आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद

हिमावृत चोटियों की श्रेणी, अनन्त आकाश के नीचे क्षुब्ध समुद्र! उपत्यका की कन्दरा में, प्राकृतिक उद्यान में खड़े हुए युवक ने युवती से कहा-”प्रिये!” ”प्रियतम! क्या होने वाला है?” ”देखो क्या होता है, कुछ चिन्ता नहीं-आसव तो है न?” ”क्यों प्रिय! इतना बड़ा खेल क्या यों ही नष्ट हो जायेगा?” ”यदि नष्ट न हो, खेल ज्यों-का-त्यों बना रहे तब तो वह बेकार हो जायेगा।”   … पढ़ना जारी रखें आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद