जब हमीरपुर के डीएम ने दी थी मुंशी प्रेमचंद को धमकी

हिंदी साहित्य में प्रेमचंद का कद काफी ऊंचा है और उनका लेखन कार्य एक ऐसी विरासत है, जिसके बिना हिंदी के विकास को अधूरा ही माना जाएगा। मुंशी प्रेमचंद एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता और बहुत ही सुलझे हुए संपादक थे। प्रेमचंद ने हिंदी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया, जिसने एक पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। उनकी लेखनी इतनी समृद्ध थी … पढ़ना जारी रखें जब हमीरपुर के डीएम ने दी थी मुंशी प्रेमचंद को धमकी

प्रेमचंद के जन्मदिवस पर विशेष

दुनिया के महानतम कथाकारों में शुमार मुंशी प्रेमचंद ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गोरखपुर की जिस रावत पाठशाला से पाई थी वहां उनका नामोनिशां तक नहीं है। यही नहीं पाठशाला के आधे से ज्यादा हिस्से की दीवारें दरककर आज जीर्णशीर्ण अवस्था में पड़ी हैं। गोरखपुर नगर निगम ने पिछले साल कुछ काम जरूर कराया लेकिन पाठशाला से उसके अति विशिष्ट छात्र प्रेमचंद के रिश्ते को धरोहर … पढ़ना जारी रखें प्रेमचंद के जन्मदिवस पर विशेष

Nagarjun_Poet

महाकवि नागार्जुन की जयंती पर विशेष

नागार्जुन (30जून 1911- 5 नवम्बर 1998) हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। अनेक भाषाओं के ज्ञाता तथा प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकार नागार्जुन ने हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली संस्कृत एवं बाङ्ला में मौलिक रचनाएँ भी कीं तथा संस्कृत, मैथिली एवं बाङ्ला से अनुवाद कार्य भी किया। नागार्जुन का जन्म १९११ ई० की ज्येष्ठ पूर्णिमा को वर्तमान मधुबनी जिले के सतलखा में हुआ था। … पढ़ना जारी रखें महाकवि नागार्जुन की जयंती पर विशेष

alka saraogi

अलका सरावगी

अलका सरावगी (जन्म- 17 नवम्बर,1960, कोलकाता) हिन्दी कथाकार हैं। वे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं। कोलकाता (भूतपूर्व कलकत्ता) में जन्मी अलका ने हिन्दी साहित्य में एम.ए. और ‘रघुवीर सहाय के कृतित्व’ विषय पर पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की है। “कलिकथा वाया बाइपास” उनका चर्चित उपन्यास है, जो अनेक भाषाओं में अनुदित हो चुके हैं। अपने प्रथम उपन्यास ‘कलिकथा वाया बायपास’ से एक सशक्त उपन्यासकार के रूप में स्थापित हो चुकी अलका … पढ़ना जारी रखें अलका सरावगी

Mahakavi Tulsidas | रामायण

हिंदी साहित्य में महाकवि तुलसीदास का युग – मृत्युंजय दीक्षित

गोस्वामी जी के साहित्य में जीवन की सभी परिस्थितियों का वर्णन है। उन्होंने प्रत्येक काव्य में मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति की है। वे राम के अनन्य भक्त हैं। उन्हें केवल राम पर ही विश्वास है। राम पर पूर्ण विश्वास करते हुए उन्होंने उनके उस मंगलकारी रूप को समाज के सामने प्रस्तुत किया है पढ़ना जारी रखें हिंदी साहित्य में महाकवि तुलसीदास का युग – मृत्युंजय दीक्षित

Meghdoot by Kalidas in Hindi

मेघदूत – कालिदास (हिंदी रूपांतरण)

कश्चित्‍कान्‍ताविरहगुरुणा स्‍वाधिकारात्‍प्रमत:
शापेनास्‍तग्‍ड:मितमहिमा वर्षभोग्‍येण भर्तु:।
यक्षश्‍चक्रे जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु
स्निग्‍धच्‍छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।| पढ़ना जारी रखें मेघदूत – कालिदास (हिंदी रूपांतरण)

bhule bisre rachnakaar Hindi

भूले-बिसरे रचनाकार : अरुणा सीतेश

डॉ॰ अरुणा सीतेश (३१ अक्टूबर१९४५-१९ नवंबर२००७) हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार थीं। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९६५ में अंग्रेज़ीसाहित्य में एम. ए. किया और स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया। १९७० में उन्होंने यहीं से डी. फ़िल की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध इंद्रप्रस्थ कॉलेज में प्राध्यापिका के पद से उन्होंने अपने कार्य-जीवन का प्रारंभ किया। बाद में वे क्रमशः रीडर तथा प्रधानाचार्या के पद पर आसीन हुईं। अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका और प्रख्यात … पढ़ना जारी रखें भूले-बिसरे रचनाकार : अरुणा सीतेश

maut se than gayi poem by atal bihari vajpayee

मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी

ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, … पढ़ना जारी रखें मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी

कुटज – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्‍या। पूर्व और अपार समुद्र – महोदधि और रत्‍नाकर – दोनों को दोनों भुजाओं से थाहता हुआ हिमालय ‘पृथ्‍वी का मानदंड’ कहा जाय तो गलत क्‍यों है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। इसी के पाद-देश में यह जो श्रृंखला दूर तक लोटी हुई है, लोग इसे ‘शिवालिक’ श्रृंखला कहते हैं। ‘शिवालिक’ का … पढ़ना जारी रखें कुटज – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

Andhkaar se joojhna hai_hajari prasad dwivedi_literature in india

अंधकार से जूझना है – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

दीवाली याद दिला जाती है उस ज्ञानलोक के अभिनव अंकुर की, जिसने मनुष्‍य की कातर प्रार्थना को दृढ़ संकल्‍प का रूप दिया था – अंधकार से जूझना है, विघ्न-बाधाओं की उपेक्षा करके, संकटों का सामना करके। पढ़ना जारी रखें अंधकार से जूझना है – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

Story by Saadat Ali Hasan Manto

सियाह हाशिए – सआदत हसन मंटो

करामात   लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए। लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अँधेरे में बाहर फेंकने लगे; कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, कानूनी गिरफ्त से बचे रहें। एक आदमी को बहुत दिक्कत पेश आई। उनके पास शक्कर की दो बोरियाँ थीं जो उसने … पढ़ना जारी रखें सियाह हाशिए – सआदत हसन मंटो

आज शाम है बहुत उदास

लोहामंडी… कृषि कुंज… इंदरपुरी… टोडापुर… ठक ठक ठक… खटारा ब्लू लाइन के कंडक्टर ने खिड़की से एक हाथ बाहर निकाल बस के टीन को पीटते हुए जोर से गला फाड़कर आवाज लगाई, मानो सवारियों के घर-दफ्तरों तक से उन्हें खींच लाने का मंसूबा हो। उस ठक-ठक में आस्था अक्सर टीन का रुदन सुना करती थी, उस दिन भी सुना। जिस बेरहमी से उसे पीटा जाता … पढ़ना जारी रखें आज शाम है बहुत उदास

आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद

हिमावृत चोटियों की श्रेणी, अनन्त आकाश के नीचे क्षुब्ध समुद्र! उपत्यका की कन्दरा में, प्राकृतिक उद्यान में खड़े हुए युवक ने युवती से कहा-”प्रिये!” ”प्रियतम! क्या होने वाला है?” ”देखो क्या होता है, कुछ चिन्ता नहीं-आसव तो है न?” ”क्यों प्रिय! इतना बड़ा खेल क्या यों ही नष्ट हो जायेगा?” ”यदि नष्ट न हो, खेल ज्यों-का-त्यों बना रहे तब तो वह बेकार हो जायेगा।”   … पढ़ना जारी रखें आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद

हॉर्स रेस

शिखर बहुराष्ट्रीय कंपनी के वातानुकूलित कमरे में बैठा हुआ था। उम्र होगी यही कोई पैंतीस के आस-पास। चेहरे पर थकान ने अपना बसेरा बना लिया था, फिर भी गाल और ललाट आत्मविश्वास से दमक रहे थे। अभी वह थोड़ा रिलैक्सड महसूस कर रहा था, क्योंकि कंपनी के टारगेट पूरे हो चुके थे। जो बाकी थे उनके भी पूरे होने की पक्की उम्मीद थी। तभी उसके … पढ़ना जारी रखें हॉर्स रेस

यहाँ-वहाँ हर कहीं

उस दिन शाम को पाँच बजे ही संजीव ऑफिस से वापस आ गया था। लिफ्ट से ऊपर जाकर उसने अपार्टमेंट की घंटी बजाई तो रोज की तरह दरवाजा नहीं खुला। वह बाहर खड़ा इंतजार करता रहा। फिर दूसरी और तीसरी बार भी बजाई तो दरवाजा वैसे ही बंद रहा। तब उसे लगा कि उसके पापा कहीं चले गए हैं। यदि वे भीतर होते तो फौरन … पढ़ना जारी रखें यहाँ-वहाँ हर कहीं

पेड़ का तबादला

सुदूर कहीं निर्जन में एक अनाम पेड़ था जिसे वहाँ के लोग अब तक पहचान नहीं सके थे। धरती की गहराई से एक जीवन निकला था – हरे रंग का जीवन, एक बिरवा। कोमल-कोमल दो चार पत्तियों को लेकर इठलाता हुआ। उसके भीतर पूरी जिजीविषा भरी हुई थी। वह अपने चारों ओर फैले निसर्ग को बड़े कौतूहल के साथ देखता, पहचानता और स्वीकार करता। उसे … पढ़ना जारी रखें पेड़ का तबादला

नंदन पार्क – अंजना वर्मा

इस बार जोर की ठंड पड़ रही थी और सूरज भी कोहरे की लिहाफ ओढ़ कर सो गया था। कहाँ सब सोच रहे थे कि अब ठंड चली गई। समय भी तो उसके जाने का हो गया था, पर अब जाते-जाते वह अपना असली चेहरा दिखा रही थी। मेहनतकश लोगों में जवान लोग तो ठीक थे, बूढ़े और बच्चों के लिए मुश्किल हो गई थी। … पढ़ना जारी रखें नंदन पार्क – अंजना वर्मा

कौन तार से बीनी चदरिया

खामोश हवा अचानक गीत पर मृदंग के सुरों से झनकने लगी थी। कड़ी, चिकनी आवाज में वे सब बाहर दरवाजे पर खड़ी होकर गा रही थीं, ”जच्चा रानी सोने के पलंग बिछा जा जच्चा रानी सोने के पलंग” सुशील के साथ-साथ किरण ने खिड़की की दरार से बाहर झाँका। ऐसे तो किरण समझ ही गई थी कि यह आवाज किसकी है? कौन आया होगा अभी? … पढ़ना जारी रखें कौन तार से बीनी चदरिया

पुर्जा – ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग

अनुवाद – विजय शर्मा सामान की आखिरी खेप जा चुकी थी। किराएदार, क्रेपबैंड हैटवाला जवान आदमी, खाली कमरों में अंतिम बार पक्का करने के लिए घूमता है कि कहीं पीछे कुछ छूट तो नहीं गया। कुछ नहीं भूला, कुछ भी नहीं। वह बाहर सामने हॉल में गया। पक्का निश्चय करते हुए कि इन कमरों में जो कुछ भी उसके साथ हुआ वह उसे कभी याद नहीं … पढ़ना जारी रखें पुर्जा – ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग

धनिया की साड़ी – ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग

लड़ाई का ज़माना था, माघ की एक साँझ। ठेलिया की बल्लियों के अगले सिरों को जोडऩे वाली रस्सी से कमर लगाये रमुआ काली सडक़ पर खाली ठेलिया को खडख़ड़ाता बढ़ा जा रहा था। उसका अधनंगा शरीर ठण्डक में भी पसीने से तर था। अभी-अभी एक बाबू का सामान पहुँचाकर वह डेरे को वापस जा रहा था। सामान बहुत ज़्यादा था। उसके लिए अकेले खींचना मुश्किल … पढ़ना जारी रखें धनिया की साड़ी – ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग