों से ज्यादा बृहत्‍तर दायित्‍व है इस हिंदी का। यह स्‍मरण रखते हुए हम भाषा के संबंध में चिंतन करें तो अच्‍छा होगा। जिसको हम ‘बहता नीर’ मानकर ग्रहण कर रहे हैं, वह वस्‍तुतः हिमालय का दान है, हिमालय के पुत्र हिमवाहों का दान है और अनंतशायी समुद्र की वाष्‍प-लक्ष्‍मी का दान है। नदी तो माँ ही है, अतः उसको नमोनमः पर साथ ही दिशिदेवतात्‍मा हिमालय को नमोनमः, उसके पुत्र बलशाही हिमवाहों को नमोनमः, और सिंधु एवं व्‍योम को भी नमोनमः, साथ ही नदी की अनेक धाराओं, उपधाराओं और सहायक नदियों, रामगंगा-गोमती-बेसी-मंघई-तमसा और सरयू को नमोनमः। अर्थात् हिंदी की आंचलिक बोलियों को, भोजपुरी, मगही, अवधी, छत्‍तीसगढ़ी, ब्रजभाषा आदि-आदि को हम इस ‘बहता नीर’ का अंग ही मानते हैं। पीका, सीका, बेहन, गाछ, पुली, गुदारा, (भा भिनुसार गुदारा लागा) जैसे शब्‍द खड़ी बोली के पास कहाँ हैं! धरहर, अदहन, पगहा जैसे भोजपुरी शब्‍दों का प्रयोग मैंने किया है। ‘पगहा’ अर्थात जो ‘चरण’ (गति) को ही ध्‍वस्‍त कर दे, अपहृत कर ले यानी पशु के बाँधते की रस्‍सी। ऐसे अभिव्‍यक्तिपूर्ण शब्द खड़ी बोली में मिलने दुर्लभ हैं। हम न केवल आंचलिक बोलियाँ, बल्कि अगल-बगल की भाषाओं से यथा पंजाबी, राजस्‍थानी, गुजराती, असमिया, बँगला, से भी शब्‍द और मुहावरे ले सकते हैं। ‘दूर के ढोल सुहावने’ के साथ-साथ असमिया ‘पहाड़ दूर से ही सुंदर लगात है’ भी मजे में चल सकता है।

संस्‍कृत भाषा के समृद्ध तथा अभिव्‍यक्ति-क्षम होने का रहस्‍य है यही भूमावृत्ति अर्थात शब्‍द-संपदा को चारों दिशाओं से आहरण करने की वृत्ति। यही कारण है कि संस्‍कृत में एक शब्‍द के अनेक पर्याय हैं। ये पर्याय मूल रूप से विभिन्‍न भारतीय अंचलों से प्राप्‍त उस शब्‍द के लिए क्षेत्रीय प्रतिशब्‍द मात्र हैं। इस संदर्भ में अपनी एक आपबीती सुनाऊँ। कुछ वर्ष पूर्व मद्रास की और यात्रा कर रहा था हावड़ा-पुरी मार्ग से। गाड़ी उड़ीसा से दक्षिणी भागों में चल रही थी कि एक छोटे से स्‍टेशन पर (नाम स्‍मरण नहीं) एक आदमी खिड़की के पास चिल्‍लाता हुआ गुजरा, ‘कडली, कडली’। मेरी समझ नहीं आया कि वह ‘कडली’ क्‍या बला है? या ‘भाषा बहता नीर’ की शैली में कहें तो मेरे भोजपुरी मन से मुझसे प्रश्‍न किया ‘ई’ ‘सारे’ का कह रहा है? ‘टुटी-फुटी’ बँगला में पूछा, ‘कडली की जिनिस?’ प्रत्‍युत्तर में मेरी नाक के सामने पके केले की घोर झुलाकर दिखाने लगा, ‘कडली-कडली।’ बाद में पता चला कि वह कह रहा है – ‘कदली’ पर आकर्षण के लिए उच्‍चारण को अपनी ओर से रच रहा है ‘कडली’ के रूप में। तब मैंने ‘शिक्षित उड़ीसा सज्‍जन’ से कहा, ”सर, दिस इज द पीपुल्‍स-वर्ड हियर” (महाशय, यहाँ यह सामान्‍य बोली का शब्‍द है।) इसका अर्थ हुआ कि संस्‍कृत में जो शब्‍द पयार्यवाची रूप में आए हैं, वे सब कहीं न कहीं की जनभाषा के सामान्‍य शब्‍द ही हैं। संस्‍कृत में जब परंपरा रही है तो वह उसकी उत्तराधिकारिणी हिंदी में भी चलनी ही चाहिए। प्रयोग की रगड़ खाते-खाते 25 या 50 वर्ष में शब्‍द परिचित हो जाएँगे। तात्‍पर्य यह है कि अभिधा-लक्षण-व्‍यंजना की जरूरतों के अनुसार हिंदी भाषा को विकसित करने के लिए ‘भाषा बहता नीर’ के साथ-साथ ‘भूमावृत्ति’ को भी समान महत्व दिया जाए। सरलता यदि दरिद्रता का पर्याय हो जाए तो वह हमें मंजूर नहीं। सरलता और समृद्धि दोनों चाहिए।

Nishaad Baasuri by Kuber Nath Rai

निषाद बाँसुरी

सप्तमी का चाँद कब का डूब चुका है। आधी रात हेल गयी है। सारा वातावरण ऐसा निरंग-निर्जन पड़ गया है गोया यह शुक्ला सप्तमी न होकर शुद्ध नष्ट-चंद्र निशा हो। अभी-अभी हमारी नाव ‘झिझिरी’ अर्थात् नौका-विहार खेलकर लौटी है। नाव को तट से बाँधकर चंदर भाई फिर ‘गलई’ अर्थात इसके अग्रभाग पर आ विराजते हैं और प्रस्ताव करते हैं – ”यार, अब सोने कौन जाए? पहर-डेढ़ पहर जो रात बची है, बातें करते-करते काट देंगे।” इधर चार-पाँच वर्षों से जब मैं घर आता हूँ तो एक पूरी संध्या और उससे जुड़ी हुई रात्रि अपने बाल-सखा चंदर माझी को समर्पित करता हूँ। अपनी प्यारी नदी के सान्निध्य में, जिसकी सेवा वे जन्म से ही बड़े मनोयोगपूर्वक कर रहे हैं, मैं इनका आतिथ्य ग्रहण कर कृतकृत्य होता हूँ और ये मुझे नौका नयन के दो-चार गीत सुनाते हैं, और सबसे बढ़कर चंद्रविगलित ज्योत्स्ना में नदी के एकांत वक्ष पर झिझिरी खेलने का अवसर देते हैं, तब मेरा आदिम निषाद-मन मुझे कुछ क्षणों के लिए पुनः इस जन्म में भी मिल जाता है। मेरा विश्वास है, और मैं इसे ‘विश्वासं अप्रमेयम्ं’ अर्थात् प्रमाण-अप्रमाण के द्वंद्व से परे का विश्वास मानकर बैठा हूँ, कि किसी जन्म में मैं गंगातीरी निषाद अवश्य था अन्यथा इस नदी के प्रति इतनी मोह-माया, इसमें इतना माँ जैसा भरोसा और बल क्यों अनुभव करता! नदी के प्रति आसक्ति ही शायद यह कारण है कि यह अँगुठियाकेशी, गठीला बदन, निरक्षर निषाद युवक मेरा इतना घनिष्ठ हो उठा है।

यों भी चंदर हैं बादशाही तबीयत वाले। बात के धनी, मन से उदार और विपत्ति में घोर साहसी। हाथ में अंकारी रहने पर जल या थल के किसी श्वापद का सामना करने को तैयार। गत वर्ष, ब्याहने गये एक को, पर लौटे दो के साथ और दोनों बहुओं का क्या ही कवित्वपूर्ण नाम रखा है ‘रूपसी’ और ‘पियासी’, जो गंगा की धारा में पायी जाने वाली दो तरह की मछलियों के नाम हैं। कहते हैं कि बेटे का नाम रखेंगे रोहित। ऐसे ‘मन को बड़ो महीप’ के साथ मेरी दोस्ती न होना ही अस्वाभाविक होता। मुझे लगता है मीन-मिथुन-जैसी दो बहुओं के बीच वे एक पद्मफूल हैं।

आज मैं घंटों नौका विहार करके भी, चंदर भाई के साथ थकावट नहीं महसूस कर रहा हूँ। इस सुनसान निरंग-निर्जन में वे अपने पुरुष कंठ से सीधी नदी को जगाने के लिए एक पुराने गान की आवृत्ति करते हैं। इस निचाट स्तब्धता में यह गान किसी अपदेवता के कंठस्वर जैसा सुनाई पड़ता है और मैं एकाध बार चंदर को अँधेरे में भी देखने की चेष्टा करता हूँ कि चंदर ही हैं न! क्योंकि इस क्षण में और इस जगह पर क्या ठिकाना कब क्या हो जाए। पास में ही मुर्दाघाट है। आखिर रात तो इन्हीं रात्रिचरों के हिस्से में है। हमारे हिस्से में तो दिन है, जिसमें ये सब चुपचाप अदृश्य या निश्चल रहते हैं। पर जैसे-जैसे रात भीगती जाती है, श्वापद-आरण्यक, पेड़-पल्लव, घाट-बाट, भूत-प्रेत सभी धीरे-धीरे जग जाते हैं और उस समय वे या तो काना-फूसी करते हैं अथवा निःशब्द एवं क्रूर आहार-विहार। यदि ऐसे में कोई हँसे, कोई गान गाये, कोई इनके एकांत में खलल डाले तो फिर ये भी उसे दंडित कर सकते हैं। मैं डोंगी के चौड़े तख़्ते पर लेटा हूँ और चंदर ‘गलई’ पर बैठे-बैठे गान भरपूर खुले कंठ से गा रहे हैं। सुनते हुए मुझे लगता है कि हम दोनों बंधु किसी भी भूत-प्रेत से कम नहीं।

”गंगा मैया,

कोई जे सोवेला रन बन,

कोई जे बेइलिया बने हो!

कोई जे सोवेला बलुआ क रेतवा

त’ तोहरे सरन धइले हो!

गंगा मैया,

राजा जे सोवेला रन बन,

रानी बेइलिया बने हो!

मलहा त’ सोवेला बालू क रेतवा,

त’ तोहरे सरन धइले हो!”

निषाद प्रार्थना कर रहा है : ”ओ माता, ओ गंगा मैया, सोयी हो या जागी हो? जरा उठो देखो, मेरी बोझी हुई नाव, मेरी ‘बरधी’ इस बालू के रेत में अटक गयी है। माँ, मैं तुम्हारी शरण में नित्य रहने वाला निषाद हूँ। तुम्हारा ही आश्रय गहकर चलता हूँ। ओ माँ, राजा तो रणभूमि में शिविर में सोता है, रानी महँ-महँ सुवासित बेला-वन में सोती है, पर मैं दीन निषाद तुम्हारे तट की बालूमयी रेती पर सोता हूँ और तुम्हारे बल पर निर्भर रहता हूँ। आज मेरी नौका ‘चोर बालू’ में फँसी है और बालू नाग की तरह कुंडली मारकर नाव को भीतर खींचता जा रहा है। माँ, अब मैं गया! जगी हो या सोयी हो जल्दी उठो। मैं, मेरी नाव, नाव पर लदा सार्थ, सब तुम्हारी शरण में।” नदी रात-भर श्वापदों और आरण्यकों को पानी पिलाती रही है। अभी-अभी सोयी है। अभी वह कच्ची नींद या ‘बालिका नींद’ में है। उसकी ‘बारी नींद’ में निषाद का करुण आवाहान खलल डाल रहा है। पर नदी को जगना ही पड़ता है। नदी में निषाद के आशीर्वाद के मात्र बाहु-विक्रम से कोई पार नहीं पा सकता। इसी से निषाद कातर कंठ से प्रार्थना कर रहा है : ”माँ, जल्दी कर, अब भरोसा टूट रहा है।” नदी की ‘बारी नींद’ टूट जाती है और वह आँख मलती उठती है, पहचानती है कि यह और कोई नहीं उसकी बालू पर आजन्म खेलने-खाने वाली उसकी प्यारी संतान ही है। नदी उठकर भरमुँह, कंठ खोलकर आशीष देती है, नखशिख-रक्षा कवच देती है और साथ ही नाव के अंदर वेग भरती है। इस प्रकार कर्तव्य का, कर्म का भार लादे हुए वह नाव धर्म के घाट जा लगती है जो सबसे सुरक्षित घाट है और सार्थ सुरक्षित पार उतर जाता है।

स्तब्ध निचाट रात में मानव कंठ का ऐसा मुक्त प्रार्थना-संगीत निश्चय ही क्रुद्ध रात्रिचरों को, कपटी कामरूपी अपदेवताओं को और साँप जैसे फण काढ़े वन्या की क्रुद्ध लहरों को सबकुछ को अपने वशीकरण से बाँध सकता है, ऐसा अनुभव करते-करते मैं इस गान को सुन रहा था, और बिना दाद या प्रशंसा की प्रतीक्षा किये हुए चंदर एक गीत के बाद दूसरा गीत उठाते जा रहे थे। लगातार पाँच गीत मैं सुनता रहा, एक से एक अपूर्व। अंतिम गीत का भाव कुछ इस प्रकार था : ”ओ नदी, ओ माता, मेरी नाव पूरब देश से धीमे-धीमे लौट रही है। यह नाव तुम्हारी पूजा के लिए रँगी हुई पियरी से बोझी है, तिरंगी चुनरी से बोझी है, इसे धीमे-धीमे निर्भय चलने का आशीर्वाद दो। ओ माँ, यह नाव तुम्हारे शृंगार के लिए हार-फूल से बोझी है, जवाकुसुम और कनेर से बोझी है, तुम्हारी सात पुष्पांजलियों के लिए इस पर केले के पत्तों पर शेफाली के फूल लदे हैं, इसे धीमे-धीमे निर्भय चलने का आशीर्वाद दो। ओ माँ, इस नाव पर तुम्हारी माँग के लिए सिंदूर और श्रीअंगों के लिए हल्दी बोझी गयी है। इसे धीमे-धीमे निर्भय चलने का आशीर्वाद दो। ओ माँ, यह नाव तुम्हारे चरणों पर अर्घ्यधार गिराने के लिए लौंग-मधु और दूध के सात घटों से बोझी है। इसे धीमे-धीमे निर्भय चलने का आशीर्वाद दो।”

गान के अंतिम भाग में नदी अपने निषाद-शिशु की बात सुनकर भरमुँह अर्थात् मुक्तकंठ कलकल ध्वनि से आशीर्वाद देती है : ”ओ निषाद, जैसे मेरे जल को कोई काटकर दो टुकड़े नहीं कर सकता वैसे ही तू भी अखंड-अच्छेद्य है। और जब तक मैं हूँ, जब तक मेरी धारा है, तब तक तू भी वर्तमान है।” गीत सुनकर मुझे लगा कि नदी हाथ उठाकर कुछ और भी कह रही है जिसे चंदर सुनते हैं, समझ नहीं पाते हैं, परंतु मैं खूब समझ रहा हूँ। मुझे लगा कि नदी कह रही है कि ओ निषाद, तेरी संस्कृति, तेरे संस्कार, तेरा मन, सब कुछ इस जल की तरह है, जो टूटता नहीं, कटता नहीं, भले ही दब जाता है और आकृति बदल लेता है, पर अस्तित्वहीन नहीं होता है – यहाँ तक कि सूख जाने पर भी या तो अंतःसलिला का अंग बन जाता है या उड़कर मेघ बनकर पुनः लौटता है।

भारतीय धरती के आदि-मालिक निषाद ही थे। भारतीय भाषाओं में मूल संज्ञाएँ, भारतीय कृषि के मूल और आदिम तरीके और भारतीय मन के आदिम संस्कार उन्हीं की देन हैं।

इस अर्थ में निषाद-द्रविड़-आर्य-किरात इन चारों महाकुलों में निषाद ही अग्रज हैं। परंतु मध्य प्रदेश आदि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर इसका इतना घोर आर्यीकरण हो चुका है कि आज यह पहचाना नहीं जा सकता। ऊपर-ऊपर से यह स्वयं निषादत्व खोकर आर्य हो चुका है, पर भीतर-भीतर तथाकथित भारतीय आर्य का अंग विश्लेषण करें तो पता चलता है कि इस महानायक के अर्थात इस पितर भारतवर्ष के इतिहास वपु की शिरा-धमनी में निषाद-मन प्रवाहित है, स्नायुमंडल की रचना द्रविड़ संस्कृति करती है, अस्थि धर्म की रचना में किरात-संस्कृति की रंग-बिरंगी बनावट है और इसके मनोमय कोषों की रचना आर्य-सरस्वती करती है। चंदर के अंदर तो निषाद-संस्कार ही हैं, वह तो गंगातीरी निषादों की सातों आर्यीकृत ‘कुरियों’ में से एक से संबंधित ही हैं, जिन्हें रामचंद्र ने पावन कर दिया था। परंतु यह मैं जो अपनी ‘स्वधा’ को ‘वत्स-भृगु-यमदग्नि-च्यवन-आप्नवान’ के पंचप्रवर में जोड़ता हूँ मैं भी इस आदिम निषाद से वंचित नहीं हूँ। मेरे संस्कार प्रवाह में भी यह बैठा है। मेरी भाषा, मेरे भोजन-पान, मेरी खेतीबाड़ी-हरबा-हथियार के मध्य वह कृष्णकाय आदिम निषाद अपने को व्यक्त कर रहा है, जिसने विश्व में सर्वप्रथम इसी गंगा की घाटी में धान-चावल का आविष्कार किया था, भैंस को दुधारू बनाया था, जड़ी-बूटियों और फलों को पहचाना था और उन्हें नाम दिया था तथा खेती के औजारों को गढ़ा था। चंदर भाई के गुरु रामदेवाजी के मुँह से मैं निषाद कुल की गरिमा की अनेक ऊल-जलूल बातों को सुनता आ रहा हूँ और आश्चर्य होता है कि कभी-कभी उन बातों का आधुनिक भाषाविज्ञान और पुरातत्त्व से अजब सटीक बैठ जाता है।

चंदर मुझसे अकसर कहा करते हैं : ”अरे हम लोग जरा काले हैं, नहीं तो आप लोगों से नीच थोड़े हैं!..” और प्रमाण न पूछने पर भी रामदेवाजी की अपूर्व ऊल-जलूल थ्योरी का संदर्भ तुरंत देते हैं, जिसे सुनकर मैं भौचक्का रह जाता हूँ। तर्क करने जाऊँगा तो चंदर डपटकर कहेंगे – ”अरे गोसाईं जी को पढ़ो, गोसाईंजी को! है न? ‘तुलसी सुनि केवट के वर बैन हँसे प्रभु जानकि ओर हहा है।’ सोचो जरा, प्रभु जानकी की ओर देखकर क्यों हँसे! क्यों न लक्ष्मण की ओर देखकर हँसे? बोलो?” और यह सब सुनकर क्या बोलूँ, मेरी तो सरस्वती ही बेहोश हो जाती है। चंदर माझी स्वयं समाधान करते हैं : ”अरे भाई, गोसाईंजी बड़े सावधान लेखक थे। उनके एक-एक ‘लफ्ज’ का भी मतलब है, बेमतलब तो उन्होंने कुछ कहा ही नहीं है। यहाँ पर मतलब यह है कि” और तब गुरु रामदेवाजी की शैली में तर्जनी नचाते हुए चंदर भाई तौल-तौलकर शब्दों की चोट करते हैं, ”मतलब यह कि, रामचंद्र जी सीताजी की ओर इशारा कर रहे हैं, कि यह निषाद तो समवर्ण का है, अतः कहीं पाँव धोने के हठ के बहाने कन्यादान करने का उपक्रम तो नहीं कर रहा है? पर इस गूढ़ भाव को सबके सामने कैसे कहें! इसी से सीता की ओर नजर मारकर हँस देते हैं।” मुझे स्मरण है कि जिस दिन प्रथम बार इस थ्योरी से परिचित हुआ था, उस दिन अपनी सारी पढ़ी हुई विद्या को धिक्कारता हुआ घर लौटा था।

पहली बार यह बात ऊटपटाँग अवश्य लगी थी। परंतु कालांतर में भारत की मौलिक जातियों के संबंध में श्री बी.एस. गुहा, डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या और डॉ. हटन आदि के प्रबंधों को पढ़ने पर मुझे लगा कि इक्ष्वाकुओं और निषादों की कुल परंपरा के संदर्भ में यह थ्योरी अक्षरशः सत्य भले ही न हो, परंतु यह सारी बात बिल्कुल वृषभ-दुग्ध या शश-शृंग-जैसी भित्तिहीन नहीं। आधुनिक पंडितों का विचार है कि रामायण की मिथक निषादकल्पना से प्रसूत है।

निषाद वृषाकपिदेवों और अपदेवताओं को पूजने वाली जाति है। वैदिक आर्यों में अवतारवाद स्वीकृत ज्ञात होता है, परंतु अत्यंत हलके तौर पर। ‘`त्र्विक्रम विष्णु’ या ‘गोपा विष्णु’ के उल्लेख अवतार के द्योतक न होकर देवता के बहुरूपी रूपांतर के द्योतक हो सकते हैं। देवता प्रेममय है और हमारे त्राण के लिए वह ‘माया वपु’ धारण करता है, इस तथ्य का दृढ़ आधार वैदिक मंत्रों में नहीं मिलता है। इसी से आधुनिक विद्वानों की कल्पना है कि भारतीय संस्कारों में अवतारवाद का प्रवेश निषादों-जैसी आनंदवादी और द्रविड़ों जैसी भाववादी जातियों की कल्पना की दान है।

इस संदर्भ में स्मरण रखने की बात यह है कि रामायण के मिथक के प्रधान संपादक वाल्मीकि की छंद सरस्वती का जागरण एक निषाद द्वारा किये गये क्रौंचवध के फलस्वरूप ही संभव हुआ था। पूरी रामायण की कथा भले ही निषाद-कल्पित न हो, परंतु उसके ताने-बाने में कुछ प्रसंग और कुछ विश्वास तो अवश्य ही ऐसे हैं जो निषादों में प्रचलित रहे होंगे। संभवतः वाल्मीकि के समय निषादों में किसी उनके ही रंग के अनुरूप ”नील सरोरुह श्याम तरुण अरुण वारिज नयन” देवता की कल्पना एवं उसके महा अवतरण में विश्वास प्रचलित रहा होगा, जो आकर इन निषादों को पाप-ताप से मुक्त करके गले लगाएगा और पंक्ति-पावन कर देगा।

किसी चरम देवता अथवा परम पुरुष के अवतरण की प्रतीक्षा बहुत काल से निषाद जाति कर रही थी। किसी ‘दूर्वादलश्यामं’ देवता के आगमन की, उसके द्वारा महिमा-मंडित और पुण्यशाली बनाये जाने की कल्पना पुरुष प्रति पुरुष निषाद जाति करती आ रही थी, और इसी बीच में इक्ष्वाकुओं के आर्यकुल में एक प्रतापशाली राजपुरुष का जन्म हुआ, और उसके शील-स्नेह और चरित्र में तथा शताब्दियों प्रतीक्षित देव कल्पना में साम्य दिखाई पड़ा, और यह साम्य निषादों में प्रचलित अवतार की कल्पना के चौखटे में पूरा-पूरा उतर गया तथा उन्होंने उक्त इक्ष्वाकुवंशीय कुमार को, उसके अलौकिक कर्म को, अपने महादेवता के अवतरण के रूप में देखा। ऐसा होना असंभव नहीं।

परंपरा के अनुसार वाल्मीकि ने जब राम को अपने महाकाव्य का नायक चुना, तो उनकी प्रज्ञा में उक्त-निषाद विश्वास निरंतर सक्रिय रहा और उन्होंने गौरवपूर्ण आर्यवंशीय कुमार को दूर्वादलश्यायम एवं नीलोत्पलश्याम रूप में देखा, तथा कथा के अंदर वृषाकपियों का प्रसंग लाकर निषाद-कल्पना को पुनः नया संस्कार दिया। वाल्मीकि गंगा और तमसा के बीच के अरण्य में रहते थे और प्रचलित निषाद-विश्वासों से उनका न प्रभावित होना ही अस्वाभाविक होता। रामकथा इस बात का प्रमाण है कि गंगातीर के निषादों का जीवन रामचंद्र द्वारा ही संस्कार समृद्ध किया गया है। अतः राम का उनकी कल्पना के केंद्र में प्रवेश कर जाना असंभव नहीं। हो सकता है कि निषादों की कल्पना रही हो कि उनका प्रिय देवता जब माया-मनुष्य बनेगा, तो उसे विमाता दुःख देगी, उसे वन-वन भटकना पड़ेगा, वह दुःखी देवता ही निषादों का आलिंगन करके उन्हें परम पावन और शुद्ध बनाएगा और वही देवता ऐसा सुशासन स्थापित करेगा कि धरती पर से रोग-शोक-पाप की छाया हट जाएगी और दुःखी कोई नहीं रहेगा। और इस निषाद-कल्पना को राम के ऐतिहासिक चरित्र में वाल्मीकि ने संभवतः अंतर्भुक्त कर दिया है।

यह तो सभी जानते हैं कि असम, बंगाल या अन्य प्रदेश की निषाद जातियों यथा कैवर्तों, धीवरों, तीयरों या मध्यप्रदेश के मुंडा, कोल आदि को जो भी माना जाता रहा हो, परंतु सनातन से गंगातीरी केवटों और माझियों को पवित्र माना जाता रहा है, तथा उनके द्वारा स्पर्श किया हुआ जल सनातन काल से ग्रहण किया जाता रहा है, क्योंकि रामचंद्र और बाद में इक्ष्वाकुओं के कुल पुरोहित वशिष्ठजी ने निषादराज का आलिंगन करके उनकी अस्पृश्यता समाप्त कर दी थी और उन्हें आर्य-महिमा से मंडित कर दिया था। राम नाम की सील मुहर के आगे मनुस्मृति भी नतमस्तक है। इस मिथकीय प्रसंग का ऐतिहासिक तात्पर्य यह है कि इक्ष्वाकुवंशीय आर्यों के संसर्ग में आकर गंगातीर के निषादगण आर्य सभ्यता के अंतर्गत आ गये। यहाँ तक कि निषादों ने अपनी भाषा भूलकर आर्य भाषा को ही मातृभाषा मान लिया। उनका खान-पान, रहन-सहन आर्यों की पद्धति पर यथासामर्थ्य चला गया। गंगातीर के केवट कहते हैं कि रामचंद्र जी ने उन्हें दो हुक्म दिये थे। एक तो नाव को तट पर बाँधकर भी जल में ही छोड़ देना, घसीटकर बालू पर नहीं करना। दूसरा यह कि कच्ची मछली कभी मत खाना। सदा नमक-हल्दी-सरसों देकर मछली खाना या भूनकर मछली नमक के साथ खाना। यह दूसरी आज्ञा देखने में भले ही साधारण लगे, पर उनके अंदर नागरिकता और आर्य रीति के प्रवेश कराने का प्रयत्न है। अन्य प्रदेशों के निषादों की अपेक्षा गंगातीर के निषादों के चाल-चलन, कथन-भंगिमा आदि में विशिष्ट गौरव झलकता है। अन्य जातियों के अपने-अपने लोककाव्य हैं, यथा अहीरों की ‘लोरकी’, कहारों का ‘बिहुला’ आदि। निषादों में नौकानयन और प्रेम संबंधी फुटकल गीत अवश्य है, परंतु कथा-काव्य की जगह वे तुलसीदास की रामायण ही गाते हैं। राम ही उनके लोकनायक हैं, अन्य कोई नहीं। राम के प्रति उनमें एक सहज समर्पण और मोह है ”तुम केवट भव सागर केरे। नदी नाव के हम बहुतेरे।”

पूर्वी उत्तरप्रदेश के गंगातीरी निषादों में सात कुल हैं : केवट, चाँई, बथवा, धीवर, तीयर, सोरहिया और मुंडार (मुंडार शब्द ‘मुंडा’ से मिलता-जुलता है, जो मध्यप्रदेश की एक आर्यत्व वंचित निषाद शाखा का नाम है और हो सकता है कि सुदूर अतीत में इनसे कोई संबंध भी रहा हो।)। इन सात कुलों में रामचंद्र का सखा निषादराज गुह किस कुल का था? चंदर भाई तो कहते हैं कि निषादराज चाँई थे। हमारे गाँव में चाँई और केवट दोनों हैं और दोनों यह गौरव लेना चाहते हैं। चाँई कहते हैं कि जेठे तो हमीं लोग हैं। शृंगवेर पुर वाले केवट हैं या चाँई, मुझे पता नहीं। ये गोस्वामी जी ने साफ लिखा है : ‘माँगी नाव न केवट आना।’ अतः मैं कहता हूँ कि शृंगवेरपुर का निषाद चाँई नहीं, केवट ही था। तब चंदर के लिए इतने बड़े कुल-गौरव को छोड़ना मुश्किल हो जाता है और वे हठपूर्वक कहते हैं : ”यहीं पर जरा-सी बिल्कुल जरा-सी, भूल गोसाईंजी से हो गयी है। बात यह है कि वे ब्राह्मण थे और हम लोगों की कुरी वगैरह भीतरी बातें वे क्या जानें? उन्हें लिखना चाहिए था ‘चाँई’ तो लिख दिया ‘केवट’। आखिर जेठी कुरी तो हम चाँई ही हैं। सभा का सरदार तो चाँई ही होता आया है।” चंदर के अनुसार शुद्ध पाठ होना चाहिए, ‘माँगी नाव न चाँई आना।’ या ‘तुलसी सुनि चाँइहि के वर बैन हँसे प्रभु जानकि ओर हहा है’ आदि। मैं समझता हूँ कि भाई चंदर, चाँई लोग तो इससे भी बृहत्तर गौरव के अधिकारी हैं। यह चाँई निषाद ही था, जिसके बाणों से क्रौंचवध हुआ और फल हुआ वाल्मीकि की छंद-सरस्वती का जन्म। चाँई नहीं होता तो रामायण ही लिखी नहीं जाती। अतः चाँई का कम महत्त्व नहीं। परंतु तो भी चाँई कुल-कमल-दिवाकर चंदर निषाद इस प्रश्न पर संधि नहीं करते और अपनी ही फेंटते जाते हैं कि गुह निषाद उनके ही कुल ‘चाँई’ का पूर्वपुरुष था। अंत में मुझे चाँई-गौरव के प्रति नतमस्तक होकर चुप हो जाना पड़ता है।

मैं अपनी जन्मभूमि गंगातट से प्रायः दूर रहने को बाध्य हूँ और जीविकोपार्जन के लिए इस किरातारण्य से घिरे आर्यों के बीच, लौहित्य तट पर, निवास कर रहा हूँ। मेरे पैरों में चक्र है और मुझे दर-दर भटकने का शाप मिला है। इस शाप भोग में भी बड़ा रस है, बड़ा सुख है। परंतु फिर भी कभी-कभी थक जाता हूँ और मन उदासी का व्यूह काटने में असमर्थ हो जाता है। तब अपने भीतर आत्मा को चींथते-फाड़ते कुत्तों को सम्मोहन में लाकर फिर थपकी देकर सुला देने के लिए मुझे किसी श्लोक, किसी गान अथवा किसी दृश्य का चिंतन करना पड़ता है और ऐसे वेदना विकल क्षणों में अपनी प्यारी नदी की ज्योत्स्ना विगलित रजत-धारा, चंदर की बातें और मीन-मिथुन जैसी दोनों भाभियों रूपसी और पियासी के गाये गीतों की मनोरम स्मृतियाँ बड़े काम की साबित होती हैं। जब मेरे मन के अंदर उन दोनों द्वारा गाये गये किसी गीत की स्मृति जगती हैं, और मन भीतर ही भीतर उसे गाने लगता है तो लगता है कि आत्मा और मन के सारे नख-दंत-क्षतों पर अपनी प्यारी नदी की झिर-झिर धार प्रवाहित होने लगी। लगता है कि वेदना-विकल मस्तक में किसी सुखद शीतल देवधुनी का जन्म हो रहा है, ऊपर से कोई फूल बरसा रहा है, नीचे रूपसी-पियासी के कंठ से निःसृत गान की डोर पर खिंची चंदर भाई की पाल तनी नाव धीमे-धीमे आ रही है, उनके लिए हल्दी, सिंदूर और मेरे लिए भोग-प्रसाद का भार लादे हुए। यह ध्यान-लब्ध दृश्य मुझे तीनों लोकों का राजा बनाकर निहाल कर जाता है, और मैं भूल जाता हूँ अपने कंठस्वर की अष्टावक्र भंगिमा को और मैं भी गुनगुनाने लगता हूँ उन्हीं से सुना हुआ एक गान :

”राधे-रुकमिनि चलेनी नहनवा, सुखा के गंगा ना।

भइली बलुआ क रेतवा, सुखा के गंगा ना!

रोवेली अटइन-रोवेली बटइन, रोवे कुआँ क पनिहारिन ना।

मुँहवा रुमलिया देके रोवेला केवटवा

कि मोरी बोझल नइया अगम भइली ना!”

– ”राधा और रुक्मिणी स्नान को चली हैं, पर गंगाजी सूख गयी हैं, यह पापहरा नदी मृत हो चुकी है, चारों ओर बालू की रेती है, चारों ओर तृषा ही तृषा है, अटवी-कन्या रो रही है, बटोही की वधू रो रही है, मुँह पर रूमाल रखकर बेचारा निषाद रो रहा है कि उसकी बोझी नौका अब अगम हो गयी!” फिर गीत आगे चलता है और राधा अपने आँचल की खूँट में बँधी सात फूल लौंग रुक्मिणी को देती हैं। रुक्मिणी लौंग को रगड़कर पीसती हैं। राधा और रुक्मिणी नतजानु होकर नदी माता को लौंग-धार का अर्घ्य देती हैं। और तब, गीत की अंतिम कड़ी में :

”राधे रुकमिनि कइली पूजनिया, छछा के गंगा ना

भइली दूनो नख आर-पार, छछा के गंगा ना!

हँसेले अटइन, हँसेले बटइन, हँसे कुआँ क पनिहारिन ना!

फेंक के रुमलिया हँसेला केवटवा,

कि मोर बोझल नइया ऊपर भइली ना!”

– ”राधे और रुक्मिणी ने छछाकर अर्थात् हुलासपूर्वक गंगा का पूजन किया। नदी ने भी उल्लासपूर्वक आशीष देकर दोनों तटों को नखानख (लबालब) जल से परिपूर्ण कर दिया। चारों ओर प्रसन्नता छा गयी। जीवन लौट आया। अटवी कन्या हँस पड़ी। बटोही की वधू हँस पड़ी। कुएँ की पनिहारिन भी हँस पड़ी और सबसे बढ़कर नदी की संतान केवट मुँह पर से रूमाल फेंककर मुक्तकंठ से ठहाका लगाकर हँस पड़ा कि उसकी बोझी नौका अब ऊपर हो गयी, अब यह नदी का अगम जल ही तरणी का सुगम मार्ग बन गया, अब उसकी नाव गंतव्य दिशा की ओर बाणवेग से छूटेगी।”

2

चंदर माझी के गुरु रामदेवाजी एक अद्भुत जीव हैं। उनके लिए ‘व्यक्ति’ न कहकर सर्वभूतमय ‘जीव’ शब्द का प्रयोग ही मुझे अधिक उपयुक्त जँचता है। अंतिम विश्लेषण में हम सब जीवात्मा ही ठहरते हैं और यही कारण है कि इस देश में ‘जय जीव’ श्रेष्ठतम अभिवादन वाक्य माना जाता था। साक्षी हैं गोस्वामीजी जिनके महाकाव्य ‘मानस’ में राजा दशरथ के मंत्री ‘जय जीव’ कहकर शीश झुकाते हैं। ‘जय जीव!’ अर्थात् भीतर की जीवात्मा नामक महासत्ता की जय हो जो हममें, आपमें, पशु-पक्षी में, तृण-तरु सबमें हैं। यह शुद्ध वेदांती प्रमाण है। आज भी हिंदी भाषा में हम जिसे बड़ा मानते हैं जिसमें ब्रह्म के अलौकिक स्फुरण का स्पष्टतः हमें भान होता है, उसके नाम के पीछे ‘जी’ लगाते हैं जो ‘जीव’ का ही रूपांतर है। जार्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा था कि एक गणतंत्रवादी पुरुष के लिए ‘मिस्टर’ अर्थात् ‘श्री’ से बढ़कर कोई उपाधि नहीं, इसके आगे ‘जनाब’, ‘सर’, ‘स्कॉयर’, ‘बाबू’, ‘महाराजा’ आदि सब तुच्छ हैं। उसी दृष्टि से एक वेदांती के लिए ‘जी’ से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ उपाधि हो ही नहीं सकती। एक वेदांती के लिए किसी भी व्यक्ति के अन्य विरुद मिथ्या हैं, मोहमाया हैं, रज्जु-सर्प या शुक्ति-रजत जैसी भ्रांतियाँ हैं। उसका तो एक ही विरुद असली है और वह है ‘जीवात्मा’ जिसका संक्षिप्त रूप है ‘जी’ या ‘जीव’। अतः जब मैं गुरु रामदेवाजी को ‘जीव’ कहकर पुकारता हूँ, तो इसमें उनकी तौहीनी नहीं, उनकी सर्वोच्च गरिमा का द्योतन है। साथ ही, इससे हमारा और उनका परस्पर अपनत्व व्यक्त होता है। अतः जब मैं रामदेवाजी को ‘अद्भुत जीव’ कहता हूँ तो ‘जीव’ से हमारा तात्पर्य अँगरेजी का ‘क्रीचर’ शब्द नहीं, वेदांत का ‘जीवात्मा’ होता है। और ‘अद्भुत’ इसलिए कि वे कभी-कभी मुझे साक्षात अद्भुत रस का सगुण रूपांतर लगते हैं।

वे जन्म से ही अद्भुत हैं, जब वे भूमिष्ठ हुए तो हल्ला हो गया कि बच्चा मरा हुआ जनमा है। दाई बच्चे को हाँडी में कसकर गाँव के बाहर परती जमीन में गयी, गड्ढा खोदा गया। हाँडी गड्ढे में रख दी गयी। पता नहीं दाई के मन में कौन-सी प्रेरणा आयी कि उसने मिट्टी भरने के पूर्व हाँडी का ढक्कन एक बार खोलकर देखा तो पाया कि बच्चा टुकुर-टुकुर ताक रहा है। बस, फिर क्या था, उसने जल्दी-जल्दी बच्चे को बाहर निकाला। दूसरे क्षण, उसी वंध्या ‘परती’ भूमि में शिशु का प्रथम कंठ फूटा एवं कुछ मिनट के बाद ही केवटों का उदास मुहल्ला ढोलक और सोहर से पुनः मुखरित हो उठा। जीवन का प्रथम स्तवगान उन्होंने वंध्याभूमि में किया था और आज भी इस अस्तोन्मुख वेला में वे चिर-कुमार ही हैं।

उनकी भोजन-पान की रुचि भी विचित्र है। सुरती-तंबाकू से घोर वैराग्य, परंतु ‘ताड़ी’ और ‘कारन’ (देव-अर्पित मदिरा) खूब चलते हैं। दूध से जितना वैर हैं, घोर खट्टी दही से उतनी ही आसक्ति। सबको ‘सजाव’ अर्थात् ताजी-मीठी दही अच्छी लगती है, तो इनकी मान्यता है कि मीठी दही असली दही नहीं है। ”अरे दही हो तो ऐसी हो कि एक बार मुरदे की जबान पर रख देने पर वह भी चैतन्य होकर उठ बैठे!… दही जितनी खट्टी होगी उतना ही उसमें ताड़ी का मजा आयेगा।” रामदेवाजी कबके छब्बीस से खब्बीस हो गये, सुर्खाब पर झुर्रियाँ पड़ गयीं, परंतु मन में चिरयुवा, मौज-मस्ती को परम धर्म मानने वाला आदिम निषाद अब भी रह-रहकर जोर मारता है। वही ठहाका, वही दुस्साहस, वही छत्तीसा, वही ताल-पखावज जो सारी जवानी देश-विदेश नौका खेते हुए और गंगा-ब्रह्मपुत्र की चंचल धार से लड़ते हुए व्यक्त होते रहे, आज भी रह-रहकर अभिव्यक्त हो जाते हैं। उनका चिरकुमार मन अब भी छोकरा है, पर भुजाएँ थक गयी हैं। अब पाँच-छह साल से बाहर नहीं जाते। यही गंगा तट पर ‘छाड़न’ भूमि में परवल, करैले, खरबूजे उगाकर गुजर कर लेते हैं। न आगे नारी रूपी ‘नकेल’ है और न पीछे परिवार रूपी खूँटा-पगहा है। रात्रिचरों अर्थात शृगालों, श्वापदों और आभीर बालकों के उत्पात से जो कुछ बच रहता है उसमें एक आदमी की गुजर हो ही जाती है, और कभी अपने दैवी, अर्धदैवी या मानवी इष्ट मित्रें को षोडशोपचार सामग्री में कुछ कमी हो जाए तो चंदर जैसे ‘मन को बड़ी महीप’ शिष्य हैं ही।

देखने में रामदेवाजी छोटे कृष्णवर्ण, गठा शरीर, पकहर केश, रतनार नयन, चौड़ा जबड़ा, पर नुकीली नाक वाले टिपिकल गंगातीरी निषाद हैं। माथे पर सिंदूर और कंधे पर पीला या गुलाबी गमछा लगाये निर्भीक कंठ से देवी का ‘पचरा’ गाते हैं और क्षण-प्रतिक्षण साँवली होती हुई संध्या में नदी जल के भीतर ‘कारन’ वारि गिराकर पता नहीं, किसकी पूजा करते हैं, दीप जलाते हैं और हमारे जैसों को चना-गुड़ का प्रसाद देते हैं। उस समय साँझ के सँवराते अर्ध-तमस वातावरण में, जब वहाँ मुझे छोड़कर और कोई तीसरा नहीं रहता, कोई शाबर-मंत्र बुदबुदाते हुए वे अचानक रतनार आँखें खोलते हैं, तो उस क्षण वे मुझे नदी के साक्षात अपदेवता की तरह ज्ञात होते हैं।

कृष्ण पक्ष की रात में नदी के तट पर मैं अकेले उनके साथ बैठकर उनकी बातें सुनता हूँ। उनकी निरक्षर, पर अद्भुत कल्पनाप्रवण शैली से ऐसा भयस्तब्ध या अद्भुत-मौन वातावरण बन जाता है कि कभी-कभी मन के असावधान क्षण में मुझे लगता है कि नदी की धारा में या हवा में कोई खिलखिलाकर अभी-अभी हँस पड़ा है अथवा अभी-अभी नदी जल से निकलकर कोई पास से गुजरा है या अभी-अभी मेरे अवचेतन में ठहक लाल पाढ़ साड़ी पहने कोई अपना अस्तित्व जता गयी है। उनकी बातें ही ऐसी होती हैं कि सुनने वाले की कल्पना शक्ति अति जाग्रत हो जाती है, चेतन स्तर नशे में ढलने लगता है, और अवचेतन के जीव रह-रहकर झाँक जाते हैं। दूसरे ही क्षण पुनः सावधान हो जाने पर कहीं कुछ नहीं। प्रवाद है कि उन्होंने भूत-डामरविद्या को ‘कामरूकमच्छा’ अर्थात् कामरूप में जाकर ‘गुणियों’ से सीखा है। प्रति पूर्णिमा को नदी के उस पार जाकर वे ‘यक्षिणी-साधन’ करते हैं जो पता नहीं क्या बला है। पर यदि वह यक्षिणी ‘मेघदूत’ के यक्षों की लीलावधू हो और मंत्रबल से अलका छोड़कर ऐसे सुपुरुष के पास उसे आना पड़े तो उसकी किस्मत में लाल ‘बोरो’ चावल का नैवेद्य, भुनी मछली, ‘कारन’ एवं जवाकुसुम या पीत कनेर का हारफूल, यही सब उपलब्ध होगा! और ऐसी अवस्था में कल्पवृक्ष शीतल छाया, मंदाकिनी का मणिमय तट और ‘मधु रतिफलं’ की मदिरा को त्यागकर इस मर्त्य महीरुह-स्थाणु के पास वह आएगी ही क्यों? पर रामदेवाजी का विश्वास है कि इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में वे यक्षिणी को वशीभूत कर ही लेंगे। एक ही जन्म की साधना से थोड़े कुछ होता है! अरे, ‘जनम जनम मुनि जतन कराहीं!’

इधर मैंने बी.एस. गुहा, डॉ. हटन, डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या के कुछ प्रबंधों को पढ़ा है और निषाद अर्थात ‘आस्ट्रिक’ और किरात अर्थात ‘इंडो-मंगोलीय’ संस्कृतियों के संबंध में भाषावैज्ञानिक और पुरातत्त्व संबंधी तथ्यों की चर्चा तथा पढ़ने-सुनने का भी थोड़ा-बहुत अवसर मुझे मिला है। यों मेरा सारा ज्ञान पल्लवग्राही ही रहा है परंतु इस सबमें मुझे चंदर माझी और रामदेवाजी की ऊल-जलूल बातों की ‘हुंकारी’ मिल जाती है और रामदेवाजी के ऊल-जलूल तथा गुहा-हटन-चाटुर्ज्या आदि के ऊहापोह में कोई न कोई संबंध अवश्य है और वह संबंध बादरायण संबंध मात्र न होकर कोई तत्त्वगत सार्थक संबंध है, ऐसी मेरी धारणा है।

हमारे गंगातीरी या उत्तर भारतीय निषाद, जिन्हें हम आम तौर से ‘मल्लाह’ कहते हैं, मूलतः ‘आस्ट्रिक’ या ‘अग्निकोणीय’ नस्ल के हैं, जो भारतीय धरती के आदि मालिक थे। उत्तर भारत में हर अर्थ में इनका इतना आर्यीकरण हो चुका है कि इनके अंदर निषादत्व का अस्तित्व बहुत कम रह गया है। भाषा बदलने से संस्कृति बदल जाती है। इनकी भाषा आर्यभाषा हो गयी। वे अपनी उस आदिम भाषा-भूषा-भोजन को त्याग चुके हैं जो अब भी मुंडा-कोल आदि मध्यप्रदेशीय ‘आस्ट्रिकों’ या ‘निषादों’ में वर्तमान है। इस आर्यीकरण का प्रतीकात्मक संकेत है राम द्वारा निषादराज के कुल को पावन करने की कथा में। आर्य-निषाद मिश्रण महाभारत में व्यापक तौर पर स्वीकृत था। और इस मिश्रित नस्ल के सबसे महिमामय फल हैं द्वैपायन कृष्ण व्यास। आज के मध्यप्रदेश अर्थात् त्रेता के जन्मस्थान और दंडकारण्य में यह प्रक्रिया उतनी ही तीव्र नहीं चली फलतः वहाँ अब भी ‘निषाद संस्कृति’ अपनी निषाद भाषा-भूषा-भोजन के साथ अक्षुण्ण है। परंतु उत्तर भारत में आर्यीकरण हो जाने के बावजूद भारतीय भाषा, भारतीय चिंतापद्धति और भारतीय स्वभाव पर इनका बड़ा प्रभाव है। लगता है कि इतिहास का आदिम निषाद राजनैतिक स्तर पर पराजित होकर भी हमारे मन और बुद्धि में प्रवेश कर इतनी सीमा तक विजयी हो गया कि विजेता आर्यत्व के कायाकल्प और मानसकल्प दोनों एक साथ घटित हो गये एवं उत्तर भारत की देह, वाणी, मन और बुद्धि का चतुरंग रूपांतर हो गया। ‘मल्लाह’ शब्द तो पेशावाचक शब्द है। मध्य युग में जब जलयात्रा और जहाजरानी पर अरबों का पूर्ण आधिपत्य हो गया तो इस शब्द का ‘नाविक’ के अर्थ में अधिक प्रचलन हो गया। मूलतः यह अरबी शब्द है। इसका प्रचलन भी हिंदी प्रदेशों तक ही सीमित है। असल संज्ञा है निषाद।

बुद्ध के समय उत्तर भारतीय निषाद आर्यघराने के अविभक्त अंग बन चुके थे। प्रायः कारीगर तथा कमकर इन्हीं में से आते थे। इनके स्वभाव में आर्यों जैसी चिंतन-प्रवणता तथा महत्त्वाकांक्षा नहीं थी। द्रविड़ों की तरह इनमें भावुकता तथा कवित्व नहीं था। ये तो शुद्ध आनंदवादी थे। नाचो, कूदो, परिश्रम करो, मौज उड़ाओ… जोगीड़ा सररर! उत्तर भारतीय त्योहार होली की विशिष्ट भंगिमा का मूल स्रोत निषाद स्वभाव ही है। दिन के लिए खाने को हो तो कल की फिक्र करने वाला जोरू का भाई!

द्रविड़ संचयवादी थे, कल की फिक्र करते थे, फलतः व्यापार और नगर संस्कृति की रचना उन्होंने की। पर निषाद आरण्यक तबीयत के थे। जो कमाया उसे संवत्सर के भीतर व्यय करके नये संवत्सर के साथ नवान्न का भोग करो – यह थी उनकी दृष्टिभंगी। आज भी मतसा के केवट चार मास बाहर तरबूज बेचकर या नौका खेकर हजार रूपये लेकर लौटते हैं तो उसे जल्दी से जल्दी मछली-भात, ताड़ी और जुआ में मास-डेढ़ मास में खर्च कर देने की कोशिश करते हैं। उनको भय होता है कि उनका कमाया रुपया कहीं जमकर दही न बन जाए, या सड़ न जाए, अतः फेंको इसे जल्दी बाजार में। परंतु भारतीय खेती का सूत्रपात करने वाले निषाद ही हैं। गंगातट के जंगलों को साफ करके पहले-पहल इन्हीं के द्वारा कृषि कर्म का श्रीगणेश हुआ। खेती के औजारों के नाम उन्हीं की देन है। विविध बीजों और अन्नों का जंगली घासों के भीतर उन्होंने ही आविष्कार किया। उनमे मुख्य है ‘धान’! ‘यव’ और ‘गोधूम’ आर्य शब्द हैं, ‘ब्रीहि’ (धान) द्रविड़ शब्द हैं जो अँगरेजी ‘राइस’ का आदि बिंदु है : ब्रीहि-रीहि-रीसि-‘राइस’। परन्तु भाषावैज्ञानिकों का कथन है कि ‘चावल’ शब्द निषाद (आस्ट्रिक) शब्द है जिसके मूल में है ‘जोम’ या ‘जाम’ (खाना) जो मुंडा-कोल बोली में अब भी प्रचलित है। जोम-झजाम-झचाम-झ चाव-झचावल। यही नहीं, आधुनिक भाषावैज्ञानिकों की दृष्टि में कदली, नारिकेल, ताल, तांबूल, वातिड्गण (बैंगन), आलाबु (लौका), निंबुक, जंबू, कर्पास, शाल्मली इत्यादि अनेक वृक्षों और तरकारियों के नामों का मूल स्रोत निषाद भाषा ही है। गंगातीर पर पाया जाने वाला काँटेदार वृक्ष ‘बबूल’, जिसके लिए असमिया भाषा में एक सुंदर नाम है ‘तरुकदंब’, शुद्ध निषाद शब्द है। हिंदी में ‘बबूल’ कहते हैं, बाँगला में ‘बाबला’। ‘अश्व’ आर्य शब्द है। परन्तु ‘साद’ (टट्टू) निषाद शब्द है। ‘साद’ से ही ‘सातवाहन’ अर्थात् घुड़सवार शब्द निकला है। कुक्कुट, मोर, मातंग, गज शब्द भी निषाद बोलियों से संबंधित हैं। ‘बाण’ और ‘लगुड़’ (भोजपुरी ‘लउर’ अर्थात् लाठी) शब्द जिनसे क्रमशः बाँगला और हिंदी के पुरुष चिह्न द्योतक शब्द निकले हैं, निषाद शब्द है। निषादों ने न केवल खेती करना बल्कि गुड़ बनाना, पान का प्रयोग, ‘कोड़ी’ (बीस) में गिनने की पद्धति, बुनाई कला, भैंस और हाथी पालना आदि का भी समारंभ किया है। ए.एल. बाशम के अनुसार संसार में सर्वप्रथम गंगा की घाटी के निषादों ने ही भैंस को पालतू बनाया।

श्री विभूतिभूषण वंद्योपाध्याय ने अपने एक संस्मरणपरक उपन्यास ‘आरण्यक’ में बताया है कि कुछ आदिवासियों के अंदर, जिनका संबंध ‘आस्ट्रिकों’-निषादों से जोड़ा जा सकता है, ‘टांडवारो’ नामक एक अपदेवता की काष्ठ मूर्त्तियाँ स्थापित करने की प्रथा है। ये जंगली भैंसों के देवता हैं। महिष बलि, महिषमर्दिनी दुर्गा की पूजा, शीतला की पूजा अपने आदि रूप में निषाद संस्कृति से प्रारंभ होती है। देह पर विवाह के अवसर पर हल्दी लगाना आर्यों में भी प्रचलित था। पर यह उन्होंने जलजीवी जाति निषादों से सीखा होगा। देह पर हल्दी मलकर जल में कूदने पर हल्दी की गंध से घड़ियाल-मगर आदि पास नहीं फटक सकते। संभवतः सिंदूर का प्रयोग भी आदिम निषादों ने ही प्रारंभ किया था।

बात कर रहा था रामदेवाजी की और बहककर चला गया गुहा-हटन-चाटुर्ज्या आदि का हरा-भरा खेत चरने। तो भी जो कुछ मैंने इधर-उधर की बातें कहीं हैं वे हँसुए के ब्याह में खुरपी का गीत निश्चय ही नहीं। बूँद में समुद्र का आह्वान और गुणधर्म भरा होता है। रामदेवाजी की ऊल-जलूल बातों और आधुनिक नृतत्वशास्त्र भाषाविज्ञान की ऊहा की बीच यही बूँद और समुद्र का संबंध है। रामदेवाजी का टोना-टोटका और भूत-डामर विशुद्ध निषाद-प्रतिभा की उपज है। और इसकी परंपरा पाँच हजार वर्ष पुरानी है एवं रामदेवाजी के शब्दों में व्यतीत पाँच हजार वर्षों के संस्कार मूर्त होते हैं। (स्मरण रहे कि ‘टोना’, ‘टोटका’ तथा अँगरेजी के ‘टोटेम’, ‘ताबू’ आदि शब्दों का मूल उत्स भी निषाद या आस्ट्रिक है) ये निषाद संस्कार हम सबकी शिरा-धमनी में हमारे षड्रिपुओं के साथ-साथ सहअस्तित्व बनाकर सक्रिय हैं।

रामदेवाजी अपनी अजीब ‘अड़बी-तड़बी’ बोली में जो कुछ कहते हैं उसका आधा ही मैं समझ पाता हूँ, पर जो समझता हूँ वह अपूर्व लगता है। वे कहते हैं, ”एक अनदेखा चन्द्रमंडल है आकाश केंद्र में। उसमें ‘मृगा’ है। ‘मृगा’ पर सवार है देवी और देवी पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण चारों ओर मुट्ठी-मुट्ठी बीज प्रतिक्षण फेंक रही है – न केवल गाछ-पात, लता-तरु के बीज बल्कि आदमी, जानवर, पंख-पखेरू सबके बीज। ये बीज चारों दिशाओं में चौदहों भुवन में निरंतर बिखरते रहते हैं और रूप लेते रहते हैं। देवी के नयनों से सात रंग बरसते रहते हैं। उसकी नजर से ही ये सारे रूप अपना-अपना रंग लेते हैं, रंग बदलते हैं, रंग उड़ते हैं और निरंग हो जाते हैं।” रामदेवाजी आविष्ट की तरह अर्धनिमीलित चक्षु होकर यह सब कहते जाते हैं और तब अचानक आलू जैसी बड़ी-बड़ी लाल आँखें खोलकर मेरी ओर ताकते हैं और वर्णन पूरा करते हैं। ”देवी की दायीं आँख रंग-बिरंग नजरें मारती हैं, सृष्टि को रंग प्रदान करती है। देवी की बायीं आँख उन रंगों का भक्षण करती है। और देवों की तीसरी आँख ललाट में स्थित है जो सूर्य के रथ का नियंत्रण करती है। दिन-रात का आना-जाना उसी आँख के इशारे पर होता है। मौसम उसी आँख की भंगिमा देखकर बदलते हैं… हम-तुम, ये चिड़िया-चुरुंग, पशु-प्राणी सभी उसी चंद्रमंडल से बिखरे बीजों के लता-पता हैं।” और इस प्रकार का कथन समाप्त करते हुए रामदेवाजी अपना मस्तक श्रद्धा से झुका लेते हैं।

चंद्रमंडल के इस महत्त्व की वार्ता सुनकर मुझे बहुत-सी बातें स्मरण हो आती हैं, जिन्हें मैंने डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या के एक निबंध में पढ़ा था। वर्तमान युग में पोलीनीशिया में आस्ट्रिक या निषाद पंचांग अब भी चालू है और उनकी तिथि गणना चंद्रमा पर आधारित है। सृष्टि और काल का मूल उत्स है चंद्रमंडल, ऐसा पुराने निषादों (आस्ट्रिकों) का विश्वास था। वे चंद्रमा की कलाओं के आधार पर तिथि-गणना करते थे। आश्चर्य है कि सुदूर पोलीनीशिया में चालू पंचांग में पूर्ण चंद्र और नष्ट चंद्र तिथियों के लिए जो शब्द आते हैं वे हैं ‘राका’ और ‘कुहू’। इससे सिद्ध होता है कि ‘राका’ और ‘कुहू’ निषाद भाषा के शब्द हैं। आर्यों ने निषाद संस्कृति को आत्मसात् करने की प्रक्रिया में इन्हें अपनी भाषा में दाखिल कर लिया। हमारे ज्योतिष शास्त्र में ‘मातृका’ नक्षत्र मंडल है, जिसे पोलीनिशियन पंचांग में अब भी ‘मातरिकी’ कहते हैं। चाटुर्ज्या महाशय की यह सूचना रामदेवाजी की ‘अड़बी-तड़बी’ रहस्यवाणी के संदर्भ में मेरे लिए और अर्थवान हो उठती है।

आर्य लोग चंद्रमा को औषधियों का स्वामी मानते हैं। मुझे लगता है यह विश्वास निषादों से अनुप्रेरित है। इस देश की जड़ी-बूटियों, घास-पात, पेड़-पौधों के पहले जानकार तो निषाद ही थे, कृषि कर्म के प्रथम नायक भी निषाद ही थे। ऐसी अवस्था में औषधियों का संबंध चंद्रमा के साथ पहले-पहल उन्हीं की कल्पना द्वारा जोड़ा गया होगा। औषधियों से आरोग्य होता है, अतः उनमें अमृत का अंश है। सोम या चंद्रमा औषधियों का राजा है, या ‘अनदेखे चंद्रमंडल’ में औषधियों का बीज है, अतः सोमकला या चंद्रमा में भी अमृत है। यह कल्पना संभवतः निषादों ने की होगी। उनके मन में प्रश्न आया होगा – यह चंद्रमा आया कहाँ से? समुद्र से। अतः समुद्र-मंथन करके अमृत-कुंभ और उसका सहोदर अमृत कलावाला चंद्रमंडल का निकाला जाना उन्होंने ही पहले-पहल कल्पित किया होगा। अमृत-मंथन की मिथक भारतीय आर्यकुल में ही प्रचलित है, नार्डिक या ग्रीक घराने में नहीं। अतः यह समुद्र मंथन का ‘मिथक’ शुद्ध देसी प्रतिभा, संभवतः निषाद-प्रतिभा की उपज है। चंद्रमा का पिता समुद्र है, तो समुद्र के नीचे क्या है? निषाद-कल्पना ने उत्तर दिया होगा, समुद्र के नीचे पाताल है जहाँ पर भी एक अमृतकुंभ है, जहाँ मणियाँ हैं, जहाँ अतुलित बलशाली नाग हैं, जो इन दोनों अलभ्य वस्तुओं की रक्षा करते हैं। क्योंकि उन्हें छोड़कर धरती के भीतर गहरी बामी में और कोई जीव नहीं रहता। इस प्रकार कल्पना-दर-कल्पना चलती रही और सबका उत्स रहा निषादों का चंद्र-प्रेम। आर्य ऊषा और आदित्य के उपासक थे। सोम नामक जड़ी का पान करके वे क्षणिक देवत्व का आवेश भोग कर लेते थे। निषादों के संसर्ग में आकर उन्होंने ‘सोम’ का संबंध चंद्रमंडल से जोड़ा और सोम का अर्थ हुआ चंद्र।

ग्रीक महाकाव्यों का ‘नेक्टार’ और आर्यों का ‘सोमरस’ केवल देवोपम निश्चिंतता और आनंदयुक्त मत्तता देते हैं। पर अमृत की कल्पना कुछ और ही है। अमृत की कल्पना में औषधि तत्त्व का संकेत है क्योंकि वह अमृत रस हमें जरा-मरण से ऊपर और परे ले जाता है, रोग और मृत्यु के पाश से हमें मुक्त कर सकता है। किसी औषधिधर्मी रस के द्वारा जरा-मरण के ऊपर विजय एक निराली कल्पना है और ऐसी कल्पना करने वाली जाति के मन में ही अमृत मंथन की कल्पना और अमृत कुंभ से युक्त पातालपुरी की कल्पना – जो मात्र भोगलोक है जिसकी राजधानी ही भोगावती है – प्रथम-प्रथम आयी होगी। बाद में द्रविड़ों ने, जो भावुकता प्रधान, ‘कवित्वपूर्ण, रईसतबीयत, मणि-माणिक-लोभी, नगर रचने वाली और व्यापार करने वाली जाति थी – इस कल्पना को विकसित किया होगा और उन्होंने कल्पित किया होगा कि समुद्र-मंथन के साथ न केवल अमृत बल्कि तरह-तरह के अलभ्य रत्न भी निकले थे और पाताल लोक न केवल अमृत कुंभ का लोक है बल्कि ‘भोगी’ जाति का चरम भोगलोक है, जहाँ मणि-माणिक माथे पर धारण करे रईसतबीयत नाग कुल अमृत पान करता है और सुख भोगता है और तब आर्यों का चिंताशील दार्शनिक मन आया होगा। और उसने इस समुद्र मंथन की पूर्व पीठिका में देवासुर संग्राम के रूप में शिव और अशिव के द्वंद्व तथा आर्य और अनार्य द्वंद्व के दार्शनिक और राजनैतिक तत्त्व को इस मिथ से संयुक्त कर दिया होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि आज की भारतीयता का पिता है आर्य, पितामह है द्रविड़ और प्रपितामह है निषाद। अवश्य ही पूर्वी भारत में एक चौथा तत्त्व भी सक्रिय रहा है जो आर्य पिता का समकालीन है और वह है ‘किरात’ अर्थात ‘इंडो-मंगालीय’ तत्त्व, जो लद्दाख से अरुणाचल (नेफा) तक की पतली हिमालय की पट्टी और समूचे ब्रह्मपुत्र क्षेत्र (असम और बंगाल तथा बाँगला देश) के इतिहास में प्राधान्य लाभ किये हुए है। परंतु इस समय हम उत्तर भारत अर्थात ठेठ हिंदुस्तान की ही चर्चा कर रहे हैं, जिसका पिता है आर्य, पितामह है द्रविड़ और प्रपितामह है निषाद।

सुनीति बाबू लिखते हैं और रामदेवाजी तथा उनके चंदर-मंदर जैसे शिष्यगण इसे करके दिखाते हैं कि निषाद मन एक ओर तो बड़ा परिश्रमी तथा धीर मन रहा है, दूसरी ओर वह खुशमिजाज, बेपरवाह, मनमौजी, सदैव ‘अरे, वाह वाह’ गीत गुंजरित, नृत्यकंपित और कभी-कभी उन्मत्त-प्रमत्त भी रहने का आदी है। इसका रसवाद प्रायः मुक्त हास्य और आदिरस से संयुक्त रहा है और इसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति होती है ‘होली’ त्योहार के अंदर, जिसे अब भी कुछ लोग चतुर्थ वर्ण का त्योहार कहते हैं। उस दिन चांडाल-स्पर्श पुण्य माना जाता है। ऐसा मानसिक भावात्मक खुलापन वाला त्योहार, निषाद संस्कारों की ही उपज है।

मैं समझता हूँ चार्वाक ऋषि की उनके जीवन काल में निषादों के बीच बड़ी इज्जत रही होगी क्योंकि उनका ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्’ दर्शन निषादों के मनमौजी स्वभाव के समानांतर है। आज भी मतसा गाँव के निषाद एक दिन का खाना भी घर पर मौजूद हो तो बैठकर ताश खेलेंगे। तेल में मछली कल्हारी जाएगी और अड्डाबाजी होगी। उस समय रायजी, मिसिर जी, वर्माजी, जा-जाकर इनकी देहरी पर शीश पटकेंगे कि चल भाई, मेरा मकान गिर रहा है, मेरी छत चू रही है, या मेरी फसल खेत में झड़ रही है, परंतु सब व्यर्थ! क्योंकि आदिम निषाद इनके मन में जाग उठा है और ये नहीं सुनेंगे। ये ही क्यों, रायजी, मिसिरजी, वर्माजी भी इस निषाद से परित्यक्त नहीं। उनकी देह में यह हो या न हो, पर उनके मन का चालीस प्रतिशत इसकी राजधानी है। यह आदिम निषाद उनके संस्कारों में जब प्रबल और उन्मत्त हो उठता है तो ये भी दो बीघा बेचकर होली-दीवाली के दिन ‘चमर नट’ या नर्तकी का नाच कराते हैं, दावतें देते हैं और स्वयं भी छानते-फूँकते-पीते हैं।

मेरे मन की गहन गुहा में कहीं पर बैठा हुआ यह आदिम निषाद मुझे भी छात्र जीवन में बड़ा तंग करता था। मुझे स्मरण है कि एक ग्रीष्मावकाश के बाद बनारस कैंट स्टेशन पर उतरकर अपने सहपाठी जयमल राय के साथ मैंने प्रतिज्ञा की कि इस वर्ष हम दोनों सिनेमा देखेंगे ही नहीं। पर ज्यों ही हमारा रिक्शा कैंट स्टेशन से आगे बढ़ा और एक-से-एक बढ़िया चलचित्रों के सम्मोहक पोस्टर आने लगे, हमारी प्रतिज्ञा ढीली होने लगी, आदिम निषाद हमारे मन का मंथन करने लगा और अंत में ‘प्रकाश टॉकीज’ तक आते-आते हमारे विचारों में आमूल परिवर्तन हो गया और जयमल को मैंने वहीं पर उतार दिया और कहा, ‘यार, तू लाइन लगा, मैं सामान रखकर अभी आया।’ आज मैं वयस की प्रौढ़ता के कारण कर्तव्यपरायण हो गया हूँ, परंतु अब भी छुट्टी के दिनों में अरण्यवीथी, या नदी तट पर निकल जाता हूँ तो अकेले में मेरी आत्मा में निरंतर वर्तमान आदिम निषाद मेरी शिरा-धमनियों में प्रवेश करके अविराम नौका-क्रीड़ा करने लगता है और मेरे मन में बज रही उसकी अविराम बाँसुरी के अस्तित्व के प्रति सचेत हो जाता हूँ।

(‘निषाद बाँसुरी’ से)

Kubza Sundari by Kuber Nath Rai

कुब्जा-सुंदरी

हमारे दरवाज़े की बगल में त्रिभंग-मुद्रा में एक टेढ़ी नीम खड़ी है, जिसे राह चलते एक वैष्णव बाबा जी ने नाम दे दिया था, ‘कुब्जा-सुंदरी’। बाबा जी ने तो मौज में आकर इसे एक नाम दे दिया था, रात भर हमारे अतिथि रहे, फिर ‘रमता योगी बहता पानी’! बाद में कभी भेंट नहीं हुई।

परन्तु तभी से यह नीम मेरे लिए श्रीमद्भागवत का एक पन्ना बन गई। इसके वक्र यष्टि-छंद में मुझे तभी से एक सौंदर्य बोध मिलने लगा। वैसे भी यह है बड़े फायदे की चीज। अपने आप उगी, बिना किसी परिचर्या के बढ़ती गई, पौधे से पेड़ बन गई और अब मुफ्त में शीतल छाँह देती हैं, हवा को शुद्ध और नीरोग रखती है, हजर किस्म के रोगों के लिए उपचार-द्रव्य के रूप में छाल, पत्ती, फूल, फल और तेल देती है, पशु और मनुष्य के रोगों से जूझती है, सबसे बढ़कर सुबह-सुबह राम-राम के पहर दातून के रूप में मुँह साफ़ करती है, बाद में मैं अपना मुँह गन्दा करूँ या अश्लील करूँ तो यह बेचारी क्या करे? नाम भले ही वृन्दावनी हो पर इसकी भूमिका वैष्णवता के उस साफ-सुथरे संस्करण की है जिसे संत कबीर ने अपनाया था। वैसे तो संत और भक्त में मैं कोई खास प्रभेद नहीं मानता। संत ‘हंस’ है तो भक्त ‘मराल’। नाम का ही फ़र्क है। बात एक ही है। संत और भक्त की मूल प्रकृति एक ही होती है। दोनों ही वैष्णव हैं।

अब राजनीति उन्हें वाद-प्रतिवाद के रूप में रखे तो रखे – ‘दाख छुहारा छांड़ि अमृत फल विष-कीरा विष खात!’ अपना-अपना स्वाद है! परन्तु हिन्दुस्तान का किसान-मन उन्हें एक ही मानता है। वैसे तो फागुन-चैत में यह नीम भी वृन्दावनी साज-शृंगार ले लेती है। पर महज एक ऋतु के लिए। फागुन में इसके पत्ते झड़ने लगते हैं। वैराग्य की उदासी का अपूर्व पीतवर्णी शान्त रस इस पर उतरता है। फिर चैत्र चढ़ते ही नरम टूसे और पत्तियाँ जीवन और यौवन की कविता की तरह फूटने लगती हैं। देखते-देखते ही वृक्ष शोभामय हो उठता है और इसके नाम से जुड़ा ‘सुन्दरी’ शब्द तभी सार्थक लगता है। फिर रात में नन्हें-नन्हें सुगन्धित पीतगर्भी श्वेत फूलों की मंजरियाँ लग जाती हैं। पतझर की पीली अपर्णा उदासी से लेकर निर्मल चाँदनी में स्नान करती हुई वासन्ती रातों की सुगन्ध तक यह नीम कविता-ही-कविता है। प्रति संध्या को प्रत्येक डाल चहचहाहट से भर उठती है। पेंपा, गौरया, सुग्गे और एकाध कौए भी इस पर रैन बसेरा लेते हैं। तब गंध और गान से इसका विश्वरूप प्रत्यक्ष हो जाता है। चाँदनी रातों में तो यह ‘देवी-यान’ बन जाती है। लोग कहते हैं कि सबकी नज़रों से अदृश्य पार्वती की सातों बहनों का रथ आकाश से उतरता है और नीम की डाल से पार्वती की सातों बहनें एकान्त में झूला झूलती हैं। मनुष्य-चक्षुओं से अदृश्य वसन्तकालीन रातों में।

भोजपुरी लोकगीतों में यह विश्वास बार-बार व्यक्त होता है भयमिश्रित श्रद्धा के साथ! वैद्यों-डॉक्टरों की वात्सल्यमयी माँ यह वसन्त ऋतु नन्हें-नन्हें बच्चों के लिए चेचक का उपहार लेकर आती है (असम, बंगाल में तो ‘वसंत’ का एक अर्थ ‘चेचक’ भी होता है) और चेचकग्रस्त शिशु के सिरहाने नीम की पतली कंछिया रख दी जाती है। अत: उत्तर भारत में यह कटु तिक्त नीम भी ‘देवी-तरु’ मानी जाती है। ‘नीप’ या ‘कदम्ब’ की तरह। ‘नीम’ और ‘नीप’ में एक अक्षर का ही अंतर है तो भी दोनों का व्यक्तित्व भिन्न हैं। ‘नीप’ अर्थात कदम्ब त्रिपुर सुन्दरी का वृक्ष है तो ‘नीम’ शीतला का। आधी रात को ‘नीप’ के कुंजों में गंधर्वों की बाँसुरी बजती है, तो आधी रात को ‘नीम’ की डाल पर देवी की सातों बहनों की चूड़ियाँ खनकती हैं। इस नीम का एक कुहकी रूप है ‘महानिम्ब’ या ‘बकायन’ जिसके पत्ते भी नीम की तरह सीकों पर लगते हैं और ये पत्तियाँ कटुतिक्त नहीं होतीं तथा अपने द्रव्य-गुण के कारण दक्षिण भारत में तेजपात की तरह इसका प्रयोग होता है। वहाँ इसे ‘गौरी नीम’ भी कहते हैं। पर उत्तर भारत में ‘बकायन’ का उल्लेख शबर मंत्रों में ‘अकाइन बकाइन लोना चमाइन’ के रूप में होता है। अत: यह वृक्ष लोक की भयमिश्रित श्रद्धा का पात्र है और बाग बगीचे के एकान्त कोने में ही लगाया जाता है। बस्ती के भीतर इसका प्रवेश नहीं। परन्तु कटु नीम तो रास्ते-चौरस्ते और आँगन की शोभा है – नीरोग छाँह, शुद्ध पवन और मनसायन कलरव! एक ग्राम-कथिका है ‘निबिया रे करुआइन तबो शीतल छाँह, भइया रे बिराना, तबो दाहिन बाँह!’ यानी नीम कटु होने पर भी शीतल छाया देती है और दूर के रिश्ते का भाई भी अपनी बाँह होता है।

उत्तर भारत में नीम भले ही लोक विश्वास में ‘देव तरु’ माना जाता हो, शास्त्र में इसे मात्र भैषज्य-तरु की ही महत्ता है। परन्तु उड़ीसा में नीम को ‘ब्रह्म दास’ की संज्ञा मिली है, वह शायद इसलिए है कि उत्कल के महादेवता जगन्नाथ जी का कलेवर यानी मूर्ति नीम-काष्ठ से ही बनती है और प्रति द्वादश वर्ष के बाद उसका ‘नव यौवन’ अर्थात ‘नवीनीकरण’ किया जाता है। इस नव कलेवर-उत्सव को ‘नव यौवन-उत्साह’ कहते हैं। मैंने पहले पहल इस बात को आज से पैंतीस वर्ष पूर्व कलकत्ते में अपने मित्र वनमाली गोस्वामी से सुना था। उन्होंने जब कहा, इस बार जून-जुलाई में पुरी जा रहा हूँ नव-यौवन दर्शन करने! सुनकर मैं तो चमत्कृत हो गया और अपनी तत्कालीन भंगिमा और भाषा में मैंने पूछा था, यार, इस कलकत्ते में नवयौवन का अकाल पड़ा है क्या, कि उत्कल देश को आपकी आँखें पवित्र करने को तुली हैं। उन्होंने मेरे अज्ञान का तत्काल निवारण करते हुए असल अर्थ बताया और आगे भी बताया कि उड़ीसा के लोग इस नीम को अत्यंत पवित्र मानते हैं और इसकी संज्ञा ‘दारु ब्रह्म’ है। यदि वेद व्यास उड़िया होते तो वे गीता में अवश्य कहला देते, वृक्षाणां निम्बोऽस्मि । वस्तुत: हिन्दुस्तानी मन जीवन को प्रकृति और ईश्वर से जोड़कर देखता है। उसके मन में जो कुछ उपयोगी और रसमय है वह सब अपने आप ईश्वर से जुड़ जाता है।

वनमाली थे उड़िया ब्राह्मण, परन्तु गौड़ीय वैष्णव मत को मानते थे। उनसे मैंने वैष्णवों की अनोखी शब्दावली का थोड़ा-बहुत ज्ञान भी अर्जित किया था। उदाहरण के लिए वैष्णव लोग खाना तो खाते ही नहीं, भोजन भी नहीं करते, बल्कि ‘प्रसाद’ ग्रहण करते हैं, ‘भात’ को ‘अन्न’ कहते हैं, दाल को ‘रसम्’ – ‘तरकारी’ शब्द का उच्चारण किया कि सीधे नरक में चले गए! अत: इसे ‘शाक’ कहते हैं। उनमें खीर के लिए ‘परमान्न’ और पुलाव के लिए ‘पुष्पान्न’ चलता है। भोजपुरी लोगों की दालपूरी के लिए ‘राधा वल्लभी’ और गाजीपुरी सत्तू-बाटी के लिए ‘मुकुन्दी’। मुझे सबसे अद्भुत लगा उनके रसशास्त्र का ‘अभियोग’ शब्द। हम तो जानते थे कि ‘अभियोग’ माने होता है मुकदमा और ‘अभियुक्त’ माने अपराधी परन्तु उनके शास्त्र में प्रेमी या प्रेमिका द्वारा एक-दूसरे को आकर्षित करने के तरीके को ‘अभियोग’ कहते हैं। जैसे कि नायिका बाग-बगीचे में जा रही है जो अक्सर वैष्णव कविता में जाती है, वहीं नायक दिखाई पड़ गया तो उसे दिखाकर एक नरम कच्चे किसलय अथवा पल्लव को दाँत से काटना, या नायक द्वारा अपने साथी को, नायिका को दिखाकर, किसी फल को देना जैसी इशारेबाजियाँ ‘अभियोग’ है।

आप कहेंगे कि कड़वी नीम के सन्दर्भ में भारत की मधुरतम रस-परम्परा की यह चर्चा करना अनर्गल है। ये चर्चाएँ तो कदम्ब-तमाल के सन्दर्भ में होनी चाहिए। परन्तु ‘वय: कैशोरकं ध्येयम’ यानी ‘वयस में किशोर-वय ही आराध्य है’ की घोषणा करने वाले माधवेन्द्र पुरी के प्राशिष्य थे महाप्रभु चैतन्य जिन्होंने अपनी साधना का केन्द्र ‘राधा’ को ही बनाया। साथ ही यह भी स्मरणीय है कि इस राधा-उपासना के आदि प्रवर्तक अपने कलिकाल में निम्बकाचार्य ही माने जाते हैं। तो यह कटु नीम इस रस-उपासना के आदि प्रवर्तक अपने कलिकाल में निम्बकाचार्य ही माने जाते हैं। तो यह कटु नीम इस रस-परम्परा के आदि गुरु के नाम से जुड़ी है और राधा-माधव के परम प्रिय ‘करील’ से तो लाख दर्जे सुन्दर और आकर्षक है। करील, कदम्ब और तमाल को जिन्होंने कभी नजदीक से देखा न हो उन्हें कोई धोखा दे, उनके बाह्य रूप रंग में ‘नाम बड़े पर दर्शन थोड़े’ वाली बात ही है। नीम फागुन-चैत-वैसाख तीन महीने पूर्वराग-राग-महाराग के प्रतीक किसी भी महीरुह से शोभा और शृंगार में मुकाबला कर सकती है। करील में तो काँटे ही काँटे हैं। उससे खूबसूरत तो अपने खेत-खलिहान की बबूल है। ग्रीष्म आते ही यह चटक पीले फूलों से ढँक जाती है तो उन काँटों के बावजूद उसे मानना पड़ता है।

कदम्ब का पेड़ शीशम की तरह ही लम्बा छरहरा होता है। पर बड़े-बड़े पत्ते होते हैं पलाश की तरह। फूल कन्दुक यानी गेंद की तरह बड़े-बड़े। इनमें दल नहीं होते। जीरे या पराग-सूत्रों से गठित सघन पुष्प-कन्दुक। हल्का हरित पीत वर्ण, कोई सौंदर्य नहीं। परन्तु इनकी सुगन्ध बड़ी मादक और मीठी होती है। कदम्ब की असल खूबी है इसकी मीठी मादक गंध और इसकी शाखाओं या कोटरों से चूती हुई ‘नीरा’ जिसे ‘कदम्ब मधु’ कहते हैं। हिमालय के निचले भागों में जहाँ किरातों की गंधर्वशाखा रहती थी ये पेड़ बहुतायत से मिलते थे। वारुणी और मादक सुगंध के कारण तथा पावस ऋतु में पुष्पित होने के कारण यह पेड़ गन्धर्व-संस्कृति से और कामदेव से जुड़ गया। फिर बाद में यमुना तट पर आरण्यक रूप में उपस्थित होने के कारण ‘साक्षात् मन्मथ-मन्मथ:’ श्रीकृष्ण की महाराग-लीला का अनिवार्य अंग बन गया। यह त्रिपुर सुंदरी का भी परम प्रिय वृक्ष बना इसी वारुणी गंध और गंधर्व संस्कृति के कारण। वैसे भी में मानता हूँ कि नीम मूलत: उपयोगी भैषज्य-तरु ही है। परन्तु रूप-गंध-सुषमा-सौन्दर्य से यह एकदम रिक्त भी नहीं है, अत: इसके संदर्भ में रस-चर्चा की बात बिल्कुल अनर्गल हो, ऐसी बात नहीं।

राधा का चर्चा तो सभी करते हैं, पर कुब्जा की चर्चा प्राय: नहीं होती। किसी ने की भी तो गोपियों के मुँह से खरी-खोटी का लक्ष्य बनाकर ही। परन्तु कुब्जा की ओर से शायद ही कोई जवाब देने जाता है। वैसे ‘ग्वालकवि’ ने मथुरा निवासी होने के कारण ही शायद ‘कुब्जाष्टक’ लिखकर पड़ोसी का कर्तव्य पालन अवश्य किया है और गोपियों की कटूक्तियों का ‘सौ सुनार की न एक लोहार की’ शैली में कुब्जा सुन्दरी का प्रत्युत्तर व्यक्त किया है। कुब्जा कहती है कि वे बेहया गोपियाँ मुझे क्या कहेंगी? कहीं चलनी भी सूप पर हँस सकती है? ‘बनन में, बागन में, यमुना किनारन में, खेत में, खरान में, खराब होती डोली वै।’ मैं तो उनसे लाख दर्जे अच्छी हूँ। इस शताब्दी के प्रारम्भ में एक बार द्विवेदी युग के प्रसिद्ध ब्रजभाषा कवि पण्डित नवनीतलाल चतुर्वेदी का आगमन बनारस में हुआ और तत्कालीन काशिराज ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह ने, जो स्वयं भी कवि थे, उनसे आग्रह किया, चौबे जी, हमें लगत हौ कि कुब्जा के साथे ब्रजभाषा के कविन द्वारा न्याय नाही हुआ है। अब आपै कुछ कृपा करीं। महाराज ने तो मौज में आकर बात कह दी थी। परन्तु चतुर्वेदी जी ने दूसरे ही दिन ‘कुब्जा-पचीसी’ लिखकर महाराज के सामने प्रस्तुत कर दी। कुब्जा की ओर दिए गए एक से एक धाँसू जवाब। बानगी देखें, कुब्जा उद्धव द्वारा लाए गए कटु-तिक्त संदेश के उत्तर में कहती है:

गोबर की डलिया सिर लै कब गायन में हम जाति हैं रूँधन।
    त्यों ‘नवनीत’ दुहावन के मिस द्वार किवार दिए कब मूँदन।
कौन दिना बन बीच कही हरि कामरि लाई बचाइयो बूँदन
उद्धव और कहा कहिए, कब खोलि दिए फरियान के फूँदन।

इसमें ‘फरिया’ शब्द से पूरब वाले शायद परिचित न हों। पहले जमाने में अन्तर्वास के रूप में मर्द जाँघिया पहनते थे और नारियाँ फरिया जो घाघरे के नीचे रहती थी। राजपूत चित्रकला में यह लक्ष्य किया जा सकता है। जाँघिया जांघों तक ही रहता है, पर फरिया पूरी टाँग को ढँकती है। शेष तो बड़ा ही स्पष्ट है। परन्तु एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि जिस समय नवनीत जी ने इस रचना के छन्दों को लिखा था वे पूर्णत: नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। बहुत बाद में 46 वर्ष की अवस्था में अपने गुरु के बहुत आग्रह करने पर उन्होंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया। वैष्णव धर्म में विशेषत: पुष्टिमार्ग में गृहस्थाश्रम को ही सर्वोच्च महत्व दिया गया है। यदि कोई आधुनिक आलोचक अपने फ्रांयड-युंग के ज्ञान का इस पर आरोपण करे और उनके जीवन के बारे में कोई कुकल्पना करे तो अपनी शोध की कलम को ही गन्दी करेगा। वैष्णव-संस्कृति में प्रशिक्षित मन इस बात को भली भाँति समझता है कि ये सब ‘राधा-गोविन्द-सुमिरन’ के बहाने हैं। इनका क्रियात्मक अर्थ शैली और भंगिमा तक ही सीमित है। ये सब मध्यकालीन वैष्णव काव्य रूढ़ियों का अनुगमन मात्र है। ठीक वैसे ही जैसे आज की आधुनिक जनवादी कविता के अद्भुत अद्भुत जुझारू तेवर हैं। सूर के ‘हों पतितन को टीको’ या तुलसी के ‘मो सम कौन कुटिल खल कामी’ के आधार पर उनके जीवन की व्याख्या करना घोर मूर्खता है और वैष्णव साहित्य परम्पराओं से घोर अपरिचय का द्योतक है। केलि-वर्णन और दैन्य-निवेदन के पदों को उनके सांस्कृतिक एवं शास्त्रीय संदर्भ में देखना ही सही ढंग से देखना है।

एक बार मैंने एक भागवत मर्मज्ञ पण्डित से इस कुब्जा-तत्व की चर्चा की थी तो उन्होंने बताया था कि कुब्जा वस्तुत: धरती का प्रतीक है और उसका कृष्ण-प्रेम पार्थिव स्तर तक ही सीमित था। दैहिक प्रेम से ऊपर उठ कर महाभाव में प्रवेश करने की वह अधिकारिणी नहीं थी। इसी से प्रेम की अपार्थिव ईश्वरीय लीला की वह सहचारिणी नहीं हो सकी। श्रीमद्भागवत एक ‘रहस्य-काव्य’ है और सारे रहस्य-काव्य प्रतीकों की भाषा में ही मुखरित होते हैं। गहन गंभीर बोध को वैखरी के स्तर पर उतारने के लिए अन्य कोई साधन ही नहीं। निर्गुण लीला में तो यह बात स्पष्ट है ही, सगुण लीला में भी यही बात है, क्योंकि ‘चरित’ जब दिव्य लीला के रूप में उतरता है तो ‘रहस्य’ व्यक्त करता है और ‘रहस्य’ की भाषा ही है प्रतीक भाषा।

रास लीला की बात लें। आर्य समाजियों से लेकर आज के नव शिक्षित तक सभी के तेवर इस पर अग्नि वर्षा करते हैं। परन्तु रास क्या कोई ‘स्थूल’ घटना है? वृन्दावन की लोक-संस्कृति में रास-नृत्य की प्रथा सदैव से है। इसको श्रीमद्भागवत ने एक सृष्टि के निरन्तर चालू भवति-प्रवाह के वृत्ताकार रूप का प्रतीक बना दिया है। केन्द्र में एक श्रीकृष्ण और परिधि के प्रत्येक जोड़े को परस्पर बाँधे हुए असंख्य कृष्ण। इस सृष्टि नाम की माल्यरचना में ईश्वर सूत्र की तरह उपस्थित हैं और एक इकाई को दूसरे से जोड़ता है। मनुष्य और मनुष्य, मनुष्य और प्रकृति, सर्वत्र ही ईश्वर महान संयोजक या ग्रंथि के रूप में वर्तमान है। यह गाँठ टूट जाय तो माला बिखर जाएगी। वही सब कुछ को एक- दूसरे से बाँधे हुए हैं तथा केन्द्र में भी वही ‘कर्माध्यक्ष’ के रूप में है। गीता में उन्होंने कहा है, ‘समासों में मैं द्वन्द्व समास’ हूँ। द्वन्द्व समास तब घटित होता है जब दो संज्ञाएँ परस्पर जुड़ती हैं। पुत्र पिता से, पति पत्नी से, मित्र मित्र से, पड़ोसी पड़ोसी से, नागरिक नागरिक से जुड़ता है तो संसार बनता है और गतिशील होता है। यही है शाश्वत रासलीला जिसे श्रीमद्भागवत अपनी प्रतीक भाषा में व्यक्त करता है। इस ‘विश्व नृत्य’ को स्थूल भाषा के माध्यम से समझना ही भूल है।

इसी भाँति कुब्जा को देखें। कुब्जा और कोई नहीं कंस द्वारा शासित पृथ्वी ही है जो कुब्ज भोगने के लिए विवश है। अपने सहज रूप में यह उदार, क्षमामयी और सुंदर अपनी धरती ही कुब्जा है जिसे कंसों, केशियों और चाणूरों का अंग-शृंगार करना पड़ता था। उसका चोवा चंदन, उसका रूप, रस, गंध और गान इन पाप-विग्रहों की सेवा में अर्पित हो रहा था। इसी से वह ग्लानि से सिकुड़कर विकलांग हो गई थी। परंतु जब ‘वरण’ का क्षण आया तो इसी विवश धरती ने साहस किया और एक बार द्विधाहीन मन से भगवत अंग श्री का चंदन-शृंगार कर दिया। इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं। जब कोई मुक्ति मार्ग नहीं रह जाता तो विश्व मंगल की परम शक्ति का अवतरण और हस्तक्षेप होता है। उस समय ईश्वर भी अपेक्षा करता है कि वरण करने का कोई साहस दिखाकर आगे आए। कोई एक लोटा गंगाजल और बेलपत्र लेकर खड़ा हो जाए। तब वह एक लोटा गंगाजल ही युगों की संचित पाप-राशि का प्रक्षालन कर देता है। एक तिनपतिया बेलपत्र ही रुद्र की तीसरी आँख बन जाता है। कोई नन्हा-सा साढ़े तीन हाथ का आदमी साहस तो करे! श्रीमद्भागवत् के अनेक प्रसंग बड़े ही संकेतधर्मी हैं, जैसे यमलार्जुन उद्धार, दावानल पान, कालिया मर्दन या कुब्जा प्रेम आदि। श्रीमद्भागवत के मर्म को समझकर उसे पढ़ा जाए तो आज भी वह अप्रासंगिक नहीं। आज भी मारक अंधकार में अनेक हत्या-कक्ष चालू हैं जिनमें से किसी एक में कहीं न कहीं कृष्ण-जन्म होगा ही। उस जन्म की आकृति, भाषा और मुहावरा चाहे जो हो। मनुष्य जन्म पाकर भी हम निराशावादी क्यों बनें? हमारी सारी वाङमयी परंपरा इस निराशा के नरक से उद्धार के सूत्रों से भरी पड़ी है।

‘पिङ् पिङ्, बिङ् पिङ् पिङ् बिङ्!’ रात्रि में आकाश मंडल में ‘नारद की वीणा बज रही है। चंद्र विगलित रात। ‘कुब्जा सुंदरी’ की दो शाखाओं के बीच चाँद झूल रहा है और रात पिघल कर सगुण-साकार चाँदनी बन गई हैं। विगलित चाँदनी की धारा! गोया रात ही पिघलकर नदी बनती जा रही हो। एक ध्यान तरंगायित विरजा नदी, जिसके इस तट पर नारद की वीणा बजती है और उस तट पर तार्क्ष्य अपने पंख पसारे विचरण करता है। तार्क्ष्य की पीठ पर एक तारा है, ‘श्रवण नक्षत्र!’ यह विष्णु के परम पद का प्रतीक है। इस पार नारद की वीणा बज रही है। आकाश से धरती तक सुरों का विस्तार है। आसपास के घर-मकान, गलियाँ, सारे जीव जगत के साथ निद्रालीन हैं। जाग रही है मेरी हिरण्यगर्भ आत्मा और जाग रहा है वैश्विक हिरण्यगर्भ के रूप में ईश्वर। मेरे दोनों चक्षु हृदय में लीन हो गए हैं, हृदय हिरण्यगर्भ आत्मा में, और आत्मा हिरण्यगर्भ ईश्वर से जुड़ कर एक अद्भुत कल्पलोक में प्रवेश पा चुकी है।

वह अपना वर्तमान नाम-रूप खो चुकी है। नाम-रूप तो इस देह और पंचप्राण के ही परिचायक हैं जो इस समय बेसुध, निद्रालीन हैं। मैं द्वापर युग का स्वप्न देख रहा हूँ। मैं क्या, सच्चाई तो यह है कि मेरी हिरण्यगर्भ आत्मा देख रही है, मैं तो निद्रालीन हूँ। मुझे लगता है कि मैं ही कामुक मणिग्रीव यक्ष हूँ, मैं ही अहंकार विमत्त नलकूबर हूँ। मैं ही युगल महीरुह बनकर ऋषि शाप को भोग रहा हूँ। मैं ही प्रतीक्षारत हूँ किसी देव शिशु के अवतरण की। उस देवशिशु की कटिमेखला में रस्सी बँधी है। या यों कहिए कि मायारज्जु से उसने अपने को बँधवा लिया है अन्यथा वह तो सब कुछ से दश-अंगुल परे ही रहता है। यह तो स्नेह भी रज्जु है जिससे अवश होकर वह भी माँ माँ , बाबा बाबा , मैया मैया कहने को, रोने-छटपटाने को बाध्य हो जाता है। यदि उस देवशिशु का आगमन मेरे जीवन में भी हो जाए, वह ऊधम मचाते हुए आकर एक धक्का मुझे दे जाए, और इस प्रकार मुझे समूल उत्पाटित कर डाले तो इस जड़िमा से, इस स्थावर नरक से, मेरा भी उद्धार हो जाए! मैं अपने स्वरूप को पुन: प्राप्त कर लूँ। इसी के लिए मैं प्रतीक्षारत हूँ।

स्वप्न बदलता है। नया पन्ना खुलता है। एक इषीका वन है। इषीका अर्थात सींक या सरकंडों का अगम-दुर्भेद्य वन। तीक्ष्ण खरधार पतलों का जंगल। भीतर सरसराते हुए साँप-भुजंग चल रहे हैं। हिंसक मांस-लोलुप भेड़िए-चीते भी दुबके होंगे। इस भयानक इषीका वन में पतली-सी राह पर मैं सरकंडे पतलों के झेपों को फाड़ते हुए चल रहा हूँ। उनकी तीक्ष्ण धार से उँगलियों और चेहरों पर खरोंचे लग जाती हैं। नीचे पैर में काँटे चुभ रहे हैं। तो भी चल रहा हूँ। जीवन यात्रा जो है। पूरी करनी ही है। यही निर्दिष्ट पथ है। उपाय नहीं। इस भयंकर इषीका वन में एक तरह से डूबा-डूबा चल रहा हूँ। अचानक चटचटाती ध्वनि करती हुई अग्नि शिखा आसपास उठती है। फिर भयंकर लपलपाती ज्वालाओं में बदल जाती है। फिर भी चल रहा हूँ। यही निर्वाचित पथ है। इसी पथ के नाम मेरा जीवन बंधक में है। अत: चल रहा हूँ। आगे-पीछे अगल-बगल ज्वालाएँ ही ज्वालाएँ हैं। तरह-तरह के जीवों का आर्तनाद सुनाई पड़ता है। जंगली शूकरों के झुण्ड, हिरणों के खुरों की तेज, विकल, पगध्वनि। दूर पर चिंघाड़ते हाथियों की भगदड़। कई विकल अजगर तो सरकते हुए आसपास बगल से ही गुज़र जाते हैं। तो यह दावानल है।

इस दावाग्नि में मारे भय के मेरी धड़कन बन्द होने को आ गई है। प्रार्थना के शब्द कण्ठ से निकल नहीं पा रहे हैं। भयानक आर्त। भयानक ज्वालाएँ। दिशाएँ जल रही हैं, सारा परिवेश जल रहा है, आँखें जल रही हैं। मैं, मैं एक बीसवीं शती के अन्तिम दशक का मनुष्य विकल-विह्वल किसी देव-शिशु के अवतरण की अशब्द प्रार्थना कर रहा हूँ। मुझे लगता है कि वह अवश्य आएगा और मुझे पीछे ठेलकर सामने स्वयं खड़ा हो जाएगा और सारी ज्वालाओं को गटागट पी जाएगा। पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण सर्वत्र की ज्वालाओं को वह साँस भर-भर कर खींच कर पी जाएगा। समस्त सृष्टि के भय, काम और दुख के दावानल को पीकर पचा जाने की क्षमता वाला देव-शिशु निश्चय ही आएगा। तब यह क्षुरधार इषीका वन जल कर भस्मीभूत हो जाएगा। वातावरण शान्त हो जाएगा। वह और हम, इस बन्धु भाव से शेष पथ पर साथ-साथ चलते जाएँगे। उस अवतरण की शक्ल सूरत क्या होगी, यह मैं नहीं जानता।

फिर दूसरा पन्ना खुलता है। दूसरा स्वप्न उदित होता है।

इसी तरह एक नहीं, अनेक पन्ने इस कुटिल बंकिम तरु की शाखाओं के नीचे आँखें मूँदे हुए मैंने कितनी बार पढ़े हैं और कितनी बार निराशा के तमस से उज्ज्वल उद्धार पाया है, इसे कहाँ तक बताऊँ। गुरु निम्बकाचार्य के नामकरण का रहस्य यह बताया जाता है कि वे प्रतिदिन एक ऊँचे नीम के पेड़ पर चढ़कर बालार्क सूर्य को प्रात: नमस्कार करते थे। शायद वे घनघोर अरण्य में रहते थे। ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के कारण प्रात: सूर्य-दर्शन नहीं हो पाता था। अत: उन्हें प्रतिदिन शाखमृग की तरह पेड़ पर चढ़ना पड़ता था। परन्तु मुझे तो इस ‘कुब्जा सुन्दरी’ की दो शाखाओं के बीच पूर्णचन्द्र का दर्शन अपनी चारपाई पर लेटे-लेटे ही हो जाता है और रात-बिरात इसकी शाखाओं के नीचे मैं श्रीमद्भागवत के रहस्य स्वप्न-चक्षुओं से देखता हूँ। अवश्य ही मेरी अर्थात इस शताब्दी की श्रीमद्भगवत् द्वापर की राग-पूर्वराग-महाराग की भागवत से भिन्न भय और हताशा की भागवत है। और आश्चर्य, कि यह भय ही हमें ईश्वर से जोड़ रहा है। मूल भागवत भी तो भय और हताशा के परिवेश में ही सुनी गई थी। शेषनाग के फणों की छाया में बैठकर नारद ने इसे ब्रह्मा से सुना था। फिर कुरुक्षेत्र की सर्वनाश-चिंता की विकल स्मृतियों को लेकर वेदव्यास ने नारद से सुना और व्यास से शुक, शुक से परीक्षित और शेष मानव समुदाय ने। यही इसकी व्यास परम्परा है।

इस टेढ़ी नीम ‘कुब्जा सुन्दरी’ के नीचे चन्द्र-विधौत रात्रियों में मैं कभी-कभी अपनी खाट पर लेटे-लेटे आँखें मूँद कर इसका एकाध पन्ना पढ़ लेता हूँ। आँखें खोलकर तो यथार्थ ही पढ़ा जाता है। परन्तु आँखें मूँदकर सत्य भी पढ़ा जा सकता है। आधुनिक साहित्यकार की ट्रेजडी यह है कि वह पेट के बल यथार्थ से बुरी तरह चिपका हुआ रेंगता चल रहा है और परा यथार्थ सत्य से उसकी भेंट नहीं हो पाती। उसके पास आँखें मूँदकर आराम से देखने-सुनने की फुरसत कहाँ! फलत: वह विश्वास ही नहीं कर पाता है कि यथार्थ और सत्य दो तरह की बातें हैं और यथार्थ से भी बड़ी सच्चाई है सत्य। ‘प्रति सत्य’ और ‘असत्य’ भी यथार्थ का चेहरा लगा कर लोला करता है और खुली आँखें प्राय: धोखे में आ जाती हैं। दो खुली आँखों से देखने की एक सीमा है। वे एक ही कोण से, एक ही दिशा में देख सकती हैं। समग्र रूप में और रूप के नीचे उतर कर अरूप में देखने की क्षमता खुली आँखों में नहीं। इन्हें यदि देखना हो तो आँखें मूँद कर ही देखना पड़ता है। यह एक विचित्र रहस्य है जिसको मैंने इस कुब्जा सुन्दरी की छाँह में, चाँदनी की शान्त समाहित धारा में स्नान करती हुई रात्रियों में समझा है। अत: यह टेढ़ी विकलांग नीम मेरे लिए वही महत्व रखती है जो निम्बकाचार्य के लिए उनके अपने निम्बतरु का था।

UttraFalguni ke Aas Paas by Kuber Nath Rai

उत्तराफाल्गुनी के आसपास

वर्षा ऋतु की अंतिम नक्षत्र है उत्तराफाल्गुनी। हमारे जीवन में गदह-पचीसी सावन-मनभावन है, बड़ी मौज रहती है, परंतु सत्ताइसवें के आते-आते घनघोर भाद्रपद के अशनि-संकेत मिलने लगते हैं और तीसी के वर्षों में हम विद्युन्मय भाद्रपद के काम, क्रोध और मोह का तमिस्त्र सुख भोगते हैं। इसी काल में अपने-अपने स्वभाव के अनुसार हमारी सिसृक्षा कृतार्थ होती है। फिर चालीसवें लगते-लगते हम भाद्रपद की अंतिम नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी में प्रवेश कर जाते हैं और दो-चार वर्ष बाद अर्थात उत्तराफाल्गुनी के अंतिम चरण में जरा और जीर्णता की आगमनी का समाचार काल-तुरंग दूर से ही हिनहिनाकर दे जाता है। वास्तव में सृजन-संपृक्त, सावधान, सतर्क, सचेत और कर्मठ जीवन जो हम जीते हैं वह है तीस और चालीस के बीच। फिर चालीस से पैंतालीस तक उत्तराफाल्गुनी का काल है। इसके अंदर पग-निक्षेप करते ही शरीर की षटउर्मियों में थकावट आने लगती है, ‘अस्ति, जायते, वर्धते’ – ये तीन धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं, उनका वेग कम होने लगता है और इनके विपरीत तीन ‘विपतरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति’ प्रबलतर हो उठती हैं, उन्हें प्रदोष-बल मिल जाता है, वे शरीर में बैठे रिपुओं के साथ साँठ-गाँठ कर लेती हैं और फल होता है, जरा के आगमन का अनुभव। पैंतालीस के बाद ही शीश पर काश फूटना शुरू हो जाता है, वातावरण में लोमड़ी बोलने लगती है, शुक और सारिका उदास हो जाते हैं, मयूर अपने श्रृंगार-कलाप का त्याग कर देता है और मानस की उत्पलवर्णा मारकन्याएँ चोवा-चंदन और चित्रसारी त्याग कर प्रव्रज्या का बल्कल-वसन धारण कर लेती हैं। अतः बचपन भले निर्मल-प्रसन्न हो, गदहपचीसी भले ही ‘मधु-मधुनी-मधूनि’ हो; परंतु जीवन का वह भाग, जिस पर हमारे जन्म लेने की सार्थकता निर्भर है, पच्चीस और चालीस या ठेल-ठालकर पैंतालीस के बीच पड़ता है। इसके पूर्व हमारे जीवन की भूमिका या तैयारी का काल है और इसके बाद ‘फलागम’ या ‘निमीसिस’ (Nemesis) की प्रतीक्षा है। जो हमारे हाथ में था, जिसे करने के लिए हम जनमे थे, वह वस्तुतः घटित होता है पच्चीस और पैंतालीस के बीच। इसके बाद तो मन और बुद्धि के वानप्रस्थ लेने का काल है – देह भले ही ‘एकमधु-दोमधु-असंख्य-मधु’ साठ वर्ष तक भोगती चले। इस पच्चीस-पैंतालीस की अवधि में भी असल हीर रचती है तीसोत्तरी। तीसोत्तरी के वर्षों का स्वभाव शाण पर चढ़ी तलवार की तरह है, वर्ष-प्रतिवर्ष उन पर नई धार, नया तेज चढ़ता जाता है चालीसवें वर्ष तक। मुझे क्रोध आता है उन लोगों पर जो विधाता ब्रह्मा को बूढ़ा कहते हैं और चित्र में तथा प्रतिमा में उन्हें वयोवृद्ध रूप में प्रस्तुत करते हैं। मैंने दक्षिण भारत के एक मंदिर में एक बार ब्रह्मा की एक अत्यंत सुंदर तीसोत्तर युवा-मूर्ति को देखा था। देखकर ही मैं कलाकार की औचित्य-मीमांसा पर मुग्ध हो गया। जो सर्जक है, जो सृष्टिकर्त्ता है, वह निश्चय ही चिरयुवा होगा। प्राचीन या बहुकालीन का अर्थ जर्जर या बूढ़ा नहीं होता है। जो सर्जक है, पिता है, ‘प्रॉफेट’ है, नई लीक का जनक है, प्रजाता है, वह रूप-माधव या रोमैंटिक काम-किशोर भले ही न हो, परंतु वह दाँत-क्षरा, बाल-झरा, गलितम् पलितम् मुंडम् कैसे हो सकता है? उसे तो अनुभवी पुंगव तीसोत्तर युवा के रूप में ही स्वीकारना होगा। जवानी एक चमाचम धारदार खड्ग है। उस पर चढ़कर असिधाराव्रत या वीराचार करनेवाली प्रतिभा ही पावक-दग्ध होंठों से देवताओं की भाषा बोल पाती है। युवा अंग के पोर-पोर में फासफोरस जलता है और युवा-मन में उस फासफोरस का रूपांतर हजार-हजार सूर्यों के सम्मिलित पावक में हो जाता है। मेरी समझ से सृष्टिकर्त्ता की, कवि की, विप्लव नायक की, सेनापति की, शूरवीर की, विद्रोही की कल्पना श्वेतकेश वृद्ध के रूप में नहीं की जा सकती। अतः प्रजापति विधाता को सदैव तीस वर्ष के पट्ठे सुंदर, युवा के सुंदर रूप में ही कल्पित करना समीचीन है।

वास्तव में तीसवाँ वर्ष जीवन के सम्मुख फण उठाए एक प्रश्न-चिह्न को उपस्थित करता है और उस प्रश्न-चिह्न को पूरा-पूरा उसका समाधान-मूल्य हमें चुकाना ही पड़ता है। किसी भी पुरुष या नारी की कीर्ति-गरिमा, इसी प्रश्न-चिह्न की गुरुता और लघुता पर निर्भर करती है। गौतम बुद्ध ने उनतीस वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर अमृत के लिए महाभिनिष्क्रमण किया। यीशु क्राइस्ट ने तीस वर्ष की अवस्था में अपना प्रथम संदेश ‘सरमन ऑन दी माउंट’ (गिरिशिखिर-प्रजनन) दिया था और तैंतीसवें वर्ष में उन्हें सलीब पर चढ़ा दिया गया। उनका समूचा उपदेश काल तीन वर्ष से भी कम रहा। वाल्मीकि के अनुसार रामचंद्र को भी तीस के आसपास ही (वास्तव में 27 वर्ष की वयस में) वनवास हुआ था। उस समय सीता की आयु अठारह वर्ष की थी और वनवास के तेरहवें वर्ष में अर्थात सीता के तीसवाँ पार करते-करते ही सीताहरण की ट्रेजेडी घटित हुई थी। अतः तीसवाँ वर्ष सदैव वरण के महामुहूर्त्त के रूप में आता है और संपूर्ण दशक उस वरण और तेज के दाह से अविष्ट रहता है। तीसोत्तर दशक जीवन का घनघोर कुरुक्षेत्र है। यह काल गदहपचीसी के विपरीत एक क्षुरधार काल है, जिस पर चढ़कर पुरुष या नारी अपने को अविष्कृत करते हैं, अपने मर्म और धर्म के प्रति अपने को सत्य करते हैं तथा अपनी अस्तित्वगत महिमा उद्घाटित करते हैं अथवा कम-से-कम ऐसा करने का अवसर तो अवश्य पाते हैं। चालीसा लगने के बाद पैंतालीस तक ‘यथास्थिति’ की उत्तराफाल्गुनी चलती है। पर इसमें ही जीवन की प्रतिकूल और अनुकूल उर्मियाँ परस्पर के संतुलित को खोना प्रारंभ कर देती हैं और प्राणशक्ति अवरोहण की ओर उन्मुख हो जाती है। इसके बाद अनुकूल उर्मियाँ स्पष्टतः थकहर होने लगती हैं और प्रतिकूल उर्मियाँ प्रबल होकर देह की गाँठ-गाँठ में बैठे रिपुओं से मेल कर बैठती हैं, मन हारने लगता है, सृष्टि अनाकर्षक और रति प्रतिकूल लगने लगती है, बुद्धि का तेज घट जाता है और वह स्वीकारपंथी (कनफर्मिस्ट) होने लगती है एवं आत्मा की दाहक तेजीमयी शक्ति पर विकार का धूम्र छाने लगता है। मैं तो यहाँ पर पैंतालीसवें वर्ष की बात कर रहा हूँ। परंतु मुझे स्मरण आती है दोस्तीव्हस्की – जिसने चालीस के बाद ही जीवन को धिक्कार दे दिया था : ‘मैं चालीस वर्ष जी चुका। चालीस वर्ष ही तो असली जीवन-काल है। तुम जानते हो कि चालीसवाँ माने चरम बुढ़ापा। दरअसल चालीस से ज्यादा जीना असभ्यता है, अश्लीलता है, अनैतिकता है। भला चालीस से आगे कौन जीता है? मूर्ख लोग और व्यर्थ लोग’ (‘नोट्स फ्रॉम अंडर ग्राउंड’ से) दोस्तोव्हस्की की इस उक्ति का यदि शाब्दिक अर्थ न लिया जाय तो मेरी समझ से इसका यही अर्थ होगा कि चालीस वर्ष के बाद जीवन के सहज लक्षणों का, परिवर्तन-परिवर्धन-सृजन का आत्मिक और मानसिक स्तरों पर ह्रास होने लगता है। पर मैं ‘साठा तब पाठा’ की उक्तिवाली गंगा की कछार का निवासी हूँ, इसी से इस अवधि को पाँच वर्ष और आगे बढ़ाकर देखता हूँ, यद्यपि दोस्तोव्हस्की की मूल थीसिस मुझे सही लगती है। शक्तिक्षय की प्रक्रिया चालीस के बाद ही प्रारंभ हो जाती है, यद्यपि वह अस्पष्ट रहती है।

मैं इस समय 1972 ईस्वी अपना अड़तीसवाँ पावस झेल रहा हूँ। पूर्वाफाल्गुनी का विकारग्रस्त यौवन जल पी-पीकर मैं ‘क्षिप्त’ से भी आगे एक पग ‘विक्षिप्त’ हो चुका हूँ और शीघ्र ही मोहमूढ़ होनेवाला हूँ! भाद्र की पहली नक्षत्र है मघा। मघा में अगाध जल है। पृथ्वी की तृषा आश्लेषा और मघा के जल से ही तृप्त होती है। यदि मघा में धरती की प्यास नहीं बुझी तो उसे अगले संवत्सर तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। न केवल परिमाण में, बल्कि गुण में भी मघा का जल श्रेष्ठ है। मघा-मेष की झड़ी झकोर का स्तव-गान कवि और किसान दोनो खूब करते हैं : ‘बरसै मघा झकोरि-झकोरी। मोर दुइ नैन चुवै जस ओरी।’ मघा बरसी, मानो दूध बरसा, मधु बरसा। इस मघा के बाद आती है पूर्वाफाल्गुनी जो बड़ी ही रद्दी-कंडम नक्षत्र है। इसका पानी फसल जायदाद के लिए हानिकारक तो है ही, उत्तर भारत में बाढ़-वर्षा का भय भी सर्वाधिक इसी नक्षत्र-काल में रहता है। इसी से उत्तर भारतीय गंगातीरी किसान इसे एक कीर्तिनाशा-कर्मनाशा नक्षत्र मानते हैं। इसके बाद आती है उत्तराफाल्गुनी, भाद्रपद की अंतिम नक्षत्र, जो समूचे पावस में मघा के बाद दूसरी उत्तम नक्षत्र है। इसका पानी स्वास्थ्यप्रद और सौभाग्यकारक होता है। इस अड़तीसवें पावस में अपने जीवन का पूर्वाफाल्गुनी काल भोग रहा हूँ, यद्यपि साथ-ही साथ द्वार पर उत्तराफाल्गुनी का आगमन भी देख रहा हूँ। चालीस आने में अब कितनी देर ही है।

अतः आज पूर्वाफाल्गुनी का अंतिम पानपात्र मेरे होंठों से संलग्न है। क्रोध मेरी खुराक है, लोभ मेरा नयन-अंजन है और काम-भुजंग मेरा क्रीड़ा-सहचर है। इनको ही मैं क्रमशः विद्रोह, प्रगति और नवलेखन कहकर पुकारता हूँ। भले ही यह विकार-जल हो, भले ही इसमें श्रेय-प्रेय, गति-मुक्ति कुछ भी न हो। परंतु इसमें जीर्णता और जर्जरता नहीं। यह जरा और वृद्धत्व का प्रतीक नहीं। पूर्वाफाल्गुनी द्वारा प्रदत्त विक्षिप्तता भी यौवन का ही एक अनुभव है। मुझे लग रहा था कि मेरे भीतर कोई उपंग बजा रहा है क्योंकि मेरे सम्मुख द्वार पर काल-नट्टिन अर्थात् उत्तराफाल्गुनी त्रिभंग रूप में खड़ी है और मैं उसमें मार की तीन कन्याओं तृषा-रति-आर्त्ति को एक साथ देख रहा हूँ। कांचनपद्म कांति, कर-पल्लव, कुणितकेश, बिंबाधर, विशाल बंकिम भ्रू, दक्षिणावर्त नाभि, और त्रिवली रेखा से युक्त इस भुवन-मोहन रूप को मैं देख रहा हूँ और इसको आगमनी में अपने भीतर बजती उपंग को निरंतर सुन रहा हूँ। उपंग एक विचित्र बाजा है। काल-पुरुषों की उँगलियाँ चटाक-चटाक पड़ती है और आहत नाद का छंदोबद्ध रूप निकलता है बीच-बीच में हिचकी के साथ। यह हिचकी भी उसी काल-विदूषक की भँड़ैती है और यह उपंग के तालबद्ध स्वर को अधिक सजीव और मार्मिक कर देती है। मैं अपने भीतर बजते यौवन का यह उपंग-संगीत सुन रहा हूँ और अपने मनोविकारों का छककर पान कर रहा हूँ। मुझे कोई चिंता नहीं। अभी वानप्रस्थ का शरद काल आने में काफी देर है। इस क्षण उसकी क्या चिंता करूँ? इस क्षण तो बस मौज ही मौज है, भले ही वह कटुतिक्त मौज क्यों न हो; काम भुजंग के डँसने पर तो नीम भी मीठी लगती है। अतः यह काल-नटी, यह पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी, यह ‘नैनाजोगिन’ कितनी भी भ्रान्ति, माया या मृगजल क्यों न हो, मैं इसके रूप में आबद्ध हूँ। इसमें मुझे वही स्वाद आ रहा है जो मायापति भगवान को अपनी माया के काम मधु का स्वाद लेते समय प्राप्त होता है और जिस स्वाद को लेने के लिए वे परमपद के भास्वर सिंहासन को छोड़कर हम लोगों के बीच बार-बार आते हैं। अतः इस समय मुझे कोई चिंता, कोई परवाह नहीं।

परंतु एक न एक दिन वह क्षण भी निश्चय ही उपस्थित होगा जिसकी श्रंगारहीन शरद यवनिका के पीछे जीर्ण हेमंत और मृत्युशीतल शिशिर की प्रेतछाया झलकती रहेगी। ‘उस दिन, तुम क्या करोगे? है तुम्हारे पास कोई बीज-मंत्र, कोई टोटका, कोई धारणी-मंत्र जिससे तुम अगले बीस-बाईस वर्षों के लिए इस उत्तराफाल्गुनी के पगों को स्तंभित कर दो और वह अगले बीस-बाईस वर्ष तुम्हारे द्वारदेश पर, शिथिल दक्षिण चरण, ईषत कृंचित जानु के साथ आभंग मुद्रा में नतग्रीव खड़ी रहे और तुम्हारे हुकुम की प्रतीक्षा करती रहे? है कोई ऐसा जीवन-दर्शन, ऐसा सिद्धाचार, ऐसी काया सिद्धि जिससे बाहर-बाहर शरद-शिशिर, पतझार-हेमंत आएँ और जूझते-हार खाते चले जाएँ। परंतु मनस की द्वार-देहरी पर यह उत्तराफाल्गुनी एक रस साठ वर्ष की आयु तक बनी रहे? है कोई ऐसा उपाय? यह प्रश्न रह-रहकर मैं स्वयं अपने ही से पूछता हूँ। आज से तेरह वर्ष पूर्व भी मैंने इस प्रश्न पर चिंता की थी और उक्त चिंतन से जो समाधान निकला उसे मैंने कार्य-रूप में परिणत कर दिया। परंतु इन तेरह वर्षों में असंख्य भाव-प्रतिभाओं के मुंडपात हुए हैं और आज मैं मूल्यों के कबंध-वन में भाव-प्रतिभाओं के केतु-कांतार में बैठा हूँ। आज जगत वही नहीं रहा जो तेरह वर्ष पूर्व था। एक ग्रीक दार्शनिक की उक्ति है कि एक नदी में हम दुबारा हाथ नहीं डाल सकते, क्योंकि नदी की धार क्षण-प्रतिक्षण और ही और होती जा रही है। काल-प्रवाह भी एक नदी है और इसकी भी कोई बूँद स्थिर नहीं। अतः शताब्दी के आठवें दशक के इस प्रथम चरण में मुझे उसी प्रश्न को पुनः-पुनः सोचना है : कैसे जीर्णता या जरा को, यदि संपूर्णतः जीतना असंभव हो तो भी फाँकी देकर यथासंभव दूरी तक वंचित रखा जाए? कैसे अपने दैहिक यौवन को नहीं, तो मानसिक यौवन को ही निरंतर धारदार और चिरंजीवी रखा जाय? उस दिन तो मैंने सीधा-सीधा उत्तर ढूँढ़ निकाला था : ‘ययाति की तरह पुत्रों से यौवन उधार लेकर।’ अर्थात मैं कोई नौकरी न करके कॉलेज में अध्यापन करूँ तो मुझ पचपन या साठ वर्ष की आयु तक युवा शिष्य-शिष्याओं के मध्य वास करने का अवसर सुलम होगा। मैं इनकी आशा-आकांक्षा, उत्साह, साहस, उद्यमता आदि से वैसे ही अनुप्राणित और आविष्ट रहूँगा जैसे चुंबकीय आकर्षण-क्षेत्र में पड़कर साधारण लोहा भी चुंबक बन जाता है।

परंतु विगत दशक के अंतिम दो वर्षों में जब मेरे ये बालखिल्य सहचरगण छिन्नमस्ता राजनीति के रँगरूट बनने लगे, जब इन्होंने मेरे गुरुओं, गांधी-विवेकानंद-विद्यासागर-सर आशुतोष, की प्रतिमाओं का एवं उनके द्वारा प्रति-पादित मूल्यों का, अनर्गल मुंडपात करना शुरू कर दिया, जब इनके नए दार्शनिकों ने कहना प्रारंभ किया कि आध्यापक और छात्र के बीच भी श्रेणी-शत्रुओं का संबंध है क्योंकि अध्यापक भी ‘स्थापित व्यवस्था’ का एक अंग है और ‘व्यवस्था’ का भंजन ही श्रेष्ठतम पुरुषार्थ है, तब देश में घटित होती हुई इन घटनाओं पर विचार करके और क्रांति तथा ‘नई पीढ़ी’ के दार्शनिकों – यथा हिबर्ट मारक्यूज, चेग्वारा, ब्रैंडिटकोहन आदि की चिंतनधारा से यथासंभव अल्प स्वल्पे परिचय पा करके मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मैं इन अपने भाइयों, अपने हृदय के टुकड़ों के साथ जो आज छिन्नमस्ता राजनीति के रँगरूट हैं, कुछ ही दूर तक, आधे रास्ते ही जा सकता हूँ। विविध प्रकार के नारों से आक्रांत ये नए ‘पुरूरवा’ (‘पुरूरवा’ का शब्दार्थ होता है ‘रवों’ (आवाजों या नारों) से आक्रांत या पूरित पुरुष। ‘ययाति’ पुरानी पीढ़ी का प्रतीक है तो पुरूरवा नई पीढ़ी का।) यदि मुझे यौवन उधार देंगे भी तो बदले में मुझे भी कबंध में रूपांतरित होने को कहेंगे। और मैं कैसे अपना चेहरा, अपनी आत्म-सत्ता, अपना व्यक्तित्व त्याग दूँ? ‘छिन्नमस्त’ पुरुष बनकर यौवन लेने से क्या लाभ? बिना मस्तक के बिना अपने निजी नयन-मुख-कान के इस उधार प्राप्त नवयौवन का नया अर्थ होगा? रूप, रस, गंध और गान से वंचित रह जाऊँगा। केवल शिश्नोदरवाला व्यक्तित्व लेकर कौन जीवन-यौवन भोगना चाहेगा? कम-से-कम बुद्धिजीवी तो नहीं ही। आत्मार्थ पृथिवी त्यजेत? अतः मुझे चिरयौवन को इन शिष्य-पुरूरवाओं की नई पीढ़ी से दान के रूप में नहीं लेना है। तेरह वर्ष पहले का चिंतित समाधान आज व्यर्थ सिद्ध हो गया है। मुझे अन्यत्र चिरयौवन का अनुसंधान करना है। कहीं-न-कहीं मेरे ही अंदर अमृता कला की गाँठ होगी। उसे ही मुझे आविष्कृत करना होगा। जो बाहर-बाहर अप्राप्य है वह सब-कुछ भीतर-भीतर सुलभ है। मैं अपने ही हृदय समुद्र का मंथन करके प्राण और अमृत के स्रोत किसी चंद्रमा को आविष्कृत करूँगा। तेरह वर्ष पुराना समाधान आज काम नहीं आ सकता।

मैं मानता हूँ कि समाज और शासन में शब्दों के व्यूह के पीछे एक कपट पाला जा रहा है। मैं बालखिल्यों के क्रोध की सार्थकता को स्वीकार करता हूँ। पर साथ ही छिन्नमस्ता शैली के सस्ते रंगांध और आत्मघाती समाधान को भी मैं बेहिचक बिना शील-मुरौवत के अस्वीकार करता हूँ। अपना मस्तक काटकर स्वयं उसी का रक्त पीना तंत्राचार-वीराचार हो सकता है परंतु यह न तो क्रांति है और न समर। पुरानी पीढ़ी का चिरयक्षत्व मुझे भी अच्छा नहीं लगता। मैं भी चाहता हूँ कि वह पीढ़ी अब खिजाब-आरसी का परित्याग करके संन्यास ले ले। शासन और व्यवस्था के पुतली घरों की मशीन-कन्याएँ उनकी बूढ़ी उँगलियों के सूत्र-संचालन से ऊब गई हैं और उनकी गति में रह-रह कर छंद-पतन हो रहा है। यह बिल्कुल न्याय-संगत प्रस्ताव है कि पूर्व पीढ़ी अपनी मनुस्मृति और कौपीन बगल में दबाकर पुतलीघर से बाहर हो जाय और नई पीढ़ी को, अर्थात हमें और हमारे बालखिल्यों को अपने भविष्य के यश-अपयश का पट स्वयं बुनने का अवसर दे जिससे वे भी अपने कल्पित नक्शे, अपने अर्जित हुनर को इस कीर्तिपट पर काढ़ने का अवसर पा सकें। यह सब सही है। परंतु क्या इन सब बातों की संपूर्ण सिद्धि के लिए इस पुतलीघर का ही अग्निदाह, पुरानी पीढ़ी द्वारा बुने कीर्तिपट के विस्तार का दाह, उनके श्रम फल का तिरस्कार आदि आवश्यक हैं? क्या ऐसा सब करना एक आत्मघाती प्रक्रिया नहीं? इस स्थल पर डॉ. राधाकृष्णन या आचार्य विनोबा भावे की राय को उद्धृत करूँ तो वह क्रांति के इन ‘दुग्ध कुमारों’ के लिए कौड़ी की तीन ही होगी। अतः मैं लेनिन जैसे महान क्रांतिकारी की राय उद्धृत कर रहा हूँ! 1922 ई. मैं लेनिन ने लिखा था, ‘उस सारी सभ्यता-संस्कृति को जो पूँजीवाद निर्मित कर गया है, हमें स्वीकार करना होगा। और उसके द्वारा ही समाजवाद गढ़ना होगा। पूर्व पीढ़ी के सारे ज्ञान, सारे विज्ञान, सारी यांत्रिकी को स्वीकृत कर लेना होगा। उसकी सारी कला को स्वीकार कर लेना होगा… हम सर्वहारा संस्कृति के निर्माण की समस्या तब तक हल नहीं कर सकते जब तक यह बात साफ-साफ न समझ लें कि मनुष्य जाति के सारे विकास और संपूर्ण सांस्कृतिक ज्ञान को आहरण किए बिना यह संभव नहीं, और उसे समझ कर सर्वहारा संस्कृति की पुनर्रचना करने में हम सफल हो सकेंगे। ‘सर्वहारा संस्कृति’ अज्ञात शून्य से उपजनेवाली चीज नहीं और न यह उन लोगों के द्वारा गढ़ी ही जा सकती है जो सर्वहारा संस्कृति के विशेषज्ञ विद्वान कहे जाते हैं ये सब बातें मूर्खतापूर्ण है। इनका कोई अर्थ नहीं होता। ‘सर्वहारा संस्कृति’ उसी ज्ञान का स्वाभाविक सहज विकास होगी जिसे पूँजीवादी, सामंतवादी और अमलातांत्रिक व्यवस्थाओं के जुए के नीचे हमारी संपूर्ण जाति ने विकसित किया है।’ यह बात स्वामी दयाननंद या पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी की होती तो बड़ी आसानी से कह सकते ‘मारो गोली! सब बूर्ज्वा बकवास है।’; पर कहता है क्रांतिकारियों का पितामह लेनिन, जिसे एक कट्टर बंगाली मार्क्सवादी नीरेंद्रनाथ राय ने अपनी पुस्तक ‘शेक्सपियर-हिज ऑडिएंस’ के पृष्ठ (49-50) पर उद्धृत किया है। आज प्रायः लोग पुकारकर कहते हैं : ‘देखो, देखो जोखिम उठा रहा हूँ, मूल्य भंजन कर रहा हूँ। अरे बंधु, जोखिम उठा रहे हो या नाम कमा रहे हो? यह तो आज अपने को प्रतिष्ठित बनाने और जाग्रत सिद्ध करने का सबसे सटीक तरीका ‘शॉर्टकट’ यानी तिरछा रास्ता है। जोखिम तुम नहीं उठा रहे हो तुम तो धार के साथ बह रहे हो और यह बड़ी आसान बात है। आज जोखिम वह उठा रहा है जो नदी की वर्तमान धारा के प्रतिकूल, धार के हुकुम को स्वीकारते हुए कह रहा है : ‘मूल्य भी क्या तोड़ने की चीज है जो तोड़ोगे? वह बदला जा सकता है तोड़ा नहीं जा सकता। मूल्य स्थिर या सनातन नहीं होता, यह भी मान लेता हूँ। परंतु एक अविच्छिन्न मूल्य-प्रवाह, एक सनातन मूल्य-परंपरा का अस्तित्व तो मानना ही होगा।’ नए बालखिल्य दार्शनिक कहेंगे – ‘यह धार के विपरीत जाना हुआ। यह तो प्रतिक्रियावाद है।’ ऐसी अवस्था में मेरा उन्हें उत्तर है : ‘कभी-कभी नदी की धार पथभ्रष्ट भी हो जाती है। वह सदैव प्रगति की दिशा में ही नहीं बहती। वह स्वभाव से अधोगति की ओर जानेवाली होती है। और आज? आज तो वन्याकाल है। वन्याकाल में धार पथभ्रष्ट रहती है। वह कर्मनाशा-कीर्तिनाशा-कालमुखी बनकर हमारे गाँव को रसातल में पहुँचाने आ रही है। अतः इस क्षण हमारी प्यारी नदी ही शत्रुरूपा हो गई है। और यदि गाँव को बचाना है तो हम धार के प्रतिकूल समर करेंगे। यदि हम अपना घर-द्वार फूँककर तमाशा देखकर मौज लेनेवाले आत्मभोगी ‘नीरो’ की संतानें नहीं है तों हमें इस नदी से समर करना ही होगा। यही हमारी जिजीविषा की माँग है। और इसके प्रतिकूल जो कुछ कहा जा रहा है, वह ‘नई पीढ़ी’ की बात हो या पुरानी की, मुमुक्षा का मुक्ति भोग है। यह सब विद्रोह नहीं बूर्ज्वा डेथविश का नया रूप है।’

अतः मै धार के साथ न बहकर अकेले-अकेले अपने अंदर की अमृता कला का अविष्कार करने को कृत संकल्प हूँ। बिना रोध के, बिना तट के जो धार है वह कालमुखी वन्या है, रोधवती और तटिनी नहीं। यों यह तो मैं मानता ही हूँ कि सर्जक या रचनाकार के लिए ‘नॉनकनफर्मिस्ट’ होना जरूरी है। इसके बिना उसकी सिसृक्षा प्राणवती नहीं हो पाती और नई लीक नहीं खोज पाती। अतः मुझे भी विद्रोही दर्शनों से अपने को किसी न किसी रूप में आजीवन संयुक्त रखना ही है। एक लेखक होने के नाते यही मेरी नियति है, और इस तथ्य को अस्वीकृत करने का अर्थ है अपनी सिसृक्षा की सारी संभावनाओं का अवरोध। परंतु लेखक, कवि या किसी भी साहित्येतर क्षेत्र के सर्जक या विधाता को यह बात भी गाँठ में बाँध लेनी चाहिए कि शत-प्रतिशत अस्वीकार या ‘नॉनकनफर्मिज्म’ से भी रचना या सृजन असंभव हो जाता है। पुराने के अस्वीकार से ही नए का आविष्कार संभव है। यह कुछ हद तक ठीक है। परंतु नए भावों या विचारों के ‘उद्गम’ के बाद ‘उपकरण’ या अभिव्यक्ति के साधन का प्रश्न उठता है और इसके लिए ‘नॉनकनफर्मिज्म’ को त्यागकर पचहत्तर प्रतिशत पुराने उपकरणों में से ही निर्वाचित-संशोधित करके कुछ को स्वीकार कर लेना होता है। रचना की ‘आइडिया’ के आविष्कार के लिए तो अवश्य ‘विद्रोही मन’ चाहिए। परंतु रचना का कार्य (प्रॉसेस) आइडिया के आविष्कार के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता। रचना-प्रक्रिया में ‘स्वीकारवादी मन’ की भी उतनी ही आवश्यकता है। अन्यथा ‘आइडिया’ या ज्ञान का ‘क्रिया’ में रूपांतर संभव नहीं। अतः प्रत्येक सर्जक या विधाता, जीवन के चाहे जिस क्षेत्र की बात हो, ‘विद्रोही’ और ‘स्वीकारवादी’ दोनों साथ ही साथ होता है। ‘शत-प्रतिशत अस्वीकार’ के फैशनेबुल दर्शन के प्रति मेरा आक्षेप यह भी है कि यह एक स्वयं आरोपित ‘नो एक्जिट’ (द्वारा या वातायन रहित अवरुद्ध कक्ष) है, इसको लेकर बहुत आगे तक नहीं जाया जा सकता है। यह दर्शन विषय और विधा दोनों की नकारात्मक सीमा बाँधकर बैठा है। और इसके द्वारा अपने ‘स्व’ को भी पूरा-पूरा नहीं पहचाना जा सकता है; तो ‘स्व’ से बाहर, इतिहास और समाज को समझने की तो बात ही नहीं उठती। यह ‘शत-प्रतिशत अस्वीकार’ का दर्शन कभी अस्तित्ववाद का चेहरा लेकर आता है तो कभी नव्य मार्क्सवाद का (क्लासिकल मार्क्सवाद से भिन्न); और ये दोनों मानसिक-बौद्धिक स्तर पर मौसेरे भाई हैं। ये एक ही ह्रासोन्मुखी संस्कृति की संतानें हैं। योगशास्त्र में मन की पाँच अवस्थाएँ कही गई हैं : क्षिप्त, विक्षिप्त, विमूढ़, निरुद्ध और आरूढ़। ये दोनों दर्शन विमूढ़ स्थिति के दो भिन्न संस्करण हैं, अतः दोनों त्याज्य हैं।

यह बाढ़-वन्या का काल है। नदी अपनी दिशा भूलकर, कूल छोड़कर उन्मुक्त हो गई है, अतः बुद्धजीवी वर्ग से धीरता और संयम अपेक्षित है। घबराकर वन्या की पथभ्रष्ट धार के प्रति आत्मसमर्पण करने की अपेक्षा जल के उत्तरण, वन्या के ‘उतार’ की प्रतीक्षा करना अधिक उचित है। पानी हटने पर नदी फिर कूलों के बीच लौट जाएगी। नदी अपनी शय्या यदि बदल भी दे, तो भी नई शय्या के साथ कोई कूल, कोई अवरोध तो उसे स्वीकार करना ही होगा। यह नया कूल भी उसी पुराने कूल के ही समानान्तर होगा। नदी तब भी समुद्रमुखी ही रहेगी। उलटकर हिमाचलमुखी कभी नहीं हो सकती। अतः इस वन्या नाट्य के विष्कंभक के बीच का समय मैं न तो बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ और न बहुत चिंताजनक। मैं बिल्कुल अविचलित हूँ। मेरा विश्वास है कि कल नहीं तो परसों हम अर्थात पुरानी पीढ़ी का युवा और मेरे बालखिल्य छात्र-छात्राएँ अर्थात नई युवा पीढ़ी, दोनों मिलकर इस शासन एवं व्यवस्था के पुतलीघर की नृत्य कन्याओं के कत्थक नृत्य को साथ-साथ संचालित करेंगे। यह पुतलीघर ऐसा है कि इसमें अनुशासित संयमित तालबद्ध कत्थक ही चल सकता है। अन्यथा जरा भी छंद पतन होने पर कोई न कोई भयावह पुतली एक ही झपट्टे में हड्डी आँत तक का भक्षण कर डालेगी क्योंकि इन पुतलियों में से कोई-कोई विषकन्याएँ भी हैं। अतः मैं चेष्टा करूँगा कि अपने अंदर की अमृता कला का आविष्कार करके इस उत्तराफाल्गुनी काल को बीस बाइस वर्ष के लिए अपने अंतर में स्थिर अचल कर दूँ, बाहर-बाहर चाहे शरद बहे या निदाघ हू-हू करे। तब मैं अपने बालखिल्य सहचरों के साथ व्यवस्था की इन पुतलियों का छंदोबद्ध नृत्य भोग सकूँगा। और एक दिन वह भी आएगा जब कोई चिल्लाकर मेरे कानों में कहेगा ‘फाइव ओ’ क्लाक! पाँच बज गए!’ कोई मेरे शीश पर घंटा बजा जाएगा, कोई मेरे हृदय में बोल जायगा : ‘बहुत हुआ। बहुत भोगा। अब नहीं। अब, अहं अमृतं इच्छामि। अहं वानप्रस्थ चरिष्यामि।’ और तब मैं व्यवस्था के पुतलीघर की इन यंत्रकन्याओं से माफी माँगकर उत्तर-पुरुष की जय जयकार बोलते हुए मंच से बाहर आ जाऊँगा और अपने को विसर्जित कर दूँगा लोकारण्य में, खो जाऊँगा अपरिचित, वृक्षोपम, अवसर प्राप्त, रिटायर्ड स्थाणुओं के महाकांतार में। पर अभी नहीं। अभी तो मैं विश्वेश्वर के साँड़ की तरह जवान हूँ।

किसान आंदोलन और गांधी-टैगोर डिबेट

gandhi and tagore debate

किसान आंदोलन चल रहा है। आंदोलन महाराष्ट्र से शुरू हुआ था और अब इसने मध्यप्रदेश को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है। आंदोलनकारियों की अनेक मांगें हैं, जिनमें कर्जमाफ़ी जैसी अनैतिक मांग भी शामिल है।

आंदोलनकारी किसानों ने आपूर्ति तंत्र को अपहृत कर लिया है। दूध, फल और सब्ज़ियों के उत्पादन और वितरण के “मैकेनिज़्म” में ये किसान बीच की अहम कड़ी की भूमिका निभाते हैं और अब उन्होंने यह भूमिका निभाने से इनकार कर दिया है। परिणाम यह है कि इससे प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया। यह वह जनजीवन है, जो किसानों की समस्याओं के लिए मूलत: दोषी नहीं था। जो किसान इस आंदोलन का हिस्सा बनने को तैयार नहीं थे और दूध और सब्ज़ियां बेचने निकले थे, उनके सामान को बलपूर्वक नष्ट कर दिया गया। यहां तक कि सहकारी संस्थाओं के दूध के टैंकरों को भी सड़कों पर उलट दिया गया।

जब मैंने आंदोलनकारियों की तस्वीरें देखीं तो दो चीज़ें मेरे दिमाग़ में आईं। एक तो आंदोलनकारियों की देहभाषा, जिसमें कहीं भी क्षोभ, हताशा या पीड़ा नहीं थी, उल्टे विनाश का “परपीड़क” सुख ही उसमें झलक रहा था। वे दूध और सब्ज़ियां नष्ट करते हुए हंसते-खिलखिलाते नज़र आ रहे थे। दूसरे, मैंने सामान्य लोगों को जीवनयापन के लिए आवश्यक वस्तुओं के लिए संघर्ष करते देखा। मैं समझ नहीं पाया कि सड़कों पर नष्ट कर दी गई आवश्यक वस्तुओं और उन्हें प्राप्त करने के लिए किए जा रहे संघर्ष के बीच के टूटे हुए “तारतम्य” को कैसे परिभाषित करूं। वह कौन-सी कड़ी थी, जिसने मांग और आपूर्ति के तंत्र को इस विडंबनामय तरीक़े से गड़बड़ा दिया था कि उनके बीच की सरणि‍यां विश्रंखल हो गई थीं। आप कह सकते हैं, किसानों के स्तर पर हठ और विवेकशून्यता और प्रशासन के स्तर पर दूरदृष्ट‍ि और संकल्पशक्त‍ि का अभाव। लेकिन मुझे इन प्रवृत्त‍ियों के भीतर ऐतिहासिक विचारधारागत भूलें दिखाई दे रही हैं।

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भारतीयों को “सत्याग्रह” और “असहयोग” की दीक्षा गांधी ने दी थी। विरोध की भंगिमा के रूप में विदेशी सामग्र‍ियों का बहिष्कार किया जाए, यह शिक्षा भी भारतीयों को गांधी ने ही दी। गांधी ने कहा था कि “विदेशी कपड़ों की ऐसी होली जलाई जाए, जो लंदन तक दिखाई दे।” अलबत्ता मज़े की बात यह है कि धुर दक्षिणपंथी भी यह दावा करने का प्रयास करते हैं कि विदेशी कपड़ों की होली जलाने के मूल में वस्तुत: सावरकर की प्रेरणा थी। आश्चर्य यह है कि जो गांधी केवल इसी कारण से आजीवन एक धोती पहनते रहे कि उनके देशवासियों के पास पहनने के लिए पूरे कपड़े भी नहीं हैं, वे कपड़ों की होली जलाने का अनैतिक आह्वान कर सकते थे, फिर चाहे उसका प्रतीकात्मक महत्व कुछ भी रहा हो।

इसके पीछे “गांधी-टैगोर मतभेदों” का एक सुचिंतित विमर्श रहा है। गांधी और टैगोर दोनों ही राष्ट्रवादी थे, लेकिन टैगोर का राष्ट्रवाद अपनी अवधारणाओं में कहीं व्यापक था। टैगोर सही मायनों में विश्व-नागरिक थे। और गांधी की आंधी के उस दौर में भले ही टैगोर को बंगाल के बाहर उतना महत्व ना दिया गया हो, सच्चाई यही है कि टैगोर के भीतर गांधी से गहरी अंतर्दृष्टि थी। लेकिन गांधी के पास जनसमर्थन था। और अपार जनसमर्थन हमेशा वैचारिक वैधता के प्रति संशय को ही जन्म देगा।

टैगोर इस बात के बिलकुल पक्ष में नहीं थे कि स्वदेशी आंदोलन के चलते बहिष्कार के एक उपकरण के रूप में विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाए। भारत में स्वदेशी आंदोलन वर्ष 1905 में “बंग-भंग” के बाद से प्रारंभ हो चुका था, अलबत्ता दादाभाई नौरोजी 1850 से ही इस दिशा में प्रवृत्त हो चुके थे। लेकिन इसे गति मिली वर्ष 1915 में गांधी की भारत वापसी से, जो दक्षिण अफ्रीका में “सत्याग्रह” के अपने प्रयोगों की पूंजी साथ लेकर आए थे। गांधी ने भारत लौटते ही अपने पूर्वग्रहों को सामने रखा। किंतु टैगोर ने गांधी की विचार-श्रंखला में निहित दुर्बलताओं को तुरंत भांप लिया था।

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1916 में टैगोर का उपन्यास “घरे-बाइरे” प्रकाशित हुआ था, जिसे भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन की “गांधी प्रणीत धारा” और “टैगोर प्रणीत पूर्वग्रह” के मूल में माना जाता है। टैगोर ने वह उपन्यास तब लिखा था, जब अभी तो “चंपारण सत्याग्रह” भी नहीं हुआ था और “असहयोग आंदोलन” भविष्य के गर्भ में था। टैगोर के उपन्यास में संदीप नामक पात्र है। संदीप राष्ट्रवादी है और “स्वराज” के लिए संघर्ष कर रहा है। वह विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की अपील करता है और जो उसके आह्वान को स्वीकार नहीं करते, उनकी वस्तुओं को बलात् नष्ट कर देता है (आज के किसान आंदोलनकारियों की तरह।) उपन्यास का नायक निखिल इस तौर-तरीक़ों से सहमत नहीं है। अनेक समालोचक गांधी को संदीप और टैगोर को निखिल के प्रतिनिधि के रूप में देखते रहे हैं। संदीप का संकीर्ण राष्ट्रवाद उग्र विरोध का हामी था, जबकि निखिल का मत था कि वस्तुओं को बलात् नष्ट करने से स्थानीय लोग और मुश्क‍िल में आ जाएंगे।

वस्तु अगर विदेशी हो तो भी अगर उसका एक “लोकल मर्केंडाइल” है तो वह स्थानीय बाज़ार में पूंजी का संचार करती है और रोज़गार के अवसरों का निर्माण करती है, यह अर्थशास्त्र की मूल धारणा है। और आप जब उत्कृष्ट उत्पादन को नष्ट करते हैं, तो यह ना केवल उपभोक्ता, जो कि अपनी प्रवृत्त‍ि में हमेशा “भूमंडलीकृत” होता है “स्थानीय” नहीं, के निजी अधिकारों का हनन होता है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के निर्माण की संभावनाओं को भी समाप्त करता है। गांधी के व्यक्त‍ित्व में भीषण हठधर्मिता थी, और उनके “असहयोग” के आह्वान में भी एक सूक्ष्म हिंसा थी, दबाव की रणनीति थी, जो कि “साधन-शुचिता” के उनके स्वयं के आग्रहों के विपरीत थी। “सत्याग्रह” में भी एक “आग्रह” है और आग्रह की अति एक “दुराग्रह” है, गांधी की बुद्धि‍ इसको समझने के लिए तैयार नहीं थी।

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1921 में जोड़ासांको की “ठाकुरबाड़ी” में गांधी और टैगोर की भेंट हुई। टैगोर ने गांधी के मुंह पर कहा कि स्वदेशी आंदोलन के नाम पर “टेक्सटाइल इंडस्ट्री” को समाप्त कर देना किसी लिहाज़ से विवेकपूर्ण नहीं है। इसके मूल में विनाश, नकारात्मकता और असहिष्णुता है। गांधी ने अपने सुपरिचित अंदाज़ में जवाब दिया, “डूबता हुआ आदमी औरों की परवाह नहीं करता!”

बंगाल में “गांधी-टैगोर डिबेट” पर बहुत विमर्श हुआ है और अमर्त्य सेन से लेकर आशीष नंदी तक ने इसकी बारीक़ पड़ताल की है। टैगोर के मानसपुत्र सत्यजित राय ने तो “घरे-बाइरे” पर एक फ़िल्म ही बनाई है, जिसमें राष्ट्रवादी संदीप स्पष्टतया एक खलचरित्र है। अलबत्ता सनद रहे कि वर्ष 1916 में टैगोर के उस विवेकशील हस्तक्षेप को बहुतों के द्वारा “विलायत-परस्ती” की संज्ञा दी गई थी! टैगोर को तीन साल पहले ही नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

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आज किसान आंदोलन के मूल में प्रतिहिंसा, नाश, असहयोग और हठधर्मिता की जो वृत्त‍ियां आपको नज़र आ रही हैं, वह भारत के जनमानस को गांधी की स्थायी देन है। मेरी मांगें मानो, अन्यथा मैं भूख हड़ताल कर दूंगा, असहयोग कर दूंगा, उत्पाद को नष्ट कर दूंगा, इस हिंसक और हठपूर्ण आग्रह को गांधी के “आभामंडल” ने एक नैतिक मान्यता प्रदान कर दी है। आपको शायद यह जानकर अच्छा ना लगे किंतु गुर्जरों द्वारा पटरियां उखाड़ देना, जाटों द्वारा सामूहिक बलात्कार करना, पटेलों द्वारा नगर-व्यवस्था को अपहृत कर लेना और किसानों द्वारा आपूर्ति-तंत्र को पंगु बना देने की प्रवृत्त‍ियों के पीछे जाने-अनजाने गांधी की ही प्रेरणा काम कर रही है।

गांधी को लगता था कि वे अपने अनुयायियों को “असहयोग” सिखा रहे हैं, जबकि उनके अनुयायी “उद्दंडता” सीख रहे थे।

गांधी को लगता था कि वे अपने अनुयायियों को “सत्याग्रह” सिखा रहे हैं, जबकि उनके अनुयायी “हठधर्मिता” सीख रहे थे।

एक “चौरी-चौरा” हमेशा गांधी की नियति में बंधा रहता है।

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मैंने किसानों की कर्जमाफ़ी की मांग को पहले ही अनुचित क़रार दे दिया है, क्योंकि जहां करोड़ों लोग नियमपूर्वक ऋण चुका रहे हों, तब कोई भी व्यवस्था “कर्जमाफ़ी” के तर्क पर नहीं चल सकती। मैं आगे जाकर यह भी कहूंगा कि किसानों के आंदोलन में निहित विनाश का व्याकरण घोर अनैतिक और आपराधिक है। उपज को नष्ट करने वाला कभी किसान नहीं हो सकता। अनाज की अवमानना करने वाला कभी “अन्नदाता” नहीं हो सकता। दूधमुंहे बच्चे एक-एक बूंद दूध के लिए तरसते रहें और गैलनों दूध को सड़कों पर नष्ट कर दिया जाए, यह कृत्य करने वाला आंदोलन कभी भी “वैध” नहीं हो सकता। और बल, आग्रह, हठ और हिंसा की जो प्रवृत्त‍ियां इस तरह के आंदोलनों के मूल में निहित होती हैं, वे कभी भी “साधन-शुचिता” की श्रेणी में नहीं रखी जा सकतीं।

और यही कारण है कि अब समय आ गया है कि भारत के भूमंडलीकृत विश्व-नागरिक गांधी और टैगोर में से किसी एक चुनाव करें और गांधी के छद्म आभामंडल से मुक्त हो जाएं।

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(ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं )

अगर तीन तलाक़ ना होगा तो मुसलमान तलाक़ के लिए कहां जाएगा?

Triple Talaq in Supreme Court

सर्वोच्च अदालत का कहना है कि “अगर तीन तलाक़ ना होगा तो मुसलमान तलाक़ के लिए कहां जाएगा?”

जैसे ही ये पंक्त‍ियां मैंने पढ़ीं, मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। और ये ही वे लोग हैं, जिन्हें हम माननीय, महनीय, योर ऑनर वग़ैरा कहते नहीं थकते!

मैं सर्वोच्च अदालत से एक सीधा सवाल पूछना चाहता हूं : “भारत का मुसलमान भारत का नागरिक है या वह इस्लाम का नागरिक है?”

दूसरा सवाल यह कि “अगर वह इस्लाम का नागरिक है तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है या इस्लामिक मुल्क़ है?”

मुझे तो इस सवाल का जवाब पता है, लेकिन मैं माननीय अदालत के मुंह से सुनना चाहता हूं।

भारत में तलाक़ की प्रक्रिया “हिंदू विवाह अधिनियम 1955” के तहत संपादित होती है। अदालत कहेगी यह “हिंदू क़ानून है, तो मुसलमान इसका पालन क्यों करेगा? अव्वल तो यह कि एक “समान नागरिक संहिता” इस देश में बनाई नहीं गई। अब आप कह रहे हैं कि मुसलमान हिंदू क़ानून का पालन क्यों करेगा। मेरा सवाल है, अगर हिंदू क़ानून से मुसलमान को न्याय मिल रहा है तो वह ऐसा क्यों नहीं करेगा? दूसरा यह कि न्यायालय का धर्म न्याय दिलाना है या लोगों के तथाकथित धर्मों की रक्षा करना है?

सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है और वह सुनवाई क्या है? वह यह जानने की कोशि‍श कर रही है कि तीन तलाक़ की प्रथा इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं। और अगर यह प्रथा इस्लाम का मूल हिस्सा पाई गई तो? तब क्या अदालत यह कहेगी कि न्याय से हमें सरोकार नहीं लेकिन इस्लाम की मान्यताओं में हम दख़ल नहीं दे सकते? वास्तव में खंडपीठ पहले ही साफ़ कर चुकी है कि अगर यह इस्लाम के मूल में हुआ तो अदालत कुछ नहीं कर सकती। और आप कहते हैं कि भारत एक “धर्मनिरपेक्ष” देश है!

बहुत संभव है अदालत इस नतीजे पर पहुंचे कि अगर तीन तलाक़ इस्लाम के मूल में होता तो जिन 22 इस्लामिक देशों में इस पर प्रतिबंध है, वहां पर ऐसा नहीं होता। लेकिन यह एक लचर तर्क है। क्या भारत के संविधान का निर्माण उन 22 इस्लामिक देशों के क़ानून को सामने रखकर किया गया था? क्या वह हमारे लिए आदर्श है, मानक है? और क्या अगर उन 22 देशों में तीन तलाक़ की अनुमति होती तो क्या भारत में भी इसकी अनुमति दी जा सकती थी? तो क्या भारत एक इस्लामिक मुल्क़ है? आप कह दीजिए कि हां, उसके बाद फिर हम कुछ नहीं बोलेंगे। लेकिन, योर ऑनर, आप कहिए एक बार कि हां भारत एक इस्लामिक मुल्क़ है!

अख़बार में बड़े अक्षरों में शीर्षक छपा है : “पांच धर्मों के जजों ने तीन तलाक़ पर शुरू की सुनवाई।” जजों का धर्म कब से होने लगा! जज का धर्म केवल न्याय है। पांच धर्मों के जज क्या सर्वधर्म समवाय करेंगे? तलाक़ “सिविल जस्ट‍िस” से जुड़ा मामला है या कोई मज़हबी तक़रीर है?

जिस देश की सर्वोच्च अदालत ही यह कहती हो कि अगर तीन तलाक़ ना होगा तो मुसलमान तलाक़ के लिए कहां जाएगा, क्या आश्चर्य कि उस देश का बंटवारा मज़हब के नाम पर हुआ था। क्या आश्चर्य कि उस देश में कश्मीर जैसी मज़हबी समस्या है, जिसका अलग “विधान”, अलग “निशान” है। भारत के प्रधानमंत्री कश्मीर के मुख्यमंत्री से मिलते हैं तो दोनों “देशों” के झंडे इस तरह से फहराए जाते हैं मानो यह कोई “बायलेटरल समिट” हो।

अलग चूल्हा, अलग चौका! अलग विधान, अलग निशान! अलग पहचान, अलग पाकिस्तान!

जहां पर देश से अलग हो सकता है, वहां देश से अलग। पश्च‍िम में पाकिस्तान, पूर्व में बांग्लोदश। जहां पर अलगाव में रुकावट है वहां पर अलगाववाद। उत्तर में कश्मीर, दक्खन में हैदराबाद। और जहां पर कोई और चारा नहीं, वहां अलग “विधान”, अलग “निशान”! हमारी थाली अलग, हमारा लोटा अलग! और उसके बावजूद आप कहते हैं गंगा-जमुनी तहज़ीब! और उसके बावजूद आप कहते हैं भारत धर्मनिरपेक्ष!

कौन कहता है? जो यह कहता हो, उसे यहां पर प्रस्तुत किया जाए। मैं देखना चाहता हूं कि एक संगीन झूठ बोलते समय किसी मनुष्य का चेहरा कितना विद्रूप दिखाई देता है!

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सुशोभित सक्तावत

छोटे शहर की लड़की का पीरियड्स

Nepalese Girls | Literature in India

पीरियड्स यानि उजले स्कर्ट में लग जाने वाले खून के धब्बों से होने वाली शर्मिंदगी, चार लड़कियों की उपाय निकालने वाली फुसफुसाहट ,घर के मर्दों से पैड को छुप- छुपाकर रखने से लेके यूज करने की कोशिश, पूजा ना करने से लेके दादी, बुआ,मर्दों को खाना- पानी ना देने की अनुमति वाली अशुद्धता।पीरियड्स यानि छूआआछूत,पूर्वाग्रह, घृणा और फिर कई सारी मिथ्याएं।

हमारे लिए पीरियड्स के मायने कुछ ऐसे ही रहे हैं। हम, कभी ना रूके, कभी ना झुके, आगे- आगे बढ़ते ही रहे – स्टे्फ्री वाली लड़की की तरह नहीं थे। हम उन छोटे शहर, कस्बों में रहने वाली लड़कियों में से थे जहां लड़कियों को पीरियड्स आते हैं तो उन्हें ऐसा एहसास कराया जाता है मानो वो उस नाली के पानी से भी ज्यादा गंदी हो। किसी बंद कमरे में कपड़ा या पैड थमा दिया जाता है और कुछ पूछने, कुछ आपत्ति जताने पर बस स्ससससससससस………..भैया, पापा को कुछ मत बताना कहकर चुप करा दिया जाता है। फिर भाई के साथ खेलना बंद- वो जिद्द करता है, क्या हुआ इसे, खेलने दो न। जवाब मिलता है- बड़ी हो गई है अपने उम्र के लड़कों के साथ खेलो।

Happy to Bleed | Literature in India

पापा के पैर दबाते हुए आपको अपने कमरे में जाने की हिदायत मिल जाती है। फिर पापा को कहा जाता है- वो बच्ची नहीं रही, पैर दबवाने की आदत छोड़ो, बेटे से दबवाया करो।

भाई के बार- बार पूछने पर कि बहन हमारे साथ पूजा में शामिल क्यों नहीं हो रही के सवाल पर वो नहाई नहीं है आज, जैसे बचकाने बहाने बनाकर आपको शर्मिंदगी महसूस करायी जाती है।

यूज की हुई पैड को किसी कोने में सबसे छुपाकर रखा करो। कितनी बार बताऊं कि पुरूषों की नज़र नहीं पड़नी चाहिए उस पर, नज़र पड़ जाने से उनकी आयु छिन्न हो जाती है। जब सुबह सभी सोए रहें तभी पैड फेंक दिया करो….जैसी ना जाने कितनी निराधार हिदायते मिलती हैं।
पर कुछ चीज़ें वैसी की वैसी ही रह जाती हैं। लड़कियों को ऐसी स्थिति में भी एक अच्छी डायट नहीं मिलती। उनके लिए दूध- घी जैसी चीज़ें नहीं होती। चर्बी हो जाने का डर होता है। फिर प्रेगनेंसी में प्रॉब्लम होगी। फल, ड्राई फ्रूट्स वगैरह तो लड़कों के खाने की चीज़े हैं। वो बाहर खेलते- कूदते हैं, लड़कियों का क्या घर में ही तो रहना है। मैंने अक्सर लड़कियों को इन दिनों में बेहोश होते, दर्द से कलपते ,रोते देखा है।

Bleed Village | Literature in India

घर में चार बहने हों तो पैड का खर्च एक मिडल क्लास फैमिली कैसे उठाएगी? वैसे भी कपड़ों से काम चल ही जाता है। फिर वो कैसे भी कपड़े हों….चार दिन की ही तो बात है। वैसे भी साफ- सफाई सदियों से चली आ रही मिथ्याओं के आगे कुछ मायने नहीं रखती। पैड को लेकर कई मिथ्याएं गांव- घर में प्रचलित है। आप गांव जाएंगे तब हैरानी होगी यह देखकर की माहवारी को लेकर जागरूकता की कितनी कमी है वहां। काले- ऊजले पॉलिथिन में पैड देने और मंदिर में प्रवेश की लड़ाईयों के इतर इनकी दुनिया हमारी दुनिया से कितनी पिछड़ी है।

मैंने देखा है महावारी वाली लड़कियों को अपने यूज किए हुए कपड़ों को धोकर – सुखाते हुए। गंदी जगहों पर कपड़ों को सुखाने के बाद वापस उनका इस्तेमाल करते। अधिकतर गरीबी में ऐसा करने पर विवश हैं मगर कुछ ऐसी भी हैं जिन्हें लगता है पैड यूज करना हराम है। पैड यूज करने से औरतें प्रेगनेंट नहीं हो पाती जैसी चीज़ें भी सुनने को मिलती हैं। कभी- कभी उनकी प्रतिक्रियाएं हास्यास्पद लग सकती हैं मगर हमें उन पर हंसने की बजाय खुद पर हंसना चाहिए कि हमने अपने स्तर पर क्या कोशिश की थी ? हमने क्या कोशिश की थी पीरियड्स से जुड़े टैबू से लड़ने की?
मैंने की थी। उस टैबू से लड़ने की जिसे दूर करने में अभी भी दशक लगेंगे। पीरियड्स में मैं अशुद्द होती हूं, यह वाली बात जमती नहीं थी मुझे। पूजा ना करने का लॉजिक समझ नहीं आता था इसलिए पीरियड्स के बारे में किसी को बिना कुछ बताए मैं पूजा करती थी। कभी- कभी मां को पता चलता तो वह खूब पिटाई करतीं। मगर मैं बाज़ नहीं आती। घर में हंगामा बढ़ता ही गया। मैं बहस करती कि क्यों ना करूं पूजा? नहाया तो है मैंने। मुझे उतना ही कोसा जाता। भगवान के सामने कान पकड़ के माफी मांगने, सर पटकने तक को कहा जाता। पाप हो गया है, लड़की है, माफ कर दीजिए ऐसी बातें मां भगवान को बोलती। मां का भी दोष नहीं था। वो तो वही कर रही थी जो उसे सिखाया गया था बचपन में। पर उसकी बेटी जिद्दी थी। मान ही नहीं रही थी। मां भी परेशान थी, डर रही थी कि कहीं पाप न लगे। रोज की खिच- खिच, डांट, मारपीट से आखिरकार मैंने पूजा करना छोड़ ही दिया।

Happy to Bleed Village | Literature in India

अब मैं पीरियड्स के दिनों में पूजा नहीं करती। आम दिनों में भी नहीं करती। मगर दोस्तों के कहने पर पीरियड्स में मंदिर जरूर चली जाती हूं। हां, वहां मां नहीं है न, घरवाले नहीं है, मगर देखो न कितना अनोखा है सबकुछ। जिसने अपने परिवार की मानसिकता के सामने हार मान लिया आज वो तुमसे बदलाव की उम्मीद लगाए बैठी है। यही विरोधाभास है, यही तो हास्यास्पद है। इस पर हंस लेना मगर उसके पहले मेरी कि कोशिश को नज़रअंदाज मत करना। कोई ऐसी कोशिश , ऐसा संघर्ष करता दिखे तो उसका बस साथ देना, तुम लड़की हो और आर्थिक रूप से सक्षम हो तो किसी गरीब व्यस्क लड़की को एक पैड गिफ्ट करना क्योंकि सरकार भी पितृसत्ता से ग्रसित है। कई साल लगेंगे सैनिटरी पैड्स को टैक्स फ्री करने में इसलिए अपनी कोशिश बरकरार रखना। याद रहे तुम एक लड़की को हैप्पी मेन्सट्रुएशन वाली फील दे सकती हो।

प्रेरणा शर्मा

ये लेख, Youth Ki Awaaz द्वार शुरु किए गए अभियान #IAmNotDown का हिस्सा है। इस अभियान का मकसद माहवारी से जुड़े स्वच्छता मिथकों पर बात करना है।

किसान हूँ, आत्महत्या मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है…

Tamilnadu Farmers Protesting in Delhi
हाँ साहब! मैं वही हूँ जिसने धरती का सीना फाड़, अपने पसीने से सींच वो फ़सल उगाई है जो आज आपके थालियों की शोभा बढ़ा रही हैं| मैं वही हूँ जो चिलचिलाती धूप में, बिलबिलाते से खेतों में कीचड़ से सने हुए अपने खून के कतरे को बूंद-बूँद टपका रहा हूँ, इस उम्मीद में कि शायद मेरी बेटी की शादी हो जाए…मेरा बेटा भी किसी कान्वेंट स्कूल में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ ले| मेरे सपने बस ये जानते है कि या तो मेरा बेटा, आईएएस बने…डॉक्टर बने…इंजीनियर बने…| इससे अधिक मेरे सपनों के हौसले नहीं हैं..न ही मेरी उम्मीदों की उड़ान| मेरे सपने मेरे फावड़े की चोटों को और तेज़ कर देते है, मैं और तेज़ खून को रगों में बहाता हूँ ताकि कतरा-कतरा ही सही…पर इस गति में बहे कि जीते जी मेरे सपने सच हो सके|
कल ही सुना था कि वकील साहब का बेटा विदेश गया है..पढ़ने| नेताजी ने भी अपनी बेटी की शादी में क्या इंतजाम किये थे…पूरा जिला-जवार जान गया कि फलाने की बेटी की शादी है| मेरी मुनिया भी गयी थी…शादी देखने नहीं…अपनी आँखों में आंसू लेकर..एक मिठाई की प्लेट की आश में| मेरा बेटा तो दूर से खड़ा ही देखता रहा…अपने फटे-चीथड़े कपड़ो में लिपटा हुआ| मैं हारा क्या न करता…मेरा मन बैठा था..बस रगों में खून और तेज़ी से दौड़ने लगा ताकि मैं कल अपने खेतों में और तेज़ फावड़ा चला सकूं, मेरा बस चले तो मैं फसलों की नन्ही कलियों को खीच कर बड़ा कर दूं पर न तो मैं भगवान हूँ…न तो मैं हैवान…बस एक किसान हूँ!
रोज रेडियो और टीवी पर बस यही देख-सून लेता हूँ कि सरकार किसानों के लिए ये कर रही है…वो कर रही है…| जाने ऐसा क्या कर रही है जो सिर्फ सुनाई देता है…दिखाई नहीं देता| मेरा हक़ है…मैं क़र्ज़ लेता हूँ…अपनी मुनिया के लिए, अपने बेटे के लिए…अपने खेत के लिए| जब मेरी फसल हुई तो आलू 5 रूपये किलों पर आ जायेगा और जब ख़त्म होगा तो २० रूपये| मैं न तो रख सकता हूँ, न बेच सकता हूँ…क्या करूं…आखिर क़र्ज़ में डूबे फावड़े में चलने का सामर्थ्य कहाँ से लाऊं? बैंक में जाता हूँ तो मेनेजर साहब पहले १०००० मांगते है फिर सरकारी योजनाओं से रूबरू कराते है| मेरे पास तो दस आने भी अधिक नहीं है…१०००० कहाँ से लाऊं?…रोता हूँ…बिलखता हूँ…आत्मा को कंपा देता हूँ…पर मायूसी ही लेकर लौटता हूँ…|
ये सरकारे, ये योजनाएं सिर्फ कागज़ पर चलती है| मेरी मुनिया बड़ी हो गयी है…मेरा बेटा खेतों में मेरे साथ हल चलाता हैं…फावड़े की चोट अब धीमी हो चली है…हल थक चुके है…नन्ही कलियाँ बचपन का आनंद ले रही हैं…मेरे आंसुओं में आग भी है…पानी भी…खुद ही धधक कर बुझ जाते है ये आंसू| साहब आप ही बताओ..खाली पेट…सपनों को ढोते-ढोते क्यों न मैं खुद ही बुझ जाऊ?
साहब! किसान हूँ, आत्महत्या मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है!
ठाकुर दीपक सिंह कवि

जहां जाति नहीं, वहां भी वह चिपका दी जाती है

छत्तीसगढ़ के बस्तर में काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया कुछ दलित बौद्धिकों की नज़र में सवर्ण महिला हैं। महानगरों में टिके हुए इन चिंतकों को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि बेला भाटिया छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में आदिवासी महिलाओं और वंचित तबके के लिए हर क़िस्म का जोख़िम उठाकर काम कर रही हैं।
उल्लेखनीय है कि बेला भाटिया को एक दिन पहले ही उनके घर में गोलबंद दबंगों द्वारा कुछ ही घंटों में छत्तीसगढ़ छोड़ देने की बेशर्त धमकी मिली है। इस प्रसंग में पुलिस से लेकर राज्य सरकार तक बेला भाटिया के ख़िलाफ़ हैं। समाचार तो ऐसे आ रहे हैं कि पुलिस के सबसे बड़े अधिकारी बेला भाटिया की महिला वकील को भी अश्लील धमकी दे रहे हैं। इस आशंका को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता कि ऐसे घोर दमन के वक़्त और परिवेश में यदि बेला भाटिया के ख़िलाफ़ कुछ अप्रिय किया जाता है तो उन्हें समय रहते कोई मदद मिल भी पायेगी या नहीं!!! हाल के कुछ वर्षों में जब वाम और दलित एकता की सबसे अधिक आवश्यकता महसूस की जा रही है तब वंचितों की ओर से कुछ ख़ास तरह के परिवर्तनकामी अम्बेडकरवादी जन्मना दलित या पिछड़े उभरकर सामने आये हैं। इनमें पत्रकार, शिक्षक से लेकर प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं।
दलित, पिछड़ों के मध्यवर्ग से सम्बन्ध रखने वाले ये अधिकांश विचारक किसी को भी जो जन्मना दलित या पिछड़ा नहीं है हमेशा जातिवाद के मोर्चे पर खींचकर बहस करना चाहते हैं। यह एक विचित्र धुन है जो अधिकतर कटुता को ही जन्म देती है। इनके लिए जाति ही सत्ता है। सत्ता के कुल चरित्र को इन्होंने केवल जाति से ही इस तरह नत्थी कर दिया है जैसे किसी ज़माने में लंगोट ही चरित्र की कसौटी हुआ करता था। ऐसा खासतौर पर तब अतिरिक्त उत्साह से किया जाता है जब सामने कोई जन्मना सवर्ण हो। इसमें आसानी यह होती है कि बिना किसी तर्क के भी ब्राह्मणवादी आया ब्राह्मणवादी आया कहकर या तो बहस को काबू में किया जा सकता है या कम से कम भटकने को विवश किया ही जा सकता है। इस नए क़िस्म के प्रायोजित दलित बौद्धिक कार्य व्यापार में एक मज़बूत आधार यह होता है कि कोई सचमुच का प्रगतिशील जन्मना सवर्ण गिरी हालत में भी दलित विरोधी बात नहीं कह पायेगा और जन्मना सवर्ण जातिवादी नहीं हो सकता दलित बौद्धिक कभी यह मानेंगे नहीं न मानने देंगे।
फिर क्या है? एक विचित्र विवेचना शुरू होती है जिसमें नेहरू केवल जनेऊधारी हैं। एक ओर गांधी के भी विखंडन की ज़बरदस्त तैयारी है तो वहीं दूसरी ओर ऐसे समकालीन कुख्यात नेताओं की वक़ालत की विवशता है जो कभी न घर के रहे हैं न कभी घाट के होंगे। समकालीन राजनीति के ही वार, पलटवार के उपकरणों, सूचनाओं और लेखन कौशल से अपनी बौद्धिकता का समर्थन निर्मित कर रहे जनाधार पलट देने की महत्वाकांक्षा रखनेवाले कुछ नव दलित एक्टिविस्टों से बहस करते हुए यदि जातिवादी कहे जाने की व्यक्तिगत और निजी तक़लीफ़ छोड़ दी जाए तो आमतौर पर आगे कोई बड़ी चुनौती नहीं मिलती। हर ऐतिहासिक उदाहरण को केवल खारिज़ करने की ज़िद तो खूब मिलती है लेकिन निर्मिति में दक्षता नहीं होती। सिर्फ़ इंकार और निंदा। तोड़ो और तोड़ो। मानो निर्माण और सहकार दैवी कृपा से अपने आप होता जायेगा।
कुल मिलाकर इस सब से वास्तव में कोई बड़ी तोड़ फोड़ तो नहीं दिखती लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण बात तो है ही कि अपने करियरिस्ट लेखन और ज़बरदस्त बायोडाटा के बल पर ये कुछ नए सफलताकामी लोगों के भीतर गहरी सामाजिक तैयारी के स्थान पर अकारण जातीय दुराव पैदा करने में किंचित सफ़ल रहते हैं। महान स्वप्न दृष्टा अम्बेडकर के प्रति अटूट और आलोचना से परे आस्था रखते दिखने वाले ये नव दलित चिंतक भूल ही जाते हैं कि इनकी आपस की बहसें, असहमतियां और झगडे कितने क्रूर और पश्चगामी हैं। इनका झगड़ा विश्व के सबसे बड़े माने जानेवाले दक्षिण पंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से है लेकिन ये फौरी तौर पर वामपंथियों को निशाने में रखना चाहते हैं क्योंकि कभी आंबेडकर ने संघ के प्रति उपेक्षा बरती थी। शुक्र है कि अपने आरंभिक दौर में भी दलितवाद के पास ज्योतिबा फुले से लेकर प्रो तुलसी राम और ओमप्रकाश वाल्मीकि, शीतल साठे जैसे प्रकाश स्तंभ हैं। वरना केवल जाति की पहचान करके ही उग्र या शांत हो जानेवाली इनकी सक्रियता कितने विभ्रम रचती इसका अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है।
एक तरफ़ छत्तीसगढ़ में बेला भाटिया हैं दूसरी तरफ़ जेएनयू में दिलीप यादव। इन दोनों के बीच में दलित, वाम सत्ता विमर्श। फ़ायदा चाहे जिसका हो लेकिन दूरी बेला और दिलीप के बीच ही बढ़ रही है इतना साफ़ है। मज़े में हैं वे ताक़तें जो दलित और वाम एकता से संकट में हो सकती थीं।

शशिभूषण। कवि-कथाकार। आकाशवाणी रीवा में क़रीब चार साल तक आकस्मिक उदघोषक रहे। बाद में यूजीसी की रिसर्च फेलोशिप भी मिली। फ़िलहाल मध्यप्रदेश के उज्जैन में हिंदी की अध्यापकी। gshashibhooshan@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

जो सार्थक है, वही सकारात्मक है


rajesh-joshi_1443996109अग्रज कवि राजेश जोशी का यह आलेख दैनिक भास्कर के गत ५ अक्टूबर के अंक में पढ़ने को मिला. सहज तरीके से कई महत्त्वपूर्ण बातें करते इस आलेख को यहां सहेजने और अपने मित्रों के बीच साझा करने की आवश्यकता महसूस हुई. दैनिक भास्कर को आभार सहित यह आलेख यहां प्रस्तुत है.

deepमिस्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कथाकार नजीब महफूज़ की एक बहुत छोटी-सी कहानी है – प्रार्थना । इस कहानी का अनुवाद हिंदी के चर्चित कथाकार जितेंद्र भाटिया ने किया है:
‘मेरी उम्र सात से भी कम रही होगी जब मैंने क्रांति के लिए प्रार्थना की। उस सुबह भी मैं रोज़ की तरह दाई की उंगली पकड़कर प्राथमिक शाला की ओर जा रहा था, लेकिन मेरे पैर इस तरह घिसट रहे थे जैसे कोई जबर्दस्ती मुझे कैदखाने की ओर खींचे लिए चल रहा हो। मेरे हाथ में काॅपी, आंखों में उदासी और दिल में सब कुछ चकनाचुर कर डालने की अराजक मनःस्थिति थी। निकर के नीचे नंगी टांगों पर हवा बर्छियों की तरह चुभ रही थी। स्कूल पहुंचने पर बाहर का फाटक बंद मिला। दरबान ने गंभीर शिकायती लहज़े में बताया कि प्रदर्शनकारियों के धरने की वजह से कक्षाएं आज भी रद्‌द रहेंगी। खुशी की एक ज़बर्दस्त लहर ने मुझे बाहर से भीतर तक सराबोर कर दिया। अपने दिल की सबसे अंदरूनी तह से मैंने इंकिलाब के ज़िंदाबाद होने की दुआ मांगी।’
यह मजेदार छोटी-सी कहानी सकारात्मकता और नकारात्मकता के अर्थ को उलझाती हुई लग सकती है, लेकिन वास्तविकता यही है कि अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग व्यक्तियों के लिए इन पदों के अर्थ बदल जाते हैं। जैसे स्कूल जाने के प्रति अनइच्छुक बच्चे के लिए स्कूल और क्रांति जैसे पद की सकारात्मकता बदल गई है। वह क्रांति के ज़िंदाबाद होने की कामना इसलिए करता है कि उसके कारण उसे स्कूल से छुट्‌टी मिल गई है । ऐसी स्थितियां आ सकती हैं जब आपको दो सकारात्मक स्थितियों या विचारों के बीच अपने लिए चुनना हो।
चरखे या स्वदेशी आंदोलन में विदेशी कपड़ों और सामान की होली जलाने को लेकर महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच हुई असहमति और वाद-विवाद को याद किया जा सकता है। (टैगोर इसे पश्चिम से दिल और दिमाग के स्तर पर अलगाव तथा आध्यात्मिक आत्मघात मानते थे। चरखे से बुनाई पर उन्होंने कहा कि जो लोग दूसरे काम के योग्य हैं, उनके द्वारा चरखे पर सूत कातने से क्या भला होगा।) इसमें रवींद्रनाथ का पक्ष सकारात्मक लग सकता है और गांधीजी की कार्रवाई नकारात्मक। तर्क के स्तर पर चाहे रवींद्रनाथ गलत नहीं थे, लेकिन बाद के इतिहास ने गांधीजी के आंदोलन को ज्यादा सही सिद्ध किया। सही से ज्यादा देश के लिए सार्थक भी।
महाभारत में यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुए संवाद में यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया कि दुनिया में सबसे मूल्यवान क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- समय। वस्तुतः समय ही किसी भी स्थिति घटना या विचार की सकारात्मकता और नकारात्मकता को तय करता है। कहा जा सकता है कि सकारात्मकता एक सापेक्ष अवधारणा है। वह दिक और काल के संदर्भ में ही व्याख्यायित होगा। यानी समय, परिस्थिति और स्थान के सदर्भ से काटकर अगर उसे देखेंगे तो वह एक लुजलुजा-सा पद बनकर रहा जाएगा।
उत्तर आधुनिकता के एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण चिंतक जाॅक देरिदा के कथन को इस प्रसंग के साथ ही जोड़कर देखें तो शायद नकारात्मकता तथा सकारात्मकता और समय के संबंध को समझने में ज्यादा सही दृष्टि मिल सकती है। जाॅक देरिदा का मानना है कि चरम निराशा की अवस्था में भी किसी उम्मीद की आकांक्षा समय के साथ हमारे रिश्ते का एक अभिन्न अंग है। नाउम्मीदी, इसलिए है, क्योंकि हमें उम्मीद है कि कुछ अच्छा और सुंदर घटित होगा। मुझे लगता है कि सकारात्मकता से ज्यादा सार्थकता पर बल दिया जाना चाहिए। हमारे समय में, जो कुछ भी हाशिये पर धकेल दिए गए मनुष्य के पक्ष में है, वही सार्थक है और वहीं सही अर्थ में सकारात्मक है
सकारात्मकता एक लचीला पद है। इसकी व्याख्या हर व्यक्ति अपने ढंग से करता है, कर सकता है। कहा जा सकता है कि नकारात्मकता भी ऐसा ही पद है। सत्ताएं या ताकत की संरचनाएं दोनों ही पदों का अपने हित में हमेशा से ही मनमाना उपयोग करती रही हैं। ताकत के केंद्र चाहे राजनीतिक हों, सामाजिक या धार्मिक। यह सिलसिला एक स्तर पर घर से ही शुरू हो जाता है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि बच्चा जब पहली बार ‘नहीं कहना सीखता है तभी उसके दिमाग का विकास शुरू होता है । कहा जा सकता है कि ‘नहीं’ तो एक नकारात्मक शब्द है, लेकिन यही मस्तिष्क के विकास की सकारात्मक प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। एक व्यक्ति के लिए, जो सकारात्मक है वह दूसरे के लिए नकारात्मक हो सकता है और इसी तरह नकारात्मक कभी-कभी बहुत सकारात्मक हो सकता है बल्कि होता ही है।
इतिहास में इसके बहुत उज्ज्वल उदाहरण मिल जाएंगे। स्वाधीनता संग्राम में भगत सिंह द्वारा संसद में बम फेका जाना ही नहीं महात्मा गांधी का करो या मरो जैसा आंदोलन भी अपने ध्वन्यार्थ में नकारात्मक है, लेकिन इतिहास इन दोनों ही घटनाओं की व्याख्या सकारात्मक रूप से ही करेगा। इसलिए कई बार लगता है कि सकारात्मकता और नकारात्मकता वस्तुतः ताकत के खेल के रूप में अपना अर्थ ग्रहण करते हैं। यह पद एक ऐसा औजार है, जिससे सत्ता हर घटना की व्याख्या को अपने पक्ष में मोड़ लेने की कोशिश करती है। समाज का वर्गीय ढांचा अपने आप में अन्याय पर आधारित संरचना है। वह मनुष्य और मनुष्य के बीच फर्क करती है।
पुरुष-सत्तात्मक समाज अन्याय पर आधारित संरचना है। वह स्त्री और पुरूष के बीच भेद करता है। उनके अधिकारों के बारे में भेद करता है। समान अधिकार का दावा करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी क्या सबको समान अधिकार मिल पाते हैं? आरक्षण के बावजूद हम पाते हैं कि कई स्तर पर दलितों के साथ समाज में हर पल अन्याय की घटनाएं होती ही रहती हैं। इन स्थितियों के विरूद्ध समाज में लगातार संघर्ष जारी रहता है। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में स्त्री विमर्श या दलित विमर्श ने विचार-विमर्श में केंद्रीयता हासिल कर ली। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में ही तर्क दिए जा सकते हैं। दिए जाते रहे हैं।
तो सवाल उठता है कि नकारात्मकता है क्या? स्त्रियों, बच्चों और समाज के कमजोर तबके के लोगों पर होने वाला अन्याय, अत्याचार नकारात्मक है या उसके विरूद्ध असहमति में उठा हाथ, विरोध में लिखा या बोला गया शब्द नकारात्मक है? वस्तुतः नकारात्मक जीवन स्थितियों के विरूद्ध खड़ी नकारात्मक कार्रवाई एक वास्तविक सकारात्मकता है

० राजेश जोशी साहित्य अकादमी अवॉर्ड व शिखर सम्मान से पुरस्कृत हिंदी कवि और लेखक

गुलामी की निशानी है घूंघट

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मेरे समाज में आज भी नई बहुओं को घूंघट निकालने के लिए बाध्य किया जाता है. ना सिर्फ गांव में बल्कि बड़े शहरों में भी आज की पढ़ी लिखी नए विचारों की लड़कियां हाथ भर का घूंघट निकाल रह रही हैं. एक बार मेरे समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने मुझसे कहा कि ‘तुम तो अच्छा लिखती हो, समाज को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी के लिए कुछ लिखो, अपने समाज की पत्रिका में छपवाएंगे’

तभी उनकी बहू हाथ भर घूंघट निकाले चाय देने आयी, तो मैं तपाक से बोली ‘आज से आपकी बहु का घूंघट हटवा लो, फिर मैं इसी पर कुछ लिखती हूं केवल आप लोगों की झूठी शान के लिए आज की लड़की आखिर ये गुलामी का भार कब तक उठाएगी? तो झुंझला कर बोले ‘घूंघट तो औरत की इज्जत होती है, घूंघट में बड़ों का लिहाज रखती है’. मैंने कहा, तो आपके छोटे भाई की बहू आपसे घूंघट क्यो नही निकालती? बोले ‘वो मेरे रिश्ते में कुछ लगती है’

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मैंने कहा ‘अजीब है सिर्फ रिश्ता डिसाइड करता है कि किसको किससे घूंघट निकालना चाहिए. तो फिर इज्जत और लिहाज की बात कहां से आ गई? और अगर इज्जत की इतनी ही ज्यादा फिक्र है तो सिर्फ बहुओं से क्यों बेटियों और बहनों से भी घूंघट निकलवाओ. और दूसरे समाज की मेरी सहेलियां जो अपने ससुराल वालों से घूंघट नहीं निकालतीं, अपनी मर्जी से जिंदगी जीती हैं तो क्या वो उन लोगों का लिहाज नहीं रखतीं? इज़्ज़त नहीं करतीं? अगर घूंघट इज्जत और शर्म का प्रतीक है तो मैंने सुना है कि कुछ दिन पहले आपके चचेरे भाई की पत्नी हाथ भर घूंघट निकाल कर किसी बात पर आपको खरी खोटी सुना गईं? तो मतलब घूंघट में सब अलाउड है ? तो कैसी इज्जत और कैसी शर्म ?

खैर काफी देर तक चली ‘घूंघट’ पर बहस का कोई सही परिणाम नही निकला. आखिर में मैंने बस इतना कहा ‘सिर्फ लिखने और बोलने से समाज नहीं बदलेगा उसके लिए आपको और हमको कई कठिन फैसले और मजबूत कदम उठाने पड़ेंगे और उसके लिए किसी ना किसी को तो पहल करनी ही पड़ेगी’

पर बड़े ही ढीठ इंसान थे, बोले ‘तुम चार किताबें पढ़कर हमारी परंपराओं को नहीं बदल सकतीं.’

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ये तो सिर्फ एक छोटी सी बात है जो उनको इतनी खटक गई अगर और भी सारी बुराइयों के बारे में बताया होता तो पता नहीं क्या करते. बड़े आए समाज में बदलाव की बात करने वाले. पहले खुद को तो बदलो.

हमारे समाज की आज की पढ़ी लिखी लड़कियां जो नए जमाने के साथ कदम मिला कर आगे बढ़ना चाहती हैं, अपने सपनों को जीना चाहती हैं, उन्हें ये रूढ़ीवादी विचारधारा वापस उसी कीचड़ में घसीट रही है, जिससे वो इतने प्रयासों के बाद बाहर निकलने की कोशिश कर रही हैं. जब लड़कियां ये सब बंदिशें झेल नहीं पातीं और घुटती हैं तो उनके मां-बाप उन्हें कुछ ऐसी महिलाओं के उदाहरण देकर हिम्मत बंधाते हैं जो कई सालों से ये सब सहती आ रही हैं और चुप-चाप जी रही हैं. यहां तक ही उनसे सीखने और उनकी तरह बनने की सलाह भी देते हैं. वाह रे मेरे दोगले कायर समाज !

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अफसोस की बात तो ये है कि आज के पढ़े-लिखे नए विचारों के लड़के जो खुद को हॉलीवुड की दुनिया के करीबी रिश्तेदार मानते हैं वो भी इसका विरोध नहीं करते जो अच्छे से जानते हैं कि घूंघट एक कुप्रथा है और एक गुलामी की निशानी है. बदलाव के लिए बड़ी बड़ी बातें नही बड़ा जिगर होना चाहिए. लड़कियों को खुद अपनी स्थिति बदलनी होगी बिना किसी के भरोसे रहे.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि लिटरेचर इन इंडिया ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

लेखक

रेखा सुथार @rekha.suthar

(आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप से साभार)

 

वेश्याओं से सुनिए उन मर्दों की कहानी

p7

उनकी सोच बिल्कुल साफ है. वे उन मर्दो को चूमना नहीं चाहतीं जिन्होंने सेक्स के लिए पैसे दिए हैं. उन्होंने यह भी बता दिया जिन मर्दों से बदबू आती है..या जो गालियां बकते और अपनी दुख भरी कहानियां सुनाती हैं. वे उनके साथ सेक्स करना नहीं चाहतीं. वे मर्द तो और भी उबाऊ हैं जो कहते हैं कि उन्हें अपनी बीवियों से नफरत है. वेश्यालयों की महिलाओं की जुबान खुली तो वहां आने वाले मर्दों के बारे में चौंकाने वाली जानकारियां सामने आने लगी. ऐसा लगा जैसे इन मसले पर उनकी सहमति नहीं है लेकिन उन्हें खरीद लिया गया हो. यहां कई अजीबोगरीब चीजें होती हैं लेकिन अब इन महिलाएं को उसकी परवाह नहीं.

p8

मैं मानती रही हूं कि वेश्यालय केवल सेक्स की जगह नहीं हैं बल्कि कामोत्तेजनाएं मिटाने की जगह भी हैं. कोई उन्हें यातनाओं की जगह के रूप में भी देख सकता है जहां मर्द अपने मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए अपनी कल्पनाओं को शुद्ध करते हैं. एक बार, जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें क्या-क्या भोगना पड़ा, उन्होंने ऐसे मर्दों की कहानियां सुनाई जिन्हें वेश्याओं को दुल्हन के जोड़े पहनाना, और रोल प्ले कराना पसंद था. ये सब रोमांटिक था, और उन्हें ये सब बुरा भी नहीं लगा.

p3

ऐसा आदमी जो उनके कपड़े उतारकर खुद पहन लेता हो, या दूसरा जो रजस्वला स्त्री के कपड़े धोने के लिए पूछे. वो ऐसी कल्पनाओं पर हंसा करती थीं, फिर भी वे पुरुषों को ऐसा करने देतीं क्योंकि इससे उन्हें पैसे मिलते थे. किसी ने बताया कि एक आदमी इतना कामुक था कि उसने एक वेश्या को पंखे से लटका दिया और उसे मारा. और वेश्या ने भी ये सब सहा क्योंकि उसे पैसा कमाना था और आगे बढ़ना था.

p6

बहुत पहले की बात है, वेश्याएं पुरुषों के बारे में क्या सोचती हैं, मैंने इस बारे में एक लेख लिखा था. ये बहिष्कृत औरतें अपने ग्राहकों के बारे में क्या सोचती हैं ये उसकी कहानी थी. और वो हमेशा यही कहतीं कि वो आदमियों को ‘चू**’ समझती हैं. वे आदमी जो उनकी गंदी सीढि़यां चढ़कर आते हैं, या वो जो उन गलियों से औरतों को उठाकर बक्से जैसे कमरों में ले जाते हैं वो नैतिकता के सवालों से मुक्त हैं.

वो जानते थे कि उन्हें कोई नहीं आंकेगा, और एक वेश्या के आंकलन की कोई कीमत नहीं. इसलिए वे वेश्याओं के सामने उनमुक्त हो जाते थे और उन्हें पैसे देते थे जिससे कि वे उसे पीट सकें, और दूसरे तरीकों से उन पर हावी हो सकें. वेश्याएं बुद्धिमान होती हैं. वो जानती हैं कि आदमियों का मन बीमार होता है, और अगर उन्हें मौका मिले तो वे और खेलेंगे और अगर वे सावधान नहीं रहीं तो जाल में फंस जाएंगी. ऐसा भी नहीं है कि इस जाल में अभी तक कोई फंसी नहीं.

p9

मैं उस युवा गर्भवती महिला से कमाठीपुरा की एक छोटी सी माइक्रोफाइनेंस यूनिट में मिली थी, जहां वो कुछ पैसे जमा कराने आई थी. पास के होटल में काम करने वाले आदमी के साथ उसकी शादी हुई थी, उसे आशा थी कि वो उसे प्यार करेगा, लेकिन उसने उसे अपना शरीर बेचने के लिए कहा जिससे कि वो और पैसे कमा सके, और उसने ऐसा ही किया. वो निराश थी. लेकिन उसे पता था कि आखिर में उसे प्यार के कुछ शब्द सुनने को मिलेंगे और वो उसके लिए काफी हैं. उसकी कहानी बहुत दुखद थी, लेकिन सभी कि कहानियां एक जैसी ही थी. इन महिलाओं ने पुरुषों को इस तरह से समझा जो हम कभी नहीं समझ सकते, और ये प्रेम और रोमांस के भ्रम के आधीन भी नहीं थीं.

हमने सिद्धांतों और साहित्य से सीखा है. हम अक्सर कुछ बुद्धिजीवी महिलाओं और पुरुषों से भरे कमरे में नारीवादी आंदोलन की बातें करते हैं और विर्जिनिया वूल्फ के लेख संग्रह ‘ए रूम ऑफ वन्स ओन’ का जिक्र भी करते हैं. यही नहीं, इन लेख को हम नारीवाद के बाइबल के तौर पर देखते हैं. हम कमरों में बहस करना पसंद करते हैं. हम खुद को उद्धारक के रूप में स्थापित करना चाहते हैं जिन्होंने सभी समस्याओं को समझ लिया है. और फिर भी हममें चीजों को उस तरह से देखने की क्षमता नहीं हैं. शायद, हम सोचते ज्यादा हैं, और देखते कम हैं, और अनुभव उससे भी कम करते हैं.

वूल्फ ने लिखा था, ‘पैसा बताता है कि कोई काम अगर अवैतनिक हो वह तुच्छ है.’

p5

और केवल यह सुनने के बाद कि वे महिलाएं कैसी परिस्थिति से गुजरी होंगी, कैसे अपने शरीर के लिए मिलने वाले पैसे का लेखा-जोखा किया होगा..मैं वूल्फ के शब्दों को ठीक से समझ सकी. वेश्याएं जानती हैं कि उन्हें पैसे के हिसाब से अपनी सेवा देनी है. यहां कुछ भी मुफ्त नहीं है और वे किसी नैतिकता से भी नहीं बंधी है कि इन बातों की खुल कर चर्चा न कर सकें. हर कोई यहां ये काम पैसे के लिए कर रहा है. इस धंधे के आगे उनके व्यक्तिगत चुनाव का कोई महत्व नहीं है. और इसलिए वे यहां जो भी करती हैं, हक के साथ करती हैं.

वेश्यालय इतने लंबे समय से चल रहे हैं. उनकी छवि अय्याशी के अड्डे के तौर पर रही है. लेकिन इन दिनों यहां भी उदार तरह की बातें जैसे महिलाओं को बचाने या उनकी तस्करी खत्म करने पर बहस हो रही है. लेकिन यह बातें अभी बस एक सुहाने सपने की तरह ही लग रही हैं. सभी की कहानी यहां एक है. दुत्कार दिए जाने वाली और दुख भरी कहानी सबके पास है. लेकिन यहां एक दूसरी कहानी भी है. दूसरा एंगल है. महिलाएं यहां एक-दूसरे को परख नहीं रही. सबका मकसद बस पैसा कमाना है और पैसे पर ही बात होती है.

p11

दिल्ली में BDSM से जुड़ी एक कहानी पर रिसर्च करते हुए मैं ‘किंकी कलेक्टिव’ नाम के एक ग्रुप के कुछ सदस्यों से मिली. यह ग्रुप-2011 में बनाया गया. यह एक तरह से छिपा समाज है और खुल के सामने नहीं आता. कई शादी-शुदा हैं और BDSM से जुड़े नहीं हैं और अपनी फैंटेसी को जाहिर करने में हिचक महसूस करते हैं.

कई महीनों के मेल-जोल और बातचीत के बाद मैंने उनकी कहानी, उनके विचार को जाना. यह भी समझा कि उनके लिए अपने सेक्सुअलिटी को जाहिर कर पाना और इस पर बात करना कितना मुश्किल है. यहां मैं ऐसी महिलाओं और पुरुषों से मिली जो अच्छे पढ़े-लिखे हैं, उदारवादी हैं. उनमें कुछ तो एक्टिविस्ट हैं और अपनी महिलावादी पहचान प्रकट भी करते हैं. लेकिन फिर भी वे छिपे हुए हैं. उनका एक अपना समाज है, नेटवर्क है और वे पूरी कोशिश करते हैं कि उनकी पहचान जाहिर हो सके. वे अपनी इच्छा, अपनी फैंटसी, अपनी सोच पर बात करेंगे लेकिन हमेशा पहचान छिपाने की शर्त पर. क्योंकि उन्हें लगता है कि समाज में नैतिकता को लेकर जो बाते होती हैं…उनका मुकाबला करना शायद मुश्किल है.

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ये पुरुष और महिलाएं दूसरी रूढि़वादी बातों पर अपनी बात रखती रही हैं. लेकिन अपने मामले पर वे अभी खुलकर आवाज नहीं उठा सके हैं. आप उनसे इस मुद्दे पर बहस करना शुरू करें इससे पहले ही वे हार स्वीकार कर लेते हैं. मैं यह नहीं कह रही कि मैं उनके भय को नहीं समझती. अभी लंबा समय लगेगा जब वे खुलकर बाहर आ सकेंगे और खुद की आलोचना के भय से जूझना सीखेंगे. फिर शादी, प्यार और कई दूसरी चीजें भी दांव पर लगी होंगी. अब भी कोई आजादी नहीं है. लेकिन वे खुद के व्यक्तित्व को स्वीकार कर रहे हैं और उनके पास अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए एक नेटवर्क भी है.

लेकिन जब मैं एक नोटबुक पर नजर डालती हूं जो इन किस्सों-कहानियों से भरा पड़ा है कि पुरुष कैसी-कैसी मांग रखते हैं, और रेड-लाइट क्षेत्र में महिलाओं जब यह कहती हैं कि वे ज्यादा पैसे के साथ और कुछ ज्यादा समय देंगी. मुझे लगता है कि इन महिलाओं से ज्यादा वे किन्नर नारीवादी हैं जो किसी प्रकार की शर्त नहीं रखते. भले ही कैसा भी पुरुष उनके पास आए.

वे ज्याद नियंत्रित हैं. कठोर हैं. पुरुषों द्वारा बार-बार उन्हें दुत्कारा और संक्रमित किया जाता है. लेकिन फिर भी उनके पास डरने के लिए कुछ नहीं है. और इस कड़वे सच के साथ उन्होंने अपनी आजादी हासिल कर ली है. जब वे किन्नर मुस्कुराते हैं तो वह दर्द झलकता भी है. उनके शरीर पर जलते सिगरेट दागे जाते हैं. उन्हें यातनाएं झेलनी पड़ती हैं. लेकिन चूकी यह उनका पेशा है, बच्चे हैं..जिनका उन्हें ख्याल रखना है…वे यह सब झेलते हैं.

उनमें से किसी ने बहुत पहले मुझसे यह कभी कहा भी था, ‘हम प्यार का भ्रमजाल लेकर चलते हैं’

p2

और फिर, उस महिला ने कहा कि वह नहीं जानती कि प्यार के साथ संभोग करने के क्या मायने होते हैं. वह कभी इसकी परवाह भी नहीं करती. सेक्स उसके लिए केवल सेक्स है. यह रोमांस, दर्द, खुशी, कंसेंट थ्योरी यह सब उन लोगों के लिए है जो ‘आजाद’ नहीं हैं और प्यार, सेक्स और उसको जाहिर किए जाने के बारे में बहुत ज्यादा सोचते हैं. किसी दूसरे ने कहा कि कोई फिजिक्स या केमिस्ट्री नहीं होती. यह केवल बॉयलोजी है और हमें इससे पैसे मिलते हैं.

उनके लिए ऐसे संबंधों के कोई मायने नहीं है. उनकी सहमति एक प्रकार से खरीद ली गई है. वे इसकी भी परवाह नहीं करते कि BDSM का मतलब क्या है या कोई अल्टरनेट सेक्सुअलिटी है. वे पुरुषों को जानती हैं और उन्होंने कहा कि अमानुषिक सेक्स उनके लिए अनुचित है. कुछ मामलों में वे सहभागी हैं लेकिन वे उसके लिए चार्ज करती हैं और जाहिर तौर पर वे उन्हें कभी खुद को किस नहीं करने देंगी.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि लिटरेचर इन इंडिया ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

लेखक

(आईचौक.कॉम या इंडिया टुडे ग्रुप से साभार )
Literature in India

रेप के बाद फेक एनकाउंटर? अब लाश खोदकर निकालेंगे

‘एनकाउंटर’ में मारी गई एक लड़की की लाश अब जमीन से खोदकर निकाली जाएगी. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का आदेश है.

क्यों?

क्योंकि आरोप है कि एनकाउंटर फर्जी था. उस लड़की से छत्तीसगढ़ पुलिस के जवानों ने रेप किया, फिर मार डाला और माओवादियों की वर्दी पहनाकर इसे एनकाउंटर बता दिया. यह सब हुआ 13 जून को सुकमा जिले के एक जंगल में. अब हाई कोर्ट ने कहा है कि लाश को जमीन से खोदकर निकाला जाए और फैमिली और कैमरे के सामने पोस्टमॉर्टम किया जाए.

इस बात से छत्तीसगढ़ पुलिस के आला अधिकारियों के हाथ-पांव फूले हुए हैं. पोस्टमॉर्टम अगर पुलिस की थ्योरी को गलत साबित करता है तो मुख्यमंत्री रमन सिंह के दामन पर भी छींटे तो आएंगे ही.

कहानी मुख़्तसर इस तरह है

सुकमा जिले के गोमपाड़ गांव की बात है. 21 साल की आदिवासी लड़की मड़कम हिड़मे यहां अपने मायके में रहने आई थी. उसकी मां, रिश्तेदारों और गांव वालों का आरोप है कि 13 जून को उसे पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स की एक टीम ज़बरदस्ती उठा ले गई.

मां के मुताबिक

”उस दिन हिड़मे की तबियत ठीक नहीं थी, लेकिन वह काम-काज में हाथ बंटाने के लिए धान कूट रही थी. तभी पुलिस के जवान आ धमके और उसे जबरन उठाकर ले जाने लगे. मैंने रोकने की कोशिश की मगर वे बंदूक की बट और जूतों से हमला करने लगे. उसे वे पास के जंगल में ले गए. कुछ गांव वाले भी वहां शिकार के लिए गए हुए थे. जब उन्होंने मेरी बेटी की चीख सुनी तो वे तीर-कमान लेकर मदद के लिए पहुंचे, लेकिन पुलिस वालों ने उन्हें खदेड़ दिया. दूसरे दिन 14 जून को किसी ने ग्राम सचिव को फोन कर कहा कि मड़कम हिड़मे की लाश चाहिए तो कोंटा थाना आना होगा. मैं गांव वालों के साथ थाने पहुंची तो देखा कि मड़कम की लाश पॉलिथीन में लिपटी सड़क पर पड़ी है. पुलिस वालों ने कहा कि ये माओवादी है, इनका एनकाउंटर कर दिया है. उसके शरीर के कई अंग कटे हुए थे. पुलिस कुछ भी कहे लेकिन मेरा मानना है कि पुलिस वालों ने मेरी बेटी से रेप किया. गांव वालों ने जंगल में झाड़ियों के पास मड़कम की टूटी चूड़ियां देखी थीं. गांव वालों के कहने पर 15 जून को बेटी को दफना दिया गया.”

मड़कम की मां, उसकी लाश की तस्वीर के साथ

पुलिस कुछ और कहती है, गवाह कुछ और

छत्तीसगढ़ पुलिस की थ्योरी अलग है. उनके मुताबिक, हिड़मे नक्सल कैडर थी और किस्ताराम प्लाटून नंबर 8 की मेंबर थी. उसे गोमपाड़ गांव के पास के जंगलों में मार गिराया गया. मामले को आप नेता और एक्टिविस्ट सोनी सोरी ने जोर-शोर से उठाया. आप और कांग्रेस ने अपनी-अपनी फैक्ट फाइंडिंग टीमें वहां भेजनी चाहीं, लेकिन आरोप है कि पुलिस ने उन्हें गांव तक पहुंचने ही नहीं दिया. इसके बाद सोनी सोरी उपवास पर बैठ गईं.

कैसे कमज़ोर पड़ा पुलिस का बयान

जब हिड़मे की लाश की तस्वीर सामने आई तो पुलिस की थ्योरी में बहत्तर छेद निकले. हिड़मे के घर वालों का कहना था कि हिड़मे को जब पुलिस वाले ले गए तो उसने साड़ी पहन रखी थी. जबकि लाश मिलने पर उसने माओवादियों की यूनिफॉर्म पहन रखी थी.

इसी के आधार पर आप स्टेट कनवेनर संकेत ठाकुर ने हाईकोर्ट में अर्जी लगा दी. उन्होंने कोर्ट को हिड़मे की लाश का एक फोटो पेश किया, जिसमें उसने नक्सल यूनिफॉर्म पहन रखी थी, लेकिन वह यूनिफॉर्म बेहद साफ और प्रेस की हुई थी. न धूल मिट्टी के निशान थे, न पहनने से आए मोड़ के निशान. उससे एनकाउंटर का कोई संकेत नहीं मिल रहा था. और सबसे ज्यादा शक पैदा करने वाली चीज़ ये थी कि हिड़मे पर करीब बीसों गोली चलाई गई थी, लेकिन एक भी गोली का निशान उसके कपड़ों पर नहीं दिख रहा था. ठाकुर का कहना है कि इससे शक होता है कि पहले हिड़मे को मारा गया, फिर उसे यूनिफॉर्म पहनाई गई.

इधर मड़कम हिड़मे के मारे जाने के उसकी नई वर्दी पहने हुई तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. लेकिन पुलिस वाहवाही लूटने में लगी रही. बवाल हुआ तो सुकमा के एसपी ईके एलेसेना ने कहा, ‘आरोपों से कोई फर्क नहीं पड़ता और उनके पास सारे सवालों का जवाब है. हिड़मे माओवादी थी और वो एनकाउंटर में ही मारी गई. पोस्टमॉर्टम के बाद शरीर का हर हिस्सा अलग-थलग हो ही जाता है.’

एस टी एफ ने हिड़मे को कंफ्यूजन में उठा लिया?

कुछ समय बाद जो एक नई खबर निकल कर आई, वो ये थी कि पुलिस असल में तो किसी और ही मड़कम हिड़मे को पकड़ने गई थी. लेकिन उठा लाई किसी और को. बताया जा रहा है कि ये दूसरी मड़कम हिड़मे वही है जिसके पति को पुलिस ने 15 और आदिवासियों के साथ 2001 में मार डाला था. और उसने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

आरोप है कि इस मामले के सभी गवाह निबटाए जा चुके थे, सिर्फ मड़कम हिड़मे ही जिंदा बची थी. जिसे मारने के लिए वो गोमपाड़ गांव पहुंचे थे, लेकिन किसी दूसरी ही मड़कम हिड़मे को उठा ले गए. जिससे कथित रेप के बाद उसकी हत्या कर दी. यहां मड़कम के पक्षकारों का आरोप ये भी है कि उस मड़कम हिड़मे को पुलिस अब भी मारने के लिए खोज रही है.

हिड़मे की मां, मड़कम लक्ष्मी ने ट्राइबल एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार से फोन पर बात की. उन्होंने बताया कि हिड़मे की कुछ दिन पहले ही शादी हुई थी और वह मायके आई हुई थी. ये भी बताया कि जब उसकी लाश लेकर आए तो हिड़मे के ब्रेस्ट और पेट से योनि तक चाकू से चीरे जाने के निशान थे.

कोर्ट के नए फैसले से उम्मीद

इधर 15 जून से सोनी सोरी उपवास पर बैठी थीं. पुलिस उन्हें हिड़मे के गांव जाने, और उसकी लाश देखने से रोक रहे थे, जिसके खिलाफ सोनी का ये उपवास था. 21 जून को ढेरों कार्यकर्ता लोगों के साथ मिलकर हिड़मे को न्याय दिलाने के लिए सड़क पर उतर आए.

फिर 23 जून को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने उम्मीद बंधाने वाला फैसला दिया. हिड़मे की लाश को जहां दफनाया गया था वहां से खोद निकालने का आदेश दिया गया. अब सच के सामने आने का इंतजार है.


इनपुट: पारुल

यह रचना मूल रूप से http://www.thelallantop.com/ में प्रकाशित है| अतः इस रचना का विशेषाधिकार http://www.thelallantop.com/ के पास सुरक्षित है| इस रचना को प्रकाशित करने का एक मात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य का व्यापक प्रचार-प्रसार है| इस लेख/कहानी/रचना में अभिव्यक्त विचार लेखक/लेखिका के है, इससे लिटरेचर इन इंडिया का कोई सम्बन्ध अथवा उत्तरदायित्व नहीं है|

कवि और कविता:नरेश मेहता का काव्‍य वैभव – डॉ. दीपक पाण्‍डेय

साहित्‍य की श्रीवृद्धि में अनेक साहित्‍यकारों ने अपने सर्वस्‍व भाव-बोध विविध विधाओं में उडेल दिए हैं जिन्‍हें विस्‍मृत कर पाना संभव नहीं है । इसी कड़ी में अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘दूसरा सप्‍तक’ के कवि नरेश मेहता का नाम साहित्यिक जगत में सम्‍मान से लिया जाता है।15 फरवरी 1922 को मालवा, मध्‍यप्रदेश के शाजापूर के गुजराती ब्राहमण परिवार में जन्‍मे नरेश मेहता का प्रारंभिक नाम ‘पूर्णशंकर शुक्‍ल’ था।मेहता की पदवी उनके पूर्वजों को गुजराज यात्रा के समय मिली जिसे अपने पिता की तरह नरेश मेहता ने भी शुक्‍ल के स्‍थान पर प्रयोग करते रहे।नरेश मेहता समकालीन हिंदी काव्‍य के शीर्षस्‍थ कवि हैं जिन्‍होंने अपने काव्‍य-संसार में शिप्रा-नर्मदा से लेकर गंगा तक फैले जीवन के विस्‍तृत फलक को अभिव्‍यक्ति दी है। मूल्‍यबोध की दृष्टि से भारतीय संस्‍कृति की मिथकीय, जातीय और सारस्‍वत स्‍मृतियों के पुनराविष्‍कार और उसकी रचनात्‍मक परिणतियों  से समृद्ध  उनका काव्‍य-संसार अपनी अद्वितीय आभा से समकालीन परिदृश्‍य में एक अनिवार्य और अपरिहार्य उपस्थिति है । आर्ष-चिंतन और वैष्‍णव संस्‍कारों के साथ आधुनिक युग के बैचेन करने वाले सवालों और ज्‍वलंत समस्‍याओं के प्रति नरेश मेहता की गहन मानवीय चिंता में एक दुर्लभ समावेशी रचनाशीलता के साक्ष्‍य हैं। उदात्‍त मानवीय मूल्‍यों के प्रति नरेश मेहता की आस्‍था और समग्र मानवता की मंगल आकांक्षा में उनका सृजन-संकल्‍प उन्‍हें सहज ही आधुनिक कवि-ऋषि की गरिमा प्रदान करता है। नरेश मेहता के काव्‍य-जगत के संदर्भ में डॉं हरिचरण शर्मा का कथन सत्‍य के करीब है कि ”नरेश मेहता का काव्‍य मूल्‍यों और मान्‍यताओं के ऊहापोह को प्रस्‍तुत करने वाला काव्‍य है।परस्‍पर संघर्ष, विपरीत मूल्‍यों और मान्‍यताओं के संघर्ष को कवि ने वाणी दी है।एक प्रकार से कवि ने प्राचीन मान्‍यताओं को समकालीन मूल्‍यों की कसौटी पर कसते हुए फेर बदल बस किया है।”

नरेश मेहता के अनेक काव्‍य संग्रह प्रकाशित हुए हैं जिनमें अरण्‍या, उत्‍सवा, बोलने दो चीड़ को, तुम मेरा मौन हो, पिछले दिनों, नगे पैर, आखिर समुद्र से तात्‍पर्य, देखना एक दिन, वनपाखी सुनो, मेरा समर्पित एकांत प्रसिद्ध हैं।नरेश मेहता के काव्‍य-संसार में प्रवादपर्व, महाप्रस्‍थान, शबरी, संशय की एक रात, प्रार्थना पुरूप, सर्वाध्रिक चर्चित खंडकाव्‍य हैं । ‘अरण्‍या’ काव्‍य संकलन के लिए नरेश मेहता को वर्ष 1988 का साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त हुआ था।’नरेश मेहता का एकांत शिखर’ पुस्‍तक में प्रमोद त्रिवेदी ने नरेश मेहता की साहित्यिक भाव-भूमि,कलात्‍मक सृजनात्‍मक क्षमता और कौशल के संबंध में लिखा है – ‘नरेश मेहता की सर्जनात्‍मक भूमि समकालीन काव्‍यभूमि या कहें मुक्तिबोध की काव्‍यभूमि से सर्वथा भिन्‍न है । मुक्तिबोध में जहॉ जमीन से गड़कर जीने की कोशिश है, वहीं नरेश मेहता ने देश या जिसे समकालीनता भी कहा जा सकता है के गुरूत्‍वाकर्षण से मुक्‍त होकर निस्‍सीमता में देशगत और तनाव तथा दबाव का अतिक्रमण करने की कोशिश की है । वैसे जमीन में धंसने और जमीन के गुरूत्‍वाकर्षण से मुक्‍त होने की चाह से यह मुद्दा बहस तलब हो सकता है कि देशगत वास्‍तविकताओं की अनदेखी करके नरेश जी आखिर क्‍या सृजन करना चाहते हैं -स्‍वप्‍न या कल्‍पना । वैसे नरेश मेहता की काव्‍य दृष्टि का काफी विरोध भी हुआ है किंतु उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्‍होंने किसी प्रकार के दबाव में लेखन को गति नहीं दी और न ही किसी प्रकार के भाव को अपने काव्‍य विवेक पर कभी हावी होने दिया । यहॉ तक कि समय बीतने के साथ उनकी अपनी मान्‍यता की प्रतिबद्धता और दृढतर होती  गई।” नरेश मेहता प्रयोग को अपनी काव्‍य-यात्रा के लिए महत्‍वपूर्ण मानते हैं और प्राचीनता को नवीनता के आवरण में गठित कर आधुनिक भावबोध की अभिव्‍यक्ति करते हैं ।

नरेश मेहता भारतीय अस्मिता और सांस्‍कृतिक संपन्‍नता के कवि हैं । हमारे दर्शन, धर्म, संस्‍कृति आदि ने आत्‍मबोध और चेतना की उर्ध्‍वता के शिखरों को सदैव स्‍पर्श किया है । उनके काव्‍य की जमीन समसामयिक स्थितियों को गहरा स्‍पर्श देती हुई शाश्‍वत् जीवनमूल्‍यों को तलाशने में प्रज्ञा-शिखर की सदियों का प्रत्‍यय बन गई हैं, उसमें युग संदर्भों के अनुकूल जीवन सत्‍य की पकड़, उर्ध्‍वगामी चेतना और अमानवीय हालातों से टकराने की ताकत है।इसी कारण उनके काव्‍य में भारतीय सांस्‍कृतिक चेतना के विविध घटक यथारूप अभिव्‍यक्ति पाते हैं।

नरेश मेहता कर्म को सर्वाधिक महत्‍व देते हैं क्‍योंकि कर्म मनुष्‍य के जीवन से बॅधा है।अगर मनुष्‍य अपने कर्म और वचनों पर स्थिर रहता है तो उसे कोई भी ताकत विचलित नहीं कर सकती अंतत: व्‍यक्ति अपने लक्ष्‍य को अवश्‍य ही प्राप्‍त कर सकता है। ‘संशय की एक रात’ में कवि कहता है –

          किंतु

          किंतु यह संभव है,

          बंधु । यह असंभव है,

          कर्म और वर्चस को,

          छीन सके कोई भी

          जब तक हम जीवित हैं । (पृ.17)

     इसी प्रकार की अभिव्‍यक्ति ‘पार्थिव भी पृथ्‍वी भी’ कविता में नरेश मेहता करते हैं-

          इसलिए

          अब कर्म के समय मेरे लिए,

          यह धरती पृथ्‍वी है,

          और पूजा के समय पार्थिक ।

     कर्म के अनुसार ही मनुष्‍य की समृद्धि होती है । कर्म के अनुरूप ही मनुष्‍य समाज में यश अर्जित करता है । इसी बात को नरेश मेहता ‘प्रसाद पर्व’ में दशरथ की छाया को राम से मुखर करते हुए दर्शाया है-

          पुत्र मेरे । संशय या शंका नहीं

          कर्म ही उत्‍तर है

          यश जिसकी छाया है

          उस कर्म को करो ।

     नरेश मेहता के काव्‍य की एक विशेषता प्रकृति-चित्रण का वैविध्‍य भी है । विभिन्‍न प्राकृतिक स्‍वरूपों की रंगों की अलौकिक छटाओं से मंडित उनकी कविताएं एक अपूर्व आनंदानुभूति देती हैं । जहाँ एक ओर कवि में अपना सब कुछ विनम्र भाव से सौंप सबके दुख को अपना समझने का समर्पण भाव है वहीं दूसरी ओर उसमें ईश्‍वर अथवा ‘परात्‍पर बोध’ के प्रति सजगता भी है । प्राकृतिक दृश्‍यों में नरेश मेहता को महाभाव की प्रतीती होती है वह उसे सभी में अनुभूत होते देखने का अभिलाषी है, तभी तो उन्‍हें कभी यह सृष्टि ‘परम पुरुष के लीला भाव सी’ लगती है तो कभी ‘विराट यज्ञ सी . . . .

          यह कैसा है यज्ञ

          यहाँ यज्ञ भी यज्ञ को समर्पित है,

          यज्ञो यज्ञेन कल्‍पताम्

          समय

          एक कालयज्ञ संपन्‍न कर रहा है,

          जिसमें श्रतु मात्र की छवि दी जा रही है,

          पृथिवी

          एक वानस्‍पतिक यज्ञ संपन्‍न कर रही है ।

     दिनारंभ होना नरेश मेहता के लिए एक फूल खिलने जैसा है।सारे वन-उपवन धरती के काव्‍य- संकलन और सृष्टि एक उत्‍सव के समान कवि मन को आकर्षित करते हैं और कवि यह कह उठता है-

          जो जहॉं भी है

          समर्पित है सत्‍य है

          ये फूल

          और यह धूप

          लहलहाते खेत

          नदी का कूल

          क्‍या प्रार्थनाऍं नहीं हैं

     प्रकृति की सारी वनस्‍पतियाँ नरेश मेहता को एक विशाल कौटुंबिकता का अनुभव कराती हैं । पृथ्‍वी उनके लिए जीवनमात्र की ‘कवच नारायणी’ है । वे पूतभाव से अभिभूत हो कह उठते हैं-

          धरती को नहीं छुओ ।

          यह श्रृवा की प्रतीती होती है,

          देवदारूओं की देह-यष्टि ।

          क्‍या उपनिषदीय नहीं लगती

          तुम्‍हें नहीं लगता ।

          कि इस भोजपत्र में 

          एक वैदिकता है ।

     काव्‍य में नरेश मेहता ने मनुष्‍य और प्रकृति के बीच अटूट संबंध का चित्रण किया है और उनका कहना है कि प्रकृति ही मनुष्‍य का सब कुछ है-

          प्रकृति से बड़ा ।

          कोई व्‍यक्ति नहीं होता

          कोई शास्‍त्र नहीं होता, पार्थ ।

वर्तमान समय में प्रकृति का निर्बाध दोहन हो रहा है । यहाँ प्रकृति का शोषण कभी उद्योगी आवश्‍यकताओं के लिए होता है तो कभी व्‍यवसाय के लिए । नरेश मेहता ‘एक प्रश्‍न’ कविता के माध्‍यम से प्रकृति के शोषण की ओर सभी का ध्‍यानार्कित करते हैं-

तुम, मात्र एक चमकदार पत्‍थर के लिए

बनैले पशु की भांति

पृथ्‍वी को खूंद कर

जब उसे पा जाते हैं,

तब दूर-दूर तक भी तुम्‍हारी आंखों में,

क्षत-विक्षत विदीर्ण

उस धरिश्री के प्रति

कृतज्ञता या आभार कुछ भी नहीं होता ।

     इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि मनुष्‍यों की भांति धरती को खूंद कर प्रकृति का नाश कर रहा है जिसे देखकर प्रकृति की हर वस्‍तु भयाकुल दीखती है । इस दैवीय संपदा के साथ मनुष्‍य हमेशा शत्रुता की भावना रखता है जबकि वे अपने ही गोत्र के परिजन हैं ।

     नरेश मेहता की कविताऍं श्रमिक वर्ग के प्रति सहानुभूति से सम्‍पृक्‍त हैं जो समाज के यथार्थ का प्रतिपादन करती हैं । वे मनुष्‍य की प्राचीन परंपराओं एवं जीवन को आधुनिक संदर्भ से जोड़ते हैं तथा रूढि़वादी परंपराओं को तोड़ने का आह्वान करते हैं । रूस में हुई क्रांति एवं समाजवाद की स्‍थापना को नरेश मेहता मनुष्‍य की सफलता मानते हैं, उसकी मुक्‍तकंठ से सराहना करते हुए श्रम को श्रेष्‍ठ मानते हैं –

          यह यौवन की भूमि सोवियत

          यहॉं मनुष की

          उसके श्रम की होती पूजा

          पूँजी और सम्राज्‍यवाद की तोड़ बेडियॉं

          हाथों में नवजीवन की उल्‍काऍं लेकर

          मनुज बडा है, कुतुब सरीखा

          उसके चलने पे लोहा है

          कौन रोक सकता है नव को चलने से

     जिसके संग-संग आदिकाल से इंद्र चल रहा है।

                                        (मेरा समर्पित एकांत पृ.46)

     नरेश मेहता काव्‍य-जगत में साम्राज्‍यवाद और उपनिवेशी मनोवृत्ति के प्रति तीव्र प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करते हैं । ‘प्रार्थना पुरुष’ काव्‍य में दो परिप्रेक्ष्‍यों में साम्राज्‍यवादी उपनिवेशीकरण पर विचार किया है । एक भारतीय परिप्रेक्ष्‍य में और दूसरा दक्षिण अफ्रीकी परिप्रेक्ष्‍य में । दक्षिण अफ्रीका में उपनिवेश की शक्तियों ने वर्ण संकरता के आधार पर अपनी सत्‍ता-नीति को बनाया । वहॉं के काले सभी प्रकार से दमित । शोषित थे । छुआछुत के कारण उन्‍हें तिरस्‍कृत किया गया । इसमें गांधी जी को कष्‍ट सहने पडे और गांधी जी ने दमित, शोषितों को संगठित कर अपने अधिकारों के प्रति सजग किया । इसी तथ्‍य को नरेश मेहता कविता में शब्‍द देते है-

          ‘अफरीका के देशा में ये

          अमानुषी काले कानून,

          पग-पग पर अपमान पुलिस का

          खाना मुश्किल दोनों जून ।

     भारतीय संदर्भ में भी उपनिवेशवादियों ने उत्‍पाद पर बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों का आक्रमण करवाया जिसकी काट गांधी जी ने स्‍थानीय उत्‍पादन को बढाने और प्रयोग की वकालत के साथ ही इसी बात को नरेश मेहता कहते हैं-

     पुरुषार्थ तभी जागेगा जब

     यह देश हाथ से कर्म करे ।

उपनिवेशवादियों की नीतियों का शिकार होकर हमें क्‍या दुष्‍परिणाम भोगने पड़े उसका चित्रण नरेश मेहता ने मार्मिक ढंग से किया है-

          किंतु आज तो शस्‍य श्‍यामला इस धरती पर

          फसल जल रही है, मनुज मर रहा है

          कलकत्‍ते के फुटपाथों पर

          मनुज खून में लथपथ डूबा अपनी सारी संस्‍कृतियों में

          ऊबा ऊबा …….

          आज मात्र शरणार्थी बन गए ।

     नरेश मेहता ने अपने काव्‍य-जगत को मानवीयता का रक्षक बनाया है । वे युद्ध को अनुचित ठहराते हैं क्‍योंकि युद्ध का उन्‍होंने जो साक्षात्‍कार किया उसी संदर्भ की अभिव्‍यक्ति कविताओं में करते हैं । वे कहते है युद्ध होता है, खत्‍म हो जाता है, खत्‍म होने के बाद नए राज्‍य को जन्‍म देता है । परंतु युद्ध अपने पीछे कैसी भयानकता छोड़ जाता है उसका अनुमान लगाना संभव नहीं है । युद्ध की दुष्‍परिणाम को नरेश मेहता ने ‘महाप्रस्‍थान’ कविता में युधिष्ठिर, पार्थ के संवाद से स्‍पष्‍ट किया है –

          प्रत्‍येक युद्ध

          जिसमें एक एक राज्‍य जन्‍म लेता है

          कितनी स्त्रियों को विधवा

          और कितने बच्‍चों को अनाथ कर जाता है

          और वे जीवन संघर्ष में

          दिशाहीन खो जाने के लिए

          बाध्‍य हो जाते हैं ।

     इसी प्रकार का आख्‍यान ‘पिछले दिनों नंगे पॉंवों’ कविता में मिलता है । जहॉं राज्‍य प्राप्ति की लालसा में कौरवों और पांडवों का युद्ध हुआ पर युद्ध की भीषणता का परिणाम सब कुछ नष्‍ट हो जाना और अपनो की ही समाधि बना-

          कैसा था यह युद्ध

          भीष्‍म, द्रोण, कृप, अश्‍वत्‍थामा

          दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण, जयद्रथ।………………………………..

          सब स्‍वाहा हो गए

          युद्ध के उदर ज्‍वाला में ।

नरेश मेहता की मनुष्‍यत्‍व में असीम आस्‍था है तभी तो वे कहते हैं-

          

एक दिन मनुष्‍य सूर्य बनेगा

          क्‍योंकि वह आकाश में पृथ्‍वी का

          और पृथ्‍वी पर आकाश का प्रतिनिधि होना

          मनुष्‍य के इस देवत्‍व के माध्‍यम से ही ।

          यह संपूर्ण सृष्टि ईश्‍वरत्‍व प्राप्‍त करेगी ।

नरेश मेहता मानव की श्रेष्‍ठता को प्रतिपादित करते हुए लिखते हैं-

          राज्‍य या न्‍याय

          धर्म या नैतिकता

          इतिहास या पुराण

          ज्ञान या दर्शन

          इन सबकी दृष्टियों का गंतव्‍यों का

          अर्थ और प्रयोजन

निष्‍कर्षत: हम पातें हैं कि नरेश मेहता ने अपने काव्‍य-साहित्‍य में विविध भाव बोधों का उदघाटन किया है तथा सामाजिक, सांस्‍कृतिक, धार्मिक दार्शनिक मूल्‍यों को आधुनिक युगानुरूप अभिव्‍यक्ति देकर कविता विधा को नवीनता दी है। नरेश मेहता नेअपनी कविताओं में सामाजिक विचारों का आधुनिकीकरण किया है तथा प्रकृति और सौंदर्य के चित्रणों के माध्‍यम से आधुनिक जीवन की विषमताओं, विवशताओं, अभिषत व्‍यक्तियों की दारुण यंत्रणाओं, आदि को यथार्थ अभिव्‍यक्ति का माध्‍यम बनाया है। इस प्रकार नरेश मेहता ने काव्‍य संसार को विषय-वैविध्‍य और पौराणिक आख्‍यानों को वर्तमान संदर्भ की प्रासंगिकता की कसौटी पर कसकर स्‍तुत्‍य कार्य किया है।

deepak pandey

केंद्रीय हिंदी निदेशालय

पश्चिमी खंड-7, रामकृष्‍णपुरम

नई दिल्‍ली-110066

मोबाइल नं. 9810722080

ई-मेल dkp410@gmail.com

शिक्षा

एम ए(हिंदी, मास कॉम),

एम फिल, पी एच डी

रूचियाँ 

अध्ययन-अध्‍यापन,

साहित्यिक कार्यक्रमों में सहभागिता

संप्रति

केंद्रीय हिंदी निदेशालय,
नई दिल्‍ली में कार्यरत

हाई कमीशन ऑफ इंडिया,

त्रिनिदाद में सेकेंड सेक्रेटरी
(साहित्‍य एव्र संस्‍कृति)

पद पर नियुक्ति।