डर के गठबंधन पर दूरगामी प्रश्नचिन्ह

लगभग दो दशक यानि 1993 के बाद, देश के दो सबसे बड़े क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व को बचाने की कवायद में फिर से एक हो चले हैं| बसपा के संस्थापक कांशीराम और मुलायम सिंह यादव की दोस्ती जब परवान चढ़ी थी तो उस वक़्त मुलायम सिंह यादव द्वारा अस्तित्व में आई समाजवादी पार्टी उत्तरप्रदेश की राजनीति में पाँव ज़माने की कोशिश में लगी हुई थी| … पढ़ना जारी रखें डर के गठबंधन पर दूरगामी प्रश्नचिन्ह

अगस्त हो या सितम्बर, बच्चे तो मरते ही हैं

गोरखपुर की त्रासदी को अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, घाव अभी भी हरा है, सांस अभी भी फूली है, दर्द अभी भी बेशुमार है; और साथ ही साथ यह भी याद है कि कैसे उपचार में हुई लापरवाही और कमिशनखोरी पर लगाम कसने में नाकाम सरकार की वजह से सैकड़ों बच्चे मार दिए गये| जी हाँ, वो बच्चे मरे नहीं, मारे गए…लेकिन योगी … पढ़ना जारी रखें अगस्त हो या सितम्बर, बच्चे तो मरते ही हैं

बाढ़ से निपटना तो हमें सीखना ही होगा

पूरब में असम, पश्चिम में गुजरात और दक्षिण में कर्नाटक तक बाढ़ का प्रकोप जारी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग से वर्षा की कुल मात्रा पूर्ववत रहेगी पर बारिश के पैटर्न में बदलाव आएगा। गर्म हवा में पानी धारण करने की शक्ति अधिक होती है। गर्म बादल बरसते है तो ताबड़तोड़ ज्यादा पानी गिरता है, लेकिन फिर सूखा पड़ जाता है। जैसे … पढ़ना जारी रखें बाढ़ से निपटना तो हमें सीखना ही होगा

जातीय आरक्षण की आग से अगर देश को बचाना है तो तमाम चीज़ों का निजीकरण ही एकमात्र रास्ता

जातीय आरक्षण की आग से अगर देश को बचाना है तो तमाम चीज़ों का निजीकरण ही एकमात्र रास्ता शेष रह गया है । वह चाहे रेल हो , रोडवेज हो या बिजली । या कोई और उपक्रम । सरकारी उपक्रमों के निजीकरण से कई फ़ायदे होंगे । एक तो चीजें पटरी पर आ जाएंगी , भ्रष्टाचार खत्म होगा , सेवाएं सुधर जाएंगी । उदाहरण के … पढ़ना जारी रखें जातीय आरक्षण की आग से अगर देश को बचाना है तो तमाम चीज़ों का निजीकरण ही एकमात्र रास्ता

नए रोजगार देश में सिर्फ औद्योगिक उत्पादन से आ सकते हैं

विख्यात अर्थशास्त्री एडम स्मिथ लिखते हैं कि एक भिखारी अपने समाज की कृपा पर जीता है. देश के बाकि लोग तो रोजगार करके, श्रम करके , धन अर्जित करते हैं, लेकिन सिर्फ भिखारी ही ऐसा नागरिक है जो दूसरों की उदारता पर जीता है. 18वीं शताब्दी के एडम स्मिथ के ये विचार आज के अर्थशास्त्र के सूत्र है. स्मिथ की माने तो हर हाथ को … पढ़ना जारी रखें नए रोजगार देश में सिर्फ औद्योगिक उत्पादन से आ सकते हैं

अगर आप समाजवादी पार्टी से है तो अखिलेश बबुआ की पुलिस आपकी ज़ेब में है

भले ही आजकल समाजवाद का झंडा बुलंद किये उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी साफ़ छवि का ढिंढोरा पीट रहे हो पर उन्हीं की पार्टी के कार्यकर्ता कुछ न कुछ ऐसा कर जाते हैं जिससे उनके किये कराये पर पानी फिर जाता है| हाल में जिस नाटकीय घटनाक्रम से उत्तरप्रदेश का यादव परिवार गुज़र रहा है, अखिलेश यादव हर जगह अपनी साफ़ छवि की ब्रांडिंग … पढ़ना जारी रखें अगर आप समाजवादी पार्टी से है तो अखिलेश बबुआ की पुलिस आपकी ज़ेब में है

क़ुरान ने हमलावरों से बचाई एक हिंदू की जान

लिंडा प्रेस्ली बीबीसी न्यूज़, ढाका बांग्लादेश में ढाका के एक रेस्तरां होली आर्टिज़न बेकरी में पिछले साल एक जुलाई को हुए चरमपंथी हमले में 29 लोग मारे गए थे. शाम का समय था, जब पांच हथियारबंद चरमपंथियों ने ढाका के भीड़भाड़ वाले इलाके में इस रेस्तरां पर हमला किया था. उस वक़्त वहाँ ज़्यादातर जापान और इटली के पर्यटक थे. लेकिन अचानक हुए इस हमले … पढ़ना जारी रखें क़ुरान ने हमलावरों से बचाई एक हिंदू की जान

डिजिटल क्रांति एवं जनसेवा की ओर अग्रसर यूपी पुलिस

डिजिटल क्रांति एवं जनसेवा की ओर अग्रसर यूपी पुलिस पढ़ना जारी रखें डिजिटल क्रांति एवं जनसेवा की ओर अग्रसर यूपी पुलिस

Maovad.. - Literature in India

माओवाद सही भी है, गलत भी…बस नज़रिए का फर्क है|

नई दिल्ली से धनबाद की यात्रा पर हूँ| लोगों से बहुत सुना था कि झारखंड प्राकृतिक सौन्दर्य को अभी भी संवारे हुए है, इसलिए प्रकृति के इस नायाब करिश्मे और सुन्दरता को देखने का मन हुआ| बहुत सोचने के बाद तय किया कि भारतीय रेल से यात्रा की जाय क्यूंकि रेल की पटरियों के किनारे ही आपको आधी सुन्दरता का दर्शन हो जाएगा| तो फिर क्या था, मैं ठहरा महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन का अनुयायी, चुनाव आते ही अम्बेडकरवाद में पगलाए मेरे देश के नेताओं और लेखकों से कहीं दूर….सैर कर दुनिया की गाफ़िल जिंदगानी फिर कहाँ….को महसूस करने…वास्तव में असली लेखक वही है जो प्रकृति और मानव विज्ञान में निहित प्रेम के दर्पण में खुद की मानवता का प्रतिबिम्ब उद्धृत कर ले| मैंने भी इसी परिपाटी को आगे बढाने की ठानी| मैंने भी सोचा क्यूँ न एक लेखक होने के नाते महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन हो जाया जाय| अथाह सुख की अनुभूति है प्रकृति की बाहों में|

इसी बीच जब मेरे अंदर का मानव जाग जाता है तो मेरी निगाहें पास बैठे लोगों के पास पहुँच जाती है…कुछ लोग मस्त हवा के आनंद में इस कदर जन्म भर से थकाए है कि उंघ रहे है…कुछ दुसरे के कंधे पर सर मार कर सो रहे है और मैं एक बन्दर की तरह सब सुत्तक्कड़ो के बीच प्रकृति की सुन्दरता ही निहार रहा कर अघा रहा हूँ| भले ही ढंग से हिंदी न आती हो लेकिन सुबह होते ही सबके हाथ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया, द हिन्दू और द टेलीग्राफ है| मेरे हाथ में सब अमर उजाला देख कर यूँ घुर रहे है जैसे मैं भारत में नहीं रूस के किसी ट्रेन के डिब्बे में बैठ कर हिंदी अखबार को सबकी निगाहों में चुभने के लिए खोल दिया हूँ| खैर ज्यादा पढ़े – लिखे लोग खतरनाक होते है इसलिए मैं अपनी निगाहों को फिलहाल अपने अखबार में ही समेट कर रखा हूँ| इसी बीच ट्रेन के बीच कुछ अतिसज्जन लोग घुस कर बोल रहे है कि “तनी खिसका हो, काहें इतना दूरे ले बैठल हवा, हमनो के तनी स जगह चाही मतलब चाही…बुझाइल|”
पढ़ना जारी रखें माओवाद सही भी है, गलत भी…बस नज़रिए का फर्क है|

आखिर कितना सही है मैगी पर प्रतिबन्ध? नियमों का पालन या कुछ और?

मैगी की शुरुआत इतनी नयी नहीँ है जितना की आम आदमी भारत में सोचता है। मैगी का प्रचलन 2004 के बाद बहुत ज्यादा बढ़ गया पर क्या आपको पता है कि आपके पसंदीदा खाद्य पदार्थो में से एक रहे मैगी का इतिहास क्या है? आखिर कितना पुराना है आपका मैगी ब्राण्ड? आइए हम आपको बताते है। मैगी का इतिहास मैगी ब्रांड के जनक जूलियस मैगी … पढ़ना जारी रखें आखिर कितना सही है मैगी पर प्रतिबन्ध? नियमों का पालन या कुछ और?

चार सवाल बनाम भूमि अधिग्रहण बिल/विधेयक – ठाकुर दीपक सिंह कवि

यह लेख आपके समक्ष प्रस्तुत करने से पहले मैं आप सभी को अवगत कराना चाहता हूँ कि इस लेख के कुछ अंश मैंने पढ़ कर या फिर विभिन्न रचनाकारों की राय के आधार पर लिखे है, अगर यहाँ पर प्रस्तुत विचार आप की रचना के किसी अंश से थोड़ा बहुत भी मेल खाता प्रतीत हो समझ लीजियेगा कि हाल फिलहाल में मैं आपके लेख, विचार … पढ़ना जारी रखें चार सवाल बनाम भूमि अधिग्रहण बिल/विधेयक – ठाकुर दीपक सिंह कवि

कितना ख़ास है सशक्त लोकतंत्र के मुखिया का सबसे बड़े लोकतंत्र में आगमन?-ठाकुर दीपक सिंह कवि (प्रधान संपादक)

भारत और अमेरिका के सुर अतीत में भले ही एक दूसरे से मेल न खाते रहे हो परंतु आज स्थिति में वांछित बदलाव है। दोनों ही देश के प्रमुख विकास के मुद्दे पर आम सहमति रखने वाले है। वैश्विक मंचो पर दोनों ही देश गर्मजोशी से मिले है और विचारधारा में भी आपसी समन्वय है। रिश्तों और आकांक्षाओं की बात करने से पहले पूर्व में … पढ़ना जारी रखें कितना ख़ास है सशक्त लोकतंत्र के मुखिया का सबसे बड़े लोकतंत्र में आगमन?-ठाकुर दीपक सिंह कवि (प्रधान संपादक)