विरहणी

भोर में ही विरहणी आंगन बुहारती, कर्मलीना प्रतिपल सोचती विचारती, तक रही है द्वार को दृष्टि है अनिमेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। उर ज्वलित विरहाग्नि से भस्म होती देह, और भड़काते बरस नयन रूपी मेह, पिय मिलन का ही रहा बस अभीप्सित शेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। थी भरी हर सौख्य से कंत थे जब पास, है यही जीवन बचा चल रही बस … पढ़ना जारी रखें विरहणी

एक मजदूरन!

कर्म में अरुणोदय से  लीन । वस्त्र धारें हैं जीर्ण, मलीन  । बदन उसका है आभाहीन  । क्षुधा की पूर्ति मात्र है धर्म । न जाने दर्प न माने शर्म । तनिक प्रारब्ध, कठिन है कर्म । नही कोई है अपना ठौर । बनेगा कार्यस्थल कल और । अथक औ अंतहीन यह दौर झेलती नन्ही संतति साथ । पंक से सने युगल लघु हाथ । … पढ़ना जारी रखें एक मजदूरन!