अगस्त हो या सितम्बर, बच्चे तो मरते ही हैं

UP-Government-Hospital

गोरखपुर की त्रासदी को अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, घाव अभी भी हरा है, सांस अभी भी फूली है, दर्द अभी भी बेशुमार है; और साथ ही साथ यह भी याद है कि कैसे उपचार में हुई लापरवाही और कमिशनखोरी पर लगाम कसने में नाकाम सरकार की वजह से सैकड़ों बच्चे मार दिए गये| जी हाँ, वो बच्चे मरे नहीं, मारे गए…लेकिन योगी जी के मंत्री जी बोलते हैं कि अगस्त में बच्चे तो मरते ही हैं| खुद योगी जी कहते हैं कि अब बच्चे भी क्या सरकार पाले?

योगी जी आप बच्चे नहीं पाल सकते, बचा तो सकते है? कानून आपका, सरकार आपकी, विभाग आपका, मंत्री आपके, डॉक्टर आपके और मरीज़…बस मरीज़ आपके नहीं है…मरते हुए…सांसों में अकड़न और दर्द लिए तड़पते हुए बच्चे आपके नहीं है| होंगे भी कैसे? आपने तो पहले ही घोषणा कर दी कि बच्चे भला हम क्यों पाले!

मुझे कोई सवाल-जवाब नहीं करना है, योगी जी…मैं यूपी का निवासी हूँ…कलम का सिपाही हूँ तो लिखूंगा और हक़ से लिखूंगा| तब तक लिखूंगा, जब तक आप यह न समझ जाय कि बच्चे भले नहीं आप पाल सकते लेकिन इन कमिशनखोरों को पाल रखा है…उनपर कानून का डंडा चलाना सरकार का काम है, पुलिस का काम है|

रोटी-कपड़ा-मकान तो दूर की बात है, आपकी सरकार कृपया यह स्पष्ट कर दे कि जीने का हक़ भी है कि नहीं? या फिर जीने के लिए, उपचार के लिए भी अगस्त बीतने का इंतजार किया जाय| या फिर आप घोषणा कर दो कि अगस्त में पैदा हुए बच्चे देशद्रोही है…मर जाए तो ठीक है वर्ना आपकी पुलिस है न…वो किस दिन काम आयेगी?

तो सुनिए योगी जी| आपकी घोषणाओं की तरह आपके मंत्री जी भी गच्चा खा गए| यहाँ बच्चे सितम्बर में भी मर रहे हैं| आपके सरकारी अस्पताल लाश का गटर बन चूके हैं और आपके सरकारी डॉक्टर कमिशनखोर| आपकी पुलिस संज्ञासुन्न हो चुकी है और आपकी अगस्त क्रांति ज़ारी है| सितम्बर, शायद अक्टूबर तक…शायद गांधी जयंती तक या लाशों का अंबार लगने तक आपकी अगस्त क्रांति जारी रहेगी|

आपके मंत्री जांच करने जाते हैं तो पकवान देखकर यह भूल जाते हैं कि वो आये किस लिए थे| ‘जांच’ और ‘कार्यवाही की जाएगी’ वो दो जुमले है जो शायद आपकी सरकार की अगस्त क्रांति के लिए रामबाण हैं| आप तो अगस्त क्रांति सफ़ल बनाइये, हमारा क्या है? हम तो लिखते थे और लिखते रहेंगे|

अबकी आपकी क्रांति में उज्जवल ध्वज़ फहराने वाला विभाग है आज़मगढ़ का सरकारी महिला चिकित्सालय| जहाँ एक बच्चे के जान की कीमत है मात्र तीन हज़ार रूपये| मोदी जी से पूछकर ही बता दीजिये कि बच्चा पैदा होने से पहले खुद ही मारने की एक स्कीम लागू कर दी जाए? ख़ासकर उन ग़रीबो के लिए यह स्कीम लागू हो जिनके पास तीन हज़ार रूपये न हो…वो…जो सरकारी अस्पताल में सरकार द्वारा मदद और उपचार की आश में मुंह उठा कर चले आये हो|

भला उन्हें भी पता नहीं क्या लगा है…योगी जी खुदे कह रहे हैं कि बच्चा हम क्यों पाले तो बड़े आये बच्चे का सपना देखने| अरे मर गया तो ठीक वर्ना डॉक्टर किस लिए है? सरकार न सही, सरकारी डॉक्टर खुदे मार डालेंगे| अरे गरीब! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई योगी जी की सरकार में बच्चा पैदा करने की? वो भी अगस्त महीने में|

योगी जी कभी आइये आजमगढ़ के महिला अस्पताल में निरीक्षण करने| अभी कुछ दिन पहले उपमुख्यमंत्री केशव जी आये थे…खूब हांके मीडिया के सामने| लोगों ने जब वसूली की शिकायत की तो ऐसे आँख तरेरे कि मानो उसी दिन कमीशनखोरी का पिंडदान कर देंगे| पर डॉक्टर ने जब आपकी अगस्त क्रांति वाली बात सुनी तो लहलहा गए, मन हरिया गया उनका| उनका तो कहना है कि अगस्त ही क्यों? यह क्रांति तो सितम्बर तक चलेगी| तभी तो तीन हज़ार रूपये के लिए जाने कितने बच्चे मार डाले| परिजनों ने शिकायत की तो चले गए हड़ताल पर| सरकार-वरकार नहीं मानते यहाँ के डॉक्टर लेकिन आपकी बातों पर अमल बहुत जी-जान से कर रहे हैं|

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अमर उजाला, पत्रिका, हिंदुस्तान…कहाँ नहीं छपी कमीशनखोरी वाली ख़बर| बच्चों को मारने वाली ख़बर| बस एक आपकी पुलिस ही है जो शायद अखबार नहीं पढ़ती..अरे हाँ…आजकल तो डिजिटल का ज़माना हैं| अगर एसपी साहब अखबार पढ़ लेंगे तो आईजी साहब बुरा नहीं मान जायेंगे! भला इस ज़माने में अखबार भी कोई पढने वाली चीज़ है?

ख़बर १  ख़बर २ ख़बर ३ ख़बर ४

सूचना देने पर आपकी पुलिस कहती है कि तहरीर मिलने पर कार्यवाही होगी| परिजन जो तहरीर देते है, वो या तो रॉकेट बना कर उड़ा देती है आपकी थाना पुलिस या फिर किलो के भाव से…यही कुछ…दस-बीस रूपये तो मिल ही जाते होंगे? वैसे भी क्या करना है? तहरीर का क्या है…रोज़ आती रहती है? आईजी साहब, आजमगढ़ पुलिस के थानों में तहरीर की हरियाली ही हरियाली है| जब जवाब न हो तो ‘जांच की जा रही है’ वाला स्वर्णिम वाक्य तो है ही? नहीं भी है तो क्या हुआ? जब मंत्री जी खुदे बोले है अगस्त में तो बच्चे मरते ही है…थोड़ा और सरक कर सितम्बर तक पहुँच गया तो क्या हुआ? प्रधानमंत्री मतलब कुच्छु नहीं होता, क्रांति जारी रहनी चाहिए|

ठाकुर दीपक सिंह कवि

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बाढ़ से निपटना तो हमें सीखना ही होगा

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पूरब में असम, पश्चिम में गुजरात और दक्षिण में कर्नाटक तक बाढ़ का प्रकोप जारी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग से वर्षा की कुल मात्रा पूर्ववत रहेगी पर बारिश के पैटर्न में बदलाव आएगा। गर्म हवा में पानी धारण करने की शक्ति अधिक होती है। गर्म बादल बरसते है तो ताबड़तोड़ ज्यादा पानी गिरता है, लेकिन फिर सूखा पड़ जाता है। जैसे 120 दिन के मॉनसून में तीन दिन भारी वर्षा हो और शेष 117 दिन सूखा रहे। वर्षा के पैटर्न में इस बदलाव का हमारी खेती पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

धान की फसल को लगातार 120 दिन पानी की जरूरत होती है। उतना ही पानी तीन दिन में बरस जाए तो फसल मारी जाएगी। वर्षा के पैटर्न में बदलाव का दूसरा प्रभाव बाढ़ पर पड़ेगा। पानी धीरे-धीरे बरसता है तो वह भूमिगत ऐक्वीफरों (भूजल भंडार) में समा जाता है जैसे वर्षा का आधा पानी ऐक्वीफर में रिस गया और आधा नालों-नदियों में बहा। ताबड़तोड़ बरसने पर वह ऐक्वीफरों में नहीं रिस पाता है। पूरा पानी नालों और नदियों की ओर बहने लगता है जिससे बाढ़ आ जाती है।

सरकारी रणनीति

इस कठिन परिस्थिति का सामना करने की सरकारी रणनीति यही है कि भाखड़ा और टिहरी जैसे नए बांध बनाए जाएं, जैसे कि लखवार व्यासी तथा पंचेश्वर में प्रस्तावित हैं। पहाड़ में होने वाली वर्षा के पानी को इन डैमों में जमा कर लिया जाए। वर्षा धीरे-धीरे हो या ताबड़तोड़, इससे डैम की भंडारण क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

बाद में इस पानी का उपयोग खेती के लिए किया जा सकता है। साथ-साथ बाढ़ वाली नदियों के दोनों तटों पर तटबंध बना दिए जाएं जिससे नदी का पानी नहर की तरह अपने रास्ते चले और बाढ़ का रूप न ले। इस नीति का फेल होना तय है क्योंकि डैम में केवल पहाड़ी वर्षा का पानी रोका जा सकता है। मैदानों की ताबड़तोड़ वर्षा का पानी तो बह ही जाएगा। गंगा के कैचमेंट में पहाड़ी हिस्सा 239 हजार वर्ग किलोमीटर का है जबकि मैदानी हिस्सा इससे तीन गुना 852 हजार वर्ग किलोमीटर का है। मैदानी वर्षा के पानी का नुकसान तो होगा ही।

दूसरी समस्या है कि स्टोरेज डैमों की आयु सीमित होती है। टिहरी हाइड्रोपावर कार्पोरेशन द्वारा कराए गए दो अध्ययनों के अनुसार टिहरी झील 140 से 170 वर्षों में पूरी तरह गाद से भर जाएगी। तब इसमें पहाड़ी वर्षा के पानी का भंडारण नहीं हो सकेगा। नदी के दोनों तटों पर बनाए गए तटबंधों में भी गाद की समस्या है। नदी द्वारा तटबंधों के बीच गाद जमा कर दी जाती है। शीघ्र ही नदी का पाट ऊंचा हो जाता है। तब तटबंधों को और ऊंचा किया जाता है। कुछ समय बाद नदी अगल-बगल की जमीन से ऊपर बहने लगती है जैसे मेट्रो ट्रेन का ट्रैक जमीन से ऊपर चलता है। लेकिन तटबंधों को ऊंचा करते रहने की सीमा है। ये टूटेंगे जरूर और तब नदी का पानी झरने जैसा गिरता और फैलता है। बाढ़ और भयावह हो जाती है।

डैमों और तटबंधों से सिंचाई भी प्रभावित होती है। डैम में पानी रोक लेने से बाढ़ कम फैलती है। जब तक तटबंध टूटते नहीं, तब तक ये बाढ़ के पानी को फैलने नहीं देते हैं। बाढ़ के पानी न फैलने से भूमिगत ऐक्वीफरों में पानी नहीं रिसता है और बाद में यह सिंचाई के लिए नहीं उपलब्ध होता। चार-पांच बाढ़ झेल लेने के बाद तटबंधों के टूटने पर पानी का पुनर्भरण अवश्य होता है पर तब तक ऐक्वीफर सूख चुके होते हैं।

सिंचाई में जितनी वृद्धि डैम में पानी के भंडारण से होती है, उससे ज्यादा हानि पानी के कम पुनर्भरण से होती है। अंतिम परिणाम नकारात्मक होता है। लेकिन यह दुष्परिणाम वर्तमान में नहीं दिख रहा है, क्योंकि हम अतीत में संचित भूमिगत जल भंडारों से पानी का अति दोहन कर रहे हैं। जैसे दुकान घाटे में चल रही हो पर पुराने स्टॉक को बेच कर दुकानदार जश्न मना रहा हो, ऐसे ही हमारी सरकार बांध और तटबंध बनाकर जश्न मना रही है।

सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा अन्यथा हम सूखे और बाढ़ की दोहरी मार में डूब जाएंगे। मैदानों में ताबड़तोड़ बरसते पानी का उपयोग भूमिगत ऐक्वीफर के पुनर्भरण के लिए करना होगा। किसानों को प्रोत्साहन देकर खेतों के चारों तरफ ऊंची मेड़ बनानी होगी जिससे वर्षा का पानी खेत में टिके और भूमि में रिसे। साथ-साथ नालों में विशेष प्रकार के ‘रीचार्ज’ कुएं बनाने होंगे जिनसे पानी जमीन में डाला जाता है।

गांवों और शहरों के तालाबों को साफ करना होगा जिससे इनमें पानी इकट्टा हो और भूमि में रिसे। दूसरे, बड़े बांधों को हटाना होगा। इन बांधों की क्षमता सूई की नोक के बराबर है। जैसे टिहरी बांध मे 2.6 अरब घन मीटर पानी का भंडारण करने की क्षमता है। इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश के भूमिगत ऐक्वीफरों की क्षमता 76 अरब घन मीटर, यानी लगभग 30 गुना है। टिहरी को हटा दें और बाढ़ को फैलने दें तो टिहरी से ज्यादा पानी भूमिगत ऐक्वीफरों में समा सकता है। यूं भी टिहरी जैसे बांधों की आयु सीमित है। तीसरे, नदियों के किनारे बनाए गए सभी तटबंधों को हटा देना चाहिए।

बदले रहन-सहन

बाढ़ लाना नदी का स्वभाव है। मनुष्य बाढ़ को आत्मसात करे। उसके साथ समायोजन विकसित करे। कुछ वर्ष पहले गोरखपुर में बाढ़ का अध्ययन करने का अवसर मिला था। लोगों ने बताया कि पहले बाढ़ का पानी फैल कर पतली चादर जैसा बहता था। गांव ऊंचे स्थानों पर बसाए जाते थे और सुरक्षित रहते थे। खेतों में धान की ऐसी प्रजातियां लगाई जाती थीं जो बाढ़ में भी अच्छी उपज देती थीं। हमें बाढ़ के साथ जीने की पुरानी कला को अंगीकार करना होगा अन्यथा हम भीषण बाढ़ में डूब जाएंगे और भीषण सूखे में भूखे मरेंगे।

लेखक: भरत झुनझुनवाला।।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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जातीय आरक्षण की आग से अगर देश को बचाना है तो तमाम चीज़ों का निजीकरण ही एकमात्र रास्ता

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जातीय आरक्षण की आग से अगर देश को बचाना है तो तमाम चीज़ों का निजीकरण ही एकमात्र रास्ता शेष रह गया है । वह चाहे रेल हो , रोडवेज हो या बिजली । या कोई और उपक्रम । सरकारी उपक्रमों के निजीकरण से कई फ़ायदे होंगे । एक तो चीजें पटरी पर आ जाएंगी , भ्रष्टाचार खत्म होगा , सेवाएं सुधर जाएंगी । उदाहरण के लिए आप कुछ निजीकरण पर नज़र डालें । एयरलाईंस और मोबाईल सेवाएं न सिर्फ़ सस्ती हुई हैं , इन की सेवाएं भी बहुत सुधरी हैं । मेरा तो मानना है कि देश के सारे सरकारी प्राइमरी स्कूल भी निजी क्षेत्र में दे दिए जाने चाहिए । वैसे भी इन सरकारी स्कूलों में लोग अपने बच्चे पढ़ने के लिए नहीं भेजते । कुछ गरीब अपने बच्चे सिर्फ़ मध्यान्ह भोजन के लिए भेजते हैं । सारा जोर भोजन पर है । तो सिर्फ़ रसोइया रखिए । इतने सारे अध्यापक रखने कई क्या ज़रुरत है ।

मिसाल के लिए आप बिहार को देखिए । बिहार बोर्ड क्या पैदा करता है , गणेश और रूबी राय जैसे फर्जी टापर । लेकिन उसी बिहार में आनंद का कोचिंग आई आई टी में अपने सारे बच्चे भेज देता है । बिहार के एक गांव के बच्चे भी आगे आए हैं । तो क्या सरकारी स्कूलों के भरोसे ? देश के सारे प्राइमरी स्कूल हाथी के दांत बन कर सिर्फ़ हमारे टैक्स का पैसा चबा रहे हैं , प्रोडक्टिविटी शून्य है । यही हाल देश के सारे सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटरों का भी है । यहां डाक्टर सिर्फ़ वेतन लेते हैं , इलाज नहीं देते । अगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिर्फ़ सरकार के भरोसे रहे तो क्या कहीं कोई आ जा पाएगा ? जातीय आरक्षण ने सिर्फ़ समाज में ही आग नहीं लगाया है , देश के विकास को भी भाड़ में डाल दिया है । आप चले जाईए किसी सरकारी आफिस में । और किसी आरक्षित वर्ग के किसी अधिकारी , कर्मचारी से करवा लीजिए कोई काम । नानी याद आ जाएगी , काम लेकिन नहीं होगा । बिना रिश्वत के नहीं होगा । या पूछ लीजिए किसी सवर्ण अधिकारी या कर्मचारी से कि क्या वह आरक्षण समुदाय के लोगों से काम ले पाता है ? या यह लोग काम जानते भी हैं ? जानते भी हैं तो क्या करते भी हैं ? बहुत सारे सवाल हैं । जो हर सरकार में अनुत्तरित हैं , रहेंगे ।

आप सोचिए कि बी एस एन एल की सेवाओं का क्या आलम है । अगर बी एस एन एल की सेवाओं के बूते देश में इंटरनेट और मोबाईल सेवाएं होतीं तो देश का क्या होता । यही हाल सभी सरकारी उपक्रमों का है । और इन के खस्ताहाल होने का दो ही कारण है सरकारी होना और इस में भी आरक्षण होना । आप मत मानिए और मुझे लाख गालियां दीजिए , यह कहने के लिए , लेकिन कृपया मुझे कहने दीजिए कि जातीय आरक्षण ने देश में विकास के पहिए में जंग लगा दिया है । बस सेवाओं का निजीकरण करते समय नियामक संस्थाओं को कड़ा बनाए रखना बहुत ज़रुरी है । आप सोचिए कि स्कूल अस्पताल आदि प्राइवेट सेक्टर में न होते तो क्या होता । इन सभी सरकारी सेवाओं , स्कूलों में दुर्गति का बड़ा कारण आरक्षण है । सोचिए यह भी कि अगर प्राईवेट सेक्टर नहीं होता तो सवर्णों के बच्चे कहां पढ़ते और कहां नौकरी करते । तो क्या यह देश अब सिर्फ़ आरक्षण वर्ग के लोगों के लिए ही है । यह देश सभी समाज , सभी वर्ग के लिए है । पर दुनिया का इकलौता देश भारत है जहां पचास प्रतिशत से अधिक आरक्षण है और अब सर्वदा के लिए है ।

सरकारी नौकरियों , उपक्रमों से यह जातीय आरक्षण हटाने की हिम्मत अब किसी भी सरकार में नहीं है । सो आरक्षण खत्म करने का सिर्फ़ एक ही रास्ता है सभी उपक्रमों और सेवाओं का निजीकरण । देखिएगा तब देश के विकास की रफ़्तार चीन से भी तेज हो जाएगी । लिख कर रख लीजिए । बस एक ध्यान सर्वदा रखना पड़ेगा कि निजीकरण में संस्थाएं लूट का अड्डा नहीं बनें । उन पर पूरी सख्ती रहे । यकीन मानिए अगर ऐसा हो गया तो यह जो जातियां आरक्षण के नाम पर , उस की मांग में आए दिन देश जलाती रहती हैं , यहां वहां आग लगा कर देश की अनमोल संपत्ति नष्ट करती रहती हैं , इन पर भी अपने आप लगाम लग जाएगी । जब सब जगह प्रतिद्वंद्विता आ जाएगी तो यह लोग आरक्षण मांगना , अरे आरक्षण शब्द भूल जाएंगे । नहीं , यह लोग आरक्षण के नाम पर ऐसे ही देश को ब्लैकमेल करते रहेंगे , आग मूतते रहेंगे , देश जलाते रहेंगे । और मुफ्त की मलाई काटते रहेंगे । उठिए और जागिए । देश को तरक्की के रास्ते पर ले चलने का सपना देखिए , देश को जलने से बचाईए । देश को निजीकरण की राह पर लाईए ।

दयानंद पाण्डेय

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)

नए रोजगार देश में सिर्फ औद्योगिक उत्पादन से आ सकते हैं

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विख्यात अर्थशास्त्री एडम स्मिथ लिखते हैं कि एक भिखारी अपने समाज की कृपा पर जीता है. देश के बाकि लोग तो रोजगार करके, श्रम करके , धन अर्जित करते हैं, लेकिन सिर्फ भिखारी ही ऐसा नागरिक है जो दूसरों की उदारता पर जीता है.

18वीं शताब्दी के एडम स्मिथ के ये विचार आज के अर्थशास्त्र के सूत्र है. स्मिथ की माने तो हर हाथ को रोजगार ज़रूरी है. रोजगार नहीं तो आप एक तरह से किसी की कृपा पर निर्भर है. यानी बेरोजगार और भिखारी में ज्यादा अंतर नहीं है. अगर अंतर है भी तो बस इतना कि भिखारी , भीख मांगकर गुजारा कर सकता है पर बेरोज़गार को इतना अधिक नीचे गिरने में बार बार सोचना पड़ सकता है.

मित्रों, सोचिये. अपने आस पास के बेरोजगार भाइयों के बारे में ज़रा सोचिये. जहाँ हाथ है पर काम नहीं. काम नहीं तो कमाई नहीं. और कमाई नहीं तो जीने के लिए कोई उम्मीद भरी राह नहीं. शायद यही सब सोचकर, मानवीय आधार पर जर्मनी से लेकर नॉर्वे और जापान से लेकर इजराइल जैसे देश अपने बेरोजगार नागरिकों को भत्ता देने लगे. ये भत्ता उनके नागरिकों को भिखारी बनने नहीं देता. ये भत्ता उनके नागरिकों को कुंठित और दीन हीन होने नहीं देता. फ़िनलैंड में तो नौकरी से हटाए या छटंनी किये गए नागरिक को उसके अंतिम वेतन की 85 .1 प्रतिशत रकम तक हर महीने सरकार देती रहती है. सम्भवता यही एक आदर्श राष्ट्र की कल्पना है. यही ‘वेल्थ ऑफ़ नेशन’ है.

आइये ज़रा दलित-ब्राह्मण, कम्युनिस्ट-भाजपाई, सेक्युलर-कम्युनल, लेफ्ट-राइट से कुछ ऊपर उठकर अपने देश के उस हालात पर गौर करें जहाँ सिर्फ 54 प्रतिशत नागरिकों के पास रोज़गार है. यानी देश में 66 प्रतिशत ‘वर्किंग एज’ जनसँख्या के पास काम नहीं है. देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र बिज़नेस स्टैण्डर्ड के मुताबिक भारत में बेरोजगारी के ताजा आंकड़े और भी चिंताजनक है. समाचार पत्र का दावा है कि देश की 87 करोड़ वर्किंग एज जनसँख्या में सिर्फ 47 करोड़ ‘वर्किंग एज’ जनसँख्या के पास काम है. इन 47 करोड़ में तकरीबन आधे , खेती में लगे है जिनकी आमदनी और भी कम है. कारखानों और कंपनियों में काम करने वालों की तुलना में खेती में प्रति व्यक्ति आय एक चौथाई से भी कम है. यानी सिर्फ खेती पर अधिकतर केंद्रित होकर देश की अर्थव्यस्था में आगे कोई सुधार होने वाला नहीं है. खेती ज़रूरी है पर देश के आगे बढ़ने का रास्ता सिर्फ खेत से नहीं गुजरता है.

जाहिर है नए रोजगार देश में सिर्फ औद्योगिक उत्पादन से आ सकते हैं. देश को आज ज्यादा से ज्यादा कारखाने और भारी उद्योग की ज़रूरत है. लेकिन गैर कृषि क्षेत्र में भारत सिर्फ 2 .8 प्रतिशत की सालाना दर से आगे बढ़ रहा है जो भविष्य के लिए गहरे संकट के संकेत है. फैक्ट्री और मैन्युफैक्चरिंग का हाल तो ये है कि देश में कुछ वर्षों से कुछ लिखने -कहने लायक नहीं है. सच है कि भारत यदि चाहता तो चीन के उद्योग देश में ला सकता था. लेकिन हमने चीन में बढ़ती उत्पादन लागत की ओर गंभीरता से देखा ही नहीं. नतीजा ये हुआ की चीन के उद्योग धीरे धीरे थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया में स्थानांतरित होने लगे जबकि हम इस दिशा में कोई बड़ा प्रयास अबतक नहीं कर पाए.

निसंदेह हमारी प्राथमिकताएं कुछ और थी. हमारे राष्ट्रीय लक्ष्य …बिखरे हुए थे. अगर हमने पाकिस्तान से आगे बढ़कर चीन से प्रतिस्पर्धा करने का संकल्प लिया होता तो आज तस्वीर कुछ और होती. हमने हिमालय के उस पार की चुनौती को स्वीकार किया होता तो आज हर साल लाखों भारतीयों को रोजगार मिलने की गारंटी रहती. लेकिन हम १३० करोड़ नागरिकों के आगे राष्ट्रीय लक्ष्य रखने में विफल रहे. माओ से लेकर शी- जिनपिंग हमारे नेताओं से बहुत आगे निकल गए.

मित्रों, आज ज़रूरत चीन को चुनौती देने की है ना कि दिवालिया पाकिस्तान से हर मोड़ पर मुकाबला करने की. चाहे वो कश्मीर हो या क्रिकेट. पाकिस्तान प्रतिस्पर्धी नहीं. महत्वहीन है.
हमे तो निशाना कहीं और साधना है.

वरना.

1200 साल पहले जैसे हम ग़ज़नी से पराजित हुए थे या फिर 250 साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी से….वैसे ही आज एक निर्णायक अर्थ युद्ध में हम चीन से पराजित होने के कगार पर खड़े हैं. हमे इस अप्रत्यक्ष युद्ध में उतरना है हमे चीन की चुनौती स्वीकार करनी है. अगर हम इस चुनौती से पीछे हटे, तो..  आज से बीस बरस बाद हम, आप और सब एक ऐतिहासिक हार के गुनाहगार होंगे. याद रखियेगा आज के दौर के राष्ट्र सीमाओं से नहीं अर्थ से टूटते है.

दीपक शर्मा

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(लेखक दैनिक जागरण, आजतक आदि प्रमुख मीडिया संस्थानों में बतौर पत्रकार एवं सम्पादक योगदान दे चुके हैं| वर्तमान में इंडिया संवाद के प्रमुख है)

अगर आप समाजवादी पार्टी से है तो अखिलेश बबुआ की पुलिस आपकी ज़ेब में है

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भले ही आजकल समाजवाद का झंडा बुलंद किये उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी साफ़ छवि का ढिंढोरा पीट रहे हो पर उन्हीं की पार्टी के कार्यकर्ता कुछ न कुछ ऐसा कर जाते हैं जिससे उनके किये कराये पर पानी फिर जाता है| हाल में जिस नाटकीय घटनाक्रम से उत्तरप्रदेश का यादव परिवार गुज़र रहा है, अखिलेश यादव हर जगह अपनी साफ़ छवि की ब्रांडिंग कर रहे हैं| मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद सरीखे दागदार छवि वाले नेताओं पर सख्त रुख अपना कर अखिलेश यादव ने काफी हद तक अपनी इस छवि को सच साबित करने का प्रयास किया है|

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लेकिन इन सबके बीच समाजवादी पार्टी के एक छुटभैया कार्यकर्ता देश के प्रधानमंत्री पर अशोभनीय टिपण्णी कर बैठे| इस छुटभैया नेता ने बकायदा सशक्त सामाजिक माध्यम फेसबुक पर पोस्ट ही नहीं डाली बल्कि इसके साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं प्रवीण तोगड़िया की आपत्तिजनक तस्वीर भी साझा की| अगले ही दिन यह पोस्ट आग की तरह लोगों के बीच फ़ैल गयी| मीडिया में बात आने के बाद आनन-फानन में बलिया पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज कर ली लेकिन कार्यवाही के नाम पर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे| मामला उछला और एक प्रतिष्ठित अखबार की सुर्खियां बन बैठा| हमने आईजी वाराणसी एवं डीआईजी आज़मगढ़ को ट्विटर के माध्यम से इस प्रकरण से अवगत कराया| मामले की गंभीरता को भांपते हुए दोनों ही अधिकारियों के कार्यालय से जांच के आदेश तो दे दिए गए लेकिन बलिया पुलिस मामले को दबाने में लगी रही|

आईजी वाराणसी से हमने दुबारा संपर्क किया, फिर से जांच का आदेश आया| बलिया पुलिस से हमने जब संपर्क किया तो बातों को गोल-गोल घुमाते हुए हमे पहले नियम क़ानून का हवाला दिया जाने लगा| समाजवादी पार्टी के टैग से बलिया पुलिस इस कदर खौफ में थी कि कार्यवाही अथवा गिरफ़्तारी से साफ़ हाथ खड़े कर दिए| हमारे सवालों से बचने के लिए एसपी बलिया के कार्यालय से कार्यवाही का आश्वासन प्राप्त हुआ|modiabuse6

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एक हफ्ते से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई| इसी क्रम में एसपी बलिया का तबादला कर दिया गया| यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि आख़िर एसपी का तबादला क्यों हुआ? जब पत्रकारों ने आरोपी से उसका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया तो वह मामले से बिलकुल निडर होकर बोला कि पूरे होशो-हवास में किया है और आगे भी करता रहूँगा| पत्रकारों के इस सवाल पर कि क्या उसे कानून या पुलिस का डर नहीं है? जवाब मिला कि मुक़दमे तो बहुत देखे है, गिरफ़्तारी कोई नहीं कर सकता, बलिया पुलिस तो मेरे जेब में है|

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अब हमने पुलिस महानिदेशक के कार्यालय में शिकायत की है और फिर से मामले की जांच हेतु उसी बलिया पुलिस को भेज दिया गया है|

जनता के लिए यह बहुत गर्व की बात है कि कार्यवाही के नाम पर सेनापति जावीद साहब की यूपी पुलिस चूहे-बिल्ली का खेल खेलती है| घटना के घटित होने का इंतज़ार किया जाता है और जब घटना घट जाती है तो कार्यवाही स्वरुप यही जवाब मिलता है कि जांच चल रही है|

इस प्रकरण से तो यही स्पष्ट होता है कि समाजवादी का झंडा लेकर बलवा करो या बलात्कार, हत्या करो या चलाओ हथियार, पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करेगी क्योंकि….भैया हम है समाजवादी और अखिलेश बबुआ की उत्तर प्रदेश पुलिस मेरे जेब में रहती है|

क़ुरान ने हमलावरों से बचाई एक हिंदू की जान

शिशिर सरकार

बांग्लादेश में ढाका के एक रेस्तरां होली आर्टिज़न बेकरी में पिछले साल एक जुलाई को हुए चरमपंथी हमले में 29 लोग मारे गए थे.

शाम का समय था, जब पांच हथियारबंद चरमपंथियों ने ढाका के भीड़भाड़ वाले इलाके में इस रेस्तरां पर हमला किया था.

उस वक़्त वहाँ ज़्यादातर जापान और इटली के पर्यटक थे. लेकिन अचानक हुए इस हमले की कई कहानियां अभी भी अनसुनी हैं.

इन्हीं में से एक कहानी है शिशिर सरकार की जिनकी जान क़ुरान की आयत पढ़ने से बच गई थी.

शिशिर इस रेस्तरां के शेफ़ हैं. जब उन्होंने गोलियों की आवाज़ सुनी थी तब उस वक़्त वह पास्ता का प्लेट हाथ में लिए हुए फ़्रिज़ वाले कमरे से बाहर निकल रहे थे.

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शिशिर उस दिन के बारे में बताते हैं, “मैंने तभी एक हमलावर के हाथ में तलवार देखी, उसके सीने से बंदूक लटक रही थी.”

एक हिंदू होने के नाते शिशिर का ख़ौफ़ज़दा हो जाना लाज़िमी था. अगर इस्लामी चरमपंथियों को उनके धर्म के बारे में पता चल जाता तो उनकी मौत निश्चित थी.

वो बताते हैं, “उसी समय एक जापानी आदमी पीछे से चीख़ा ‘मेरी मदद करो!’. मैं पीछे पलटा और उसकी मदद की.”

उस कमरे में कोई कुंडी नहीं थी. इसलिए वे दोनों कमरे का दरवाज़ा अंदर से पकड़ कर खड़े हो गए.

शिशिर बताते हैं, “जापानी पर्यटक ने मुझसे पूछा कि ये लोग कौन हैं. मैंने कहा कि नहीं जानता हूं लेकिन घबराने की बात नहीं है. पुलिस आ रही है.”

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दो घंटे तक उन दोनों ने कमरे का दरवाज़ा अंदर से पकड़ रखा था.

शिशिर सरकार ने बताया, “फ़्रिज़ वाले कमरे में बहुत ठंड थी. हम किसी तरह अपने आप को गर्म रखने की कोशिश कर रहे थे और दरवाज़ा पकड़े बैठे थे.”

तभी एक हमलावर ने दरवाज़े पर हमला कर दिया और उसे खोलने की कोशिश करने लगा.

“हम मज़बूती से दरवाजा थामे थे, उसकी कोशिश नाकाम रही. वो वापस चला गया. लेकिन वे यह जान गए थे कि कोई अंदर है.”

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और उसके 10-15 मिनट बाद फिर से चरमपंथी कमरे के पास आ गए थे.

“हमें बहुत ठंड लग रही थी. हम कमज़ोर पड़ रहे थे. इस बार हमलावर दरवाज़ा खोलने में कामयाब रहे.

“उन्होंने मुझे बाहर आने को कहा. मैं बहुत डरा हुआ था. मैं तुरंत नीचे गिर पड़ा. मैंने सोचा कि अगर मैं खड़ा रहूंगा तो पक्का वो मुझे तलवार से काट डालेंगे. मैं बार-बार कह रहा था कि अल्लाह के लिए मुझे मत मारो, मुझे बख़्श दो.”

शिशिर उन्हें मुसलमान मानते हुए ऐसा कह रहे थे. हथियारबंद चरमपंथी ने उन्हें जाकर अपने लोगों के साथ खड़े हो जाने को कहा जो कि रेस्तरां के दूसरे हिस्से में थे.

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“मैं घुटने के बल रेंगता हुआ लाशों के ऊपर से होकर वहां तक पहुंचा. तभी मुझे गोलियों की आवाज़ सुनाई दी. फ़्रिज़ वाले कमरे में मेरे साथ मौजूद जापानी आदमी मारा गया था.”

सरकार दूसरे लोगों के साथ जाकर बैठ गए. सभी सिर झुकाकर बैठे हुए थे. तभी उनमें से एक ने पूछा कि शेफ कौन है.

शिशिर के साथियों ने उनकी ओर इशारा किया. उन्हें चरमपंथी किचन में ले गए.

शिशिर उसके बाद के वाकये के बारे में बताते हैं,”उन्होंने मुझे खाना बनाने को कहा और उसे शानदार ढंग से प्लेट में परोसने को कहा.

जब मैं खाना बना रहा था तब एक चरमपंथी मेरे पास आया. उसने मुझसे पूछा कि मेरा नाम क्या है. मैंने अपना नाम सिर्फ़ शिशिर बताया. मैंने अपना सरनेम नहीं बताया. नहीं तो वो जान जाते कि मैं हिंदू हूं.”

लेकिन शायद उसे शक हो गया था. उन्होंने मुझे कुरान की आयतें सुनाने को कहा.”

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मैं आराम से खाना बनाते हुए कुरान की आयतें सुनाने लगा. मेरे बहुत सारे मुसलमान दोस्त रहे हैं. इसलिए मैं कुरान के कुछ सूरा जानता हूं लेकिन फिर भी मैं डरा हुआ था. मैं सोच रहा था कि क्या वो मेरी प्रतिक्रिया से संतुष्ट हैं?”

”ये रमज़ान का महीना था इसलिए सुबह से पहले मुस्लिम बंधकों को सहरी खाने को दिया गया.”

मैं बहुत डरा हुआ था. डर के मारे मैं खाना निगल नहीं पा रहा था. लेकिन तभी मैंने सोचा कि अगर मैंने नहीं खाया तो उन्हें शक हो जाएगा कि मैं मुसलमान नहीं हूं.”

सुबह होने के बाद ऑपरेशन थंडरबोल्ट में सभी पांचों चरमपंथी मारे गए थे और मैं अपने कई साथियों के साथ ज़िंदा बच चुका था.”

लेकिन इसके बाद मेरी ज़िंदगी बदल गई. वे पहले जैसी नहीं रही. अब मैं भविष्य के कोई सपने नहीं देखता. मैं ठीक से सो नहीं पाता हूं. जब कभी भी मैं अकेला होता हूं तो मैं उस रात के बारे में सोचने लग जाता हूं. मैं कुछ नहीं कर पाता हूं. मुझे ख़ौफ़ सताता रहता है.”

डिजिटल क्रांति एवं जनसेवा की ओर अग्रसर यूपी पुलिस

UPPOLICE

साभार : दैनिक भास्कर

सोशल मीडिया और कंप्यूटर के इस दौर में जैसे-जैसे हर किसी की जवाबदेही सुनिश्चित हुई है, वैसे-वैसे इन माध्यमों का इस्तेमाल करके सरकारों ने लोगों से सीधे संवाद करने का अभूतपूर्व निर्णय लिया है| इसी कड़ी में अब एक और नाम जुड़ गया है, और, वो नाम है…भारत के सबसे ज्यादा जनसँख्या वाले राज्य की पुलिस यानि यूपी पुलिस|

ट्विटर

साभार : ट्विटर

कुछ समय पहले कुछ चुनिन्दा पुलिस अधिकारी ट्विटर पर सक्रीय थे और वो जनता से सीधे शिकायतों और सुझावों का संज्ञान लेकर सम्बंधित पुलिस अधिकारीयों को कार्यवाही का आदेश देते थे जिनमे लखनऊ रेंज के पुलिस महानिदेशक ए सतीश गणेश, डीजीपी ऑफिस के पी.आर.ओ. राहुल श्रीवास्तव एवं यूपी पुलिस डीजीपी जावीद अहमद के नाम प्रमुख है| लेकिन धीरे-धीरे संपर्क के बढ़ते दायरे और अपनी छवि पर लगे दाग को मिटाने के लिए एक दूरगामी सोच के अंतर्गत डीजीपी जावीद अहमद ने ट्विटर सेवा हेतु इच्छा जाहिर की तो ट्विटर इंडिया के प्रमुख राहील खुर्शीद और वाईस प्रेसिडेंट ऋषि जेटली ने इस हेतु हर संभव सहयोग की घोषणा कर दी|

यूपी पुलिस

ट्विटर इंडिया प्रमुख राहील खुर्शीद एवं वाईस प्रेसिडेंट ऋषि जेटली के साथ यूपी पुलिस डीजीपी जावीद अहमद की बैठक 

मुलाकातों के सिलसिले के बाद ट्विटर सेवा को अमलीजामा पहचाने का काम शुरू हुआ और ट्विटर ने यूपी पुलिस को एक पूर्ण रूप से समर्पित सॉफ्टवेयर देने का निर्णय किया|

वरिष्ठ अधिकारीयों के साथ ट्विटर इंडिया हेड राहील खुर्शीद

यूपी पुलिस वरिष्ठ अधिकारीयों के साथ ट्विटर वाईस प्रेसिडेंट ऋषि जेटली एवं इंडिया प्रमुख राहील खुर्शीद

यूपी पुलिस और उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने भी ट्विटर सेवा हेतु ख़ास रुचि दिखाई और ट्विटर सेवा को शुरू करने का अंतिम निर्णय लिया गया|

ट्विटर सेवा के उद्घाटन के अवसर पर

ट्विटर सेवा के उद्घाटन के अवसर पर

आख़िरकार ८ सितम्बर, २०१६ को उत्तर प्रदेश के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया| डीजीपी जावीद अहमद, ट्विटर वाईस प्रेसिडेंट ऋषि जेटली, ट्विटर इंडिया प्रमुख राहील खुर्शीद, एडीजी कानून दलजीत सिंह चौधरी की उपस्थिति में ट्विटर सेवा का उद्घाटन किया गया|

अधिकारीयों को ट्विटर संचालन के प्रशिक्षण का एक दृश्य

अधिकारीयों को ट्विटर संचालन के प्रशिक्षण का एक दृश्य

ट्विटर के जानकारों द्वारा हर जिले के एसपी, डीआईजी और आईजी रैंक के अधिकारियों को ट्विटर सेवा के इस्तेमाल हेतु प्रशिक्षण दिया गया|

अधिकारीयों को ट्विटर संचालन के प्रशिक्षण का एक दृश्य

अधिकारीयों को ट्विटर संचालन के प्रशिक्षण का एक दृश्य

डीजीपी जावीद अहमद के इस महत्वाकांक्षी मुहीम को सभी अधिकारियों का भरपूर समर्थन भी मिला|

मुहीम का असर

मुहीम का असर

ट्विटर सेवा की आधिकारिक घोषणा के बाद ही इस सेवा ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया| लोगों ने अपनी शिकायतों और सुझावों को सीधे डीजीपी कार्यालय पहुँचाना शुरू कर दिया| यूपी पुलिस डीजीपी कार्यालय से संचालित ट्विटर हैंडल पर शिकायत एवं सुझाव के निम्न फायदे है –

१ – कोई भी पुलिस अधिकारी आपकी शिकायत को नहीं सुनता है तो आप यूपी पुलिस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर शिकायत कर सकते है| चंद मिनट के अन्दर ही डीजीपी कार्यालय से सम्बंधित जिले के एसपी को आदेश दिया जाएगा और आपके क्षेत्र का सम्बंधित पुलिस अधिकारी खुद आपके पास चल कर आएगा, आपकी शिकायत को संज्ञान में लेने और उसका हर संभव निस्तारण करने|

२- अगर किसी पुलिस स्टेशन पर आपकी एफआईआर नहीं लिखी जा रही है तो आप ट्विटर पर सूचना दे| एफआईआर दर्ज किया जाएगा एवं आपकी हर संभव मदद की जायेगी|

३- आप मौजूदा समय में दर्ज शिकायतों की जानकारी भी प्राप्त कर सकते है|

४- आप उत्तर प्रदेश पुलिस को कार्यप्रणाली को और बेहतर बनाने हेतु सुझाव भी दे सकते है|

तत्काल कार्यवाही

तत्काल कार्यवाही

ट्विटर सेवा के शुरू होने के कुछ ही समय बाद लोगों ने जहाँ शिकायतों को सीधे अधिकारियों तक पहुँचाना शुरू किया है वही यूपी पुलिस ने भी हर शिकायत के निस्तारण हेतु हर संभव सफल कोशिश की है|

तत्काल कार्यवाही

तत्काल कार्यवाही

सेवा के शुरू होने के बाद जहाँ हर अधिकारी की जवाबदेही तय हुई है वही स्थानीय पुलिस ने कई सराहनीय कार्य भी किये है, जिसे लोगों तक पहुँचाने का काम किया है यूपी पुलिस ने|

लेकिन इस सेवा के बाद जो महत्वपूर्ण सुझाव हमारे स्रोतों को प्राप्त हुए है, उन्हें हम यूपी पुलिस तक ज़रूर पहुँचाना चाहेंगे ताकि यूपी पुलिस इन सुझावों को संज्ञान में लेकर इस अभूतपूर्व सेवा को और बेहतर बना सके –

१- कुछ लोगों का कहना है कि डीजीपी ऑफिस से आदेश तो दे दिया जाता है परन्तु उन आदेश पर अमल करना स्थानीय पुलिस का काम है, जो कभी कुछ करता नहीं| इस शिकायत को संज्ञान में लेकर हमारा यूपी पुलिस को सुझाव है कि वह हर शिकायत की जवाबदेही अवश्य तय करें|

२- कुछ लोगों का यह भी कहना है कि अगर यूपी पुलिस की सराहना करो तो यूपी पुलिस खुश होकर ट्वीट को रीट्वीट करती है परन्तु अगर कोई कड़वी बात कर दी जाय तो यूपी पुलिस हर ट्वीट को नज़रंदाज़ करना शुरू कर देती है| यह वाकई में यूपी पुलिस के इस मुहीम को सफल अमलीजामा पहनने में रोड़ा बन सकता है| अतः आलोचना को भी यूपी पुलिस को सहर्ष स्वीकार करना होगा|

नीचे यूपी पुलिस के ट्विटर अकाउंट का विवरण दिया गया है –

यूपी पुलिस ट्विटर खाता

यूपी पुलिस ट्विटर खाता

यूपी पुलिस ट्विटर खाता

यूपी पुलिस ट्विटर खाता

यूपी पुलिस ट्विटर खाता

यूपी पुलिस ट्विटर खाता

ठाकुर दीपक सिंह कवि

प्रधान संपादक

लिटरेचर इन इंडिया

Maovad.. - Literature in India

माओवाद सही भी है, गलत भी…बस नज़रिए का फर्क है|

Maovadi - Literature in India

नई दिल्ली से धनबाद की यात्रा पर हूँ| लोगों से बहुत सुना था कि झारखंड प्राकृतिक सौन्दर्य को अभी भी संवारे हुए है, इसलिए प्रकृति के इस नायाब करिश्मे और सुन्दरता को देखने का मन हुआ| बहुत सोचने के बाद तय किया कि भारतीय रेल से यात्रा की जाय क्यूंकि रेल की पटरियों के किनारे ही आपको आधी सुन्दरता का दर्शन हो जाएगा| तो फिर क्या था, मैं ठहरा महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन का अनुयायी, चुनाव आते ही अम्बेडकरवाद में पगलाए मेरे देश के नेताओं और लेखकों से कहीं दूर….सैर कर दुनिया की गाफ़िल जिंदगानी फिर कहाँ….को महसूस करने…वास्तव में असली लेखक वही है जो प्रकृति और मानव विज्ञान में निहित प्रेम के दर्पण में खुद की मानवता का प्रतिबिम्ब उद्धृत कर ले| मैंने भी इसी परिपाटी को आगे बढाने की ठानी| मैंने भी सोचा क्यूँ न एक लेखक होने के नाते महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन हो जाया जाय| अथाह सुख की अनुभूति है प्रकृति की बाहों में|

Maovadi2 - Literature in India

इसी बीच जब मेरे अंदर का मानव जाग जाता है तो मेरी निगाहें पास बैठे लोगों के पास पहुँच जाती है…कुछ लोग मस्त हवा के आनंद में इस कदर जन्म भर से थकाए है कि उंघ रहे है…कुछ दुसरे के कंधे पर सर मार कर सो रहे है और मैं एक बन्दर की तरह सब सुत्तक्कड़ो के बीच प्रकृति की सुन्दरता ही निहार रहा कर अघा रहा हूँ| भले ही ढंग से हिंदी न आती हो लेकिन सुबह होते ही सबके हाथ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया, द हिन्दू और द टेलीग्राफ है| मेरे हाथ में सब अमर उजाला देख कर यूँ घुर रहे है जैसे मैं भारत में नहीं रूस के किसी ट्रेन के डिब्बे में बैठ कर हिंदी अखबार को सबकी निगाहों में चुभने के लिए खोल दिया हूँ| खैर ज्यादा पढ़े – लिखे लोग खतरनाक होते है इसलिए मैं अपनी निगाहों को फिलहाल अपने अखबार में ही समेट कर रखा हूँ| इसी बीच ट्रेन के बीच कुछ अतिसज्जन लोग घुस कर बोल रहे है कि “तनी खिसका हो, काहें इतना दूरे ले बैठल हवा, हमनो के तनी स जगह चाही मतलब चाही…बुझाइल|”

Maovadi3 - Literature in Indiaझारखण्ड की प्रकृतिक सुन्दरता उसके प्राकृतिक सम्पदा, लहलहाते हरे पेड़ों, छोटी-छोटी घासों से है जो पठारनुमा पहाड़ों पर दूर तक दिखती है और क्षितिज से पहले ओझल नही होती| माओवाद की शुरुआत भी इसी हेतु की गयी थी कि जो भी हो…विकास के नाम पर प्रकृति का बलात्कार नहीं होने देंगे| एसी में बैठ कर प्रकृति के लिए लडाई लड़ना आसान है पर जब इंसान उसी प्रकृति की रक्षा के लिए हथियार उठा ले तो वो माओवादी हो जाता है| हाँ ये भी सच है कि बाद में (वर्तमान में) ये आन्दोलन किसी और दिशा में चल दिया जिसके बाद…माओवाद की मूलभावना को माओवादियों ने ही दमन कर दिया|

Maovadi3 - Literature in Indiaअब गौर करने वाली बात है कि प्रकृति की रक्षा जैसे नेक काम में भी उन्हें हथियार क्यों उठाना पड़ा? कुछ तो बात होगी? कुछ लोगों से बात करके पता चला कि औद्योगिक माफियाओं और विकास के ठेकेदारों के पैसे के इशारे पर पुलिस द्वारा माओवाद से जुड़े लोगों और उनके परिवारों का उत्पीड़न जब चरम पर पहुँच गया तो उन्हें मजबूरी बस हथियार उठाना पड़ा| शेर के मुंह में खून लग जाने के बाद वो और खूंखार हो जाता है…ठीक वही हाल माओवादियों का हुआ…वो आन्दोलन की दिशा से भटक गए और हिंसा को जन्म देकर एक सोची समझी साजिश के तहत गुनाहगार हो गये|

Maovadi4 - Literature in Indiaमेरे हिसाब से माओवाद से जितना नुक्सान हुआ उससे कही ज्यादा फायदा हुआ है…प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण का| सरकारे करोड़ो, अरबों खर्च करके प्राकृतिक संपदा संरक्षण का ढोंग करती है और विकास के नाम पर प्राकृतिक जंगलों को काट कर कंकरीट के जंगल (‘कंकरीट के जंगल’ मेरे फेसबुक मित्र शम्भुनाथ शुक्ला जी के फेसबुक पृष्ठ से साभार) बसा दिया| इस जंगलों के बसने में औद्योगिक घरानों और गुंडागर्दी की राह पर बिल्डर बने लोगों का सबसे ज्यादा विकास हुआ| आम इंसान को तो बस धोखा मिला…और उनकी मानसिक तसल्ली हेतु इन कंकरीट के जंगलों में छोटे-छोटे पार्क बना दिए गये ताकि ज्यादा पढ़े-लिखे (मुर्ख) लोग बच्चों की भाँती इसमें सुबह-सुबह योग और व्यायाम करते हुए यही सोचे कि वो या तो कश्मीर की वादियों या तो हरियाली से परिपूर्ण खलिहानों या हरे-भरे जंगलों में बैठ कर प्राकृतिक हवा घोंट रहे है|

Maovadi6 - Literature in India

Thakur Deepak Singh Kavi

– ठाकुर दीपक सिंह कवि (लेखक लिटरेचर इन इंडिया के प्रधान संपादक है|)

आखिर कितना सही है मैगी पर प्रतिबन्ध? नियमों का पालन या कुछ और?

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मैगी की शुरुआत इतनी नयी नहीँ है जितना की आम आदमी भारत में सोचता है। मैगी का प्रचलन 2004 के बाद बहुत ज्यादा बढ़ गया पर क्या आपको पता है कि आपके पसंदीदा खाद्य पदार्थो में से एक रहे मैगी का इतिहास क्या है? आखिर कितना पुराना है आपका मैगी ब्राण्ड? आइए हम आपको बताते है।

मैगी का इतिहास

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मैगी ब्रांड के जनक जूलियस मैगी का जन्म 9 अक्टूबर 1846 में स्विट्ज़रलैंड में हुआ। उनके पिता माइकल मैगी स्विट्ज़रलैंड में ही एक मिल के मालिक थे। 1872 में माइकल मैगी के देहांत के बाद जूलियस ने मिल का कार्यभार अपने हाथों में ले लिया। जल्द ही खाद्य उत्पादों में जूलियस का नाम सबसे पहले गिना जाने लगा क्योंकि मैगी के उत्पादों का उद्देश्य श्रमिक वर्ग को पोषक तत्वयुक्त खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना था। मैगी पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने पोषक तत्वयुक्त खाद्य पदार्थो पर अधिक बल दिया और उन्हें बाजार में उपलब्ध करवाया।

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1886 में सबसे पहले इस श्रृंख्ला में मैगी ने बना-बनाया सूप बाजार में उतारा। 1897 में मैगी ने मैगी GmbH नाम से सींगें के जर्मन टाउन में एक कंपनी की स्थापना की जो आज भी उसी जगह पर स्थित है।

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सन् 1947 में नेस्ले ने मैगी का अधिग्रहण कर लिया और तब से लेकर आज तक नेस्ले ही मैगी को पाल-पोष रही है। आज मैगी चीन, पाकिस्तान, ताइवान, वियतनाम, थाईलैंड, मेक्सिको, सिंगापुर, मलेशिया, ब्रुनेई, जर्मन भाषी देशों, नीदरलैंड, स्लोवानिया, पोलैंड, फ्रांस सहित भारत में अपने पाँव जमा चुकी है।

विवाद

1 – अक्टूबर 2008 में बांग्लादेश में भ्रामक विज्ञापन हेतु ब्रिटिश एडवरटाइजिंग स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ने मैगी उत्पाद हेतु स्पष्टीकरण माँगा जिसमें यह दावा किया गया था कि मैगी खाने से ‘ मजबूत मांसपेशियों, हड्डियों और बालों के निर्माण में मदद मिलती है’|

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2 – मई 2015 में खाद्य सुरक्षा विभाग ने अपनी प्रारंभिक जांच में पाया कि मैगी में आदेशित मात्रा से 17 गुना ज्यादा शीशे के तत्व

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और साथ ही साथ एमएस जैसे खतरनाक कैंसर के कारक तत्व है।

3 – 3 जून 2015 को नई दिल्ली सरकार ने 15 दिन के लिए मैगी पर प्रतिबन्ध लगाया।

4 – 4 जून 2015 को 39 में से 27 सैंपल के नेगेटिव पाये जाने के बाद गुजरात खाद्य विभाग ने 30 दिन का प्रतिबन्ध लगाया।

5 – बिग बाजार, इजी डे आदि ने अपने शोरूम से मैगी को हटाया।

6 – 4 जून 2015 को तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रतिबन्ध।

7 – 5 जून 2015 को आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा प्रतिबन्ध।

8 – 6 जून 2015 को भारत सरकार द्वारा अनिश्चित काल तक मैगी पर प्रतिबन्ध एवं उसी दिन नेपाल सरकार द्वारा प्रतिबन्ध।

कितना सही है प्रतिबन्ध?

रिपोर्ट एवं सूत्रों के अनुसार नेस्ले ने मैगी के सैंपल की जांच करायी और सरकारी प्रयोगशालाओं में जांच करायी गयी। दोनों ने एक ही प्रान्त से नमूने लिए और दोनों की रिपोर्ट अलग-अलग है! हालाँकि दोनों ही प्रयोगशालाएं मान्यता प्राप्त है। इससे कई बाते उभर कर सामने आती है –
1 – दोनों में से कोई एक प्रयोगशाला असक्षम है।
2 – दोनों में से किसी एक प्रयोगशाला में जांच हेतु उपकरण की कमी है।
3 – दोनों में से किसी एक में काम कर रहे वैज्ञानिकों में तज़ुर्बे की कमी है और यह बात कम से कम मेरे गले से तो नही उतर रही।

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चलिए अगर यह भी मान लिया जाय की सरकारी प्रयोगशाला की रिपोर्ट ही सही है पर एक बात और कि खुलेआम बिक रहे गोलगप्पे, चाऊमीन, गुटखे, सिगरेट, दारू, पानमसाला आदि क्या सेहत के लिए लाभदायक है?

आपने देखा होगा कि सफ़ेद सा पदार्थ जो चाऊमीन, गोलगप्पे आदि में धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है वो आपकी ग्रंथियों को सुन्न सा कर देता है और आपको स्वाद का पता भी नही चलता। इसी के फलस्वरूप आप सड़ा-गला आदि कुछ भी बड़े चाव से खाते है।

अगर गुटखे, तम्बाखू आदि के मालिक सरकार को उम्मीद से ज्यादा पैसा कर के रूप में देते है तो इससे यह तो साबित नही होता कि इनके उत्पाद सेहत के लिए फायदेमंद है!

क्या मैगी की बिक्री बंद हो जायेगी?

मुझे तो नही लगता कि ऐसा कुछ होने वाला है। इस बात पर कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है –

“तेरी महफ़िल में सब कुछ मुनासिब है…
बस छुपाने के लिए परदे का इंतज़ाम कर ले…”

आप सभी को याद होगा कि 2003 में संसद में एक विधेयक पारित हुआ था सिगरेट और तंबाकू आदि पर प्रतिबन्ध लगाया गया था पर क्या आपको लगता है कि ऐसा कुछ हुआ? आज भी लोग दारू पीकर सड़को पर नाचते दिख जाते है, आज भी लोग सिगरेट का धुँआ उड़ाते आसानी से दिख जाएंगे। ठीक इसी तरह मैगी का इतना उत्पाद तो बाज़ार में आ ही चूका है कि छः से सात महीने तक आराम से लोग सेवन कर सके। अब छः या सात महीने बाद क्या होगा यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा। वैसे एक बात तो साफ़ है कि डर से मैं तो मैगी खाना बंद ही कर दूंगा।

(सन्दर्भ – विकिपीडिया, यंगिस्तान डॉट इन, मैगी, संसद विधेयक, तंबाकू अधिनियम और बीबीसी हिंदी)

Deepak Singh
ठाकुर दीपक सिंह कवि
प्रधान संपादक
लिटरेचर इन इंडिया जालपत्रिका

चार सवाल बनाम भूमि अधिग्रहण बिल/विधेयक – ठाकुर दीपक सिंह कवि

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यह लेख आपके समक्ष प्रस्तुत करने से पहले मैं आप सभी को अवगत कराना चाहता हूँ कि इस लेख के कुछ अंश मैंने पढ़ कर या फिर विभिन्न रचनाकारों की राय के आधार पर लिखे है, अगर यहाँ पर प्रस्तुत विचार आप की रचना के किसी अंश से थोड़ा बहुत भी मेल खाता प्रतीत हो समझ लीजियेगा कि हाल फिलहाल में मैं आपके लेख, विचार या राय से रूबरू हो चूका हूँ। विचारों की कड़ी में सबसे पहले मैं ‘नौकरशाही डॉट इन’ से लिए गए अंश को आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहूँगा-

“यह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश है क्या?, क्या यह सचमुच अलोकतांत्रिक और ब्रिटिश राज के मनमानी कानून की तरह है जैसा कि अन्ना बता रहे हैं. आइए इन के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को जानें.

मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण यानी किसानों या आम जनता की जमीन को पैसे के बल पर ले लेने का अध्यादेश जारी किया है. इसके तहत-
सरकार जब चाहे और जिस क्षेत्र में चाहे आम
जनता की जमीन ले सकती है और इसके लिए उसे जमीन मालिक से सहमति की भी जरूरत नहीं है. मतलब आप की मिलकियत, सरकार जब चाहे खत्म कर सकती है. सरकार ने यह प्रावधान रक्षाउत्पादन, ग्रामीण इन्फ्रा, औद्योगिक कॉरीडोर के लिए किया है. पहले यानी यूपीए सरकार में यह गुंजाइश थी कि सरकार खेती योग्य जमीन नहीं ले सकती लेकिन एनडीए सरकार के इस नये प्रस्ताव में वह खेती की जमीन भी ले सकती है और उसका मालिक सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का भी हक नहीं रख सकेगा.अगर। सरकार आपकी जमीन ले लेती है तो आप
इसके खिलाफ किसी भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का हक भी नहीं रखते. मतलब कि आप की अदालत में भी कोई सुनवाई नहीं होगी. अगर एक बार सरकार ने आपकी जमीन लेने की घोषणा कर दी और उसने उस पर कोई काम शुरू किया या नहीं किया वह उसकी हो जायेगी. जबकि मनमोहन सरकार के कानून के अनुसार अगर उस भूमि पर पांच साल तक कोई काम शुरू नहीं किया गया तो जमीन का मालिक उस जमीन को वापस लेने का हक था. अन्ना हजारे ने जंतर-मंत्र पर इस अध्यादेश को काला कानून बताते हुए कहा कि ऐसे कानून तो अंग्रेजों के जमाने की याद ताजा करते हैं. उनका कहना है कि लोकतांत्रिक देश में ऐसे कानून स्वीकार नहीं किया जा सकते. अन्ना ने कहा कि यह अलोकतांत्रिक कानून है.”

अब विस्तार से चर्चा करते हुए मैंने कुछ प्रश्न और चर्चा हेतु अपने विचार तथ्यों के आधार पर आपके सामने रखे है-

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प्रथम प्रश्न- यह सिर्फ मेरा ही नहीं बल्कि समस्त भारत वासियों का है(क्योंकि हमारे देश की लगभग तीन गुना आबादी कृषि पर आधारित है) कि किसानों की उपजाऊ ज़मीन छीन कर विकास की बात आखिर कहाँ तक सार्थक है?

अगर किसान से उसकी उपजाऊ ज़मीन छीन ली जाए वो भी उसकी बिना सहमति लिए तो फिर यह सरकार का जनविरोधी फैसला है क्योंकि लोकतंत्र बहुमत का खेल है, संख्या का पक्ष है और संख्या में किसान बहुसंख्यक है और औद्योगिक घराने अतिअल्पसंख्यक। अगर सरकार किसानों से उपजाऊ ज़मीन ही छीन लेगी तो दो वक़्त की रोटी को दर-दर भटकने पर मज़बूर किसान आखिर किस विकास की तरफ उन्मुख होगा? यह एक बड़ा और गंभीर प्रश्न है। विकास की बात करके सत्ता में आयी सरकार ज़रा ‘विकास’ शब्द से परहेज़ न करें और भौंदी ‘राजनीतिक परिभाषा’ से विमुख होकर विचार करे तो यह साफ़ तौर पर ज़ाहिर होगा कि यह प्रावधान कत्तई विकास को प्रोत्साहित नही करता। यह विकास सिर्फ चंद औद्योगिक घरानों के लिए सार्थक है एवं किसानों हेतु निरर्थक। अब फैसला और पहला प्रश्न सरकार के ज़िम्मे छोड़ मैं दूसरे प्रश्न पर अग्रसर होता हूँ।

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प्रश्न द्वितीय-क्या किसानों से न्यायालय के दरवाज़े बंद करके लोकतंत्र का गला घोटना सरकार के लिए शोभनीय है?

जैसा कि पहले मैं कह चूका हूँ कि अगर बात किसानों कि है तो यह भारतीय लोकतंत्र और संविधान की बात है क्योंकि किसान यहाँ बहुमत है। अगर सरकार बहुमत को ही अपने हक़ से वंचित रखती है तो यह ज़्यादती नहीं तो और क्या है? भारतीय क़ानून और न्याय प्रत्येक भारतीय नागरिक का हक़ है और सरकार की जानकारी हेतु मुझे अवगत कराना होगा कि किसान भी भारतीय नागरिक है और यह उनका हक़ है। आखिर संविधान में निष्ठा की शपथ लेकर किसानों को हक़ से वंचित रखना कहाँ तक तर्कसंगत है?

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प्रश्न तृतीय- सरकार औद्योगिक लाभ हेतु है या फिर सर्वांगिक लाभ हेतु?

इस योजना से जितना औद्योगिक घरानों को लाभ होगा उससे कई गुना अधिक किसान को नुकसान। जिस प्रकार बिन इंजन के गाड़ी बेकार है, बिना बारिश के छाता ठीक उसी प्रकार बिना उपजाऊ जमीन के किसान| किसान बेकार और बेगारी का जीवन यापन करने पर मज़बूर हो तो इसमें कहाँ विकास है और कैसा हित?

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प्रश्न चतुर्थ-अगर सरकार दावे के साथ खुद को किसान हितैषी कह रही है तो फिर बिन मौसम बर्बाद हुई फसलों से पीड़ित किसानों की मदद के लिए आगे क्यों नही आ रही?

खुद को किसान के भले-बुरे में सहयोगी होने का निराधार दावा करने वाली सरकार की पोल इसी बात से खुल जाती है कि बर्बाद फसलों के मुआवजे हेतु गुहार लगाने वाली किसान की आवाज़ पर सरकार अपने कान बंद कर लेती है और जब यह आवाज़ चीख या गुस्से में बाहर आती है तो लाठियों और गोलियों के दम पर इन्हें दबाने की भरपूर कोशिश की जाती है।

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ज़्यादा लिखूंगा तो बात घुमावदार बनती जायेगी और मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता क्योंकि साफ़ और सीधी बात ही साहित्य का विसंगतियों पर चोट है। आशा करता हूँ सरकार समय से पहले खुद को संभाल ले और लोकतंत्र की सुध ले वर्ना लोकतंत्र तो है ही संख्या का खेल! और साथ-साथ किसान भाइयों से भी आह्वान करना चाहूँगा कि आप अपनी आवाज़ बुलंद करें क्योंकि यह आपके हक़ की लड़ाई है। भारत में उद्योग लगाने हेतु अपार बंजर ज़मीन है तो उपजाऊ ही क्यों?

Deepak Singh

लेखक लिटरेचर इन इंडिया के प्रधान संपादक है

कितना ख़ास है सशक्त लोकतंत्र के मुखिया का सबसे बड़े लोकतंत्र में आगमन?-ठाकुर दीपक सिंह कवि (प्रधान संपादक)

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भारत और अमेरिका के सुर अतीत में भले ही एक दूसरे से मेल न खाते रहे हो परंतु आज स्थिति में वांछित बदलाव है। दोनों ही देश के प्रमुख विकास के मुद्दे पर आम सहमति रखने वाले है। वैश्विक मंचो पर दोनों ही देश गर्मजोशी से मिले है और विचारधारा में भी आपसी समन्वय है। रिश्तों और आकांक्षाओं की बात करने से पहले पूर्व में आये अमेरिकी राष्ट्रपतियों और उनसे हुए फायदे नुकसान पर भी नज़र दौड़ाना लाज़मी है।

करीब 55 साल पहले दिसंबर 1959 में डी आइजनहावर सर्वप्रथम भारत की यात्रा पर आये थे। यह वह दौर था जब भारत और चीन की तकरार चरम पर थी और अमेरिका का वास्तविक तौर पर भारत की तरफ झुकाव था, ये इसलिए नहीं कि भारत के प्रति उनके दिल में कुछ नमी थी बल्कि इसलिए कि चीन एक सशक्त वैश्विक शक्ति बनकर उभर रहा था और अमेरिका इसके प्रति चिंता भी दबी जुबां में जाहिर कर चूका था। इसी कड़ी में आइजनहावर ने चीन की पकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति की बात तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखित रूप में कही थी। यह भले ही छद्म शुरुआत हो परंतु भारत को वैश्विक तौर पर एक अहम समर्थन था। हालांकि उनकी यात्रा को हम सफल नही करार दे सकते क्योंकि उन्होंने जाते-जाते ये बात कहकर कि भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते सबसे ऊपर है लेकिन पाकिस्तान अमेरिका के दिल में है, यात्रा की अहमियत को धूमिल कर दिया। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार सबसे खास बात तो यह थी कि आजतक यह पता नही चल पाया कि आइजनहावर से नेहरू ने वास्तव में आग्रह किया था या वे स्वयं भारत यात्रा पर आये थे।

1959 के बाद सन् 1969 में लगभग एक दशक बाद जुलाई के महीने में रिचर्ड निक्सन भारत आये। यह वो दौर था जब कांग्रेस की राजनीति एक-दूसरे की खींचतान में उलझी हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पार्टी में वर्चस्व को लेकर कांग्रेस सिंडिकेट नेताओं से मोर्चा ले रही थी। भारत के घरेलू राजनीति में उठापटक के बीच यह यात्रा मात्र एक औपचारिकता तक ही सीमित रह गयी और इस यात्रा से भारत-अमेरिका के खराब होते रिश्तों में कोई बदलाव नही आया और न तो इंदिरा और न ही निक्सन एक दूसरे से गर्मजोशी से मिले। चीन, पाकिस्तान और अमेरिका की भारत के विरूद्ध तिकड़ी चिंता का विषय तो था ही तत्पश्चात इंदिरा और निक्सन की शिथिल वर्ता संकट की तरफ इंगित करने वाला कदम था।

1978 की जनवरी में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर भारत यात्रा पर आये। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया और बदले में कार्टर भारत के लिए एक औपचारिक सद्भावना का सन्देश लेकर आये। दोनों ही नेताओ ने एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किया और साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने हरियाणा के दौलतपुर गाँव का दौरा किया जिसका नाम बाद में बदलकर कार्टरपुर रख दिया गया। यह यात्रा भी सफल नही हुई क्योंकि उनके इस दौरे पर विवाद खड़ा हो गया। दरअसल वो अपने एक सहयोगी से कह रहे थे कि परमाणु महत्वाकांक्षा पर भारतीयों को बहुत ही कड़ा सन्देश दिया जाना चाहिए और यह बात माइक्रोफोन पर रिकॉर्ड हो गयी।

एक लंबे अरसे के बाद सन् 2000 में बिल क्लिंटन भारत आये। यह यात्रा वास्तव में ख़ास थी क्योंकि दोनों देश तथाकथित शीतयुद्ध की छाया से बाहर निकलते हुए खुले तौर पर एक दूसरे के साथ नज़र आये। यह पहली बार था कि अमेरिका निर्देश देने की बजाय आग्रह के अंदाज़ में नज़र आया। वो दिल्ली के साथ-साथ मुम्बई, हैदराबाद, जयपुर और आगरा भी गए। उन्होंने भारत पाक से परमाणु कार्यक्रम रोकने का आग्रह किया। सबसे अधिक फायदा भारत में रेंगते हुए दौड़ने की कोशिश करते हुए आईटी सेक्टर को हुआ जो अमेरिका के बाज़ारों में दौड़ने लगा। यह यात्रा भारत-अमेरिका रिश्ते की एक नयी और मजबूत शुरुआत थी।

सन् 2006 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश भारत की ओर कदम बढ़ाने को राज़ी हुए। बदलती परिस्थिति में भारत एक महाशक्ति बनकर उभर रहा था। आईटी सेक्टर दौड़ पड़ा था और भारत एक परमाणु संपन्न देश था। बुश की यह यात्रा कई मायनों में ख़ास रही। इराक़ युद्ध को लेकर भारतीय मुस्लिम उनका विरोध कर रहे थे। इस यात्रा के पश्चात भारत वैश्विक स्तर पर परमाणु बिरादरी में अछूत नही रहा। भारत अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु करार पर आगे बढ़ा। हालांकि यात्रा के दौरान यूपीए सहयोगी वामदलों के विरोध के चलते उन्हें भारतीय संसद में संबोधन से वंचित रहना पड़ा। उन्होंने विश्वभर में भारत से लोकतंत्र फ़ैलाने के लिए मदद मांगी परंतु एक भारतीय प्रवक्ता ने उन्हें खरी-खरी सुना दी कि भारत लोकतंत्र का कारोबार नही करता।

अब 26 जनवरी 2015 को गणतंत्र दिवस के मौके पर ओबामा की भारत यात्रा वास्तव में अहम है। चीन सीमा विवाद और पाकिस्तान की लगातार बढ़ती नापाक हरकत का समाधान संभव है। भारत की कोशिश यही होगी की इन अहम मुद्दों पर अमेरिका से सहयोग प्राप्त कर लिया जाय। आतंकवादियों के सुरक्षित पनाह बन चुके पडोसी मुल्क पाकिस्तान पर नकेल कसने के लिए भारत अमेरिका का सहयोग प्राप्त कर सकता है और साथ ही साथ तंग सीमाओं पर शान्ति बहाल करने में सफल हो सकता है। साथ ही परमाणु उत्तरदायित्व पर लचीलापन संभव है जिससे अमेरिकी कम्पनियाँ माल सप्लाई करने के लिए राज़ी हो जाये। खाद्य सुरक्षा और सब्सिडी पर भी दोनों नेता एक दूसरे से बात कर सकते है। आईटी सेक्टर की महत्वाकांक्षाओं को भी तवज्जो दिया जा सकता है साथ ही साथ आयात-निर्यात के दायरों को बढ़ाने हेतु बातचीत संभव है।
दोनों देश आतंकवाद के मुद्दे पर एकजुट दिखाई पड़ते है और मौजूदा चुनौतियों से निपटने हेतु आम सहमति प्रकट कर सकते है।
यह यात्रा भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती लाने के लिए एक ख़ास कदम है। साथ ही सैन्य हथियारों की खरीद-फरोख्त पर भी अमेरिका के साथ ख़ास वार्तालाप हो सकती है एवं अमेरिका द्वारा वांछित मदद भी मिल सकती है। यह यात्रा भारत और अमेरिका के रिश्ते की तरफ नए युग की शुरुआत साबित हो सकती है परन्तु अपने पुराने एवं विश्वसनीय मित्र रूस से नाराज़गी एवं असहयोग का खतरा भी संजोये हुए है। अब देखना ये है कि मोदी की वैश्विक नीति कितना रंग लाती है और कैसे वो अमेरिका और रूस, दो परस्पर विचार विरोधी देशों के संग रिश्ते को आगे बढ़ाने एवं मजबूत करने में सफल होते है।

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लेखक लिटरेचर इन इंडिया जालपत्रिका के प्रधान संपादक हैं।