केदारनाथ सिंह के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति

Kedarnath Singh

केदारनाथ सिंह (७ जुलाई १९३४ – १९ मार्च २०१८), हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष २०१३ का ४९वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के १०वें लेखक थे। केदारनाथ सिंह का जन्म ७ जुलाई … पढ़ना जारी रखें केदारनाथ सिंह के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति

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जितना मुझसे हो सका, उतना मैंने किया – तारा सिंह

जितना मुझसे हो सका, उतना मैंने किया तुमने मुझको जैसा रखा, वैसा मैं रहा अपने तन को तिल – तिल जलाकर तुम्हारे आगे रोशनी किया जितना मुझसे हो सका, उतना मैंने किया कभी साँसों का हार बनाया कभी तन, धूप, दीप जलाया कभी आँखों से आँसू लेकर तुम्हारे मंदिर को धोया जितना मुझसे हो सका, … पढ़ना जारी रखें जितना मुझसे हो सका, उतना मैंने किया – तारा सिंह

समझदारों की दुनिया में माँ मूर्ख होती हैं – ज्योति चावला

मेरा भाई और कभी-कभी मेरी बहनें भी बड़ी सरलता से कह देते हैं मेरी माँ को मूर्ख और अपनी समझदारी पर इतराने लगते हैं वे कहते हैं नहीं है ज़रा-सी भी समझदारी हमारी माँ को किसी को भी बिना जाने दे देती है अपनी बेहद प्रिय चीज़ कभी शॉल, कभी साड़ी और कभी-कभी रुपये-पैसे तक … पढ़ना जारी रखें समझदारों की दुनिया में माँ मूर्ख होती हैं – ज्योति चावला

देह का जादू – जया जादवानी

उगती है देह उसकी हथेली पर वह मुट्ठी भींच लेती है उगती है देह उसकी आंखों में दिखता है लहराता लाल गुलाब पौधा नहीं दिखता कसकर मींच लेती है आंखें चुभते हैं कांटे झपक कर रोकती है आंसू गुलाब भीतर खींच लेती है उगती है देह उसके बालों की महक में उचक कर बैठ जाती … पढ़ना जारी रखें देह का जादू – जया जादवानी

मन के साथ भटकना होगा – जया झा

मन के पीछे चलने वाले, मन के साथ भटकना होगा। हाँ, अभी देखी थी मन ने रंग-बिरंगी-सी वह तितली फूल-फूल पे भटक रही थी जाने किसकी खोज में पगली। पर वह पीछे छूट गई है इन्द्रधनुष जो वह सुन्दर है अब उसको ही तकना होगा। मन के पीछे चलने वाले, मन के साथ भटकना होगा। … पढ़ना जारी रखें मन के साथ भटकना होगा – जया झा

छोटी औरत – चंद्र रेखा ढडवाल

क़दमताल करती है औरत कभी तेज़ कभी धीमे जैसी बजती है धुन नाचती है उसपर कभी हँस कर कभी रो कर पाँवों को एक क्रम से उठाने-बिठाने के उसके बेढब प्रयासों को देखते उससे बड़ी उम्र की एक औरत मुँह बिचकाती है उसके पल्लू को अँगुली से लिपेटती साथ-साथ ठुमकती है घर की एक छोटी … पढ़ना जारी रखें छोटी औरत – चंद्र रेखा ढडवाल

बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना – कविता किरण

बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना है हरसू उदासी तुम्ही कुछ कहो ना मैं पतझड़ का मौसम हूँ चुप ही रहा हूँ ओ गुलशन के वासी! तुम्ही कुछ कहो ना कि ढलने को आई शबे-गम ये आधी है बाकी ज़रा-सी तुम्ही कुछ कहो ना समाकर समंदर में भी रह गयी है लहर एक प्यासी … पढ़ना जारी रखें बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना – कविता किरण