हिंदी साहित्य का इतिहास काल विभाजन

हिंदी साहित्य का इतिहास प्रथम संस्करण का वक्तव्य -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

हिंदी कवियों का एक वृत्तसंग्रह ठाकुर शिवसिंह सेंगर ने सन् 1833 ई. में प्रस्तुत किया था। उसके पीछे सन् 1889 में डॉक्टर (अब सर) ग्रियर्सन ने ‘मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑव नार्दर्न हिंदुस्तान’ के नाम से एक वैसा ही बड़ा कविवृत्त-संग्रह निकाला। काशी की नागरीप्रचारिणी सभा का ध्यान आरंभ ही में इस बात की ओर गया कि सहस्रों हस्तलिखित हिंदी पुस्तकें देश के अनेक भागों में, … पढ़ना जारी रखें हिंदी साहित्य का इतिहास प्रथम संस्करण का वक्तव्य -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

जितना मुझसे हो सका, उतना मैंने किया – तारा सिंह

जितना मुझसे हो सका, उतना मैंने किया तुमने मुझको जैसा रखा, वैसा मैं रहा अपने तन को तिल – तिल जलाकर तुम्हारे आगे रोशनी किया जितना मुझसे हो सका, उतना मैंने किया कभी साँसों का हार बनाया कभी तन, धूप, दीप जलाया कभी आँखों से आँसू लेकर तुम्हारे मंदिर को धोया जितना मुझसे हो सका, उतना मैंने किया कभी अनल जल स्नान किया कभी काँटों … पढ़ना जारी रखें जितना मुझसे हो सका, उतना मैंने किया – तारा सिंह

समझदारों की दुनिया में माँ मूर्ख होती हैं – ज्योति चावला

मेरा भाई और कभी-कभी मेरी बहनें भी बड़ी सरलता से कह देते हैं मेरी माँ को मूर्ख और अपनी समझदारी पर इतराने लगते हैं वे कहते हैं नहीं है ज़रा-सी भी समझदारी हमारी माँ को किसी को भी बिना जाने दे देती है अपनी बेहद प्रिय चीज़ कभी शॉल, कभी साड़ी और कभी-कभी रुपये-पैसे तक देते हुए भूल जाती है वह कि कितने जतन से … पढ़ना जारी रखें समझदारों की दुनिया में माँ मूर्ख होती हैं – ज्योति चावला

देह का जादू – जया जादवानी

उगती है देह उसकी हथेली पर वह मुट्ठी भींच लेती है उगती है देह उसकी आंखों में दिखता है लहराता लाल गुलाब पौधा नहीं दिखता कसकर मींच लेती है आंखें चुभते हैं कांटे झपक कर रोकती है आंसू गुलाब भीतर खींच लेती है उगती है देह उसके बालों की महक में उचक कर बैठ जाती है माथे पर ढंकती है इधर तो बौखलाया उधर दिखने … पढ़ना जारी रखें देह का जादू – जया जादवानी

मन के साथ भटकना होगा – जया झा

मन के पीछे चलने वाले, मन के साथ भटकना होगा। हाँ, अभी देखी थी मन ने रंग-बिरंगी-सी वह तितली फूल-फूल पे भटक रही थी जाने किसकी खोज में पगली। पर वह पीछे छूट गई है इन्द्रधनुष जो वह सुन्दर है अब उसको ही तकना होगा। मन के पीछे चलने वाले, मन के साथ भटकना होगा। बच्चों-सा जो कल सीधा था और कभी किशोर-सा चंचल आज … पढ़ना जारी रखें मन के साथ भटकना होगा – जया झा

छोटी औरत – चंद्र रेखा ढडवाल

क़दमताल करती है औरत कभी तेज़ कभी धीमे जैसी बजती है धुन नाचती है उसपर कभी हँस कर कभी रो कर पाँवों को एक क्रम से उठाने-बिठाने के उसके बेढब प्रयासों को देखते उससे बड़ी उम्र की एक औरत मुँह बिचकाती है उसके पल्लू को अँगुली से लिपेटती साथ-साथ ठुमकती है घर की एक छोटी औरत – चंद्र रेखा ढडवाल पढ़ना जारी रखें छोटी औरत – चंद्र रेखा ढडवाल

बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना – कविता किरण

बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना है हरसू उदासी तुम्ही कुछ कहो ना मैं पतझड़ का मौसम हूँ चुप ही रहा हूँ ओ गुलशन के वासी! तुम्ही कुछ कहो ना कि ढलने को आई शबे-गम ये आधी है बाकी ज़रा-सी तुम्ही कुछ कहो ना समाकर समंदर में भी रह गयी है लहर एक प्यासी तुम्ही कुछ कहो ना मेरे दिल में तुम हो कहीं … पढ़ना जारी रखें बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना – कविता किरण

तलाश – कविता गौड़

गुलाब बनने को तैयार हैं सब बरगद कौन बनना चाहता है गुंबद बनने को तैयार हैं सब नींव की ईंट कौन बनना चाहता है वाह-वाही पाना चाहते हैं सब त्याग कौन करना चाहता है पता है सबको जो बन जायेगा बरगद वह हिल न सकेगा अपनी जगह से पता है सबको जो बनेगा नींव की ईंट सब बढ़ जाएँगे उस पर चढ़ के पता है … पढ़ना जारी रखें तलाश – कविता गौड़

वेश्या – ऋतु पल्लव

मैं पवित्रता की कसौटी पर पवित्रतम हूँ क्योंकि मैं तुम्हारे समाज को अपवित्र होने से बचाती हूँ। सारे बनैले-खूंखार भावों को भरती हूँ कोमलतम भावनाओं को पुख्ता करती हूँ। मानव के भीतर की उस गाँठ को खोलती हूँ जो इस सामाजिक तंत्र को उलझा देता जो घर को, घर नहीं द्रौपदी के चीरहरण का सभालय बना देता। मैं अपने अस्तित्व को तुम्हारे कल्याण के लिए … पढ़ना जारी रखें वेश्या – ऋतु पल्लव

बाँस की नन्ही-सी टहनी – उज्जवला ज्योति तिग्गा

जड़ों का सघन जाल रच देता है एक अद्भुत दुनिया ज़मीन के अंदर काफ़ी गहरे तक कोमल तंतुओं का जाल कि बाँस की नन्ही-सी टहनी सब कुछ भुलाकर खेलती रहती है आँख-मिचौली उन जड़ों के अनगिन तंतुओं के सूक्ष्म सिरों की भूलभूलैया में छिपकर उस अन्धेरी दुनिया में बरसो तक बग़ैर इस बात की चिंता किए कि क्या यही है लक्ष्य उसके जीवन का क्योंकि … पढ़ना जारी रखें बाँस की नन्ही-सी टहनी – उज्जवला
ज्योति तिग्गा

प्रेम में अंधी लड़की – अंजना संधीर

टैगोर की कविता दे कर उसने चिन्हित किया था शब्दों को कि वो उस रानी का माली बनना चाहता है सख़्त लड़की ने पढ़ा सोचा कि मेरे बाग का माली बनकर वो मेरे लिए क्या-क्या करेगा… खो गई सपनों में लड़की कविता पढ़ते-पढ़ते कि ठाकुर ने कितने रंग बिछाए हैं जीवन में तरंगों के लिए वो देखने लगी माली के शब्द कि जब वो चलेगी … पढ़ना जारी रखें प्रेम में अंधी लड़की – अंजना संधीर

माथे लगी बेंदी, हाथों में लगी मेंहदी – हिन्दी लोकगीत

माथे लगी बेंदी, हाथों में लगी मेंहदी-२ प्यारी सी जच्चा सजन संग चली मेरी सासू के अरमान पूरे हुए, और चरुवे की घड़ी में लालन हुए मेरी प्यारी सासू को कंगन चाहिए-२ प्यारी सी जच्चा सजन संग चली. माथे लगी बेंदी, हाथों में लगी मेंहदी-२ प्यारी सी जच्चा सजन संग चली मेरी जिठनी के अरमान पूरे हुए, और पिपरी की घड़ी में लालन हुए मेरी … पढ़ना जारी रखें माथे लगी बेंदी, हाथों में लगी मेंहदी – हिन्दी लोकगीत

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको – अदम गोंडवी

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा … पढ़ना जारी रखें मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको – अदम गोंडवी

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार आज सिन्धु ने विष उगला है लहरों का यौवन मचला है आज हृदय में और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार लहरों के स्वर में कुछ बोलो इस अंधड में साहस तोलो कभी-कभी मिलता जीवन में तूफानों का प्यार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार यह असीम, … पढ़ना जारी रखें तूफानों की ओर घुमा दो नाविक – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

ज़िंदगी – अजनबी राजा

ज़िंदगी इक पहेली है अनदेखी इक सहेली है कही बेबाक़ नादानियाँ है कही थोडी बचकानियां है खुशियों की बरसात है वही ग़मो का अन्धेरा है कही तपती धूप है तो कही नीम की छाँव है हसरतें है इसमें बचपन की ललक है इसमें ज़िंदगी क्या है चले तो उम्र भर की हमसफ़र है वही पल दो पल की हमराह बस की भीड़ है ज़िंदगी तो … पढ़ना जारी रखें ज़िंदगी – अजनबी राजा

कहानी सरहद की – भूपेन्द्र कुमार दवे

‘सरहद पर तैनात जवानों के सामने प्रकृति की खुली किताब होती है जिस पर ईश्वर की इबारत शायद विश्व के सभी ग्रंथों से ज्यादा जीवन को पवित्रता संपन्न कराने की क्षमता रखती है।  मेरे साथी ने उत्तर-पश्चिम सरहदों का नजारा देखकर यह कहा था। उसने प्रश्न किया था, ‘यह सरहद यहाँ आकर रुक क्यों जाती है? सारे विश्व को यदि यह अपने आगोश में ले … पढ़ना जारी रखें कहानी सरहद की – भूपेन्द्र कुमार दवे

मेरी मुन्नी का कमरा – तरुण कुमार

मेरी मुन्नी का कमरा वो टेडी बियर पूछता है मुझसे तुम्हारा पता, गुमसुम सा तकता वो रेसिंग कारे, वो काठ का घोड़ा, वो गुडिया के उतरे कपडे, जो सोती थी दुबक कर मुन्नी के साथ, कबसे वैसे पड़ी है , मुन्नी तुम्हारे कमरे में सबसे बेह्टर और बोलती हैं दीवारें, तुम्हारी पेंटिंग्स के आगे एम् ऍफ़, पिकासों हैं फीके, मेरा अजंता, एलोरा यही हैं, मुन्नी … पढ़ना जारी रखें मेरी मुन्नी का कमरा – तरुण कुमार

बदनाम न करो राम , खुदा – जय नारायण कश्यप

१- अलिफ से अल्लाह जो कहे , और ॐ कहे दिल से , उनसे कहें , मस्जिद मंदिर , तुम्हारी चले फिर से , हमें उनसे करो आज़ाद जो , इंसान को देखें घिन से , थक गए हैं , पक गए हैं , धर्मांधों के सितम से , तुम लड़ो तो लड़ो खुद के लिए , भूख प्यास , हद के लिए , पर … पढ़ना जारी रखें बदनाम न करो राम , खुदा – जय नारायण कश्यप

रिटायर्ड का दर्द – कवि द्रौणाचार्य दुबे

मै बुजुर्ग हूँ रिटायर्ड हूँ पेंशन पर जीता हूँ पेंशन क्या इससे ज्यादा तो टेंशन पर जीता हूँ कोल्हू के बैल-सा घर के सारे काम कर जाता हूँ बदले में सिर्फ अपमान के शब्द ही पाता हूँ हूँ जिँदा मगर मर मर के ही जीता हूँ रोज अपमान के आँसू -गम पीता हूँ राम -सीता से बेटे बहू को मैने है पाया अपने को मिटा … पढ़ना जारी रखें रिटायर्ड का दर्द – कवि द्रौणाचार्य दुबे

एक अजन्मा, अनसुना सा गीत – नंदकिशोर ‘सौम्य’

किसी वीरान हवेली के, अंधेरे कमरे के कुन्ने में एक अजन्मा, अनसुना सा गीत पड़ा कराह रहा है ! वो गीत जिसने करुण क्रंदन से निर्मित शब्दों के बिस्तर की सेज सजाई है ! वो गीत, जो अनदेखे तमाम आँसू अपनी सूखी आँखों में छिपाए बैठा है ! वो गीत, जिसके हर शब्द में — विरह है, विलाप है, एक अधूरा सा मिलाप है… धूप … पढ़ना जारी रखें एक अजन्मा, अनसुना सा गीत – नंदकिशोर ‘सौम्य’