सुधार – हरिशंकर परसाई

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एक जनहित की संस्‍था में कुछ सदस्‍यों ने आवाज उठाई, ‘संस्‍था का काम असंतोषजनक चल रहा है। इसमें बहुत सुधार होना चाहिए। संस्‍था बरबाद हो रही है। इसे डूबने से बचाना चाहिए। इसको या तो सुधारना चाहिए या भंग कर देना चाहिए।

संस्‍था के अध्‍यक्ष ने पूछा कि किन-किन सदस्‍यों को असंतोष है।

दस सदस्‍यों ने असंतोष व्‍यक्‍त किया।

अध्‍यक्ष ने कहा, ‘हमें सब लोगों का सहयोग चाहिए। सबको संतोष हो, इसी तरह हम काम करना चाहते हैं। आप दस सज्‍जन क्‍या सुधार चाहते हैं, कृपा कर बतलावें।’

और उन दस सदस्‍यों ने आपस में विचार कर जो सुधार सुझाए, वे ये थे –

‘संस्‍था में चार सभापति, तीन उप-सभापति और तीन मंत्री और होने चाहिए…’

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हरिशंकर परसाई

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आलसस्य परम सुखम

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प्राचीन काल से ही आलस को सामाजिक और व्यक्तिगत बुराई माना जाता रहा हैं. “जो सोवत हैं, वो खोवत हैं” जैसी कहावतो के माध्यम से आलसी लोगो को धमकाने और “अलसस्य कुतो विद्या” जैसे श्लोको के ज़रिये उनको सामाजिक रूप से ज़लील करने /ताने कसने के प्रयास अनंतकाल से जारी हैं. लेकिन फिर भी आज तक (चैंनल नहीं ) आलस और आलसियों का वजूद “सेट मैक्स चैनल” पर “सूर्यवंशम फिल्म” की तरह जस का तस बना हुआ है, जो ये दर्शाता हैं की बुराई का विरोध करने से वो ज़्यादा बढ़ती हैं। इसीलिए बुराइयो को कोसे नहीं बल्कि प्यार से पाले-पोसे और बड़ा होने पर उनके हाथ पीले और गाल लाल करके घर से विदा कर दे।

दरअसल हर युग में अवतरित हुए जरुरत से ज़्यादा (लेकिन आवश्यकता से कम ) “श्याणे-लोग” इस बात को समझने में नाकाम रहे हैं की आलस कोई दुर्गुण नहीं हैं बल्कि ये तो दुनियादारी और मोहमाया से मुँह मोड़ लेने (और हाथ-पैर तोड़ लेने) का एक आसान आध्यात्मिक तरीका हैं जिसमे व्यक्ति बिना किसी को तकलीफ दिए, बिना किसी “गिव या टेक” के,सारे प्रलोभनों को ओवरटेक करके,”सिक्स-लेन” वाले “मोक्ष मार्ग” पर बिना कोई टोल टैक्स दिए अपनी गाड़ी और कल्पनाओं के घोड़े दौड़ा सकता हैं. जिस दिन जालिम दुनिया ये समझ लेगी उसी दिन से सारी समस्याए नेताओ की ईमानदारी की तरह छू मंतर हो जाएगी।

आलसी लोगो को चाहे कोई कितना भी भला-बुरा क्यों ना कहे लेकिन वो उसका कभी बुरा नहीं मानते क्योंकि बुरा मानने के बाद गुस्सा उपजता हैं जो की झगड़े और कलह (और कलह से सुलह रास्ता काफी दुर्गम होता हैं) को जन्म देता है जिससे रिश्तो में दरार आने की संभावना रहती हैं और इस दरार को रोकने के लिए वो “खम्बुजा – सीमेंट” की तरह काम करते हैं. टीवी विज्ञापनों में कई सीमेंट में जान बताई जाती हैं। ऐसे सारे विज्ञापन के खिलाफ ज्ञापन देने की ज़रूरत हैं क्योंकि दरअसल “जान” किसी सीमेंट में नहीं होती हैं बल्कि आलसी लोगो में होती हैं क्योंकि संबंधों के लिए वो अपना “अहम” त्याग देते हैं लेकिन अपना आलस त्याग देंगे ऐसा “वहम” किसी कीमत पर नहीं उपजने देते हैं।

आज के भौतिकतावादी युग में सामाजिक मूल्यों को बनाये रखने में आलसी महापुरुष अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं क्योंकि जहाँ अधिकतर लोग सफलता मिलने के बाद बदल जाते हैं और इवन-डे पर अपनी मंहगी कार में और ओड-डे पर अपने अभिमान पर सवारी करने लगते हैं, वहीँ आलसी लोगो से सभ्य समाज को ऐसा कोई खतरा नहीं हैं क्योंकि काम और सफलता इन दो शब्दों से आलसी लोगो का वहीँ सम्बन्ध होता हैं जो की “लाल -किला बासमती चावल” से लाल किले का हैं । लेखक और प्रकाशक की “सयुंक्त-गलती” से “काम और सफलता” जैसे शब्द आलसियों की डिक्शनरी में होते तो हैं लेकिन उन्हें देखते ही वो पेज पलट देते हैं ताकि उनकी किस्मत का पासा न पलट पाये और वो आलस के अलावा किसी अभिमान या स्वाभिमान का शिकार न हो पाये।

यहाँ पर ये “अस्पष्ट” कर देना ज़रूरी हैं की आलसी लोग किसी भी कार्य या मेहनत से नहीं घबराते हैं उनको केवल इस बात का डर सताता हैं की उनके काम करने से कहीं “सोने ” के भाव कम ना हो जाये। ये लोग इतने दयालु और परहित स्वाभाव के होते हैं की हर क्षेत्र में बढ़ती हुई “गला-काट” प्रतिस्पर्धा को कम करने के उद्देश्य से काम ही नहीं करते हैं ताकि “काबिल” लोगो को मौका मिले और वे सफल होकर “ड्यू डेट” से पहले अपने सभी “बिल” भर सके। इसके बदले इनको किसी सम्मान की आशा नहीं होती बल्कि ये तो केवल इतना ही चाहते हैं की काबिल लोग अपनी सफलता का शोर मचा कर इनकी नींद न ख़राब करे। इसके अलावा आलसी लोगो पर कभी अपेक्षाओं और उम्मीदों पर खरा ना उतर पाने का आरोप नहीं लगता क्योंकि सपने में भी इनसे कोई उम्मीद या अपेक्षा नहीं रखी जाती। ये कभी किसी का दिल भी नहीं तोड़ते क्योंकि इन्हे दिन-रात खटिया तोड़ने से ही फुर्सत नहीं मिलती।

आलसी लोग बिना दब के, कब के, समाज के हर तबके में अपनी पैठ सियाचिन की बर्फ की तरह जमा चुके हैं। बॉलीवुड में ऐसे कई आलसी (हीरो) भरे हुए है जो पूरे साल में केवल एक ही फिल्म करते लेकिन चूँकि वो बड़े लोग है इसीलिए उनके आलस को परफेक्शन की पैकिंग में बेच दिया जाता है। कुछ डायरेक्टर्स तो इतने आलसी होते हैं की फिल्म की स्क्रिप्ट सेलेक्ट करने में ही 3-4 साल निकाल देते हैं. वैसे ये डायरेक्टर्स हिम्मत करके थोड़ा आलस और दिखाए तो सरकारे पंचवर्षीय योजनाये बनाने और क्रियान्वित करने में भी इनकी मदद ले सकती हैं ताकि सरकार और उनके मंत्री संसद के अंदर और बाहर थोड़ा और आराम से सो सके.

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अमित शर्मा

(रचनाकार पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट है |)

चरित्रवान भैंस, गर्भवती बुद्धिजीवी

buffaloएक थे सुदामा राय..जिला बलिया द्वाबा के भूमिहार,एक मेहनती किसान,एक बड़े खेतिहर.
कहतें हैं उनके पास दो गाय और एक भैंस थी..

एक साँझ की बात है..राय साहेब गाय भैंस को खिला पिलाकर झाड़ू लगा रहे थे.तब तक क्षेत्र के एक प्रसिद्ध पशु व्यापारी आ धमके..
व्यापारी जी ने भैंस जी को बड़े प्यार से देखा..आगे-पीछे,दांये-बांये,ऊपर-नीचे…मानों वो भैंस नहीं साक्षात होने वाली महबूबा को देख रहे हों।.
कुछ देर तक लगातार भैंस जी को देखने के बाद व्यापारी जी राय साब से मुखातिब हुये. और धीरे से कहा…
“राइ साब अब तो इ भैंसीया बेच दिजिये महराज..हम आज दो साल से आपसे मांग रहे हैं..समझ नहीं आ रहा कि इसका कौन सा अँचार डालेंगे आप..”

राय साहेब के कान पर जूं तक न रेंगी..दुआर को खरहर से बहारते रहे….नाद,चरन साफ करते रहे..भूसा,लेहना,सानी-पानी करते रहे..
बड़ी देर बाद खरहर रखकर बुलंद आवाज में कहा……” “भाई व्यापारी जी…इ भैंस तो हम कब्बो नहीं बेचेंगे..आप चाहें दस लाख क्यों न दें..काहें कि ये बड़ी दुर्लभ चीज है….बहुत ज्यादा”
व्यापारी जी को घोर आश्चर्य..उन्होंने झट से पूछा..”बे महाराज कइसन दुर्लभ…कौन सा मोती झर रहा?..दूध कुछ ख़ास नहीं..नैन-नक्श,डील-डौल भी बेकार है..मरखाह भी बहुत है…आ हम अच्छा खासा पैसा दे रहे तो भी आप नहीं बेच रहे..आखिर का बात है…कवन ऐसी खूबी है,बताइये जरा ?
राय साहेब ने झट से खुद को सम्भाला और कहा….
“तुम नहीं समझोगे भाई..ये बड़ी चरित्रवान भैंस है..”

व्यपारी जी हँसे…. “चरित्रवान भैंस..
मने का मजाक कर दिये राय साहेब..अरे इहाँ गाय भैंस खरीदते बेचते बुढ़ौती आ गया जी..बाल पक कर झड़ गये हमारे…सरवा आज तक हम हजारों भैंस किने बेचे लेकिन चरित्रवान भैंस का नाम तक नहीं सुना..तनी सुरती खिलाइये आ खुलासा समझाइये..बात का है?”

राय साब खैनी की डिबिया निकाले और व्यापारी जी की तरफ बढ़ाते हुये प्रेमपूर्वक बोले….
“भाई इ जो भैंस है न..बहुते चरित्रवान है…रिकार्ड है कि आज तक एक ही भैंसा से गाभिन हुई है..मने दूसरे भैंसा को तो पास सटने नहीं देती.. बहुत चरित्रवान है..एकदम से पतिव्रता भैंस”
व्यापारी खूब हंसा…लगातार हंसा.

आप भी हंस सकतें हैं..
लेकिन इधर दो तीन दिन से मैं हंस नहीं रहा, मैं उदास हूँ..
फेसबुक,ट्वीटर पर मैं पढ़ता ज्यादा, लिखता कम हूँ..
दो चार दिन से कई नामी गिरामी सर्टिफाइड बुद्धिजीवियों को पढ़ चुका..
इनको पढ़ता रहा लगातार और मुझे सुदामा राय की वो चरित्रवान भैंस याद आती रही..

देख रहा कि ये वही चरित्रवान बुद्धिजीवी हैं..जो अकलाख की मौत के बाद तुरन्त गर्भवती हो गये थे..और असहिष्णुता नामक बच्चे को जन्म देकर दुनिया भर में ढिढोरा पीट दिया था..
“हाय! भारत रहने लायक नहीं रहा…’
इस प्रसव की खुशी में न जाने कितने अपनी हरी हरी चूड़ियाँ तोड़ पुरस्कार तक वापस करने लगे थे..
मोदी संघ को पानी पी पी कर इस अंदाज में गरियाने लगे थे, मानों मोदी ने अकलाख की हत्या अपने हाथों से की हो..
वो तो भला हो बिहार चुनाव में भाजपा के रिजल्ट का…सब एकाएक सही हो गया..बिहार में राम राज्य आ गया..लव कुश गद्दी सम्भाल लिये।वरना अल्लाह जाने और क्या क्या पैदा हो गया होता।
कुछ इस ख़ुशी में लौटाया हुआ पुरस्कार वापस ले आये।

लेकिन इधर देख रहा असहिष्णुता साइलेंट मोड में बहुत दिन से है..केरल में संघ के कार्यकर्ता सन्दीप की हत्या, उसके माँ बाप के सामने घर में घुसकर मार्क्सवादी गुंडों ने कर दी..कर्नाटक में लगातार संघ के कार्यकर्ता मारे गये…
उधर प्रशांत पुजारी की हत्या हुई..
वैसे इ सब तो संघी हैं.
वो बस्तर दंतेवाड़ा में रोज नक्सली, मासूम आदिवासी और सैनिकों की लगातार हत्या कर रहे हैं..उनकी भी कोई खोज खबर नही।
पता न क्यों असहिष्णुता पैदा ही नहीं हो रही।

न इनकी कविता आ रही न लेख छप रहे..न बड़े बड़े इंटरव्यू हो रहे..
आखिर कैसे हो जाय..?
अब पंकज नारंग बेचारे उत्तराखण्ड के घोड़े थोड़े हैं… न ही वो नसीम,नदीम,अकलाख,अफज़ल,याकूब या रोहित वेमुला हैं।

अब किसी आदिवासी,सैनिक या किसी संघी के लिये रो कर का मिलेगा भाई?
सो बेचारे बता रहे कि “अरे ये तो साधारण सी छोटी मोटी घटना है..ये तो आये दिन होती रहती है..इ उस टाइप की नही है..असहिष्णुता टाइप.. की पुरस्कार लौटाना पड़े…अरे मारने वाले हिन्दू भी थे….न जाने कितनी हत्या रोज देश में हो रही..ये कोई बड़ी बात नहीं.”

हाय!देखिये तो जरा..अकलाख रोहित की मौत पर कविता करके कई लीटर आंशू बहाने वाले अब मौत का वर्गीकरण कितनी होशियारी से कर रहे हैं….छोटी मौत, बड़ी मौत, कम्युनल मौत,सेक्यूलर मौत,दलित मौत,सवर्ण मौत।
एक गंवार भी जानता है कि मौत और हत्या तो हत्या होती है..जिसमें किसी की जान चली जाती है…वो चाहें अकलाख की हो या सन्दीप की..डॉक्टर नारंग मारे जाएँ या कल हम आप मारें जाएं..
हर बार हिन्दू मुसलमान से पहले आदमी मरता है.
संवेदना का ये तकाजा है की वो सबके लिये बराबर हो..
लेकिन नहीं…संवेदना के ये सर्टिफाइड होल सेलर ऐसा न सोचकर सिर्फ बौद्धिक दलाली कर रहे हैं।..
मौत का टाइप देखकर निकलने वाले इनके घड़ियाली आंसू महज फरेब हैं। ये वैचारिक उल्लू सीधा कर रहे।
इन्हें न रोहित वेमुला से मतलब है न अकलाख की मौत से दुःख..न उत्तराखण्ड के घोड़े की टांग से हमदर्दी।
वरना केरल के सन्दीप,और कर्नाटक के संघ कार्यकर्ता. बस्तर अबूझमाड़ में मारे जा रहे आदिवासी…डाक्टर पंकज नारंग के लिये भी जरूर दो चार बून्द टपक जाता।
लेकिन ऐसा सोचना बेवकूफी है…
ये दलाल बुद्धिजीवी वही सुदामा राय के खूंटे में बंधे चरित्रवान भैंस हैं..जो हमेशा एक खास किस्म के वैचारिक भैंसा से गर्भधारण करतें हैं..

©http://atulkumarrai1.blogspot.in/2016/03/blog-post_27.html

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(अतुल कुमार राय के फेसबुक वाल से)

बुद्धिजीवी बनने के 20 अचूक तरीके….

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1-जोर जोर से नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद बोलें

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2-बीच बीच में जो आपसे तर्क करे उसे मूढ़ और संघी कहें।

3-सिगरेट जलाकर दाढ़ी खुजाएं और किसी राष्ट्रीय कृति का मजाक उड़ाते हुए धुआँ छोड़ें।

4-कोई अगर कहे की “हमें अपने देश से प्रेम है” तो उसे भगवा आतंकी कहें ।

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5-एसी में बैठकर बीसलेरी पीते हुए किसानों और मजदूरों की चिंता करें और वर्तमान सरकार को पानी पी पीकर कोसें।

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6-हर जगह आरक्षण को जरूरी बताएं….महंगे होटल के कमरे में बैठकर दलित विमर्श करें…जाति आधारित आरक्षण विरोधीयों को मनुवादी करार दें।

7-सुबह दस बजे सोकर उठें…योग,ध्यान, प्राणायाम करने वालों का मजाक उड़ाएं…रात को अमेरिका का दारू पीकर अमेरिका को गरियायें और बीबी को पीटकर कर स्त्री विमर्श पर धारदार लेख लिखें।

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8-दादरी पर खूब चिल्लाएं और मालदा पर किसी दूर देश का संगीत सुनें.. बीच बीच में अफजल याकूब को मानावतावादी बताकर कलाम के मिशाइल अभियान को मनुष्यता के लिए घातक बताएं।

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9-भारत के क्रिकेट जीतने पर टेनिस और रग्बी की बारिकियों पर चर्चा और फुटबॉल में भारत की दुर्दशा पर बहस करें साथ ही क्रिकेट जीत पर खुश होने वालों को बेवक़ूफ़ संघी कहें।

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10-सड़क पर पान थूककर स्वच्छ भारत अभियान को असफल बताएं और साथ में ये भी जोड़ें कि फैली हुई गंदगी और स्वच्छता समस्या के जिम्मेदार नरेंद्र मोदी हैं

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11-वर्तमान सरकार को रोज गाली दें और बताएं की ये देश मनमोहन सिंह अच्छे से चला रहे थे और राहुल गांधी में बहुत सम्भावनाएं हैं।

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12-गांधी को महात्मा माने या न मने गोड़से गोड़से को दुष्ट आत्मा और मावो, स्टालिन को पुण्यात्मा जरूर मानें

13-अभिव्यक्ति के अधिकार पर दिन रात चिंता व्यक्त करें..सेमीनार में व्याख्यान देते हुए सरकार को फासिस्ट कहें और दूसरों कि अभिव्यक्ति का तनिक भी सम्मान न करें उसे तुरन्त संघी करार दें।

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14-गौ मांस निर्यात और सड़क पर घूम रही गायों का हिसाब रखें…गौ प्रेमियों का मजाक उड़ाएं…शाम को बीफ फेस्टिवल में जाकर जोर से कहें. “हाँ मैं बीफ खाता हूँ”

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15-महिलावों के अधिकारों समानता और दैहिक आजादी की दिन रात बातें करें उस पर कविता लेख लिखें …लेकिन बेटी कि शादी अपने जाति में ही करें…शाम को बीबी से जबदस्ती पैर दबवाते हुए स्त्री सशक्तिकरण पर चिंता व्यक्त करें।

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16-गीता, रामायण, महाभारत, वेद कभी न पढ़ें..हिन्दूओं के सभी ग्रन्थों त्योहारों परम्पराओं का खूब मजाक उड़ाते इसे मानने वालों को जाहिल साबित करते हुए प्रगतिशील फील करें…हाँ याद रखें.. टोपी लगाके ईद कि मुबारकवाद जरूर दें लेकिन गुरुनानक जयंती कब है ये भूलकर सेक्यूलर महसूस करें।

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17-सुबह उठकर फेसबुक पर सरकार कि ऐसी की तैसी करते हुए खूब कोसें और साथ में ये जरूर लिखें कि देश में इमरजेंसी जैसे हालात हैं। जो आपसे सहमत न हो उसे तुरन्त ब्लॉक करें।

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18-घर से बाहर सड़क पर कभी न निकलें घर में बैठकर ये साबित करें कि आप देश और दुनिया कि चिंता में मरे जा रहें हैं।

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19-विचार करें या न करें कुछ पढ़ें या न पढ़ें लेकिन हर जगह खुद को सर्व ज्ञाता पढ़ा लिखा और सबसे सुलझा और समझदार साबित करते रहें…मने बुद्धिजीवी बनने से ज्यादा बुद्धिजीवी दिखने पर ध्यान दें।

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20- देश का खाएं, देश का पियें ,देश में रहें मौज करें लेकिन दिन रात देश की निंदा करें।

नोट- इन 20 नुस्खों का जल्दी असर न हो तो बाबा हकिम एम अतुलजान का दस बार नाम लेकर अपने बाम अंग में चाइनीज शिलाजीत का मसाज करें और वैचारिक शीघ्रपतन से तुरन्त फायदा पाकर 5 मिनट में बुद्धिजीवी बनें।

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अतुल कुमार राय

आवारा भीड़ के खतरे : हरिशंकर परसाई

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एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर. इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया- पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर कांच के केस में सुंदर माॅडल खड़ी थी. एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा. कांच टूट गया. आसपास के लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया-हरामजादी बहुत खूबसूरत है.

हम 4-5 लेखक चर्चा करते रहे कि लड़के के इस कृत्य का क्या कारण है? क्या अर्थ है? यह कैसी मानसिकता है? यह मानसिकता क्यों बनी? बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ये सवाल दुनिया भर में युवाओं के बारे में उठ रहे हैं-पश्चिम के सम्पन्न देशों में भी और तीसरी दुनिया के गरीब देशों में भी. अमेरिका से आवारा हिप्पी और ‘हरे राम हरे कृष्ण’ गाते अपनी व्यवस्था से असंतुष्ट युवा भारत आते हैं और भारत का युवा लालायित रहता है कि चाहे चपरासी का काम मिले, अमेरिका में रहूं. ‘स्टेटस’ जाना है यानी चौबीस घंटे गंगा नहाना है. ये अपवाद है. भीड़-की-भीड़ उन युवकों की है, जो हताश, बेकार और क्रुद्ध हैं. संपन्न पश्चिम के युवकों के व्यवहार और भारत के युवकों के व्यवहार में अंतर है.

सवाल है उस युवक ने सुंदर माॅडल के चेहरे पर पत्थर क्यों फेंका? हरामजादी बहुत खूबसूरत है- यह उस गुस्से का कारण क्यों है? वाह, कितनी सुंदर है- ऐसा इस तरह के युवक क्यों नहीं कहते?

The Power of the Crowd And, Inevitably, the Rise of Custom-Made Products

युवक साधारण कुर्ता पाजामा पहने था. चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त. शिक्षित था. बेकार था. नौकरी के लिए भटकता रहा था. धंधा कोई नहीं. घर की हालत खराब. घर में अपमान बाहर अवहेलना. वह आत्मग्लानि से क्षुब्ध. घुटन और गुस्सा. एक नकारात्मक भावना. सबसे शिकायत. ऐसी मानसिकता में सुंदरता देखकर चिढ़ होती है. खिले हुए फूल बुरे लगते हैं. किसी के अच्छे घर से घृणा होती है. सुंदर कार पर थूकने का मन होता है. मीठा गाना सुनकर तकलीफ होती है. अच्छे कपड़े पहिने खुशहाल साथियों से विरक्ति होती है. जिस चीज से खुशी, सुंदरता, संपन्नता, सफलता, प्रतिष्ठा का बोध होता है, उस पर गुस्सा आता है.

बूढ़े-सयाने लोगों का लड़का जब मिडिल स्कूल में होता है, तभी से शिकायतें होने लगती हैं. वे कहते हैं ये लड़के कैसे हो गए? हमारे जमाने में ऐसा नहीं था. हम पिता, गुरु, समाज के आदरणीयों की बात सिर झुका के मानते थे. अब ये लड़के बहस करते हैं. किसी की नहीं मानते. मैं याद करता हूं कि जब मैं छात्र था, तब मुझे पिता की बात गलत तो लगती थी, पर मैं प्रतिवाद नहीं करता था. गुरु का भी प्रतिवाद नहीं करता. समाज के नेताओं का भी नहीं. मगर तब हम किशोरावस्था में थे, जानकारी ही क्या थी? हमारे कस्बे में दस-बारह अखबार आते थे. रेडियो नहीं. स्वतंत्रता संग्राम का जमाना था. सब नेता हमारे हीरो थे- स्थानीय भी और जवाहरलाल नेहरू भी. हम पिता, गुरु, समाज के नेता आदि की कमजोरियां नहीं जानते थे. मुझे बाद में समझ में आया कि मेरे पिता कोयले के भट्टों पर काम करने वाले गोंडों का शोषण करते थे.

पर अब मेरा ग्यारह साल का नाती पांचवीं कक्षा का छात्र है. वह सबेरे अखबार पढ़ता है, टेलीविजन देखता है, रेडियो सुनता है. वह तमाम नेताओं की पोलें जानता है. देवीलाल और ओमप्रकाश चौटाला की आलोचना करता है. घर में कुछ ऐसा करने को कहो तो प्रतिरोध करता है- मेरी बात भी तो सुनो. दिन भर पढ़कर आया हूं. अब फिर कहते हो कि पढ़ने बैठ जाऊं. थोड़ी देर नहीं खेलूंगा नहीं तो पढ़ाई भी नहीं होगी. हमारी पुस्तक में लिखा है. वह जानता है कि घर में बड़े कब-कब झूठ बोलते हैं.

ऊंची पढ़ाई वाले विश्वविद्यालय के छात्र सबेरे अखबार पढ़ते हैं तो तमाम राजनीति और समाज के नेताओं के भ्रष्टाचार, पतनशीलता के किस्से पढ़ते हैं. अखबार देश को चलाने वालों और समाज के नियामकों के छल, कपट, प्रपंच, दुराचार की खबरों से भरे रहते हैं. धर्माचार्यों की चरित्रहीनता उजागर होती है. यही नेता अपने हर भाषण हर उपदेश में छात्रों से कहते हैं- युवकों, तुम्हें देश का निर्माण करना है (क्योंकि हमने नाश कर दिया) तुम्हें चरित्रवान बनना है (क्योंकि हम तो चरित्रहीन हैं) शिक्षा का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, नैतिक चरित्र का ग्रहण करना है- (हमने शिक्षा और अशिक्षा से पैसा कमाना और अनैतिक होना सीखा) इन नेताओं पर छात्रों-युवकों की आस्था कैसे जमे? छात्र अपने प्रोफेसरों के बारे में सब जानते हैं. उनका ऊंचा वेतन लेना और पढ़ाना नहीं. उनकी गुटबंदी, एक-दूसरे की टांग खींचना, नीच कृत्य, द्वेषवश छात्रों को फेल करना, पक्षपात, छात्रों का गुटबंदी में उपयोग. छात्रों से कुछ भी नहीं छिपा रहता अब. वे घरेलू मामले भी जानते हैं. ऐसे गुरुओं पर छात्र कैसे आस्था जमाएं. ये गुरु कहते हैं- छात्रों को क्रांति करना है. वे क्रांति करने लगे तो सबसे पहले अपने गुरुओं को साफ करेंगे. अधिकतर छात्र अपने गुरुओं से नफरत करते हैं.

बड़े लड़के अपने पिता को भी जानते हैं. वे देखते हैं कि पिता का वेतन तो तीन हजार है, पर घर का ठाठ-बाट आठ हजार रुपयों का है. मेरा बाप घूस खाता है. मुझे ईमानदारी के उपदेश देता है. हमारे समय के लड़के-लड़कियों के लिए सूचना और जानकारी के इतने माध्यम खुले हैं कि वे सब क्षेत्रों में अपने बड़ों के बारे में सबकुछ जानते हैं. इसलिए युवाओं से ही नहीं बच्चों से भी अंधआज्ञाकारिता की आशा नहीं की जा सकती. हमारे यहां ज्ञानी ने बहुत पहले कहा था- ‘प्राप्तेषु षोडसे वर्षे पुत्र मित्र समाचरेत.’

उनसे बात की जा सकती है, उन्हें समझाया जा सकता है. कल परसों मेरा बारह साल का नाती बाहर खेल रहा था. उसकी परीक्षा हो चुकी है और लंबी छुट्टी है. उससे घर आने के लिए उसके चाचा ने दो तीन बार कहा. डांटा. वह आ गया और रोते हुए चिल्लाया, हम क्या करें? ऐसी-तैसी सरकार की जिसने छुट्टी कर दी. छुट्टी काटना उसकी समस्या है. वह कुछ तो करेगा ही. दबाओगे तो विद्रोह कर देगा. जब बच्चे का यह हाल है तो तरुणों की प्रतिक्रियाएं क्या होंगी.

युवक-युवतियों के सामने आस्था का संकट है. सब बड़े उसके सामने नंगे हैं. आदर्शों, सिद्धातों, नैतिकताओं की धज्जियां उड़ते वे देखते हैं. वे धूर्तता, अनैतिकता, बेईमानी, नीचता को अपने सामने सफल और सार्थक होते देखते हैं. मूल्यों का संकट भी उनके सामने है. सब तरफ मूल्यहीनता उन्हें दिखती है. बाजार से लेकर धर्मस्थल तक. वे किस पर आस्था जमाएं और किसके पदचिन्हों पर चलें? किन मूल्यों को मानें?

यूरोप में दूसरे महायुद्ध के दौरान जो पीढ़ी पैदा हुई उसे लॉस्ट जनरेशन’(खोई हुई पीढ़ी) का कहा जाता है. युद्ध के दौरान अभाव, भुखमरी, शिक्षा, चिकित्सा की ठीक व्यवस्था नहीं. युद्ध में सब बड़े लगे हैं तो बच्चों की परवाह करने वाले नहीं. बच्चों के बाप और बड़े भाई युद्ध में मारे गए. घर का, संपत्ति का, रोजगार का नाश हुआ. जीवन मूल्यों का नाश हुआ. ऐसे में बिना उचित शिक्षा, संस्कार, भोजन, कपड़े के विनाश और मूल्यहीनता के बीच जो पीढ़ी बढ़कर जवान हुई तो खोई हुई पीढ़ी. इसके पास निराशा, अंधकार, असुरक्षा, अभाव, मूल्यहीनता के सिवा कुछ नहीं था. विश्वास टूट गए थे. यह पीढ़ी निराश, विध्वंसवादी, अराजक, उपद्रवी, नकारवादी हुई. अंग्रेज लेखक जार्ज ओसबर्न ने इस क्रुद्ध पीढ़ी पर नाटक लिखा था तो बहुत पढ़ा गया और उस पर फिल्म भी बनी. नाटक का नाम है- ‘लुक बैक इन एंगर’. मगर यह सिलसिला यूरोप के फिर से व्यवस्थित और सम्पन्न हो जाने पर भी चलता रहा. कुछ युवक समाज के ‘ड्राप आउट’ हुए. ‘बीट जनरेशन’ पैदा हुई. औद्योगीकरण के बाद यूरोप में काफी प्रतिशत बेकारी है. ब्रिटेन में अठारह प्रतिशत बेकारी है. अमेरिका ने युद्ध नहीं भोगा. मगर व्यवस्था से असंतोष वहां भी पैदा हुआ. अमेरिका में भी लगभग बीस प्रतिशत बेकारी है. वहां एक ओर बेकारी से पीड़ित युवक हैं तो दूसरी ओर अतिशय सम्पन्नता से पीड़ित युवक भी. जैसे यूरोप में वैसे ही अमेरिकी युवकों, युवतियों का असंतोष, विद्रोह, नशेबाजी, यौन स्वछंदता और विध्वंसवादिता में प्रकट हुआ. जहां तक नशीली वस्तुओं के सेवन का सवाल है, यह पश्चिम में तो है ही, भारत में भी खूब है. दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यवेक्षण के अनुसार दो साल पहले (1989 में) सत्तावन फीसदी छात्र और पैंतीस फीसदी छात्राएं नशे के आदी पाए गए. दिल्ली तो महानगर है. छोटे शहरों में, कस्बों में नशे आ गए हैं. किसी-किसी पान की दुकान में नशा हर कहीं मिल जाता है. ‘स्मैक’ और ‘पाट’ टाफी की तरह उपलब्ध हैं.

छात्रों-युवकों को क्रांति की, सामाजिक परिवर्तन की शक्ति मानते हैं. सही मानते हैं. अगर छात्रों-युवकों में विचार हो, दिशा हो, संगठन हो और सकारात्मक उत्साह हो, वे अपने से ऊपर की पीढ़ी की बुराइयों को समझें तो उन्हीं बुराइयों के उत्तराधिकारी न बनें, उनमें अपनी ओर से दूसरी बुराइयां मिलाकर पतन की परंपरा को आगे नहीं बढ़ाएं. सिर्फ आक्रोश तो आत्मक्षय करता है.

एक हर्बर्ट मार्क्यूस चिंतक हो गए हैं, जो सदी के छठे दशक में बहुत लोकप्रिय हो गए थे. वे ‘स्टूडेंट पावर’ में बहुत विश्वास करते थे. मानते थे कि छात्र क्रांति कर सकते हैं. वैसे सही बात यह है कि अकेले छात्र क्रांति नहीं कर सकते. उन्हें समाज के दूसरे वर्गों को शिक्षित करके चेतनाशील बनाकर संघर्ष में साथ लेना होगा. लक्ष्य निर्धारित करना होगा. आखिर क्या बदलना है यह तो तय हो. अमेरिका में हर्बर्ट मार्क्यूस से प्रेरणा पाकर छात्रों ने नाटक ही किए. हो ची मिन्ह और चे गुवेरा के बड़े-बड़े चित्र लेकर जुलूस निकालना और भद्दी, भौंड़ी, अश्लील हरकतें करना. अमेरिकी विश्वविद्यालयों की पत्रिकाओं में बेहद फूहड़ अश्लील चित्र और लेख कहानी. फ्रांस के छात्र अधिक गंभीर शिक्षित थे. राष्ट्रपति द गाल के समय छात्रों ने सोरोबोन विश्वविद्यालय में आंदोलन किया. लेखक ज्यां पाल सात्र ने उनका समर्थन किया. उनका नेता कोहने बेंडी प्रबुद्ध और गंभीर युवक था. उनके लिए राजनीतिक क्रांति करना तो संभव नहीं था. फ्रांस के श्रमिक संगठनों ने उनका साथ नहीं दिया. पर उनकी मांगें ठोस थीं जैसे शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन. अपने यहां जैसी नकल करने की छूट की क्रांतिकारी मांग उनकी नहीं थी. पाकिस्तान में भी एक छात्र नेता तारिक अली ने क्रांति की धूम मचाई. फिर वह लंदन चला गया.

युवकों का यह तर्क सही नहीं है कि जब सब पतित हैं तो हम क्यों नहीं हों. सब दलदल में फंसे हैं तो जो लोग नए हैं, उन्हें उन लोगों को वहां से निकालना चाहिए. यह नहीं कि वे भी उसी दलदल में फंस जाएं. दुनिया में जो क्रांतियां हुई हैं, सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, उनमें युवकों की बड़ी भूमिका रही है. मगर जो पीढ़ी ऊपर की पीढ़ी की पतनशीलता अपना ले, क्योंकि वह सुविधा की है और उसमें सुख है, वह पीढ़ी कोई परिवर्तन नहीं कर सकती. ऐसे युवक हैं, जो क्रांतिकारिता का नाटक बहुत करते हैं, पर दहेज भरपूर लेते हैं. कारण बताते हैं- मैं तो दहेज को ठोकर मारता हूं, पर पिताजी के सामने झुकना पड़ा. यदि युवकों के पास दिशा हो, विचारधारा हो, संकल्पशीलता हो, संगठित संघर्ष हो तो वे परिवर्तन ला सकते हैं.

पर मैं देख रहा हूं एक नई पीढ़ी अपने से ऊपर की पीढ़ी से अधिक जड़ और दकियानूस हो गई है. यह शायद हताशा से उत्पन्न भाग्यवाद के कारण हुआ है. अपने पिता से अधिक तत्ववादी, बुनियादपरस्त (फंडामेंटलिस्ट) लड़का है.

दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है. इसका उपयोग खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं. इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया. यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है. यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उन्माद और तनाव पैदा कर दे. फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं. यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है. हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है. इसका उपयोग भी हो रहा है. आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है.

एक रंग यह भी… – अखिलेश मिश्रा

अखिलेश मिश्रा


सच कहता हूँ! मैंने अपने पच्चीस साल की नौकरी के कार्यकाल में कभी विभाग का काम नहीं किया है। जब मैं जूनियर था, तब मेरा काम मेरे वरिष्ठ करते थे और आज जब मैं वरिष्ठ अफसर हो गया हूँ तो मेरा काम मेरे जूनियर करते हैं। मैं यह सब इसलिए बता रहा हूँ कि इनसान जैसा चाह ले, उस तरीके से वह जी सकता है। बस आपको अपने कर्म का रास्ता लक्ष्य के अनुसार चुनना पड़ेगा। आज बहुत से लोग काम… काम… काम चिल्लाते रहते हैं, जैसे देश का सारा बोझ यही उठाए फिर रहें हों। यह सब भटके हुए लोग हैं। मैं तो बिंदास जीता हूँ और ऐसा भी नहीं है कि मेरे वरिष्ठ या कनिष्ठ लोग हमेशा मुझसे नाराज ही रहे हों। ज्यादातर परिस्थितियों में यह लोग मुझसे खुश ही रहा करते हैं। मैं अकेला अफसर था जो अपने बॉस की बीवी के साथ डांस करता था और गाना गाता था। बॉस वहीं खड़े मुस्कुराते रहते थे। आज भी मौके के अनुसार यही करता हूँ, पर अब उम्र का लिहाज करना पड़ता है… हा! …हा! …वैसे मैं साला कभी बूढ़ा ही नहीं होऊँगा, पर दुनिया यह थोड़ी जानती समझती है …हा! …हा! …हा! मेरी ज्यादातर सीआर एक्सेलेंट है। सारे प्रमोशन मुझे समय पर मिले हैं। मेरे कई कनिष्ठ मेरी लापरवाही के कारण बड़े-बड़े विजिलेन्स केस में फँस गए पर उन्हें कभी अपनी वफादारी में पश्चाताप नहीं हुआ। मेरे कई कर्मचारी आज मुझे भगवान की तरह पूजते हैं। कई तो सुबह आठ बजे मेरे घर आ जाते हैं और फिर रात दस बजे तक मेरे ही साथ रहते हैं। यह लोग अपने बाप की उतनी इज्जत नहीं करते हैं, जितनी कि मेरी करते हैं। यह सब अपने माँ, बाप और बीवी को छोड़ सकते हैं पर मुझे नहीं।मैं यह सब बातें अपने साथ विभाग में काम करने वालों को और दूसरे अन्य लोगों को भी अक्सर बताता हूँ… बड़े फक्र के साथ! अपना यह गुण मुझे बहुत ही विलक्षण प्रतिभा वाला लगता है। मैं इसे कामचोरी बिलकुल नहीं मानता… जैसे कि मुझसे चिढ़ने वाले लोग कहते हैं, पीठ पीछे। इस काम के लिए भी बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ती है… अन्य विभागीय कार्यों से कई गुना ज्यादा कड़ी मेहनत! यह गुण भगवान सबको नहीं देता है।

मैं कोई भी बात गलत नहीं कह रहा हूँ… आप खुद ही सोचकर देख लीजिए। विभाग का काम भले ही मैं नहीं करता हूँ पर तब भी मेरे पास कभी भी एक मिनट का खाली समय नहीं रहता है। मुझे कोई आलसी नहीं कह सकता है… और न ही कामचोर! मेरे जैसे लोग और आलसी में बड़ा फर्क होता है। आलसी हर काम में सुस्त होता है जबकि मेरे जैसे लोग अपना स्वार्थ देखकर काम करते हैं। जहाँ स्वार्थ होता है, वहाँ हम लोग अर्थात मेरे जैसे अन्य लोग अपनी सारी ऊर्जा लगा देते हैं। हम लोग परिस्थिति के अनुसार अपने आप को बड़ी तेजी से बदल लेते हैं। हम आलसी की तरह हाथ मलते नहीं बैठे रहते हैं। आलसी से लक्ष्मी दूर भागती है जबकि मैं लक्ष्मी की पूजा करता हूँ इसीलिए लक्ष्मी भी मुझको आशीर्वाद देती है। कुछ खास परिस्थितियों में हमारे जैसे लोग बहुत आकर्षण व्यक्तित्व वाले इनसान के रूप में जाने जाते हैं। मेरे जैसी सोच वाले कई लोग सर्वोच्च पद की शोभा बढ़ाकर रिटायर होते हैं, बल्कि आजकल तो आधे से ज्यादा लोग इसी रास्ते पर चलकर आगे बढ़ रहे हैं।

मेरा चैंबर बहुत बड़ा है। मैंने अपने चैंबर की दीवाल में एक बड़ा सा दर्पण लगवाया हुआ है। मैं लगभग अपनी हर पोस्टिंग में चैंबर में दर्पण जरूर लगवाता हूँ। इसमें मैं अपने चेहरे को देखता रहता हूँ। चेहरे में हमेशा ताजगी दिखनी चाहिए। भले ही आप दिनभर मेहनत करते हों, लेकिन यदि आप थके हारे दिखेंगे तो कोई आपको पसंद नहीं करेगा। इसीलिए घिस्सू लोगों को काम निकल जाने के बाद कोई नहीं पूछता है। मैं अपने चैंबर को बहुत सजाकर रखता हूँ। अपने पास आनेवाली फाइलों को मैं एक आलमारी में बंद कर देता हूँ अन्यथा अपने नीचेवालों को मार्क कर देता हूँ। कुछ फाइलों की जरूरत पड़ने पर मैं हत्या भी कर देता हूँ… सदा के लिए… सच कह रहा हूँ! जो करता हूँ …वह बता रहा हूँ।

मैं अपने चैंबर में आनेवाले हर अधिकारी और कर्मचारी का आवभगत बहुत लगन से करता हूँ। मेरा मानना है कि यह सभी अफसरों और कर्मचारियों को करना चाहिए। चाय, काफी, बिसकुट, कोल्डड्रिंक, सिगरैट… अलग-अलग व्यक्ति के साथ अलग खातिरदारी! यह हमारी सभ्यता का हिस्सा रहा है… भारतीय संस्कृति और सभ्यता… अतिथि देवो भव!

मैं चैंबर में बहुत कम समय के लिए ही बैठता हूँ, …मुश्किल से दो घंटे के लिए! मेरा काम जल्दी ही निपट जाता है। फालतू किस्म के काम मैं करता नहीं हूँ और दुनिया को दिखाने के लिए आठ घंटे कुर्सी तोड़ना मेरे सिद्धांतों के खिलाफ है।

बहुत से लोग अपनी कुर्सी के प्रति, सिस्टम के प्रति वफादार रहते हैं पर मैं तो मानता हूँ कि कर्मचारी, अफसर को अपने बॉस के प्रति वफादार रहना चाहिए। बॉस भी तो इसी सिस्टम का हिस्सा है। मैंने तो इसी सिद्धांत पर काम किया है। मेरा बॉस यदि हँसता मुसकुराता रहता है, तो मैं समझ जाता हूँ कि मेरा सिस्टम बढ़िया चल रहा है। यही उम्मीद मैं अपने कनिष्ठों से करता हूँ। कोई कर्मचारी भले ही रात दिन सिस्टम के लिए मेहनत करे पर यदि वह मुझे खुश नहीं रख पाता है तो मैं उसे कैसे अच्छा कर्मचारी मान सकता हूँ? आप ही बताइए? मेरे हाथों से वह कभी भी उत्कृष्ठ सीआर नहीं पा सकता है। सच कह रहा हूँ! हम लोग बॉस के लिए काम करते हैं, सिस्टम के लिए नहीं! सिस्टम को हमें बॉस के भरोसे छोड़ देना चाहिए। मुझे परेशानी सिर्फ तभी होती है जब कोई खड़ूस प्रकृति का बड़ा अफसर आ जाता है। ऐसे लोग किसी भी प्रकार की सेवा नहीं चाहते हैं। यह रात-दिन सिस्टम की भलाई के लिए कोल्हू के बैल की तरह लगे रहते हैं। इन्हें लगता है मानो इनका जन्म सिस्टम को सुधारने के लिए ही हुआ है। ऐसे बॉस के साथ मुझे तकलीफ होती है। यह बेहद नीरस लोग होते हैं। बल्कि मैं कहता हूँ कि यह लोग नालायक होते हैं। यद्यपि मुझे अपने वरिष्ठों के लिए ऐसे क्रूर शब्द आप लोगों के सामने नहीं कहने चाहिए। यदि किसी को बुरा लगा हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। मैं आप किसी को भी नाराज नहीं करना चाहता, बिना मतलब के!

जैसा कि मैंने पहले कहा, …मैं आज तक अपनी कुर्सी में कभी भी दो घंटे से ज्यादा नहीं बैठा हूँ। मैं दिनभर कुर्सी में बैठ ही नहीं सकता हूँ। मेरे पास और भी बहुत से काम रहते हैं। मनुष्य का जीवन एक बार मिला है। जीवन के विभिन्न आयामों पर ध्यान देना चाहिए। बड़े-बड़े सुधारक, ईमानदार, मेहनती लोग मरते हैं तो उनकी अर्थी में दस-बीस से ज्यादा लोग नहीं शामिल होते हैं पर मैंने इतनी जान पहचान बना ली है कि मेरे मरने पर कम से कम हजार पाँच सौ लोग तो आएँगे ही! मैंने इसी नौकरी में रहते हुए कइयों का भला किया है। सही तरीके से भला किया या गलत तरीके से, मैं इसे महत्व की चीज नहीं मानता। हर आदमी के लिए सही या गलत का पैमाना अलग-अलग होता है। नियम कानून बनाने वाले भी तो आखिर हम लोग ही हैं। किसी न किसी का फायदा तो होता ही है! आप ही बताइए दूसरे की मदद करना परहित होता है कि नहीं? अब मान लीजिए मैंने दफ्तर का कंप्यूटर उठा कर अपने किसी रिश्तेदार को दे दिया… रिश्तेदार के बच्चे उस कंप्यूटर में काम करेंगे… उससे कुछ सीखेंगे तो इससे देश का एक नागरिक आइटी में शिक्षित हुआ कि नहीं? बताइए? आखिर देश का तो फायदा ही हुआ और वैसे भी सब कुछ देश की ही तो संपत्ति है। देश की संपत्ति पर सबका अधिकार है। मैंने विभाग से पाँच लैपटाप इशू कराए हैं और सबको मैंने अपने परिचितों में बाँट दिया है। जब यह किसी काम के नहीं रह जाएँगे तो इन्हें वापस कर दूँगा। इनके बदले में पाँच नए लैपटाप खरीदूँगा और फिर से इन्हें अपने परिचितों में बाँट दूँगा। बड़े पद पर पहुँच कर यदि हम अपने किसी भी नात, रिश्तेदार या दोस्त, भाई का भला नहीं कर सके तो धिक्कार है ऐसी कुर्सी को और उस पर बैठने वाले स्वार्थी अफसर को! मैं इनको स्वार्थी इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह लोग सिर्फ अपने लिए ही सोचते और जीते हैं। यह लोग अपने को बचाने के लिए नियम कानून से डरते हैं।

भई! …यदि आप अपनों का भला नहीं कर सकते, तो देश का भला कैसे करेंगे? भलाई के संस्कार अपने घर परिवार, नात-रिशतेदारों से ही शुरू होते हैं। मैं यदि कुछ गलत कह रहा हूँ, तो आप टोक दीजिएगा!

मेरे घरवालों ने मेरा नाम मेरे स्वभाव के अनुसार ही रखा है, रंगीला प्रसाद! मेरा जैसा नाम है, मैं बिलकुल वैसा ही हूँ… बड़ा ही बाँका! …बड़ा ही रंगीला! …बड़ा ही नटखट! …बड़ा ही छैल छबीला! नाचना, गाना, घूमना फिरना मुझे बहुत भाता है। मुझे किसी भी चीज का बंधन पसंद नहीं है। मुझे कोई बाँधकर नहीं रख सकता। चाहे यह बंधन कर्तव्य का हो… समय का हो…, कुर्सी का हो या यहाँ तक कि रिश्ते-नातों का हो! मैं सबसे मुक्त हूँ। राज की बात बताता हूँ, मेरी बीवी भी मुझे बाँधकर नहीं रख पाती है।

मेरे अंदर ऊर्जा का प्रचुर भंडार है। मैं कभी थकता नहीं हूँ। मैं स्थिर होकर एक जगह बैठ नहीं सकता हूँ। विभाग में कुछ पार्टी करनी हो तो इसकी जिम्मेदारी मुझे ही सौंपी जाती है। विभाग में जब भी कोई नया बड़ा अफसर आनेवाला होता है तो मैं उस अफसर और उसके परिवार का सारा बायोडाटा अपने लैपटाप में कैद कर लेता हूँ। मैं पहले बॉस को खुश करने की कोशिश करता हूँ और फिर मैडम को। जिस तरह से भी यह दोनों प्राणी खुश रह सकें, मैं उसी उपाय में लगा रहता हूँ। जब बॉस और मैडम दोनों थोड़ा कड़क स्वभाव के और नियम कानून से चलने वाले होते हैं तब मैं एकात्म में खो जाता हूँ। जिस तरह कछुआ अपने हाथ पैर को अपने अंदर ही समेटकर दुबक जाता है, वैसे ही मैं भी शांत हो जाता हूँ। इस उम्मीद के साथ कि अपना कार्यकाल पूरा करके यह साहब एक दिन चले जाएँगे और फिर मेरे ही स्वभाव से मिलते जुलते कोई नए अफसर आएँगे। हर निशा के बाद आखिर नया सबेरा तो होता ही है।

जब भी कोई कड़क अफसर मुझे काम के लिए कहता है तो मैं उसे अपनी कोई न कोई परेशानी बता देता हूँ। मैं बड़े ही दीन भावना के साथ कहानी सुनाता हूँ। अच्छा इनसान स्वभावतः दयालु और परोपकारी होता है। बड़े अफसर भी मेरी कहानी को सच मानकर और मेरी वरिष्ठता का खयाल रखकर मुझे खुला छोड़ देते हैं। मैंने हर प्रकार के इनसान के गुण, अवगुण रट रखे हैं। मौका देखकर मैं इन्हें उपयोग में लाता हूँ। रंग बदलने में मैं गिरगिट को भी मात दे सकता हूँ। मैं पानी की तरह हूँ, जिसमें हर रंग घुल जाता है। मुझे यह सब बताने में कोई संकोच नहीं होता है, क्योंकि मैं ऐसा ही हूँ और अपने को विलक्षण प्रतिभा वाला मानता हूँ।

जो लोग रात दिन लगे रहते हैं अपनी क्षमता दिखाने में, उन्हें मैं महा मूरख मानता हूँ। हो सकता है कि वह लोग मेरे बारे में भी ऐसी ही राय रखते हों। लेकिन कोई मेरे बारे में कैसी राय रखता है, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर आप मुझे बेशरम मत समझ लीजिएगा… हा! …हा! …हा!

आजकल मेरे बड़े अफसर ईमानदार और नियम कानून से चलने वाले हैं। वह सज्जन और बहुत ही सीधे-साधे स्वभाव के हैं। मैं इनके साथ बड़ी ही विनम्रता से पेश आता हूँ। आजकल मैं दफ्तर भी दो-दो घंटे के लिए दो बार जाता हूँ। सामान्यतः मैं हमेशा एक हाफ में दो घंटे के लिए ही दफ्तर जाता हूँ, …और कभी-कभी तो दफ्तर जाता भी नहीं हूँ। वरिष्ठता को देखते हुए मुझे अक्सर ही कुछ छूट मिल जाती है …और मिले भी क्यों नहीं? बड़े साहब का स्वभाव ऐसा है कि वह किसी की बुराई सुनना पसंद नहीं करते हैं और इस वजह से उनको मेरे बारे में पूरी सच्चाई पता नहीं चल पाती है। यहाँ भी अपना फायदा ही हो रहा है …हा! …हा! …हा! मैंने भी अपने ऊपर एक बड़े सज्जन इनसान का चोला डाला हुआ है… पता नहीं कब तक जीना पड़ेगा, इस चोले के साथ। बोर हो रहा हूँ मैं! मेरी पूरी टीम भी अभी शांत है। हम सब लोग स्थितिप्रज्ञ अवस्था में पहुँच गए हैं।

अपने जैसे स्वभाव के लोगों की एक टीम बना रखी है, हम लोगों ने!

मेरे ही दफ्तर में एक कनिष्ठ अधिकारी अनुराग सिंह भी है। वह भी बड़े साहब की तरह नियम से चलने वाला और थोड़ा कड़क मिजाज का है। मूर्ख है साला! उसे यह नहीं मालूम है कि नियम कानून वरिष्ठों के ऊपर नहीं बल्कि कनिष्ठों के ऊपर चलाए जाते हैं। मेरी वरिष्ठता का उसे बिलकुल भी खयाल नहीं है… नालायक कहीं का! अनुराग मेरी सलाह और माँगों को नहीं मानता है। मैं उससे कुछ भी फायदा नहीं उठा पाता हूँ। मेरी टीम के कुछ साथियों को अनुराग ने अपने तरीके से ठीक करने कि कोशिश की है। मेरे टीम के साथी तो बहुत ही सीधे-साधे स्वामिभक्त कर्मचारी हैं, उन्हें क्या सुधारना? एक बार सेवा का मौका तो दो… तब पता चलेगा कि वह कौन सी प्रजाति के हीरे हैं। हर कोई दफ्तर का घिस्सू नहीं हो सकता है। सबमें अलग-अलग प्रतिभा होती है। मैं मन ही मन अनुराग से बहुत नाराज हूँ, पर बड़े साहब का अनुराग के प्रति स्नेह देखकर फिलहाल चुप हूँ। मैं उस सुबह का इंतजार कर रहा हूँ, जब बड़े साहब अपने सामान के साथ नई जगह ज्वाइन करने जाएँगे… तब मैं देखूँगा इस नालायक अनुराग को! …ब्लडी ईडियट को!

मुझे पता है कि समय चलता है और चलने के साथ-साथ यह बदलता भी रहता है। गृह नक्षत्र भी बदलते रहते हैं। इन्हीं के साथ इनसान की परिस्थितियाँ भी बदलती है। यह सब जरूरी होता है, गुण-दोष को परखने के लिए। सुबह, दोपहर, शाम, रात सबका अपना महत्व है। सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ही गुण, दोष इस दुनिया में रहे हैं और श्रष्टि के अंत तक यह रहेंगे। इनकी मात्रा में जरूर थोड़ा बहुत परिवर्तन होता रहता है। मेरे जैसे गुणी लोगों को हमेशा दबाकर नहीं रखा जा सकता है।

मेरे भी दिन अब बदलने वाले हैं। मेरी शुक्र की शुभ दशा आने वाली है। ज्योतिषियों ने मुझे अच्छे दिन के लिए तैयार हो जाने के लिए कह दिया है। शुक्र मेरी कुंडली में बारहवें घर में बैठा हुआ है और यह शुक्र की अच्छी जगह मानी जाती है। मैं बहुत खुश हूँ, भविष्य के बारे में सोचकर!

शुक्र की दशा… धन, नाम, ऐश्वर्य की दशा! मैं अपनी खुशी को दबा नहीं पा रहा हूँ। कहीं मैं पागल न हो जाऊँ, खुशी के मारे!

लीजिए बड़ी जल्दी ही मेरे शुभ दिनों की शुरुआत भी हो गई है। बड़े साहब का तबादला हो गया है। यद्यपि बड़े साहब ने मेरा कभी कोई नुकसान नहीं किया पर तब भी उनके समय में, मैं अपने कोई भी काम नहीं करवा पा रहा था। इस वजह से मैं उनके जाने से मन ही मन बहुत खुश हूँ। दूसरी अच्छी बात यह है कि बड़े साहब के रूप में श्री दलाई साहब आ रहे हैं जो मेरे स्वभाव से पूरी तरह तो नहीं मिलते हैं पर सेवा और चापलूसी उन्हें भी बहुत पसंद है। मैंने दलाई साहब की पसंद, नापसंद की जानकारी पहले से ही ले लिया है। मैं शुरू से ही दलाई साहब को अपनी गिरफ्त में लेने का काम चालू कर दूँगा। मैंने अपनी सेना को दलाई साहब के शानदार स्वागत के लिए तैयारी करने के लिए कह दिया है। ऐसा स्वागत होगा कि दलाई साहब इसे जीवन भर याद रखेंगे। मेरी पूरी सेना तैयारी में लग गई है।

एक बड़े होटल में शानदार कार्यक्रम का आयोजन किया गया। दलाई साहब को उनके सम्मान में रखी हुई पार्टियाँ बहुत पसंद आती हैं। मैंने भी एक स्वागत गीत गाया। इसे मैंने खुद ही लिखा है।

‘आए हैं आज जगत के नंदन, स्वागत करो दीप जला के रे!

अब जाने का नाम मत लेना, स्वागत करो दीप जला के रे!

बड़े दिनों के बाद, अब अच्छा समय आया है रे!

स्वागत करो पूरे दिल से, जाने मत देना इस पल को रे!

झूम के नाचो, झूम के गाओ, आज इस पल में रे!

आए हैं आज जगत के नंदन, स्वागत करो दीप जला के रे!’

इस स्वरचित स्वागत गीत के बाद मैंने एक फिल्मी गीत भी गाया था।

‘तुम आ गए हो… नूर आ गया है!’

आज मैं बहुत ही खुश हूँ। मेरे शरीर की ऊर्जा अब उबाल बनकर बाहर छलकना चाहती है। मेरी पूरी सेना भी अब अपने रंग में आ गई है। जैसा मैंने पहले बताया ही है कि मैंने अपने स्वभाव से मिलते जुलते लोगों की एक सेना बनाई हुई है। यह लोग विभाग का काम छोड़कर बाकी दुनिया के सारे काम करते हैं। इन्हीं लोगों के सहारे मैं अपना जलवा मैंटेन करता हूँ। इन लोगों के हितों की जिम्मेदारी मैं अपने दोनों कंधों से ढोता हूँ। मैं इन सबका हूँ और यह सब मेरे हैं। जिन अफसरों ने मेरी रंगीला सेना के सदस्यों को विभाग का काम नहीं करने के कारण प्रताड़ित किया था, अब मैं उनको सबक सिखाना चाहता हूँ। इस सूची में पहला नाम अनुराग सिंह का है। अनुराग ने मेरे कई साथियों की तनख्वाह काटी है, क्योंकि यह बेचारे लोग अपने घर के काम के कारण दफ्तर नहीं आ पाते थे। मेरे खौफ के कारण ऐसी गुस्ताखी कोई अफसर करता नहीं है पर यह अनुराग साला हीरो बनता है। रानाडे भी अनुराग के ही साथ का है पर वह कितना सीधा है, कितना विनम्र है। अपने अफसरों से इतना डरता है कि यदि वह उसे जोर से डाँट देंगे तो वह बेचारा सू-सू कर देगा पैंट में ही। आखिर क्यों डरता है रानाडे ? …सी आर के लिए! …प्रमोशन के लिए …पोस्टिंग के लिए …डरना भी चाहिए। आज के युग में ऐसे विनम्र लोग ही सफल होते हैं। अनुराग इनसे सबक नहीं लेता है।

उतारता हूँ हीरोगीरी अब सबकी!

‘सर अब हमें बदला लेना चाहिए।’ सभी कामचोरों ने रंगीला साहब से कहा।

‘जरूर!’

‘सर! अनुराग साहब विभाग को अपने बाप की पूँजी समझते हैं। मैं एक हाफ दफ्तर नहीं आता था तो उन्होने मेरी तनख्वाह ही कटवा दिया। मेरे अपने पैसे डूब गए।’

‘यह तो अन्याय है। हम सरकारी नौकरी में हैं। मुझे पता है कि तुम आधे समय अपनी आटा चक्की में बैठते हो!’

‘सर! सभी के घर में कुछ न कुछ काम तो होता ही है?’

‘क्यों नहीं? मैं खुद दफ्तर में कभी दो घंटे से ज्यादा नहीं बैठता हूँ। भाई यह सरकारी संस्था है, किसी के बाप की नहीं है!’

‘सर, दलाई साहब को बोलकर पहले अनुराग सिंह का तबादला कराइए। बाकी से बाद में निपटते हैं।’

‘चिंता मत करो! मैं मौके की तलाश कर रहा हूँ। ऐसे समय तबादला करवाऊँगा जब उसको सबसे ज्यादा परेशानी होगी।’

‘मतलब?’

‘मतलब, अक्टूबर महीने में तबादला करने से वह अपने परिवार को साथ नहीं ले जा पाएगा। इससे वह और उसका परिवार दोनों परेशान रहेंगे।’

‘सर! यू आर जीनियस!’

‘तो, अभी तक तुम लोग मुझे क्या समझ रहे थे?’

‘सर आप हमारे डॉन थे, डॉन हैं और हमेशा रहेंगे।’

मैं यह सुनकर बहुत खुश हो गया हूँ… सच में। मुझे अपने आप को डॉन कहलवाना बहुत पसंद है। मैं तो साला गलती से अफसर बन गया, …वास्तव में मुझे डॉन ही बनना था!

खैर! अच्छा हुआ कि कई लोगों का जीवन बच गया… हा! …हा! …हा! आज जितने डॉन हैं, उन्हीं से दुनिया परेशान है।

मजाक छोडकर अब काम की बात में आता हूँ। मैंने दो सूची बनाई हुई है। एक में वह लोग हैं, जिनसे मुझको बदला लेना है और दूसरी में वह नाम हैं जिनको मैं फायदा पहुँचाना चाहता हूँ। मेरी सोच बड़ी स्पष्ट हैं, यह तो आप अब तक समझ ही गए होंगे। अपने काम करवाने के लिए मुझे दलाई साहब की जमकर चापलूसी करनी पड़ेगी। चापलूसी की सारी हदें भी मुझे पार करनी पड़ी तो मैं करूँगा पर अपने काम करवाकर रहूँगा। मैं जो चाह लेता हूँ, वह करके रहता हूँ।

कल ही एक मीटिंग होने वाली है। उसी में मैं दलाई साहब को दाल मखानी वाला तड़का लगा देता हूँ। आप हँसिए नहीं… यह मेरा कर्तव्य है और काम करने का अपना तरीका है।

मीटिंग में मैंने दलाई साहब के बारे में बोलना चालू कर दिया है, ‘दलाई साहब जैसे अफसर कभी-कभी पैदा होते हैं। यह लोग समाज की धुरी हैं। यह अफसर नहीं बल्कि एक इंस्टीटूसन हैं। ज्ञान और अनुभव की गंगा हैं। इन पर शोध होना चाहिए। हमारे लिए यह गर्व की बात हैं, कि इतना महान आदमी हमारे मुखिया के रूप में यहाँ हैं। हम लोगों को इनसे बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। मैंने तो सोच लिया है कि जितना ज्ञान मैंने अपने पिता और शिक्षकों से नहीं प्राप्त किया है, उससे कहीं ज्यादा ज्ञान मैं आदरणीय, पूज्यनीय, वंदनीय श्री दलाई साहब से प्राप्त करने की कोशिश करूँगा। मैं कह रहा हूँ कि कोशिश करूँगा क्योंकि दलाई साहब सागर हैं और मैं इस सागर की एक बूँद। मैं कोशिश करके जितना भी सीख पाऊँगा, मेरे लिए वह ही बहुत है। मैं उनके चरण कमलों के प्रति सदैव नतमस्तक रहूँ, यही मेरे लिए भाग्य की बात होगी।’

मैं बोलते समय दलाई साहब की तरफ बीच-बीच में देख रहा हूँ। मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि दलाई साहब का सीना फूलकर चौड़ा हो गया है और वह इधर-उधर देख रहे हैं। वह बहुत भावुक हो गए हैं और उनकी आँखों में स्पष्ट तरलता देखी जा सकती है।

प्रशंसा हर किसी को अच्छी लगती है। भगवान को भी अपनी स्तुति अच्छी लगती है फिर दलाई साहब को प्रशंसा क्यों अच्छी नहीं लगेगी? मैंने भगवान का उदाहरण इसलिए लिया जिससे आप अपनी सीमा के अंदर आ जाएँ, अन्यथा आप मुझे चापलूस समझेगें और मेरे ऊपर दाँत निपोरकर हँसेंगे।

मेरी तकनीक काम कर गई है। दलाई साहब मुझ पर बहुत अधिक विश्वास करने लगे हैं। वह अपने हर निर्णय में मुझसे राय मशविरा जरूर करते हैं। हर मीटिंग और अन्य मौकों पर वह मेरी जमकर तारीफ भी करते हैं। विश्वास एक ऐसी चीज होती है जो अपने आप बहुत जल्दी आ जाती है, चाहकर इसे नहीं पाया जा सकता। लेकिन मुझे इसे पाने के सारे तरीके पता हैं।

अब मुझे अपने काम करवाने हैं। किसी दिन मौका देखकर, थोड़ा उदास होकर दलाई साहब के पास जाता हूँ। एक्टिंग करने में तो कोई मुझसे आगे हो ही नहीं सकता। न जाने कितनी बार अपने माँ बाप को धोखा दिया है। जब मैं अपने माँ बाप को, जिन्होने मुझे जन्म दिया है, धोखा दे सकता हूँ फिर बॉस किस खेत की मूली है… हेंह!

‘मे आइ कम इन सर?’

‘कम इन …कम इन …रंगीला जी! प्लीज टेक यौर सीट।’

‘धन्यवाद सर!’

‘क्या बात है रंगीला जी! आज आप खुश नहीं दिख रहें हैं?’

‘सर! आजकल जूनियर लोग सीनियर लोगों की इज्जत नहीं करते हैं।’

‘यह बहुत ही गलत चीज है और मैं इसके सख्त खिलाफ हूँ। तुम किसकी बात कर रहे हो?’

‘सर! अनुराग मेरी बात नहीं सुनता है। उसे जरा भी लिहाज नहीं है कि मैं उससे पंद्रह साल वरिष्ठ हूँ।’

‘तुम क्या चाहते हो?’

‘सर! उसे आराम की कुर्सी में बैठा दीजिए। बहुत काम-काम चिल्लाता है।’

‘तुम जहाँ कहो, मैं उसे वहीं भेज देता हूँ।’

‘सर, यह दो सूचियाँ हैं। इन पर सब लिखा है।’

‘चलो! एक-एक करके डिस्कस कर लेते हैं।’

‘ठीक है सर!’

दलाई साहब ने जल्दी ही मेरे मन की मुराद पूरी कर दी है। यह सब साहब इतना जल्दी कर देंगे, मुझे खुद इसका अनुमान नहीं था। अनुराग का तबादला अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में कर दिया गया।

उसे साल भर हर तरीके से परेशान किया गया। अच्छा काम करने के बावजूद उसकी सीआर खराब कर दी गई है। इसी तरह एक दो और लोगों को मैंने सबक सिखाया है।

साले! …बड़े चले थे ईमानदार और मेहनती बनने! इन नालायकों को यह नहीं पता है कि दुनिया कितना आगे चली गई है।

मेरी पूरी रंगीला सेना आज बहुत खुश है। सबने मिलकर मुझे एक शानदार दावत दिया है, बड़े होटल में। मैं इसे दावत नहीं बल्कि उनका मेरे प्रति सम्मान और प्यार समझता हूँ। इस पार्टी में मैंने भी शराब का लुप्त उठाया। मैं बहुत कम मौकों पर ही पीता हूँ, आप लोग मुझे पियक्कड़ मत समझ लीजिएगा।

‘सर! दलाई साहब कब तक रहेंगे?’ दिलीप ने पूछा।

‘क्यों बे? तू उन्हें जल्दी भेजना चाहता है।’

‘सर मैं तो चाहता हूँ कि वह यहीं से रिटायर करें।’

‘तो अब दुबारा उनके जाने की बात मुँह से मत बोलना। आदमी जैसे सोचता है, वैसे ही ऊर्जा उसकी तरफ आती है।’

‘जी सर!’

‘क्या हालचाल है सोहन सिंह?’

‘सर आजकल लग रहा है कि हम सरकारी नौकरी में हैं। वरना पहले तो अनुराग साहब ने हमारा जीना मुश्किल कर दिया था।’

‘अब तुम लोग आराम से ऐश करो!’

‘सर! यू आर ग्रेट!’ राव ने कहा।

‘तुम्हें अभी पता चला?’

‘सर हम लोग आपकी काबिलियत के कायल हैं।’ राजेंद्र ने कहा।

‘अब तुम लोग अनुराग, जयप्रकाश और राकेश के बारे में तरह-तरह की बातें फैलाओ!’

‘सर! हम लोग आज से ही लग जाते हैं।’

‘इन लोगों को बिना मतलब बदनाम करो! मगर थोड़ी होशियारी से! साला मैं इस मामले में पहले से बदनाम हूँ। लोगों को पहला शक मेरे ऊपर ही होता है।’

‘आप निश्चिंत रहें सर! मैं इतना बड़ा कुत्तापन करूँगा कि यह ईमानदार लोग अपना जीवन ठीक से जीना भूल जाएँगे। आखिर आपकी दी हुई शिक्षा कब काम आएगी?’ दिलीप ने कहा।

‘साला मैं तो हमेशा से तुम्हें कमीना कुत्ता ही समझता रहा हूँ! तुम इनसान हो ही नहीं!’ यह कहकर रंगीला प्रसाद जोर का ठहाका लगाते हैं।

‘सर! चेला किसका हूँ?’ दिलीप यह कहकर रंगीला प्रसाद के साथ ठहाका लगाने लगता है।

सब कुछ अपने नियंत्रण में है। समय अच्छे से कट रहा है। कुछ लोग समझते हैं कि मैं उफनाती नदी की तरह फैल रहा हूँ। मुझे रोकने के लायक न कोई किनारा है और न ही कोई मजबूत बाँध। मेरा व्यवहार भी अब पूरी तरह बदल गया है, और क्यों नहीं बदले? विभाग के लोगों को भरोसा ही नहीं होता है कि यह वही रंगीला प्रसाद है। यद्यपि पुराने लोग मेरी इस आदत के बारे में सब जानते हैं। लोगों को मेरी चाल से अभिमान की गंध आती है, जलते हैं साले! मैं इनको जलाने के लिए ऐसा चलता हूँ मानो कोई मदमस्त हांथी चल रहा हो! मेरी फुर्ती बड़े तूफान से भी ज्यादा तेज है। मेरे ओंठों पर रहने वाली विनम्र मुस्कान, क्रोधी ऋषि की गंभीरता में बदल गई है। निष्क्रियता की जगह अति सक्रियता आ गई है। दीनता ने मानो शरमाकर मुँह ढक लिया है। विनम्र मीठी आवाज की जगह बिजली कड़कने लगी है। एक सीधा-साधा इनसान, रॉबिनहुड जैसे दिखने लगा है, जो कि मैं वास्तव में हूँ। ऊर्जा का प्रचुर भंडार तो मैं पहले से ही था। यह सब परिवर्तन मैंने जान बूझकर किए हैं। आखिर क्यों मैं अपने असली रंग में नहीं आऊँ? यह समय मेरा है… सिर्फ और सिर्फ मेरा।

बहुत कष्ट झेले हैं हमने… गुलामों की तरह रहते थे!

विभाग के सोकॉल्ड ईमानदार, मेहनती और सीधे-साधे लोग अब परदे की पीछे से चुपचाप अपना काम कर रहे हैं, गधों की तरह। उनकी आजकल कोई पूछ नहीं है। उनका मनोबल टूट रहा है। वह निराश हो रहे हैं और उन्हें निराश होना भी चाहिए। थोड़ा सा काम क्या कर देते थे, अपने आप को बड़े बहादुर समझते थे। हम लोगों को यह लोग बड़े हेय द्रष्टि से देखते थे। अब मरे सालें! आजकल सब जगह मेरा और मेरी टीम का ही बोलबाला है। सब लोग कहते हैं कि विभाग का आउटपुट गिर रहा है पर मैं इससे सहमत नहीं हूँ। मैं तो मानता हूँ कि आजकल हमारे विभाग में सच्चा समाजवाद और समता का वातावरण है। आजकल सब खुश हैं, केवल कुछ गधों को छोडकर। पर गधे तो कभी खुश हो भी नहीं सकते हैं। इनके लिए ज्यादा काम है तो परेशानी… और काम नहीं है तो भी परेशानी!

हम लोग मजे से जी रहे थे पर पता नहीं मेरे ऊपर किसकी नजर लग गई है। दलाई साहब का अचानक तबादला हो गया है। यह खुद दलाई साहब के लिए एक सदमा है। इससे पहले इतना जल्दी वह कहीं से नहीं गए थे। वह अक्सर खुश होकर कहते भी थे कि मैं जहाँ भी जाता हूँ, वहीं धूनी जमाकर बैठ जाता हूँ। मैं और मेरी पूरी सेना दुखी है। मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हम लोग किसी भी हालत में दलाई साहब को नहीं जाने देना चाहते हैं। बहुत दिनों के बाद हमारे जीवन में बहार आई थी और वह इतनी जल्दी उजड़ जाएगी, यह हमारे कल्पना से बाहर है। आज मुझे लग रहा है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता खुद नहीं है। कर्म और भाग्य दोनों पर मेरा विश्वास कम हो रहा है। कर्म का फल, इस सिद्धांत से मेरा मन उचटने लगा है।

‘आखिर हम लोगों ने क्या गलत किया था कि भगवान से हमारा थोड़ा सा जलवा देखा नहीं गया? क्या हम लोग पापी हैं? क्या हम लोग दुष्ट हैं? रंगीला साहब ने तो जीवन भर परहित ही किया है। नियम कानून को ताक पर रखकर, अनगिनत लोगों का उन्होने भला किया है। न जाने कितने आर्केस्ट्रा वाले सरकारी पैसे की मदद से बच गए, नहीं तो वह कबके बंद हो गए होते? फर्जी सर्टिफिकेट बनवाकर, न जाने कितने ही लोगों को उन्होने नौकरी में रखवाया है। अनगिनत कामचोर लोगों की सीआर सुधरवाकर, उन्होंने प्रमोशन दिलवाए हैं। यह सब और कौन कर सकता है? …सिर्फ और सिर्फ हमारे रंगीला साहब! न जाने कितने लोगों की, जिनकी नौकरी काम में नहीं आने से जा सकती थी, रंगीला साहब ने फर्जी हाजिरी लगवाकर बचाया है! वह बाबू लोगों को डाँट दपटकर खुद अपने हाथ से मस्टर भरते थे। नवीन तो एक साल दफ्तर ही नहीं आया था पर उसे पूरी तनख्वाह मिलती रही…, किसके कारण? …रंगीला साहब के कारण! ऐसे संत की खुशी भगवान से देखी नहीं जाती है। धिक्कार है ऐसे ईश्वर को!’ दिलीप यह कहकर रो रहा था, दहाड़ मार-मारकर, गले को फाड़-फाड़कर!

उसने भविष्य में किसी भी मंदिर में न घुसने कि कसम खा ली थी, हाथ में जल लेकर!

मेरा भक्त! …दिलीप! भगवान को छोड़ सकता है पर मुझे नहीं। मेरे वफादारों के सामने, कुत्ते अपनी वफादारी भूल जाएँगे।

मैं इतना जल्दी हार मानने वाला नहीं हूँ। मैं अभी दलाई साहब के पास जाता हूँ।

‘सर! हम आपको इतना जल्दी नहीं जाने देंगे।’

‘आदेश तो ऊपर से आया है। हमें तो जाना ही पड़ेगा।’

‘सर! हम लोग कोशिश तो कर लेते हैं।’

‘क्या करोगे?’

‘सर! हवन कराऊँगा, नेता मंत्री को पकड़ूँगा, साम, दान, दंड, भेद सब करूँगा!’

‘हम लोग मिलकर प्रयास करेंगे तो सफल हो सकते हैं।’

‘जरूर सर! वी विल विन!’

‘ओके!…गो अहेड बट बी केयरफुल!’

‘डोंट वरी सर एंड हैव अ कॉन्फ़िडेंस इन मी!’

मैंने अपने आप से कहा कि मेरा तो जीवन ही बीत गया है, यही सब करते हुए। मेरी पूरी सेना बहुत दुखी है। उनके अंदर मातम सा छा गया है। मैं उनको इस हालत में नहीं देख सकता। मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि उनके अंदर जान फूँकी जाए। मैंने सबको आदेश दिया है कि वह अपने-अपने क्षेत्र के नेताओं को पकड़ने की कोशिश करें। रंगीला सेना में कई ऐसे लोग हैं, जिनकी क्षेत्र के नेताओं से थोड़ी बहुत जान पहचान है। मैंने शहर के कई बड़े ज्योतिषियों को दलाई साहब की कुंडली दिखाई है। उसमें तबादला रोकने के उपाय ढूँढ़ने का प्रयास किया जा रहा है। हम ऐसे ही हार नहीं मान जाएँगे।

बहुत भटकने के बाद आखिर एक बड़े ज्योतिषी ने कुछ ऐसे उपाय बताए हैं जिससे साहब का तबादला रुकवाया जा सकता है। एक हवन करना पड़ेगा और हवन को करवाने में ग्यारह हजार रुपए का खर्चा आएगा। इतने पैसे की बात सुनकर मुझे थोड़े समय के लिए कुछ झटका तो महसूस हुआ लेकिन फिर मैंने आगे के बारे में सोचकर अपनी जेब से बारह हजार रुपए निकालकर पंडित को दे दिए।

इनवेस्टमेंट करने वाले को ही उसका फल मिलता है… आप समझ रहे हैं न! जो रिस्क ले सकता है, वही सिकंदर है।

‘पंडित जी ग्यारह हजार रुपए हवन कराने के लिए और एक हजार हवन सामग्री के लिए है। हवन शुद्ध घी से होना चाहिए।’

‘जरूर जजमान! ऐसा ही होगा!’

‘यह एक हजार और रख लीजिए… पूरे ध्यान से मंत्र पढ़िएगा।’

‘निश्चिंत रहिएगा… आपने मेरे दिमाग को पूरी तरह एकाग्र कर दिया है।’

हवन करने के बाद ही संयोग से एक नेता से भी जान पहचान निकल आई है। मैंने खुद नेता जी से बात की है और उन्होने दलाई साहब का तबादला रुकवा दिया है।

खुशी! …अपार खुशी मिली है, मेरी पूरी टीम को!

इस घटना से दलाई साहब की धाक जम गई है। मैं इस घटना को खूब प्रचारित कर रहा हूँ। गधे लोगों को छोडकर बाकी सबके बीच हमारी अच्छी धाक जम गई है। मुझे पता हैं कि आप कहेंगे कि हम लोगों ने कमजोर, निरीह, और कायर लोगों के बीच अपनी इज्जत जमा ली है। आप ऐसा ही समझ रहे हैं क्योंकि आप हमसे जलते हैं। वास्तव में हमारी पहुँच बहुत ऊपर तक है। इस तबादले को रुकवाने में हमारी कोई कचूमड़ नहीं निकली है, जैसा कि आप समझ रहे हैं।

‘रंगीला और दलाई मिलकर खूब कुर्सी का नशा भोग रहे हैं। उनके उद्देश्य विभाग की भलाई नहीं, बल्कि कुछ और हैं। रंगीला को देखकर ऐसा लग रहा है मानो कि वह कितने सालों से लक्ष्मी की उपासना कर रहा था और आज माँ लक्ष्मी ने उनको आशीर्वाद दिया है। करीब एक साल में इन दोनों ने मिलकर विभाग की ऐसी की तैसी कर दी है।’ अनुराग फोन पर यह बात पुराने साहब को बता रहा था।

अनुराग जैसे लोग समय के साथ बदल नहीं पाए हैं और इसीलिए दुखी और हारे हुए हैं।

क्या बुराई है, मेरे जीवन दर्शन में? आज कौन ज्यादा सफल है, मेहनती ईमानदार कि मैं? मैं बड़े आराम से यहाँ तक पहुँच गया हूँ। खूब ऐश किया हूँ और आगे भी करता रहूँगा। मैं क्यों बदलूँ, अपने आप को?

अब सब लोग मुझसे सफलता पाने की सलाह लिया करते हैं। जो लोग सलाह नहीं लेते हैं, उन्हें मैं अपने से ही सलाह दे देता हूँ। यद्यपि यह मेरी एक कमजोरी है। बिना माँगे सलाह नहीं देना चाहिए। जिसको नहीं सुधरना है, उसका ठेका मैंने थोड़ी लिया है। मेरी कुछ मुख्य सलाह निम्न हैं, ध्यान से पढ़िएगा –

अपने से बड़े अधिकारी की खूब सेवा करो… अच्छे महँगे होटल में खाना खिलाओ… बॉस का गुलदस्ते से अभिवादन करो… उनकी सभी जरूरतों का ध्यान रखो… फिल्म शोले के गब्बर की तरह बॉस को फॉलो करो, अर्थात बॉस हँसे तो हँसो वरना चुपचाप शांत होकर बॉस के आदेश की प्रतीक्षा करो… बॉस जब तुम्हारे मुख्यालय आए तो उसे इतनी शॉपिंग कराओ कि वह मुख्य काम भूल जाए… बॉस को बीच-बीच में घर बुलाकर खाना खिलाओ… बॉस की मैडम को खुश रखो… बॉस और उनकी मैडम का, जब भी मौका मिले दिल खोलकर तारीफ करो… इत्यादि, इत्यादि!

कई लोग मेरी सीख को अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाने लगे हैं। लोकेश तो इन सुझाओं पर बहुत अधिक चिंतन मनन करता रहता है पर उसे यह नहीं मालूम है कि इन गुणों को पाने के लिए कुछ साल तपस्या करनी पड़ेगी। रातों रात कोई भी इन पर एक्सपेर्ट नहीं हो जाएगा। वह जल्दबाजी में कुछ गड़बड़ियाँ कर देता है।

आजकल मेरी सेना में नई भर्तियाँ हो रही हैं… रोज!

समय चलता है …चलता ही रहता है …दिन बदलते हैं …स्थिति बदलती है।

आज अनुराग को अपने चैंबर में बुलाता हूँ। देखता हूँ कि मिर्च में तीखापन अभी बचा भी है कि खतम हो गया।

‘अनुराग, एक मिनट के लिए मेरे पास आओगे?’

‘सर! अभी आता हूँ।’

‘आजकल कैसे हो, अनुराग?’

‘सर! बिल्कुल ठीक ठाक!’

‘यहाँ कुछ काम धाम तो होगा नहीं?’

‘सर! थोड़ा बहुत काम तो रहता ही है। बाकी अच्छा है कि मुझे अपने लिए भी समय आराम से मिल रहा है।’

‘लेकिन तुम्हें मजा नहीं आ रहा होगा?’

‘सर! मुझे यहाँ ज्यादा आनंद आ रहा है। मैं पावर और पैसे में विश्वास नहीं करता हूँ बल्कि कर्तव्य की भावना के साथ अपनी कुर्सी से न्याय करने की कोशिश करता हूँ।’

‘तुम्हें नहीं लगता है कि इस रास्ते पर चलकर तुम जल्दी ही थक जाओगे?’

‘बिल्कुल नहीं! वैसे भी जब रास्ता कुछ ऊबड़-खाबड़ होता है, तभी पता चलता है कि इनसान चलने लायक भी है या नहीं।’

‘तुम्हारे अंदर बहुत जोश है!’

‘सर! जिसके अंदर जोश नहीं है, वह इनसान नहीं बल्कि मुरदा होता है।’

‘शाबास! तुम्हारे विचार बड़े उच्च हैं।’ रंगीला ने व्यंग्य के साथ कहा।

‘सर! आपके विचार भी तो एक अलग ही किस्म की उच्चता को दर्शाते हैं!’

‘ कैसे?’

‘सर! आप में जो क्षमता है, वह असाधारण है।’

अनुराग ने यह बातें जिस अंदाज से कही है, उससे मैं अंदर से काँप गया हूँ… सच में! मेरे दिमाग में हलचल चालू हो गई है। किसी आदमी ने पहली बार मुझे अंदर से सोचने के लिए विवश किया है। मैं अंदर से खुश भी हो गया हूँ और डर भी गया हूँ। खुश इसलिए हो गया हूँ, क्योंकि मुझे अपना भविष्य अब सुरक्षित नजर आने लगा है। मुझे ऐसा लगता है कि जब तक अनुराग जैसे कर्तव्यनिष्ठ, मेहनती, ईमानदार लोग हैं, जिन्हें कि मैं बेवकूफ कहता और मानता हूँ, तब तक मैं और मेरी सेना इसी तरह ऐश कर सकते हैं। हम लोग चाहते भी यही हैं कि हमारे अलावा बाकी सब घिस्सू रहें। लेकिन अनुराग के तेवर और बदलते समय ने मुझे यह अहसास करा दिया है कि अब कामचोरों को अपना तरीका थोड़ा सा बदलना पड़ेगा। काम तो हम लोग कर नहीं सकते हैं क्योंकि हम इसके लिए बने ही नहीं हैं, पर अब ऐसा दिखाना पड़ेगा कि हम काम कर रहे हैं। बिना दफ्तर आए, तनख्वाह लेने का समय अब गुजर गया है। अब दफ्तर में सबको आना पड़ेगा, भले ही दफ्तर में बैठकर घर का काम करें। युवा आबादी आँख मूँदकर नहीं बैठ सकती है। एक बात और, अब हम लोगों को काम करने वालों से कभी भिड़ना नहीं चाहिए वरना हारने की पूरी संभावना है। बल्कि हम लोगों को अब काम करने वालों की जमकर खुशामद करनी चाहिए जिससे हम सुखपूर्वक जीवन बिता सकें।

मैं अपनी सेना के कार्यकारणी सदस्यों की एक बैठक बुलाता हूँ जिसमें इन सारी बातों को विस्तार से बताऊँगा और अपनी सेना के नियमों में बदलाव के लिए प्रस्ताव भी रखूँगा।

‘समय के साथ बदलना ही जीवन है। हम लोगों को अपनी संख्या ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहिए। हम लोगों को मेहनती लोगों की प्रशंसा करनी चाहिए और सिर्फ मौके पर ही उन्हें दिमाग से हराना चाहिए जिससे हमारी आवश्यकता पूरी होती रहे। मौके से मेरा मतलब प्रोमोसन और पोस्टिंग से है। हमें अपनी टीम में सिर्फ पैदाइसी कामचोरों को ही रखना है। बनावटी और समय के साथ बदल जाने वाले कामचोरों को अपने आसपास भी नहीं फटकने देना है। आज इनसान उसी पर विश्वास करता है जो आँखों से दिखता है। सोचने, समझने का समय अब किसी के पास नहीं है अतः हम कामचोरों को भी अब अपनी कुर्सी में बैठना होगा। अपने व्यक्तिगत काम अब मोबाइल के सहारे दफ्तर से ही करना पड़ेगा। एक बात और… हम लोगों को मेहनत करते हुए दिखना है, मेहनत करने की आदत नहीं डालनी है वरना हमारी प्रजाति ही समाप्त हो जाएगी। ‘मैंने यह सब बातें अपनी कार्यकारिणी से कही।

रंगीला साहब की जय! …रंगीला साहब अमर रहे! …अफसर हमारा कैसा हो, रंगीला प्रसाद जैसा हो! …रंगीला साहब आप संघर्ष करो, हम आपके साथ हैं!

सभाकक्ष में चारो तरफ यह नारे गूँजने लगे। मैंने मुस्कुराकर अभिवादन स्वीकार किया। आज थोड़े समय के लिए मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो धरती और स्वर्ग के बीच सिर्फ और सिर्फ मैं हूँ, सच में!

सब कुछ मन के मुताबिक ही चल रहा था कि अचानक मैं जमीन पर पटक दिया गया हूँ। मैं बहुत दुखी हो गया हूँ, पर रो नहीं रहा हूँ। भगवान लगता है दलाई साहब और मुझसे, दोनों से खुश नहीं है। दलाई साहब का तबादला हो गया है। इस बार भी मैंने बहुत तरह के प्रयास किए पर मेरा कोई भी उपाय सफल नहीं हो पाया है। हवन में खर्च हुए पैसे इस बार बेकार चले गए हैं। दलाई प्रसाद को जाना पड़ा है और उनकी जगह श्री नारायण राव आ गए हैं जो बेहद कड़क मिजाज के ईमानदार अफसर के रूप में जाने जाते हैं।

यानि कि मेरे और मेरी सेना के किसी काम के नहीं हैं।

पूरी की पूरी रंगीला सेना ने अपने आप को फिर से बदल लिया है…, और कर भी क्या सकते हैं बेचारे! इन लोगों ने अपने ऊपर विनम्रता और धैर्यशीलता का एक चोला पहन लिया है। मुस्कान को लिपिस्टिक की तरह अपने ओंठों से चिपका लिया है। यह शांत इतने हो गए हैं, मानो कि स्थितिप्रज्ञ अवस्था को प्राप्त कर लिए हों। विनम्र ऐसे हो गए हैं कि मानो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को चुनौती दे रहे हों। मजबूरी में सभी के साथ यह लोग अचानक अच्छा व्यवहार करने लगे हैं। धैर्य इनके अंदर इतना आ गया है, जैसे कि वह चकवे की तरह पानी की पहली बूँदों यानि की अपने जैसे ही किसी अफसर के लिए इंतजार कर रहे हों।

इनकी यह दशा मुझसे देखी नहीं जाती है। मुझे पता है, कितनी तकलीफ होती है यह सब करने में। एक नई दुल्हन से भी ज्यादा एडजस्ट करना पड़ता है। हर नया बॉस हम लोगों के लिए नई ससुराल की तरह होता है।

दफ्तर के सभी लोग श्री दलाई साहब के जाने से बहुत खुश हैं। सब लोग समझ रहे हैं कि अब मेरा खौफ कुछ कम हो जाएगा। कुछ लोग तो यह भी मानकर चल रहे हैं कि अब मैं भी यहाँ से चला जाऊँगा। आप भी यही सोच रहें होंगे… है न? खैर! उम्मीद पर ही तो दुनिया टिकी है। सब अपने लिए ही सोचता है। सभी गधे मिलकर फिर से काम करने लगे हैं। काम तो यह पहले भी करते थे पर तब इनका मुँह फूला रहता था। सब दुखी और दबे रहते थे। अब मुस्कुराने लगे हैं, कुछ तो खिलखिलाते भी हैं।

पर लोग इस बात को न भूलें कि समय बदलता है… मैं फिर से लौट के आऊँगा, एक नए रंग के साथ क्योंकि रंगीला किसी न किसी रूप में आप सबके अंदर घात लगाए बैठा रहता है और मौका मिलते ही बाहर आ जाता है!

झूठ के नामकरण—डॉ अखिलेश बार्च

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“हाँ दादा पायलागी! कैसे हैं. . .? कल जैसे
ही दुकान के शुभारंभ का समाचार मिला मन प्रसन्न हो गया। अब आऊँगा तो लडडू ज़रूर खाऊँगा. . .सब आपकी कृपा है. . .जी हाँ जी
हाँ. . .।”

दूरभाष पर कवि – मित्र की दूर शहर में रहने वाले एक वरिष्ठ कवि से बातचीत हो रही है।
कवि मित्र बात करते समय यों झुके हुए थे, मानो चरण स्पर्श करने के बाद रीढ़ सीधी करने का समय ही नहीं मिल पा रहा हो। वास्तव में वे एक ऐसे सज्जन से बात करने में लगे थे जिनकी पहुँच पुरस्कार/चयन समितियों में अच्छी थी, और जो जुगाड़मेंट के क्षेत्र में माहिर माने जाते थे। कविमित्र को जैसे ही पता लगा कि इन सज्जन के तीसरे बेटे ने एस.टी.डी., पी.सी.ओ., फ़ोटोकॉपी की दुकान खोली है, उन्होंने तुरंत अवसर का लाभ उठाया और दूरसंचार विभाग के तारों पर सवार होकर उनके पाँव छू लिए।
बात पूरी कर मेरे पास आकर बैठते हुए बोले, “बुढ्ढ़ा बहुत खुर्राट है, पर क्या करें! साहित्य के क्षेत्र में जमना है तो ऐसे लोगों के पाँव छूने ही पड़ेंगे।” मैंने देखा उनके चेहरे पर चंद मिनटों पहले जला हुआ खुशी का बल्ब फक्क
से बुझ गया था और वे कड़कड़ा रहे थे। बाद में बड़ी देर तक तथाकथित ‘खुर्राट बुढ्ढ़े’ को गालियाँ देते रहे। मैं समझ नहीं पा रहा था कि उनकी वह खुशी वास्तविक थी या यह गुस्सा
वास्तविक है। यह तो ज़ाहिर है कि उनके कथन में कुछ न कुछ असत्य अवश्य था।

सच पूछा जाए तो जीवन में हर आदमी कभी न कभी झूठ बोलता है। झूठ की अपनी महत्ता, अपनी उपयोगिता है। सत्य बोलने वाले लोग सतयुग में भी बहुत कम रहे होंगे इसलिए तो राजा हरिश्चंद्र का ‘सत्यवादी’ होना आज तक याद किया जाता है। धर्मराज युधिष्ठिर का छदम सत्य ‘अश्वत्थामा हत: नरो वा कुंजरो वा’ पुराण प्रसिद्ध है। और तो और बहुत सारे पौराणिक पात्र तो झूठा(छदम) रूप भी धारण करते थे। गौतम ऋषि नदी। पर स्नान के लिए गए तो एक देवता ने तुरंत गौतम ऋषि का डबल रोल लिया व पहुँच गए अहिल्या के समीप।

बाकी की कथा आपको मालूम ही है। झूठ का विकास मानव सभ्यता के विकास के साथ हुआ। जब मानव असभ्य था वह सत्य के नज़दीक था, जब वह सभ्य हो गया, सत्य से दूर हो गया। अत्याधुनिक व्यक्ति अत्यधिक झूठ बोलता है। कहते हैं ‘झूठ के पाँव नहीं होते।’ शायद इसीलिए वह उड़कर कभी भी, कहीं भी पहुँच जाता है।

झूठ की व्यापकता इतनी है कि यह दुनिया के सभी देशों में अपनी जड़ें जमा चुका है। यह भी ‘बिन पग चले, सुने बिनु काना’ की स्थिति में आ गया है। एक पुराना लोकगीत है, ‘झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरियो’ जिस पर एक फ़िल्मी गीत की रचना हुई थी। मुझे आज तक किसी कौवे ने नहीं काटा, इसका मतलब यह हुआ कि या तो यह बात झूठी है या आजकल झूठों की बढ़ती ताकत को देखकर कौवों में काँटने की हिम्मत नहीं
रही। भारतीय चिंतन में ‘मनसा वाचा कर्मणा’ को बहुत महत्व दिया गया है जिसका अर्थ है – ‘जो मन में है वही कहो और जो कहा है वही करो।’ गोकुल की गोपी बिना किसी लाग लपेट के कहती है – ‘मन मोहना. . .बड़े झूठे’। आज स्थिति ठीक उल्टी हो गई है। जो मन में है उसे जुबाँ पर बिलकुल मत आने दो, और जो कह दिया वैसा तो बिल्कुल मत करो। जब कोई नेता कहता है ‘मैं पार्टी छोड़ने की बात सोच भी नहीं सकता।’ तो जनता समझ जाती है कि उसने वर्तमान पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में घुसने की जोड़–तोड़ शुरू कर दी है। या जब पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ने का खंडन करें तो जनता ताड़ जाती है कि पेट्रोल–डीज़ल महँगा होने वाला है। सुनते हैं पहले आदमी इतना सच्चा होता था कि झूठ पकड़े जाने पर उसका चेहरा फक्क हो जाता था। जब झूठ बढ़ने लगा तो झूठ पकड़ने की मशीन ईजाद की गई। आजकल तो कई लोगों ने इस मशीन पर भी उसी तरह विजय पा ली है जैसे मच्छरों ने डीडीटी पर या मलेरिया परजीवी ने ब्लड टेस्ट पर। एक समय एक विशेष प्रकार के झूठ का नामकरण भी हुआ था – सफ़ेद झूठ। इसमें व्यक्ति इतनी होशियारी से झूठ बोलता था कि उसकी शिनाख़्त ही नहीं हो पाती थी और सुनने वाला उसे पूरी तरह सच्चा समझ लेता था। ‘सफ़ेद झूठ’ ने लंबे समय तक संवादों, लेखों, कहानियों में अपना स्थान बना कर रखा।

सभी बदलने के साथ अब इस मामले में भी प्रगति हुई है। झूठ की, और झूठ बोलने वालों की नई–नई किस्में तैयार होने लगी हैं। पहले रुपहले पर्दे पर जिस अभिनय के आधार पर ‘अभिनय सम्राट’ या ‘ट्रेजेडी किंग’ की उपाधि मिलती थी वह अभिनय अब ढेरों लोग, ख़ासतौर पर, नेतागण करने लगे हैं। मिसाल के तौर पर चुनाव प्रचार के लिए निकला नेता किसी क्षण रुँधे गले से बोलता है, आँखों में आँसू भरकर ज़ार–ज़ार रोने लगता है पर कुछ ही क्षणों बाद खुशी से गदगद होकर लोगों को बधाइयाँ देने लग जाता है। एक निष्णात झूठ जो इन दिनों खूब चल रहा है उसमें नामकरण का प्रश्न भी चर्चाओं और गोष्ठियों में उठाया जा रहा है, मसलन किसी न्यूज़ चैनल पर कैमरे के सामने मौजूद पार्टी प्रवक्ता कहता है, ‘हम लोगों में कोई मतभेद नहीं हैं, इस मसले पर सभी लोग एक मत हैं।’ सारे दर्शकों को शत प्रतिशत विश्वास होता है कि उसकी बात में ज़रा-सी भी सत्यता नहीं है। पार्टी में जूतम पौज़ार चल रही है। फिर भी प्रवक्ता जी के बोलने में अद्वितीय आत्मविश्वास है। वह बार–बार कहते हैं, “पार्टी में मतभेदों की बात विरोधियों द्वारा फैलाई गई है, इनमें कोई सच्चाई नहीं है।” अब इस झूठ को आप क्या नाम देंगे? इसके सामने तो सफ़ेद झूठ भी पानी भरता प्रतीत होता है। अगले दिन वही प्रवक्ता बड़ी शान से घोषणा करता है, ‘पार्टी में
अनुशासन बनाए रखने की ख़ातिर चार लोगों को छ: वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित किया जाता है।’

विज्ञापनों की दुनिया ने ‘रेशमी झूठ’ किंवा ‘चमकीले झूठ’ को घर–घर में प्रसारित कर दिया है। बुढ़ाते लोग अपने श्वेत केशों को अश्वेत बनाने के लिए विज्ञापनी वस्तुएँ ख़रीदते हैं व खुद को जवान सिद्ध करते हैं। बालों को काला करने के जादू ने स्त्री–पुरुष सभी को सम्मोहित कर रखा है। संधिकाल में जी रही रमणियाँ, जो जवानी को जाने नहीं देना चाहतीं, अपनी त्वचा को रेशमी मुलायम बनाने के प्रसाधनों का भरपूर दोहन कर रही हैं। जन्नत की हक़ीक़त भले ही सबको मालूम हो, दिल को समझाने के लिए थोड़ी-सी लीपापोती
में बुरा क्या है? आख़िर चमकीला झूठ चमक ही बढ़ाएगा ना? सच बोलने में अक्सर ख़तरा रहता है।

चोर को चोर या भ्रष्ट को भ्रष्ट कहना कतई समझदारी नहीं है इसलिए चतुर सुजान अपनी
वाक्पटुता से बात को सत्य असत्य से परे ले जाते हैं, अपने पाँव पर कुल्हाड़ी नहीं मारते। यदि ज़रूरी ही हो तो ‘सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात’ की सुरक्षित नीति अपनाते हैं।
आंख़र, ‘राजा नंगा है’ कहने की नासमझी कोई नादान ही करता है। ऐसी ही नादानी व्यंग्यकार करता रहता है, जहाँ विसंगति देखता है तुरंत बोल पड़ता है, पर इस बारे में कुछ बोलना भी बेकार है क्योंकि यदि वह समझदार ही होता तो व्यंग्यकार क्यों बनता?

एक रोटी….पांच रूपये की! – विशाल मौर्या

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एक  रिक्शेवान अपने किसी सरकारी काम से उस सरकारी दफ्तर गया … जिसके मंजिलों सीढियों से वो भालीभाती परिचित हो चूका था … परिचित इसलिए .. अरे भाई ! कोई सात – आठ बार वहां जायेगा .. तो अपने आप दोस्ती और परिचय हो जाता है … और कभी –कभी तो ….
तीसरी मंजिल
कमरा न . ३१३
भू – अभियंता
ये तीन पंक्तियाँ उसके दिमाग में कौधने लगती थी .. जब भी वो उस लाल रंग के चार मंजिली दफ्तर के गेट से दाखिला लेता था । उसने उस फॉर्म को कस के अपनी हथेली मे पकड़ा…. और चल पड़ा अपनी मंज़िल की ओर ! उसे आज न जाने क्यूँ… उस बदरी के मौसम में एक उम्मीद की किरण नज़र आने लगी थी…पर इंद्र देवता आज बरसने को आतुर थे।
आज बारिश होय से पहले आपन कमवा होइए जाए के चाही… ऐसा सीढ़ियों पर चढ़ते हुये उसने सोचा ।
जैसे ही वो उस भू – अभियंता  के कमरे में दाखिल हुआ …. वो चौंक गया !

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सभी साहब लोग अपने काम मे मशगूल थे … मानो आज उनका 2 घंटे बाद इंतिहान हो !
फिलहाल वो अपने माथो की रेखाओं को थोड़ा आराम देते हुये … शर्मा जी के डेस्क के नजदीक पहुंचा।
“ प्रणाम साहेब “… अपनी उम्र को चुनौती देते हुये उसने शर्मा जी से कहा शर्मा जी उसके इस अभिवादन को सहर्ष स्वीकार किया ।
“हमार कमवा होइए ग्वा …. जौन…”
(उसको बीच मे ही  रोकते हुये… ) शर्माजी ने उसका फ़ार्म डेस्क पर रखते हुये  कहा “अरे हो गया भाई … निकालो  48 रुपये “
रिक्शेवान  सोचने लगा … चला … आठ बार बादे ही सही … हमरा कमवा तो होइ ग्वा …. मालती तो यूं ही बकथ है … मैं किसी काम का नही … आज बताऊँगा उसे ।
“ अरे… तू कहाँ खो गया … निकाल जल्दी 48 रुपये … आज बहुत काम है “
फिर उसने जल्दी से अपने जेब मे हाथ डाला … और अपने चार – पाँच नोटों के गट्ठर के बीच मे से 50 का नोट बाहर निकाला … जो की दिखने मे काफी भद्दा था…. पर आज काम का था ।

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शर्माजी ने लपक के नोट पकड़ा … फिर अपना सलीके से दराज खोला …. जिसमे सभी नोट बड़े व्यवस्थित ढंग से रखे थे …. 100 का नोट अलग … 500 का नोट अलग… 1 और 2 के कुछ सिक्के अलग  !
ये देखकर वो सोचने लगा … साहेब लोग कितना स्याटेमातिक ढंग से नोटवा सजाये राखात हैं … बस  स्यसटमवा ही गड़बड़ है …और मैं …..
“ ठीक है …. तुम अब जा सकते हो “ शर्मा जी ने कहा
“ साहब … हमरा 2 रूपिया “
“ अरे… जाओ यार … क्या 2 रुपये के लिए तुम भी … आजकल 2 रुपये की क्या कीमत है “
“ अगर साहेब कौनों कीमत नहीं … तो दे काही नहीं देते “ रिक्शेवान ने व्यंगवश कहा ।
“छुट्टा नही है यार … जाओ यहाँ से “
“ पर आपके दर्जवा मे तो है … हमने अभिहि देखा “
“अरे यार … तुम्हें एक बार मे समझ नहीं आता …”
“ तुम्हें किस बात की सरकार से तनख़्वाह मिलती है … ?”
“इस पागल को बाहर निकालो “ शर्माजी ने गुस्साते हुये उस गेटकीपर से कहा।
( जो कुर्सी पर बैठा -२ जम्हाई ले रहा था )
“साहेब … आप बेवकूफ हो “
“क्या ?… कह रहा है अबे तू “
“हा साहेब … आपके लूटे नही आवट … मन्नू के दुकान पे एक रोटी  5 रुपैया  के मिलत है…  2 रुपैया के नाही! आपके और लूटे के पड़ी….. आप अफसर कैसे बन गए … जरूर घूस दे के आए होंगे “

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ये सुनकर शर्माजी शर्मिंदा हो गए … अब उनका गुस्सा ठंडा हो चुका था… अब उनकी नज़रें झुकी हुयी… पर उस काँच के खिड़की पर केन्द्रित थी … मानो आज वो पूरे संसार के सार को एक पल मे समझ लेना चाहते थे…पर वो अदनी सी खिड़की सिर्फ उन्हे  मोटर, कारों, भीड़, बारिश  और कुछ बहुमंज़िली इमारतों से ही परिचय करा सकती थी ।
इस परिचय के बीच मे वो गेटकीपर रिक्शेवान को धक्के देकर बाहर कर चुका था … और वो फॉर्म…  अभी भी उस डेस्क पर पड़ा था ……शायद उस रिक्शेवान…  के इंतज़ार में ।

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नाम : विशाल मौर्या
आवासीय पता : 9/1085-86 राधा स्वामी सत्संग पार्क के नजदीक , गीता कॉलोनी, गांधीनगर , नई दिल्ली 110031
माता का नाम : सीता मौर्या
पिता का नाम : बृज भूषण मौर्या

©लिटरेचर इन इंडिया समूह

चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

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चाहता तो लेख का शीर्षक ”मैं और चूहा” रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया। इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्नी थी, तब घर में खाना बनता था। इस बीच पारिवारिक दुर्घटनाओं-बहनोई की मृत्यु आदि के कारण हम लोग बाहर रहे। इस चूहे ने अपना अधिकार मान लिया था कि मुझे खाने को इसी घर में मिलेगा। ऐसा अधिकार आदमी भी अभी तक नहीं मान पाया। चूहे ने मान लिया है। लगभग पैंतालिस दिन घर बन्द रहा। मैं तब अकेला लौटा। घर खोला, तो देखा कि चूहे ने काफी क्रॉकरी फर्श पर गिराकर फोड़ डाली है। वह खाने की तलाश में भड़भड़ाता होगा। क्रॉकरी और डिब्बों में खाना तलाशता होगा। उसे खाना नहीं मिलता होगा, तो वह पड़ोस में कहीं कुछ खा लेता होगा और जीवित रहता होगा। पर घर उसने नहीं छोड़ा।

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उसने इसी घर को अपना घर मान लिया था। जब मैं घर में घुसा, बिजली जलाई तो मैंने देखा कि वह खुशी से चहकता हुआ यहाँ से वहाँ दौड़ रहा है। वह शायद समझ गया कि अब इस घर में खाना बनेगा, डिब्बे खुलेंगे और उसकी खुराक उसे मिलेगी।
दिन-भर वह आनन्द से सारे घर में घूमता रहा। मैं देख रहा था। उसके उल्लास से मुझे अच्छा ही लगा। पर घर में खाना बनना शुरू नहीं हुआ। मैं अकेला था। बहन के यहाँ जो पास में ही रहती है, दोपहर को भोजन कर लेता। रात को देर से खाता हूँ, तो बहन डब्बा भेज देती। खाकर मैं डब्बा बन्द करके रख देता। चूहाराम निराश हो रहे थे। सोचते होंगे यह कैसा घर है। आदमी आ गया है। रोशनी भी है। पर खाना नहीं बनता। खाना बनता तो कुछ बिखरे दाने या रोटी के टुकड़े उसे मिल जाते।

मुझे एक नया अनुभव हुआ। रात को चूहा बार-बार आता और सिर की तरफ मच्छरदानी पर चढ़कर कुलबुलाता। रात में कई बार मेरी नींद टूटती मैं उसे भगाता। पर थोड़ी देर बाद वह फिर आ जाता और सिर के पास हलचल करने लगता। वह भूखा था। मगर उसे सिर और पाँव की समझ कैसे आई? वह मेरे पाँवों की तरफ गड़बड़ नहीं करता था। सीधे सिर की तरफ आता और हलचल करने लगता। एक दिन वह मच्छरदानी में घुस गया।
मैं बड़ा परेशान। क्या करूँ? इसे मारूँ और यह किसी अलमारी के नीचे मर गया, तो सड़ेगा और सारा घर दुर्गन्ध से भर जाएगा। फिर भारी अलमारी हटाकर इसे निकालना पड़ेगा। चूहा दिन-भर भड़भड़ाता और रात को मुझे तंग करता। मुझे नींद आती, मगर चूहाराम मेरे सिर के पास भड़भड़ाने लगते।

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आखिर एक दिन मुझे समझ में आया कि चूहे को खाना चाहिए। उसने इस घर को अपना घर मान लिया है। वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। वह रात को मेरे सिरहाने आकर शायद यह कहता है – ”क्यों, बे, तू आ गया है। भर-पेट खा रहा है, मगर मैं भूखा मर रहा हूँ मैं इस घर का सदस्य हूँ। मेरा भी हक है। मैं तेरी नींद हराम कर दूँगा। तब मैंने उसकी माँग पूरी करने की तरकीब निकाली।”
रात को मैंने भोजन का डब्बा खोला, तो पापड़ के कुछ टुकड़े यहाँ-वहाँ डाल दिए। चूहा कहीं से निकला और एक टुकड़ा उठाकर अलमारी के नीचे बैठकर खाने लगा। भोजन पूरा करने के बाद मैंने रोटी के कुछ टुकड़े फर्श पर बिखरा दिए।
सुबह देखा कि वह सब खा गया है। एक दिन बहन ने चावल के पापड़ भेजे। मैंने तीन-चार टुकड़े फर्श पर डाल दिए। चूहा आया, सूँघा और लौट गया। उसे चावल के पापड़ पसन्द नहीं। मैं चूहे की पसन्द से चमत्कृत रह गया। मैंने रोटी के कुछ टुकड़े डाल दिए। वह एक के बाद एक टुकड़ा लेकर जाने लगा।

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अब यह रोजमर्रा का काम हो गया। मैं डब्बा खोला, तो चूहा निकलकर देखने लगता। मैं एक-दो टुकड़े डाल देता। वह उठाकर ले जाता। पर इतने से उसकी भूख शान्त नहीं होती थी। मैं भोजन करके रोटी के टुकड़े फर्श पर डाल देता। वह रात को उन्हें खा लेता और सो जाता। इधर मैं भी चैन की नींद सोता। चूहा मेरे सिर के पास गड़बड़ नहीं करता। फिर वह कहीं से अपने एक भाई को ले आया। कहा होगा, ”चल रे, मेरे साथ उस घर में। मैंने उस रोटीवाले को तंग करके, डरा के, खाना निकलवा लिया है। चल दोनों खाएँगे। उसका बाप हमें खाने को देगा। वरना हम उसकी नींद हराम कर देंगे। हमारा हक है।”
अब दोनों चूहाराम मजें में खा रहे हैं। मगर मैं सोचता हूँ – आदमी क्या चूहे से भी बद्तर हो गया है? चूहा तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है, मेरी नींद हराम कर देता है। इस देश का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?

यह कहानी अँग्रेजी लेखक स्टीन बेक के लघु उपन्यास ऑफ मैन एण्ड माउस से अलग है।

हरिशंकर परसाई

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