सुना है कि सलीम “मुसलमान” है.

मेरे देश के गदगद लिबरल बौद्धिकों ने यह पता लगा लिया है कि अमरनाथ यात्रियों की बस को जो सलीम चला रहा था, वह "मुसलमान" है. इससे पहले वे ये पता लगा चुके थे कि अमरनाथ गुफा की "खोज" एक मुसलमान चरवाहे ने की थी. मैं तो समझता था कि पुरास्थलों की "खोज" पुराविद् करते... Continue Reading →

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क्या “अयोध्या”, क्या “अमरनाथ”

अमरनाथ यात्रा के प्रति कश्मीरियों का द्वेष अयोध्या के प्रति मुस्ल‍िमों के द्वेष से कम नहीं है, ऐसी धारणा अगर बन गई है, तो यह निर्मूल नहीं है। अमरनाथ इधर पिछले नौ सालों से कश्मीर का "अयोध्या" जो बन गया है। और यही कारण है कि अमरनाथ यात्र‍ियों पर हमला करने के अनेक मायने होते... Continue Reading →

अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता

जिस कश्मीर में मानवाधिकार के नाम पर ज्यूडिशियली खुद संज्ञान ले कर एक पत्थरबाज आतंकी को दस लाख का मुआवजा देने की सरकार को सिफ़ारिश करती हो उस कश्मीर में अगर अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में... Continue Reading →

हिंदी साहित्य: आदिकाल

आदिकाल सन 1000 से 1325 तक हिंदी साहित्य के इस युग को यह नाम डॉ॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिला है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे वीर-गाथा काल नाम दिया है। इस काल की समय के आधार पर साहित्य का इतिहास लिखने वाले मिश्र बंधुओं ने इसका नाम प्रारंभिक काल किया... Continue Reading →

भाषा बहता नीर

'भाषा बहता नीर'। भाषा एक प्रवाहमान नदी। भाषा बहता हुआ जल। बात बावन तोले पाव रत्ती सही। कबीर की कही हुई है तो सही होनी ही चाहिए। कबीर थे बड़े दबंग और उनका दिल बड़ा साफ था। अतः इस बात के पीछे उनके दिल की सफाई और सहजता झाँकती है, इससे किसी को भी एतराज... Continue Reading →

निषाद बाँसुरी

सप्तमी का चाँद कब का डूब चुका है। आधी रात हेल गयी है। सारा वातावरण ऐसा निरंग-निर्जन पड़ गया है गोया यह शुक्ला सप्तमी न होकर शुद्ध नष्ट-चंद्र निशा हो। अभी-अभी हमारी नाव 'झिझिरी' अर्थात् नौका-विहार खेलकर लौटी है। नाव को तट से बाँधकर चंदर भाई फिर 'गलई' अर्थात इसके अग्रभाग पर आ विराजते हैं... Continue Reading →

कुब्जा-सुंदरी

हमारे दरवाज़े की बगल में त्रिभंग-मुद्रा में एक टेढ़ी नीम खड़ी है, जिसे राह चलते एक वैष्णव बाबा जी ने नाम दे दिया था, 'कुब्जा-सुंदरी'। बाबा जी ने तो मौज में आकर इसे एक नाम दे दिया था, रात भर हमारे अतिथि रहे, फिर 'रमता योगी बहता पानी'! बाद में कभी भेंट नहीं हुई। परन्तु... Continue Reading →

उत्तराफाल्गुनी के आसपास

वर्षा ऋतु की अंतिम नक्षत्र है उत्तराफाल्गुनी। हमारे जीवन में गदह-पचीसी सावन-मनभावन है, बड़ी मौज रहती है, परंतु सत्ताइसवें के आते-आते घनघोर भाद्रपद के अशनि-संकेत मिलने लगते हैं और तीसी के वर्षों में हम विद्युन्मय भाद्रपद के काम, क्रोध और मोह का तमिस्त्र सुख भोगते हैं। इसी काल में अपने-अपने स्वभाव के अनुसार हमारी सिसृक्षा... Continue Reading →

किसान आंदोलन और गांधी-टैगोर डिबेट

किसान आंदोलन चल रहा है। आंदोलन महाराष्ट्र से शुरू हुआ था और अब इसने मध्यप्रदेश को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है। आंदोलनकारियों की अनेक मांगें हैं, जिनमें कर्जमाफ़ी जैसी अनैतिक मांग भी शामिल है। आंदोलनकारी किसानों ने आपूर्ति तंत्र को अपहृत कर लिया है। दूध, फल और सब्ज़ियों के उत्पादन और वितरण के "मैकेनिज़्म"... Continue Reading →

अगर तीन तलाक़ ना होगा तो मुसलमान तलाक़ के लिए कहां जाएगा?

भारत में तलाक़ की प्रक्रिया "हिंदू विवाह अधिनियम 1955" के तहत संपादित होती है। अदालत कहेगी यह "हिंदू क़ानून है, तो मुसलमान इसका पालन क्यों करेगा? अव्वल तो यह कि एक "समान नागरिक संहिता" इस देश में बनाई नहीं गई। अब आप कह रहे हैं कि मुसलमान हिंदू क़ानून का पालन क्यों करेगा। मेरा सवाल है, अगर हिंदू क़ानून से मुसलमान को न्याय मिल रहा है तो वह ऐसा क्यों नहीं करेगा?

छोटे शहर की लड़की का पीरियड्स

पीरियड्स यानि उजले स्कर्ट में लग जाने वाले खून के धब्बों से होने वाली शर्मिंदगी, चार लड़कियों की उपाय निकालने वाली फुसफुसाहट ,घर के मर्दों से पैड को छुप- छुपाकर रखने से लेके यूज करने की कोशिश, पूजा ना करने से लेके दादी, बुआ,मर्दों को खाना- पानी ना देने की अनुमति वाली अशुद्धता।पीरियड्स यानि छूआआछूत,पूर्वाग्रह,... Continue Reading →

किसान हूँ, आत्महत्या मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है…

हाँ साहब! मैं वही हूँ जिसने धरती का सीना फाड़, अपने पसीने से सींच वो फ़सल उगाई है जो आज आपके थालियों की शोभा बढ़ा रही हैं| मैं वही हूँ जो चिलचिलाती धूप में, बिलबिलाते से खेतों में कीचड़ से सने हुए अपने खून के कतरे को बूंद-बूँद टपका रहा हूँ, इस उम्मीद में कि... Continue Reading →

जहां जाति नहीं, वहां भी वह चिपका दी जाती है

छत्तीसगढ़ के बस्तर में काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया कुछ दलित बौद्धिकों की नज़र में सवर्ण महिला हैं। महानगरों में टिके हुए इन चिंतकों को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि बेला भाटिया छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में आदिवासी महिलाओं और वंचित तबके के लिए हर क़िस्म का जोख़िम उठाकर काम कर रही हैं। उल्लेखनीय... Continue Reading →

जो सार्थक है, वही सकारात्मक है

अग्रज कवि राजेश जोशी का यह आलेख दैनिक भास्कर के गत ५ अक्टूबर के अंक में पढ़ने को मिला. सहज तरीके से कई महत्त्वपूर्ण बातें करते इस आलेख को यहां सहेजने और अपने मित्रों के बीच साझा करने की आवश्यकता महसूस हुई. दैनिक भास्कर को आभार सहित यह आलेख यहां प्रस्तुत है. मिस्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कथाकार... Continue Reading →

गुलामी की निशानी है घूंघट

मेरे समाज में आज भी नई बहुओं को घूंघट निकालने के लिए बाध्य किया जाता है. ना सिर्फ गांव में बल्कि बड़े शहरों में भी आज की पढ़ी लिखी नए विचारों की लड़कियां हाथ भर का घूंघट निकाल रह रही हैं. एक बार मेरे समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने मुझसे कहा कि 'तुम तो अच्छा लिखती हो, समाज को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी के लिए कुछ लिखो, अपने समाज की पत्रिका में छपवाएंगे'

वेश्याओं से सुनिए उन मर्दों की कहानी

मैं मानती रही हूं कि वेश्यालय केवल सेक्स की जगह नहीं हैं बल्कि कामोत्तेजनाएं मिटाने की जगह भी हैं. कोई उन्हें यातनाओं की जगह के रूप में भी देख सकता है जहां मर्द अपने मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए अपनी कल्पनाओं को शुद्ध करते हैं. एक बार, जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें क्या-क्या भोगना पड़ा, उन्होंने ऐसे मर्दों की कहानियां सुनाई जिन्हें वेश्याओं को दुल्हन के जोड़े पहनाना, और रोल प्ले कराना पसंद था. ये सब रोमांटिक था, और उन्हें ये सब बुरा भी नहीं लगा

रेप के बाद फेक एनकाउंटर? अब लाश खोदकर निकालेंगे

”उस दिन हिड़मे की तबियत ठीक नहीं थी, लेकिन वह काम-काज में हाथ बंटाने के लिए धान कूट रही थी. तभी पुलिस के जवान आ धमके और उसे जबरन उठाकर ले जाने लगे. मैंने रोकने की कोशिश की मगर वे बंदूक की बट और जूतों से हमला करने लगे. उसे वे पास के जंगल में ले गए. कुछ गांव वाले भी वहां शिकार के लिए गए हुए थे. जब उन्होंने मेरी बेटी की चीख सुनी तो वे तीर-कमान लेकर मदद के लिए पहुंचे, लेकिन पुलिस वालों ने उन्हें खदेड़ दिया. दूसरे दिन 14 जून को किसी ने ग्राम सचिव को फोन कर कहा कि मड़कम हिड़मे की लाश चाहिए तो कोंटा थाना आना होगा. मैं गांव वालों के साथ थाने पहुंची तो देखा कि मड़कम की लाश पॉलिथीन में लिपटी सड़क पर पड़ी है. पुलिस वालों ने कहा कि ये माओवादी है, इनका एनकाउंटर कर दिया है. उसके शरीर के कई अंग कटे हुए थे. पुलिस कुछ भी कहे लेकिन मेरा मानना है कि पुलिस वालों ने मेरी बेटी से रेप किया. गांव वालों ने जंगल में झाड़ियों के पास मड़कम की टूटी चूड़ियां देखी थीं. गांव वालों के कहने पर 15 जून को बेटी को दफना दिया गया.”

कवि और कविता:नरेश मेहता का काव्‍य वैभव – डॉ. दीपक पाण्‍डेय

साहित्‍य की श्रीवृद्धि में अनेक साहित्‍यकारों ने अपने सर्वस्‍व भाव-बोध विविध विधाओं में उडेल दिए हैं जिन्‍हें विस्‍मृत कर पाना संभव नहीं है । इसी कड़ी में अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित 'दूसरा सप्‍तक' के कवि नरेश मेहता का नाम साहित्यिक जगत में सम्‍मान से लिया जाता है।15 फरवरी 1922 को मालवा, मध्‍यप्रदेश के शाजापूर के गुजराती ब्राहमण परिवार में जन्‍मे नरेश मेहता का प्रारंभिक नाम 'पूर्णशंकर शुक्‍ल' था।मेहता की पदवी उनके पूर्वजों को गुजराज यात्रा के समय मिली जिसे अपने पिता की तरह नरेश मेहता ने भी शुक्‍ल के स्‍थान पर प्रयोग करते रहे।नरेश मेहता समकालीन हिंदी काव्‍य के शीर्षस्‍थ कवि हैं जिन्‍होंने अपने काव्‍य-संसार में शिप्रा-नर्मदा से लेकर गंगा तक फैले जीवन के विस्‍तृत फलक को अभिव्‍यक्ति दी है। मूल्‍यबोध की दृष्टि से भारतीय संस्‍कृति की मिथकीय, जातीय और सारस्‍वत स्‍मृतियों के पुनराविष्‍कार और उसकी रचनात्‍मक परिणतियों से समृद्ध उनका काव्‍य-संसार अपनी अद्वितीय आभा से समकालीन परिदृश्‍य में एक अनिवार्य और अपरिहार्य उपस्थिति है ।

सीवान, शहाबुद्दीन और एक हताश पिता का संघर्ष

Tehelkahindi Magazine ‘लुंगी-गंजी में एसपी साहब आए. मैंने कहा कि सुरक्षा चाहिए. एसपी साहब ने कहा कि आप कहीं और चले जाइए, सीवान अब आपके लिए नहीं है. चाहे तो यूपी चले जाइए या कहीं और. हम एस्कॉर्ट कर सीवान के घर में जो सामान है, वह वहां भिजवा देंगे’ बाहुबली: जिस जीरादेई में देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का जन्म हुआ था. उस इलाके से पहली बार विधयक बनकर शहाबुद्दीन राजनीति में आए थे.

सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

जब आतंकवाद को सूफीवाद से खत्म किये जाने की बात कही जा रही है, ऐसे में आध्यात्मिक क्रान्ति से कदाचार (अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचारादि) का अंत करने की बात होना, यह सिद्ध करते है कि सूफीमत की रूहानियत ही अध्यात्म-विज्ञान है। यह भी संयोग ‘परवरदिगार’ ने तय किया  ‘‘कदाचार पूर्ण दुर्घर्ष दौर में ‘आर्ट आॅफ... Continue Reading →

लोक चेतना में स्वाधीनता की लय – आकांक्षा यादव

स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्राणिमात्र का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी से आत्मसम्मान और आत्मउत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भारतीय राष्ट्रीयता को दीर्घावधि विदेशी शासन और सत्ता की कुटिल-उपनिवेशवादी नीतियों के चलते परतंत्रता का दंश झेलने को मजबूर होना पडा था और जब इस क्रूरतम कृत्यों से भरी अपमानजनक स्थिति की चरम सीमा हो गई तब... Continue Reading →

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