मीमांसा दर्शन का स्वरूप

मीमांसा दर्शन सोलह अध्यायों का है, जिसमें बारह अध्याय क्रमबद्ध हैं। शास्त्रसंगति, अध्यायसंगति, पादसंगति और अधिकारसंगतियों से सुसंबद्ध है। इन बारह अध्यायों में जो छूट गया है, उसका निरूपण शेष चार अध्यायों में किया गया है जो ‘संकर्षकांड’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसमें देवता के अधिकार का विवेचन किया गया है। अत: उसे ‘देवता कांड’ भी कहते हैं अथवा द्वादश अध्यायों का परिशिष्ट भी … पढ़ना जारी रखें मीमांसा दर्शन का स्वरूप

मीमांसा दर्शन क्या है?

मीमांसा दर्शन हिन्दुओं के छः दर्शनों में से एक है। पक्ष-प्रतिपक्ष को लेकर वेदवाक्यों के निर्णीत अर्थ के विचार का नाम मीमांसा है। उक्त विचार पूर्व आर्य परंपरा से चला आया है। किंतु आज से प्राय: सवा पाँच हजार वर्ष पूर्व सामवेद के आचार्य कृष्ण द्वैपायन के शिष्य ने उसे सूत्रबद्ध किया। सूत्रों में पूर् पक्ष और सिद्धान्त के रूप में बादरायण, बादरि, आत्रेय, आश्मरथ्य, … पढ़ना जारी रखें मीमांसा दर्शन क्या है?

जैन धर्म में आगम

आगम शब्द का प्रयोग जैन धर्म के मूल ग्रंथों के लिए किया जाता है। केवल ज्ञान, मनपर्यव ज्ञानी, अवधि ज्ञानी, चतुर्दशपूर्व के धारक तथा दशपूर्व के धारक मुनियों को आगम कहा जाता है। कहीं कहीं नवपूर्व के धारक को भी आगम माना गया है। उपचार से इनके वचनों को भी आगम कहा गया है। जब तक आगम बिहारी मुनि विद्यमान थे, तब तक इनका इतना … पढ़ना जारी रखें जैन धर्म में आगम

शब्दप्रमाण क्या है?

आप्त पुरुष द्वारा किए गए उपदेश को “शब्द” प्रमाण मानते हैं। (आप्तोपदेश: शब्द:; न्यायसूत्र 1.1.7)। आप्त वह पुरुष है जिसने धर्म के और सब पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को भली भांति जान लिया है, जो सब जीवों पर दया करता है और सच्ची बात कहने की इच्छा रखता है। न्यायमत में वेद ईश्वर द्वारा प्रणीत ग्रंथ है और ईश्वर सर्वज्ञ, हितोपदेष्टा तथा जगत् का कल्याण … पढ़ना जारी रखें शब्दप्रमाण क्या है?

Rakshabandhan_The_colors_of_the_literature_in_India_जीवन चंद्र परगाॅई सितारगंज (उधम सिंह नगर)

आज राखी के महापर्व-त्यौहार

है दिन आज राखी के महापर्व-त्यौहार का । यह पर्व नहीं महाउत्सव है भाई-बहन के प्यार का ।। तुम आज ना मांगो मुझसे कोई रक्षा का वचन । तुम्हारी हर खुशी के लिए समर्पित है मेरा तन मन ।। लेकिन तुम कोई अबला नारी नहीं इस युग में । तुमसे ही तो क्रांति के दीप जले हर इक युग में ।। जो आज मैं तुमको … पढ़ना जारी रखें आज राखी के महापर्व-त्यौहार

शब्दार्थ ग्रहण

बच्चा समाज में सामाजिक व्यवहार में आ रहे शब्दों के अर्थ कैसे ग्रहण करता है, इसका अध्ययन भारतीय भाषा चिन्तन में गहराई से हुआ है और अर्थग्रहण की प्रक्रिया को शक्ति के नाम से कहा गया है। शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च। वाक्यस्य शेषाद् विवृत्तेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः॥ — (न्यायसिद्धांतमुक्तावली-शब्दखंड) इस कारिका में अर्थग्रहण के आठ साधन माने गए हैं: 1- व्याकरण, 2- उपमान, 3- कोश, 4- … पढ़ना जारी रखें शब्दार्थ ग्रहण

अर्थ की दृष्टि से शब्द-भेद

अर्थ की दृष्टि से शब्द के दो भेद हैं- 1. सार्थक 2. निरर्थक 1. सार्थक शब्द : जिन शब्दों का कुछ-न-कुछ अर्थ हो वे शब्द सार्थक शब्द कहलाते हैं। जैसे-रोटी, पानी, ममता, डंडा आदि। 2. निरर्थक शब्द : जिन शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता है वे शब्द निरर्थक कहलाते हैं। जैसे-रोटी-वोटी, पानी-वानी, डंडा-वंडा इनमें वोटी, वानी, वंडा आदि निरर्थक शब्द हैं। निरर्थक शब्दों पर … पढ़ना जारी रखें अर्थ की दृष्टि से शब्द-भेद

प्रयोग के आधार पर शब्द-भेद

प्रयोग के आधार पर शब्द के निम्नलिखित दो भेद होते है- 1.विकारी शब्द 2.अविकारी शब्द 1-विकारी शब्द के चार भेद होते है 1. संज्ञा 2. सर्वनाम 3. विशेषण 4. क्रिया अविकारी शब्द के चार भेद होते है 1. क्रिया-विशेषण 2. संबंधबोधक 3. समुच्चयबोधक 4. विस्मयादिबोधक इन उपर्युक्त आठ प्रकार के शब्दों को भी विकार की दृष्टि से दो भागों में बाँटा जा सकता है- विकारी … पढ़ना जारी रखें प्रयोग के आधार पर शब्द-भेद

उत्पत्ति के आधार पर शब्द-भेद

उत्पत्ति के आधार पर शब्द के निम्नलिखित चार भेद हैं- तत्सम जो शब्द संस्कृत भाषा से हिन्दी में बिना किसी परिवर्तन के ले लिए गए हैं वे तत्सम कहलाते हैं। जैसे-अग्नि, क्षेत्र, वायु, ऊपर, रात्रि, सूर्य आदि। तद्भव जो शब्द रूप बदलने के बाद संस्कृत से हिन्दी में आए हैं वे तद्भव कहलाते हैं। जैसे-आग (अग्नि), खेत (क्षेत्र), रात (रात्रि), सूरज (सूर्य) आदि। देशज जो … पढ़ना जारी रखें उत्पत्ति के आधार पर शब्द-भेद

शब्द और उसके भेद

एक या एक से अधिक वर्णों से बनी हुई स्वतंत्र सार्थक ध्वनि शब्द है। जैसे- एक वर्ण से निर्मित शब्द- न (नहीं) व (और) अनेक वर्णों से निर्मित शब्द-कुत्ता, शेर, कमल, नयन, प्रासाद, सर्वव्यापी, परमात्मा आदि भारतीय संस्कृति में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। एक से ज़्यादा शब्द मिलकर एक पूरा वाक्य बनाते है। शब्द के भेद व्युत्पत्ति के आधार पर व्युत्पत्ति (बनावट) के … पढ़ना जारी रखें शब्द और उसके भेद

स्वतंत्रता – अजय वर्मा

अलगाव के बहुत अहसास है धर्म की आड़ है पंथों के दर्शन है मान्यताओं के भेद है वादों के सिद्धांत हैं अलगाव के बहुत अहसास है उम्र के बंधन है रिश्तो के नाम है साधनों के जश्न हैं अभावों के दर्द हैं अलगाव के बहुत अहसास है आस पाने की है डर खोने का है हकों की मांग है हितों का सवाल है अलगाव के … पढ़ना जारी रखें स्वतंत्रता – अजय वर्मा

भाषाविज्ञान में ‘अक्षर’

भाषाविज्ञान में ‘अक्षर’ या शब्दांश (अंग्रेज़ी: syllable सिलाबल) ध्वनियों की संगठित इकाई को कहते हैं। किसी भी शब्द को अंशों में तोड़कर बोला जा सकता है और शब्दांश शब्द के वह अंश होते हैं जिन्हें और ज़्यादा छोटा नहीं बनाया जा सकता वरना शब्द की ध्वनियाँ बदल जाती हैं। उदाहरणतः ‘अचानक’ शब्द के तीन शब्दांश हैं – ‘अ’, ‘चा’ और ‘नक’। यदि रुक-रुक कर ‘अ-चा-नक’ … पढ़ना जारी रखें भाषाविज्ञान में ‘अक्षर’

समास

दो शब्द आपस में मिलकर एक समस्त पद की रचना करते हैं। जैसे-राज+पुत्र = राजपुत्र, छोटे+बड़े = छोटे-बड़े आदि समास छ: होते हैं: द्वन्द, द्विगु, तत्पुरुष, कर्मधारय, अव्ययीभाव और बहुब्रीहि पढ़ना जारी रखें समास

संधि

संधि (सम् + धि) शब्द का अर्थ है ‘मेल’। दो निकटवर्ती वर्णों के परस्पर मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है वह संधि कहलाता है। जैसे – सम् + तोष = संतोष ; देव + इंद्र = देवेंद्र ; भानु + उदय = भानूदय। संधि के भेद संधि तीन प्रकार की होती हैं – स्वर संधि व्यंजन संधि विसर्ग संधि पढ़ना जारी रखें संधि

प्रत्यय

वे शब्द जो किसी शब्द के अन्त में जोड़े जाते हैं, उन्हें प्रत्यय(प्रति + अय = बाद में आने वाला) कहते हैं। जैसे- गाड़ी + वान = गाड़ीवान, अपना + पन = अपनापन पढ़ना जारी रखें प्रत्यय

उपसर्ग

वे शब्द जो किसी दूसरे शब्द के आरम्भ में लगाये जाते हैं। इनके लगाने से शब्दों के अर्थ परिवर्तन या विशिष्टता आ सकती है। प्र+ मोद = प्रमोद, सु + शील = सुशील उपसर्ग प्रकृति से परतंत्र होते हैं। उपसर्ग चार प्रकार के होते हैं – 1) संस्कृत से आए हुए उपसर्ग, 2) कुछ अव्यय जो उपसर्गों की तरह प्रयुक्त होते है, 3) हिन्दी के … पढ़ना जारी रखें उपसर्ग

कारक

८ कारक होते हैं। कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, संबन्ध, अधिकरण, संबोधन। किसी भी वाक्य के सभी शब्दों को इन्हीं ८ कारकों में वर्गीकृत किया जा सकता है। उदाहरण- राम ने अमरूद खाया। यहाँ ‘राम’ कर्ता है, ‘खाना’ कर्म है। दो वस्तुओं के मध्य संबन्ध बताने वाले शब्द को संबन्धकारक कहते हैं। उदाहरण – ‘यह मोहन की पुस्तक है।’ यहाँ “की” शब्द “मोहन” और “पुस्तक” … पढ़ना जारी रखें कारक

वचन

हिन्दी में वचन दो होते हैं- (१) एकवचन (२) बहुवचन शब्द के जिस रूप से एक ही वस्तु का बोध हो, उसे एकवचन कहते हैं। जैसे-लड़का, गाय, सिपाही, बच्चा, कपड़ा, माता, माला, पुस्तक, स्त्री, टोपी बंदर, मोर आदि। शब्द के जिस रूप से अनेकता का बोध हो उसे बहुवचनकहते हैं। जैसे-लड़के, गायें, कपड़े, टोपियाँ, मालाएँ, माताएँ, पुस्तकें, वधुएँ, गुरुजन, रोटियाँ, स्त्रियाँ, लताएँ, बेटे आदि। हिन्दी … पढ़ना जारी रखें वचन

विस्मयादि बोधक

विस्मय प्रकट करने वाले शब्द को विस्मायादिबोधक कहते हैं। उदाहरण – अरे! मैं तो भूल ही गया था कि आज मेरा जन्म दिन है। यहाँ “अरे” शब्द से विस्मय का बोध होता है अतः यह विस्मयादिबोधक है।[3] पुरुष एकवचन बहुवचन उत्तम पुरुष मैं हम मध्यम पुरुष तुम तुम लोग / तुम सब अन्य पुरुष यह ये वह वे / वे लोग आप आप लोग / … पढ़ना जारी रखें विस्मयादि बोधक

समुच्चय बोधक

दो शब्दों या वाक्यों को जोड़ने वाले संयोजक शब्द को समुच्चय बोधक कहते हैं। उदाहरण – ‘मोहन और सोहन एक ही शाला में पढ़ते हैं।’ यहाँ “और” शब्द “मोहन” तथा “सोहन” को आपस में जोड़ता है इसलिए यह संयोजक है। ‘मोहन या सोहन में से कोई एक ही कक्षा कप्तान बनेगा।’ यहाँ “या” शब्द “मोहन” तथा “सोहन” को आपस में जोड़ता है इसलिए यह संयोजक … पढ़ना जारी रखें समुच्चय बोधक