सुधार – हरिशंकर परसाई

एक जनहित की संस्‍था में कुछ सदस्‍यों ने आवाज उठाई, 'संस्‍था का काम असंतोषजनक चल रहा है। इसमें बहुत सुधार होना चाहिए। संस्‍था बरबाद हो रही है। इसे डूबने से बचाना चाहिए। इसको या तो सुधारना चाहिए या भंग कर देना चाहिए। संस्‍था के अध्‍यक्ष ने पूछा कि किन-किन सदस्‍यों को असंतोष है। दस सदस्‍यों ने असंतोष व्‍यक्‍त किया। अध्‍यक्ष ने कहा, 'हमें सब लोगों का सहयोग चाहिए। सबको संतोष हो, इसी तरह हम काम करना चाहते हैं। आप दस सज्‍जन क्‍या सुधार चाहते हैं, कृपा कर बतलावें।'

Advertisements

आलसस्य परम सुखम

प्राचीन काल से ही आलस को सामाजिक और व्यक्तिगत बुराई माना जाता रहा हैं. “जो सोवत हैं, वो खोवत हैं” जैसी कहावतो के माध्यम से आलसी लोगो को धमकाने और “अलसस्य कुतो विद्या” जैसे श्लोको के ज़रिये उनको सामाजिक रूप से ज़लील करने /ताने कसने के प्रयास अनंतकाल से जारी हैं. लेकिन फिर भी आज... Continue Reading →

चरित्रवान भैंस, गर्भवती बुद्धिजीवी

एक थे सुदामा राय..जिला बलिया द्वाबा के भूमिहार,एक मेहनती किसान,एक बड़े खेतिहर. कहतें हैं उनके पास दो गाय और एक भैंस थी.. एक साँझ की बात है..राय साहेब गाय भैंस को खिला पिलाकर झाड़ू लगा रहे थे.तब तक क्षेत्र के एक प्रसिद्ध पशु व्यापारी आ धमके.. व्यापारी जी ने भैंस जी को बड़े प्यार से... Continue Reading →

बुद्धिजीवी बनने के 20 अचूक तरीके….

1-जोर जोर से नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद बोलें 2-बीच बीच में जो आपसे तर्क करे उसे मूढ़ और संघी कहें। 3-सिगरेट जलाकर दाढ़ी खुजाएं और किसी राष्ट्रीय कृति का मजाक उड़ाते हुए धुआँ छोड़ें। 4-कोई अगर कहे की "हमें अपने देश से प्रेम है" तो उसे भगवा आतंकी कहें । 5-एसी में बैठकर बीसलेरी पीते हुए... Continue Reading →

आवारा भीड़ के खतरे : हरिशंकर परसाई

एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर. इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया- पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर कांच के केस में सुंदर माॅडल खड़ी थी. एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा. कांच टूट गया. आसपास के लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया?... Continue Reading →

एक रंग यह भी… – अखिलेश मिश्रा

सच कहता हूँ! मैंने अपने पच्चीस साल की नौकरी के कार्यकाल में कभी विभाग का काम नहीं किया है। जब मैं जूनियर था, तब मेरा काम मेरे वरिष्ठ करते थे और आज जब मैं वरिष्ठ अफसर हो गया हूँ तो मेरा काम मेरे जूनियर करते हैं। मैं यह सब इसलिए बता रहा हूँ कि इनसान... Continue Reading →

झूठ के नामकरण—डॉ अखिलेश बार्च

"हाँ दादा पायलागी! कैसे हैं. . .? कल जैसे ही दुकान के शुभारंभ का समाचार मिला मन प्रसन्न हो गया। अब आऊँगा तो लडडू ज़रूर खाऊँगा. . .सब आपकी कृपा है. . .जी हाँ जी हाँ. . .।" दूरभाष पर कवि – मित्र की दूर शहर में रहने वाले एक वरिष्ठ कवि से बातचीत हो... Continue Reading →

एक रोटी….पांच रूपये की! – विशाल मौर्या

एक  रिक्शेवान अपने किसी सरकारी काम से उस सरकारी दफ्तर गया ... जिसके मंजिलों सीढियों से वो भालीभाती परिचित हो चूका था ... परिचित इसलिए .. अरे भाई ! कोई सात – आठ बार वहां जायेगा .. तो अपने आप दोस्ती और परिचय हो जाता है ... और कभी –कभी तो .... तीसरी मंजिल कमरा... Continue Reading →

चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

चाहता तो लेख का शीर्षक ''मैं और चूहा'' रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया। इस घर में... Continue Reading →

A WordPress.com Website.

Up ↑