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आत्मा शब्द मुक्तबोध की कविता का बीज

गजानन माधव मुक्तिबोध का 1964 में निधन हुआ और उसी वर्ष उनका पहला कविता संग्रह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ प्रकाशित हुआ जिसे वो अपनी आँखों देख नहीं पाए.   इन पचास वर्षों में हिन्दी कविता पर जिस एक महत्तर कवि का सर्वाधिक सृजनात्मक प्रभाव महसूस किया गया है, जो आगे की कवि पीढ़ी की धमनियों में बहता है वह निस्संदेह मुक्तिबोध हैं.   आधुनिक … पढ़ना जारी रखें आत्मा शब्द मुक्तबोध की कविता का बीज

भारतीय साहित्य की मूलभूत एकता और उसके आधार-तत्व

भारत की प्रत्येक भाषा के साहित्य का अपना स्वतंत्र और प्रखर वैशिष्ट्य है जो अपने प्रदेश के व्यक्तित्व से मुद्रांकित है। पंजाबी और सिंधी, इधर हिन्दी और उर्दू की प्रदेश-सीमाएँ कितनी मिली हुई हैं ! किंतु उनके अपने-अपने साहित्य का वैशिष्ट्य कितना प्रखर है ! इसी प्रकार गुजराती और मराठी का जन-जीवन परस्पर ओतप्रोत है, किंतु क्या उनके बीच में किसी प्रकार की भ्रांति संभव … पढ़ना जारी रखें भारतीय साहित्य की मूलभूत एकता और उसके आधार-तत्व

गंगुओं का हमारा युग और राजा भोज [हमारी शिक्षा और व्यवस्था, आलेख – 20]

गंगुओं का हमारा युग और राजा भोज

हमें तो वास्कोडिगामा ने खोजा है, भारतीय उससे पहले थे ही कहाँ? पढाई जाने वाली पाठ्यपुस्तकों का सरलीकरण करें तो महान खोजी-यात्री वास्कोडिगामा ने आबरा-कडाबरा कह कर जदू की छडी घुमाई और जिस देश का आविष्कार हुआ उसे हम आज भारत के नाम से जानते हैं? माना कि देश इसी तरह खोजे जाते हैं लेकिन अपनी ही डायरी में वास्कोडिगामा किस स्कंदश नाम के भारतीय … पढ़ना जारी रखें गंगुओं का हमारा युग और राजा भोज

भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है

डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है. यह हिंदू शासकों के लिए भी उतना ही सही है, जितना कि मुस्ल‍िम शासकों के लिए. अतीत के लिए भी, आज के लिए भी. ग़ौरी, गज़नवी, चंगीज़, तैमूर, दुर्रानी, अब्दाली जैसे मुस्ल‍िम आक्रांता लूटखसोट की फ़िराक़ में थे. हिंदुस्तान … पढ़ना जारी रखें भारत की मूल समस्या यह है कि यहां शासक और जनता के बीच कभी कोई तारतम्य नहीं रहा है

क्या बच्चों का सही तरीके से इलाज नहीं होता है? : रवीश कुमार

गोरखपुर के बीआरडी अस्तपाल में बच्चों के मरने की घटना से एक बात साबित हो गई. 12 अगस्त को 48 घंटे में 30 बच्चों की मौत के बाद हम सबने ख़ूब बहस की, चर्चा की, मुख्यमंत्री से लेकर सरकार को घेरा, फिर चुटकुले बनाए और उसके बाद सब नॉर्मल हो गया. सिस्टम भी समझ गया कि ये लोग पहले गुस्सा करेंगे फिर चुटकुला बनाकर नॉर्मल … पढ़ना जारी रखें क्या बच्चों का सही तरीके से इलाज नहीं होता है? : रवीश कुमार

वक़्त के साथ बदलते बाबाओं के अवतार

 प्राणेश तिवारी आज एक बाबा ने कहर ढा रखा है। रेप के आरोप में दोषी पाए गए हैं और उनके भक्त दो राज्यों में आपातकाल जैसे हालात लाने पर उतारू हैं। 25 से ज़्यादा जानें जा चुकी हैं और जगह-जगह आगजनी की खबरें सामने आ रही हैं। हर कोई सोच रहा है कि बाबा में ऐसा क्या है जो लोग जान लेने-देने पर उतारू हैं। … पढ़ना जारी रखें वक़्त के साथ बदलते बाबाओं के अवतार

सुना है कि सलीम “मुसलमान” है.

मेरे देश के गदगद लिबरल बौद्धिकों ने यह पता लगा लिया है कि अमरनाथ यात्रियों की बस को जो सलीम चला रहा था, वह “मुसलमान” है. इससे पहले वे ये पता लगा चुके थे कि अमरनाथ गुफा की “खोज” एक मुसलमान चरवाहे ने की थी. मैं तो समझता था कि पुरास्थलों की “खोज” पुराविद् करते हैं. ## तो क़िस्सा क़ोताह यह है कि तीर्थयात्रियों की … पढ़ना जारी रखें सुना है कि सलीम “मुसलमान” है.

क्या “अयोध्या”, क्या “अमरनाथ”

अमरनाथ यात्रा के प्रति कश्मीरियों का द्वेष अयोध्या के प्रति मुस्ल‍िमों के द्वेष से कम नहीं है, ऐसी धारणा अगर बन गई है, तो यह निर्मूल नहीं है। अमरनाथ इधर पिछले नौ सालों से कश्मीर का “अयोध्या” जो बन गया है। और यही कारण है कि अमरनाथ यात्र‍ियों पर हमला करने के अनेक मायने होते हैं। आतंकी कहीं भी हमला कर सकते थे, लेकिन अमरनाथ … पढ़ना जारी रखें क्या “अयोध्या”, क्या “अमरनाथ”

अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता

जिस कश्मीर में मानवाधिकार के नाम पर ज्यूडिशियली खुद संज्ञान ले कर एक पत्थरबाज आतंकी को दस लाख का मुआवजा देने की सरकार को सिफ़ारिश करती हो उस कश्मीर में अगर अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में गल्फ फंडिंग और क्रिश्चियन मिशनरी फंडिंग पर पल रहे एन … पढ़ना जारी रखें अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता

हिंदी साहित्य: आदिकाल

हिंदी साहित्य: आदिकाल

आदिकाल सन 1000 से 1325 तक हिंदी साहित्य के इस युग को यह नाम डॉ॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिला है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे वीर-गाथा काल नाम दिया है। इस काल की समय के आधार पर साहित्य का इतिहास लिखने वाले मिश्र बंधुओं ने इसका नाम प्रारंभिक काल किया और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बीजवपन काल। डॉ॰ रामकुमार … पढ़ना जारी रखें हिंदी साहित्य: आदिकाल

Bhasha Bahta Neer by kubernath rai

भाषा बहता नीर

‘भाषा बहता नीर’। भाषा एक प्रवाहमान नदी। भाषा बहता हुआ जल। बात बावन तोले पाव रत्ती सही। कबीर की कही हुई है तो सही होनी ही चाहिए। कबीर थे बड़े दबंग और उनका दिल बड़ा साफ था। अतः इस बात के पीछे उनके दिल की सफाई और सहजता झाँकती है, इससे किसी को भी एतराज नहीं हो सकता। बहुत कुछ ऐसी ही स्थिति है कबीर … पढ़ना जारी रखें भाषा बहता नीर

Nishaad Baasuri by Kuber Nath Rai

निषाद बाँसुरी

सप्तमी का चाँद कब का डूब चुका है। आधी रात हेल गयी है। सारा वातावरण ऐसा निरंग-निर्जन पड़ गया है गोया यह शुक्ला सप्तमी न होकर शुद्ध नष्ट-चंद्र निशा हो। अभी-अभी हमारी नाव ‘झिझिरी’ अर्थात् नौका-विहार खेलकर लौटी है। नाव को तट से बाँधकर चंदर भाई फिर ‘गलई’ अर्थात इसके अग्रभाग पर आ विराजते हैं और प्रस्ताव करते हैं – ”यार, अब सोने कौन जाए? … पढ़ना जारी रखें निषाद बाँसुरी

Kubza Sundari by Kuber Nath Rai

कुब्जा-सुंदरी

हमारे दरवाज़े की बगल में त्रिभंग-मुद्रा में एक टेढ़ी नीम खड़ी है, जिसे राह चलते एक वैष्णव बाबा जी ने नाम दे दिया था, ‘कुब्जा-सुंदरी’। बाबा जी ने तो मौज में आकर इसे एक नाम दे दिया था, रात भर हमारे अतिथि रहे, फिर ‘रमता योगी बहता पानी’! बाद में कभी भेंट नहीं हुई। परन्तु तभी से यह नीम मेरे लिए श्रीमद्भागवत का एक पन्ना … पढ़ना जारी रखें कुब्जा-सुंदरी

UttraFalguni ke Aas Paas by Kuber Nath Rai

उत्तराफाल्गुनी के आसपास

वर्षा ऋतु की अंतिम नक्षत्र है उत्तराफाल्गुनी। हमारे जीवन में गदह-पचीसी सावन-मनभावन है, बड़ी मौज रहती है, परंतु सत्ताइसवें के आते-आते घनघोर भाद्रपद के अशनि-संकेत मिलने लगते हैं और तीसी के वर्षों में हम विद्युन्मय भाद्रपद के काम, क्रोध और मोह का तमिस्त्र सुख भोगते हैं। इसी काल में अपने-अपने स्वभाव के अनुसार हमारी सिसृक्षा कृतार्थ होती है। फिर चालीसवें लगते-लगते हम भाद्रपद की अंतिम … पढ़ना जारी रखें उत्तराफाल्गुनी के आसपास

किसान आंदोलन और गांधी-टैगोर डिबेट

किसान आंदोलन चल रहा है। आंदोलन महाराष्ट्र से शुरू हुआ था और अब इसने मध्यप्रदेश को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है। आंदोलनकारियों की अनेक मांगें हैं, जिनमें कर्जमाफ़ी जैसी अनैतिक मांग भी शामिल है। आंदोलनकारी किसानों ने आपूर्ति तंत्र को अपहृत कर लिया है। दूध, फल और सब्ज़ियों के उत्पादन और वितरण के “मैकेनिज़्म” में ये किसान बीच की अहम कड़ी की भूमिका निभाते … पढ़ना जारी रखें किसान आंदोलन और गांधी-टैगोर डिबेट

अगर तीन तलाक़ ना होगा तो मुसलमान तलाक़ के लिए कहां जाएगा?

भारत में तलाक़ की प्रक्रिया “हिंदू विवाह अधिनियम 1955” के तहत संपादित होती है। अदालत कहेगी यह “हिंदू क़ानून है, तो मुसलमान इसका पालन क्यों करेगा? अव्वल तो यह कि एक “समान नागरिक संहिता” इस देश में बनाई नहीं गई। अब आप कह रहे हैं कि मुसलमान हिंदू क़ानून का पालन क्यों करेगा। मेरा सवाल है, अगर हिंदू क़ानून से मुसलमान को न्याय मिल रहा है तो वह ऐसा क्यों नहीं करेगा? पढ़ना जारी रखें अगर तीन तलाक़ ना होगा तो मुसलमान तलाक़ के लिए कहां जाएगा?

छोटे शहर की लड़की का पीरियड्स

पीरियड्स यानि उजले स्कर्ट में लग जाने वाले खून के धब्बों से होने वाली शर्मिंदगी, चार लड़कियों की उपाय निकालने वाली फुसफुसाहट ,घर के मर्दों से पैड को छुप- छुपाकर रखने से लेके यूज करने की कोशिश, पूजा ना करने से लेके दादी, बुआ,मर्दों को खाना- पानी ना देने की अनुमति वाली अशुद्धता।पीरियड्स यानि छूआआछूत,पूर्वाग्रह, घृणा और फिर कई सारी मिथ्याएं। हमारे लिए पीरियड्स के … पढ़ना जारी रखें छोटे शहर की लड़की का पीरियड्स

किसान हूँ, आत्महत्या मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है…

हाँ साहब! मैं वही हूँ जिसने धरती का सीना फाड़, अपने पसीने से सींच वो फ़सल उगाई है जो आज आपके थालियों की शोभा बढ़ा रही हैं| मैं वही हूँ जो चिलचिलाती धूप में, बिलबिलाते से खेतों में कीचड़ से सने हुए अपने खून के कतरे को बूंद-बूँद टपका रहा हूँ, इस उम्मीद में कि शायद मेरी बेटी की शादी हो जाए…मेरा बेटा भी किसी … पढ़ना जारी रखें किसान हूँ, आत्महत्या मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है…

जहां जाति नहीं, वहां भी वह चिपका दी जाती है

छत्तीसगढ़ के बस्तर में काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया कुछ दलित बौद्धिकों की नज़र में सवर्ण महिला हैं। महानगरों में टिके हुए इन चिंतकों को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि बेला भाटिया छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में आदिवासी महिलाओं और वंचित तबके के लिए हर क़िस्म का जोख़िम उठाकर काम कर रही हैं। उल्लेखनीय है कि बेला भाटिया को एक दिन पहले ही उनके घर … पढ़ना जारी रखें जहां जाति नहीं, वहां भी वह चिपका दी जाती है

जो सार्थक है, वही सकारात्मक है

अग्रज कवि राजेश जोशी का यह आलेख दैनिक भास्कर के गत ५ अक्टूबर के अंक में पढ़ने को मिला. सहज तरीके से कई महत्त्वपूर्ण बातें करते इस आलेख को यहां सहेजने और अपने मित्रों के बीच साझा करने की आवश्यकता महसूस हुई. दैनिक भास्कर को आभार सहित यह आलेख यहां प्रस्तुत है. मिस्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कथाकार नजीब महफूज़ की एक बहुत छोटी-सी कहानी है – प्रार्थना … पढ़ना जारी रखें जो सार्थक है, वही सकारात्मक है