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रचनाएँ भेजे

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महत्वपूर्ण सूचना: २०० से अधिक रचनाएँ प्रकाशनार्थ पंक्तिबद्ध होने के कारण दिसंबर माह तक कोई भी नई रचना प्रकाशनार्थ स्वीकार नहीं की जा सकेगी| आपको हुई असुविधा हेतु खेद है|

नोट:

  • रचना प्रकाशनार्थ प्राप्त होने के उपरांत प्रकाशन हेतु विचाराधीन रहेगी| प्रकाशन हेतु सहमति के पश्चात रचना को literatureinindia.com पर प्रकाशित किया जायेगा|
  • प्राप्त रचनाओं की संख्या अधिक होने के कारण इस पूरी प्रक्रिया में 15-20 दिन का समय अपेक्षित है|
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111 विचार “रचनाएँ भेजे&rdquo पर;

  1. मै एक सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन को लेकर उपवास कर लखनऊ मे आन्दोलन मे सहभागिता की कोशिश की थी ।और सूचना के अधिकार अधिनियम के लागू होने से पहले ही सूचना के अधिकार के आन्दोलन की कोशिश भरावन हरदोई मे किया था उस समय अरविंद केजरीवाल जी भी मेरे घर चाय पर जाकर मेरे जमीनी स्तर के संघर्ष को महत्व दिया था ।उसके बाद से मैने सूचना के अधिकार अधिनियम को लेकर आन्दोलन करने रहा हूॅ ।अभी गांव गाॅव जाकर सूचना के अधिकार की चौपाल लगाकर रहा हूॅ ।और सामूहिक सूचना के आवेदन लगाते हैं ।अभी हाल मे ही भरावन हरदोई मे सांसद अंजू बाला लोक सभा क्षेत्र मिश्रिख से सूचना माॅगी है ।

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  2. मुझे डर नहीं है
    एक दिन तो,
    सबको जाना है,
    पर शायद मुझे,
    कुछ जल्दी जाना है,
    मुझे डर नहीं है,
    मेरे जाने का…
    मुझे डर है,
    मेरे पिता के रोने का,
    मुझे डर है,
    मेरी मम्मी के दुखी होने का,
    मुझे डर है,
    मेरे भाई के सहम जाने का,
    पर मुझे डर नही है,
    मेरे जाने का…
    आखिर मेरे बाद,
    कौन मेरे पिता को हँसाएगा?
    एक मैं ही तो हूँ,
    जो उनके चेहरे पर मुस्कान लाए,
    आखिर मेरे बाद,
    कौन रात-भर मेरी मम्मी से बतलाएगा?
    एक मैं ही तो हूँ,
    जो रात-भर मम्मी से बतलाती हूँ,
    आखिर मेरे बाद,
    कौन मेरे भाई को,
    बार-बार पढने की याद दिलाएगा?
    एक मैं ही तो हूँ,
    जो बार-बार भाई को पढने के
    लिए कहती हूँ,
    आखिर मेरे बाद,
    कौन इन्हें खुश रख पाएगा?
    मुझे डर नही है,
    मेरे जाने का…
    मुझे डर नहीं है,
    मेरे जाने का…

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  3. मैं उभरती कलम नाम से कविताएं लिखता हूँ।उभरती कलम मेरी रचनाओ का संकलन है।मैं आपके माध्यम से अपनी रचनाओं को अमर करना चाहता हूं।कृपया उचित मार्गदर्शन करें।
    धन्यवाद

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  4. मातृत्व शर्मसार है
    **************
    जिस नारी ने जन्म दिया
    उसी नारी को नोच रहे
    मातृत्व शर्मसार है
    भेड़ियों को क्यों जन्म दिए,
    हैवान इतना हावी की
    बच्चियों में यौवन खोज रहे
    मातृत्व शर्मसार है
    कोख को क्यों नही नोच दिए,
    क्या छप्पन क्या दो माह
    सभी पे निगाह निचोड़ रहे
    जिस छाती से दूध पिया
    उसी के कपड़े खींच रहे
    बहने भी शर्मसार हुई
    किन हाथों पे राखी धरे
    रक्षक भक्षक सेवक राजा
    साधु विलासिता भोग रहे
    चोर उचक्के संत और राजा
    राजत्व के भोग भोग रहे
    गांव गली शहर मुहल्ले
    भेड़िये सब ओर विचर रहे
    कहाँ सुरक्षित अबला नारी
    घरों में इज्जत लूट रहें
    सुनो नारी छोड़ो अब लज्जा
    दुर्गा काली के रूप धरें
    उठा खड्ग कर दे हमला तू
    फूलन से कुछ सीख प्रिये
    छोड़ मोह उस बाप भाई का
    जिसने अस्मत पर हस्त धरे
    उठा अस्त्र काट दे हाथों को
    जिसपे तुमने राखी धरे।।।

    From
    उभरती कलम
    By
    जय प्रकाश श्रीवास्तव

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  5. सिर्फ़ अपनी झूठी शान दिखाते हैं लोग

    दिल छोटा रखते हैं
    इमारत बडी बनाते हैं लोग

    नफ़रत दिल मे है
    प्यार जताते है लोग

    अपने सच से हैं बेख़बर
    ओरो को आईना दिखाते हैं लोग

    बेचकर ज़मीर अपना
    नाम कमाते हैं लोग

    ज़ख्म पे मरहम लगाते हैं
    बाद में तमाशा बनाते हैं लोग

    सब अपने मतलब से चलते हैं
    रास्ता कहाँ बताते है लोग

    जीते जी “जीने नही देते”
    मर जाने पे आंसू बहाते हैं लोग ।

    (राजनंदिनी राजपूत)-राजस्थान, ब्यावर

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    1. सिर्फ़ अपनी झूठी शान दिखाते हैं लोग

      दिल छोटा रखते हैं
      इमारत बडी बनाते हैं लोग

      नफ़रत दिल मे है
      प्यार जताते है लोग

      अपने सच से हैं बेख़बर
      ओरो को आईना दिखाते हैं लोग

      बेचकर ज़मीर अपना
      नाम कमाते हैं लोग

      ज़ख्म पे मरहम लगाते हैं
      बाद में तमाशा बनाते हैं लोग

      सब अपने मतलब से चलते हैं
      रास्ता कहाँ बताते है लोग

      जीते जी “जीने नही देते”
      मर जाने पे आंसू बहाते हैं लोग ।

      (राजनंदिनी राजपूत)-राजस्थान, ब्यावर

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  6. दिल की आरजू
    सफनो सी जगी मेरी आरजू
    अपनो सी जगी मेरी आरजू
    लोगो से जगी मेरी आरजू
    …….बस मेरी दिल की आरजू

    गहरे पनो में जगी वो आरजू
    लहरो के किनारे जगी वो आरजू
    मन के एहसास मै बेठी वो आरजू
    …………बस मेरे दिल की आरजू

    पनो मे लिखना एक आरजू
    सफनो में सजाना एक आरजू
    पलको में बसाना एक आरजू
    ………..बस मेरे दिल की आरजू

    जनतो की सजावट आरजू
    खाव्बो की रोनक आरजू
    दिल की बात आरजू
    ……बस मेरे दिल की आरजू
    प्यारी मुस्कान दे जा….
    sumit singh

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  7. आदरणीय महोदय,
    लोग रास्ता पर चलता है। रास्ता पर चलते चलते कांटे भी चुभ सकते हैं। परिणामस्वरूप दर्द होंगे। दर्द सहते हुए अगर कोई कुछ कदम आगे बढता है तो उसे अपने प्रयासों के लिए शाबशी मिलता है। क्या साहित्य कांटे की चुभन को सहते हुए अपनी छत्रछाया में किसी साहित्य के क्षेत्र में नवागन्तुक को शरण नहीं दे सकता? यदि संभव है तो सरल तरीका बताकर कृतार्थ करें।

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