Vetican City - Short Story by Savita Mishta Akshaja

वेटिकनसिटी – सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

“मेरी बच्ची ! तू सोच रही होगी कि मैंने इस तीसरे अबॉर्शन के लिए सख्ती से मना क्यों नहीं किया !!” ओपीडी के स्ट्रेचर पड़ी बिलखती हुई माँ ने अपने पेट को हथेली से सहलाते हुए कहा। पेट में बच्ची की हल्की-सी हलचल हुई। “तू कह रही होगी कि माँ डायन है ! अपनी ही बच्ची को खाए जा रही है। नहीं! मेरी प्यारी गुड़िया, … पढ़ना जारी रखें वेटिकनसिटी – सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की -केदारनाथ सिंह

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की, उड़ने लगी बुझे खेतों से झुर-झुर सरसों की रंगीनी, धूसर धूप हुई मन पर ज्यों — सुधियों की चादर अनबीनी, दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की । साँस रोक कर खड़े हो गए लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन, चिलबिल की नंगी बाँहों में — भरने लगा एक खोयापन, बड़ी हो गई कटु … पढ़ना जारी रखें झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की -केदारनाथ सिंह

देवनागरी

देवनागरी एक लिपि है जिसमें अनेक भारतीय भाषाएँ तथा कई विदेशी भाषाएं लिखीं जाती हैं। देवनागरी बायें से दायें लिखी जाती है, इसकी पहचान एक क्षैतिज रेखा से है जिसे ‘शिरिरेखा’ कहते हैं। संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी, नेपाली, नेपाल भाषा (तथा अन्य नेपाली उपभाषाएँ), तामाङ भाषा, गढ़वाली, बोडो, अंगिका, मगही, भोजपुरी, मैथिली, संथाली आदि भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त कुछ स्थितियों में गुजराती, पंजाबी, बिष्णुपुरिया मणिपुरी, रोमानी और उर्दू भाषाएं भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। देवनागरी विश्व में सबसे प्रयुक्त लिपियों में से एक है।   देवनागरी में लिखी ऋग्वेद की पाण्डुलिपि परिचय … पढ़ना जारी रखें देवनागरी

एक थी गौरा – अमरकांत

लंबे कद और डबलंग चेहरे वाले चाचा रामशरण के लाख विरोध के बावजूद आशू का विवाह वहीं हुआ। उन्होंने तो बहुत पहले ही ऐलान कर दिया था कि ‘लड़की बड़ी बेहया है।’   आशू एक व्यवहार-कुशल आदर्शवादी नौजवान है, जिस पर मार्क्स और गाँधी दोनों का गहरा प्रभाव है। वह स्वभाव से शर्मीला या संकोची भी है। वह संकुचित विशेष रूप से इसलिए भी था … पढ़ना जारी रखें एक थी गौरा – अमरकांत

होली और बुरा ना मानो महोत्सव

होली, भारत का प्रमुख त्यौहार है, क्योंकि इस दिन पूरे भारत मे बैंक होली-डे  रहता है अर्थात अवकाश रहता है जिसकी वजह से बैंक में घोटाले होने की संभावना नही रहती है, मतलब होली के दिन केवल आप रंग लगा सकते है, चूना लगाना मुश्किल होता है। इसी कारण से होली देश की समरसता के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए भी पतंजलि … पढ़ना जारी रखें होली और बुरा ना मानो महोत्सव

डर के गठबंधन पर दूरगामी प्रश्नचिन्ह

लगभग दो दशक यानि 1993 के बाद, देश के दो सबसे बड़े क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व को बचाने की कवायद में फिर से एक हो चले हैं| बसपा के संस्थापक कांशीराम और मुलायम सिंह यादव की दोस्ती जब परवान चढ़ी थी तो उस वक़्त मुलायम सिंह यादव द्वारा अस्तित्व में आई समाजवादी पार्टी उत्तरप्रदेश की राजनीति में पाँव ज़माने की कोशिश में लगी हुई थी| … पढ़ना जारी रखें डर के गठबंधन पर दूरगामी प्रश्नचिन्ह

ग्यारह सितंबर के बाद – अनवर सुहैल

ग्यारह सितंबर के बाद करीमपुरा में एक ही दिन, एक साथ दो बातें ऐसी हुर्इं, जिससे चिपकू तिवारी जैसे लोगों को बतकही का मसाला मिल गया। अव्वल तो ये कि हनीफ ने अपनी खास मियाँकट दाढ़ी कटवा ली। दूजा स्कूप अहमद ने जुटा दिया… जाने उसे क्या हुआ कि वह दँतनिपोरी छोड़ पक्का नमाजी बन गया और उसने चिकने चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी बढ़ानी शुरू … पढ़ना जारी रखें ग्यारह सितंबर के बाद – अनवर सुहैल

जीवनसंगिनी – मनीष कुमार

संग संग चलो मेरी जीवनसंगनी रुको नहीं थको नहीं ओ मेरी हृदयनयनी अपलक नयनों के तार जुड़े हैं तेरे मेरे सांसों को बेजार मत करो मृगनयनी संग संग चलो मेरी जीवनसंगनी आसमान की ऊंचाई से , जीवन की गहराई तक धूपो की अगुवाई से , रात्रि की विदाई तक स्वप्नों की अनुभूति से, हकीकत की सच्चाई तक फूलों की पंखुिड़यों से, काँटों  की चुभन तक … पढ़ना जारी रखें जीवनसंगिनी – मनीष कुमार

मनीष कुमार, रांची, झारखण्ड

सबका साथ

सबका साथ सबका हाथ मिलकर बनाएंगे एक नया इतिहास कोई वर्ग न छूटे कोई धर्म के नाम पर न लूटे जीवन की हर सांस पर क़दमों के हर ताल पर सुनेगे और सुनायेंगे हर बात पर जोर लगाएंगे पीछे मुड़कर न आयेंगे मिलकर माशल जलाएंगे एक अनुपम भारत बनाएंगे जहां प्रगति धारा की होगी प्रवाह हर निश्चल मानस का होगा प्रवास न धर्म होगा न … पढ़ना जारी रखें सबका साथ

प्रदूषण

आँख में चुभ रहा, आज प्रतिक्षण यहाँ जान लेकर रहेगा प्रदूषण यहाँ ! रोज बढ़ता हुआ वाहनों का धुआँ वायु में घुल रहा जहर भीषण यहाँ ! उजड़ते वन यहाँ जानता है ख़ुदा चीड़ का हो रहा रोज खण्डन यहाँ ! परत ओज़ोन का तीव्र अवक्षय यहाँ ऊष्मा लाँघता व्योम घर्षण यहाँ ! कोल की कालिमा उगलती चिमनियाँ नित्य बढ़ता हुआ उत्सर्जन यहाँ ! जानते … पढ़ना जारी रखें प्रदूषण

किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा

किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा। मेरी ख्वाबों की दुनिया को ये लश्कर मार डालेगा।। भिखारी आज इक़ फुटपाथ पे देखा ठिठुरता है। यकीनन आज फिर मुझको ये बिस्तर मार डालेगा।। खिलौना मानकर ये खेलता फिर जानवर से है। इसी वहशत में जाने कितने बंदर मार डालेगा।। उसे मैं इसलिये ही खत नहीं हूँ भेजता कोई। मेरा खत फाड़कर के वो … पढ़ना जारी रखें किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा

हम सिसक सिसक सो जाते है

तेरा मेरी गली से गुजरना, मेरी नजरों पे आके वो रुकना । उन यादों के दामन थामे, हम संभल-संभल रुक जाते हैं।।   तेरी बातों पे मेरा बिखरना, मेरे साये से तेरा लिपटना। उन लम्हों को पास यू पाके, हम मचल-मचल रह जाते हैं।। तेरी रातों में मेरा वो सपना, मेरी सुबहो में तेरा वो जगना। उन यादों को दिल से लगा के, हम सिसक-सिसक … पढ़ना जारी रखें हम सिसक सिसक सो जाते है

विरहणी

भोर में ही विरहणी आंगन बुहारती, कर्मलीना प्रतिपल सोचती विचारती, तक रही है द्वार को दृष्टि है अनिमेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। उर ज्वलित विरहाग्नि से भस्म होती देह, और भड़काते बरस नयन रूपी मेह, पिय मिलन का ही रहा बस अभीप्सित शेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। थी भरी हर सौख्य से कंत थे जब पास, है यही जीवन बचा चल रही बस … पढ़ना जारी रखें विरहणी

मेरे पिता को आता है..

न मेरी मेहबूबा करती है,न अज़ीज़ कर पाता है, वो दिल को खुश समझते है जब आँखे दर्द छुपता है, कही कोने में थी गम की गट्ठर उसे भी ढूंढ निकाला , की मेरा चेहरा पढ़ना सिर्फ मेरे पिता को आता है।     मेरे हाथ जब मेरे अविकसित मूछों को ताव देती है, मुश्किलें खुद पिता की मौजूदगी भांप लेती है, सर पर पैर … पढ़ना जारी रखें मेरे पिता को आता है..

मशहूर कवि एवं गीतकार शैलेंद्र पर विशेष

सरल और सहज शब्दों से जादूगरी करने वाले शैलेंद्र का जन्म 30 अगस्त, 1923 को रावलपिंडी में हुआ था. मूल रूप से उनका परिवार बिहार के भोजपुर का था. लेकिन फ़ौजी पिता की तैनाती रावलपिंडी में हुई तो घर बार छूट गया. रिटायरमेंट के बाद शैलेंद्र के पिता अपने एक दोस्त के कहने पर मथुरा में बस गए.   लोकप्रिय गीत आवारा हूँ (श्री ४२०) … पढ़ना जारी रखें मशहूर कवि एवं गीतकार शैलेंद्र पर विशेष

प्रसिद्ध गीतकार कवि प्रदीप पर विशेष

ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी   मौत के साए में हर घर है, कब क्या होगा किसे खबर है बंद है खिड़की, बंद है द्वारे, बैठे हैं सब डर के मारे ~ चुपके चुपके रोनेवाले रखना छुपा के दिल के छाले रे ये पत्थर का देश है पगले यहां कोई … पढ़ना जारी रखें प्रसिद्ध गीतकार कवि प्रदीप पर विशेष

हिन्दी और मैथिली के प्रसिद्ध कवि एवं कहानीकार राजकमल चौधरी के जन्मदिवस पर विशेष

अँधेरे में, (गर्म दूध पीती हुई) बिल्ली का चेहरा नहीं देख पाता हूँ, सिर्फ आँखें। हर रात इसी वक्त बिजली कट जाती है।   “… चाय तैयार है, आओ पिएँ…”     एक प्रश्न हजार उत्तर— “मैंने सूरज से पूछा—धरती कब आग का गोला बन जाएगी ? मुझसे सूरज ने पूछा—तुम बरफ-घर में सोये कब तक ?”   ~ राजकमल चौधरी अगर आप भी लिखते … पढ़ना जारी रखें हिन्दी और मैथिली के प्रसिद्ध कवि एवं कहानीकार राजकमल चौधरी के जन्मदिवस पर विशेष

District Magistrate Office

डिप्टी कलक्टरी – अमरकांत

शकलदीप बाबू कहीं एक घंटे बाद वापस लौटे। घर में प्रवेश करने के पूर्व उन्होंने ओसारे के कमरे में झाँका, कोई भी मुवक्किल नहीं था और मुहर्रिर साहब भी गायब थे। वह भीतर चले गए और अपने कमरे के सामने ओसारे में खड़े होकर बंदर की भाँति आँखे मलका-मलकाकर उन्होंने रसोईघर की ओर देखा। उनकी पत्नी जमुना, चौके के पास पीढ़े पर बैठी होंठ-पर-होंठ दबाए … पढ़ना जारी रखें डिप्टी कलक्टरी – अमरकांत

दोपहर का भोजन – अमरकांत

सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रख कर शायद पैर की उँगलियाँ या जमीन पर चलते चीटें-चीटियों को देखने लगी।

अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास नहीं लगी हैं। वह मतवाले की तरह उठी ओर गगरे से लोटा-भर पानी ले कर गट-गट चढ़ा गई। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह हाय राम कह कर वहीं जमीन पर लेट गई।

आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़ी रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गई, आँखों को मल-मल कर इधर-उधर देखा और फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छह वर्षीय लड़के प्रमोद पर जम गई।

लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियाँ साफ दिखाई देती थीं। उसके हाथ-पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हंडिया की तरह फूला हुआ था। उसका मुख खुला हुआ था और उस पर अनगिनत मक्खियाँ उड़ रही थीं। पढ़ना जारी रखें दोपहर का भोजन – अमरकांत

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

खड़ी बोली हिंदी के भाषिक और साहित्यिक विकास में जिन भाषाओं और बोलियों का विशेष योगदान रहा है उनमे  अपभ्रंश और अवहट्ट भाषाएँ भी है| हिंदी को अपभ्रंश और अवहट्ट से जो कुछ भी मिला उसका पूरा लेखा जोखा इन तीनों की भाषिक और साहित्यिक संपत्ति का तुलनात्मक विवेचन करने से प्राप्त होता है | अपभ्रंश और अवहट्ट का व्याकरणिक रूप – अपभ्रंश कुछ -कुछ और अवहट्ट बहुत … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप