एक मजदूरन!

कर्म में अरुणोदय से  लीन । वस्त्र धारें हैं जीर्ण, मलीन  । बदन उसका है आभाहीन  । क्षुधा की पूर्ति मात्र है धर्म । न जाने दर्प न माने शर्म । तनिक प्रारब्ध, कठिन है कर्म । नही कोई है अपना ठौर । बनेगा कार्यस्थल कल और । अथक औ अंतहीन यह दौर झेलती नन्ही संतति साथ । पंक से सने युगल लघु हाथ । … पढ़ना जारी रखें एक मजदूरन!

बड़ा महत्व है – रमा सिंह

कार्यालय में क्लर्क का, व्यवसाय में संपर्क का जीवन में वर्क का, रेखाओं में कर्क का बड़ा ही महत्व है   इलेक्शन में वोट का, गिरने में चोट का ड्रेस में कोट का, पॉकेट में नोट का बड़ा ही महत्व है   कवियों में बिहारी का, कथा में तिवारी का सभा में दरबारी का, भोजन में तरकारी का बड़ा ही महत्व है   रत्नों में … पढ़ना जारी रखें बड़ा महत्व है – रमा सिंह

बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना – कविता किरण

बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना है हरसू उदासी तुम्ही कुछ कहो ना मैं पतझड़ का मौसम हूँ चुप ही रहा हूँ ओ गुलशन के वासी! तुम्ही कुछ कहो ना कि ढलने को आई शबे-गम ये आधी है बाकी ज़रा-सी तुम्ही कुछ कहो ना समाकर समंदर में भी रह गयी है लहर एक प्यासी तुम्ही कुछ कहो ना मेरे दिल में तुम हो कहीं … पढ़ना जारी रखें बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना – कविता किरण

प्रेम में अंधी लड़की – अंजना संधीर

टैगोर की कविता दे कर उसने चिन्हित किया था शब्दों को कि वो उस रानी का माली बनना चाहता है सख़्त लड़की ने पढ़ा सोचा कि मेरे बाग का माली बनकर वो मेरे लिए क्या-क्या करेगा… खो गई सपनों में लड़की कविता पढ़ते-पढ़ते कि ठाकुर ने कितने रंग बिछाए हैं जीवन में तरंगों के लिए वो देखने लगी माली के शब्द कि जब वो चलेगी … पढ़ना जारी रखें प्रेम में अंधी लड़की – अंजना संधीर

बिटिया बड़ी हो गयी – अंजना बख्शी

देख रही थी उस रोज़ बेटी को सजते-सँवरते शीशे में अपनी आकृति घंटों निहारते नयनों में आस का काजल लगाते, उसके दुपट्टे को बार-बार सरकते और फिर अपनी उलझी लटों को सुलझाते हम उम्र लड़कियों के साथ हँसते-खिलखिलाते । माँ से अपनी हर बात छिपाते अकेले में ख़ुद से सवाल करते, फिर शरमा के, सर को झुकाते । और फिर कभी स्तब्ध मौंन हो जाते; … पढ़ना जारी रखें बिटिया बड़ी हो गयी – अंजना बख्शी

ज़िंदगी – अजनबी राजा

ज़िंदगी इक पहेली है अनदेखी इक सहेली है कही बेबाक़ नादानियाँ है कही थोडी बचकानियां है खुशियों की बरसात है वही ग़मो का अन्धेरा है कही तपती धूप है तो कही नीम की छाँव है हसरतें है इसमें बचपन की ललक है इसमें ज़िंदगी क्या है चले तो उम्र भर की हमसफ़र है वही पल दो पल की हमराह बस की भीड़ है ज़िंदगी तो … पढ़ना जारी रखें ज़िंदगी – अजनबी राजा

कहानी सरहद की – भूपेन्द्र कुमार दवे

‘सरहद पर तैनात जवानों के सामने प्रकृति की खुली किताब होती है जिस पर ईश्वर की इबारत शायद विश्व के सभी ग्रंथों से ज्यादा जीवन को पवित्रता संपन्न कराने की क्षमता रखती है।  मेरे साथी ने उत्तर-पश्चिम सरहदों का नजारा देखकर यह कहा था। उसने प्रश्न किया था, ‘यह सरहद यहाँ आकर रुक क्यों जाती है? सारे विश्व को यदि यह अपने आगोश में ले … पढ़ना जारी रखें कहानी सरहद की – भूपेन्द्र कुमार दवे

मेरी मुन्नी का कमरा – तरुण कुमार

मेरी मुन्नी का कमरा वो टेडी बियर पूछता है मुझसे तुम्हारा पता, गुमसुम सा तकता वो रेसिंग कारे, वो काठ का घोड़ा, वो गुडिया के उतरे कपडे, जो सोती थी दुबक कर मुन्नी के साथ, कबसे वैसे पड़ी है , मुन्नी तुम्हारे कमरे में सबसे बेह्टर और बोलती हैं दीवारें, तुम्हारी पेंटिंग्स के आगे एम् ऍफ़, पिकासों हैं फीके, मेरा अजंता, एलोरा यही हैं, मुन्नी … पढ़ना जारी रखें मेरी मुन्नी का कमरा – तरुण कुमार

बदनाम न करो राम , खुदा – जय नारायण कश्यप

१- अलिफ से अल्लाह जो कहे , और ॐ कहे दिल से , उनसे कहें , मस्जिद मंदिर , तुम्हारी चले फिर से , हमें उनसे करो आज़ाद जो , इंसान को देखें घिन से , थक गए हैं , पक गए हैं , धर्मांधों के सितम से , तुम लड़ो तो लड़ो खुद के लिए , भूख प्यास , हद के लिए , पर … पढ़ना जारी रखें बदनाम न करो राम , खुदा – जय नारायण कश्यप

यह  अश्क  जो बहते हैं – ओनिका सेतिया ”अनु ”

यह   अश्क   जो   बहते  है  इस तरह  , जिंदगी से  इनका   नाता  है इस तरह . जिंदगी  चाहे हालातों  से  ना उबर  पाए , अश्क अपना रास्ता  बनायेगे ही इसी तरह . जज्बातों  की जहाँ  में  कोई कद्र नहीं   , अनदेखी  अश्कों  की होती है इस तरह . तकदीर और ज़माने  के सताए  हुए हम , यह  बेवजह तो नहीं बहते  इस तरह . अपने  … पढ़ना जारी रखें यह  अश्क  जो बहते हैं – ओनिका सेतिया ”अनु ”

||| स्त्री के मन के रंग |||- विजय कुमार सप्पति

“सिलवटों की सिहरन” अक्सर तेरा साया एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है ….. मेरे हाथ, मेरे दिल की तरह कांपते है, जब मैं उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ ….. तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छु जाता है जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था, मैं सिहर सिहर … पढ़ना जारी रखें ||| स्त्री के मन के रंग |||- विजय कुमार सप्पति