Kedarnath Singh

केदारनाथ सिंह के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति

केदारनाथ सिंह (७ जुलाई १९३४ – १९ मार्च २०१८), हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष २०१३ का ४९वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के १०वें लेखक थे। केदारनाथ सिंह का जन्म ७ जुलाई १९३४ ई॰ को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया … पढ़ना जारी रखें केदारनाथ सिंह के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति

maut se than gayi poem by atal bihari vajpayee

मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी

ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, … पढ़ना जारी रखें मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी

उठो प्रतिभावान स्वर उठो

सुलग रहे अदम्य मन का ज्वाला है घुल रहे असंख्य प्रवीणता का हवाला है बिना घिसे चमक क्या आई है चमकहीन  सभ्यता हमने लाई है प्रेरणा नहीं उनमें, मैं प्रतिशतता भरते जाऊ बिना जले बाती में, मै प्रकाश कहाँ से लाऊ विरले बिना स्वृण के, चमके होगें संकेतन दीप जगत में, जहाँ दमके होगें भूले सार तन खंगाल उठो विकट संकट सवाल उठो सममूल्यता उर … पढ़ना जारी रखें उठो प्रतिभावान स्वर उठो

क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

  क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? आज नहीं क्या हो सकता जो कल होता, सच्चा प्रयत्न  नहीं   कभी   विफल होता, क्या एकता में ही केवल बल होता? क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? बौने बामन ने अकेले राजा बलि को बांधा था, तीन पग में नभ, महि और स्वर्ग तक को लांघा था। एक अकेले विप्र ने क्षत्रिय हीन जग था किया, हाथ में … पढ़ना जारी रखें क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

Dekho to Shabdo me| Literature in India

देखो तो शब्दों में – मीनाक्षी वशिष्ठ

देखो तो शब्दों में कितना जादू है! मेरे शब्द मुझे उस लोक में ले आये हैं   जहाँ सब सुन्दर हैं! यहाँ हर और बिखरते रुप, रंग, रस, राग के झरने यहाँ हर पल उत्सव है दुख की तो परछाई भी नहीं जीवन फूट-फूट पड़ता है । देखो तो शब्दों में कितना जादू है! मैं जब लिखती हूं ‘प्रेम’ रोम-रोम पुलकित हो उठता है मैं … पढ़ना जारी रखें देखो तो शब्दों में – मीनाक्षी वशिष्ठ

पेड़ की आत्‍मा - Jagdish Sharma Sahaj

पेड़ की आत्‍मा – जगदीश शर्मा सहज

मैं नश्वर था पर तुम्हारे हाथों मृत्यु का अधिकारी नहीं मैं बूढ़ा अवश्य था पर जनजीवन का अपकारी नहीं   मैं जब बच्चा था तुम पैदा ही नहीं हुए थे धरती पर न यह भीड़भाड़ थी, न शोर था, जीवन था प्रगति पर     मैं मौन रहकर तुम्हें देखता था निस्तब्ध सा खड़ा था शीतल छाया देने को तुम्हें प्रचंड सूर्य से भी लड़ा … पढ़ना जारी रखें पेड़ की आत्‍मा – जगदीश शर्मा सहज

मेरे सपने- जूनून भी सुकून भी…

पलकों के पालने में सजा है एक सपना, जब मैं जागती तो वो भी जागता, जब मैं सोती तो भी वो जागता ।     एक दिन पूछा मैंने उसको – नींद नहीं आती तुमको ? तो कहा सपने ने मुस्कुराते हुए ,  कौन आता है रोज़ तुम्हे उठाने के लिए ! तू जब भी है सोती , मेरे ही बीज बोती। और जब जागती , तो … पढ़ना जारी रखें मेरे सपने- जूनून भी सुकून भी…

विरहणी

भोर में ही विरहणी आंगन बुहारती, कर्मलीना प्रतिपल सोचती विचारती, तक रही है द्वार को दृष्टि है अनिमेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। उर ज्वलित विरहाग्नि से भस्म होती देह, और भड़काते बरस नयन रूपी मेह, पिय मिलन का ही रहा बस अभीप्सित शेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। थी भरी हर सौख्य से कंत थे जब पास, है यही जीवन बचा चल रही बस … पढ़ना जारी रखें विरहणी

अधूरे प्रेम की पूरी दुनिया – अंकिता रासुरी

ओ मेरे साथी तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो मैं कर सकती हूँ तुमसे अधूरा प्रेम क्योंकि बहुत कुछ घट जाने के बाद अधूरा हिस्सा ही बचा रह सकता है किसी के जीवन मे पर मैं अब करना भी नहीं चाहती पूरा प्रेम मैं जानती हूँ वह प्रेम हो सकता है खतरनाक किसी भी स्त्री के लिए वह प्रेम बना सकता है किसी स्त्री को … पढ़ना जारी रखें अधूरे प्रेम की पूरी दुनिया – अंकिता रासुरी

कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं

शब्द नए चुनकर गीत वही हर बार लिखूँ मैं
उन दो आँखों में अपना सारा संसार लिखूँ मैं
विरह की वेदना लिखूँ या मिलन की झंकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं…………… पढ़ना जारी रखें कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं

एक ऐसा चेहरा

हल्की सी शर्म, हल्की सी नज़ाकत हो एक अजब सा एहसास, एक गज़ब सी चाहत हो थोड़ी सी नरमी, थोड़ी सी गर्माहट हो हो एक ऐसा चेहरा, जिसमें खो जाने की राहत हो ज़रा सी बेचैनी, ज़रा सी घबराहट हो न कोई साज़िश, न कोई बनावट हो ज़रा सी हंसी, ज़रा सी मुस्कराहट हो हो एक ऐसा चेहरा, जिसमें छा जाने की ताक़त हो हो … पढ़ना जारी रखें एक ऐसा चेहरा

ये जो मर मर के करती हो काम /जान नही है क्या मेरी जान

एक बार में जरा सा काम करना और धप्प्प से बैठ जाना फिर उठना और थोडा और काम करना फिर बैठ लेना लम्बी लम्बी सांस पसीने से तर ब्लाउज का आखिरी हूक खोलना और कहना जैसे चल नही रही सांस कि और सांस लेने को नही बची ताकत माटी हो गई देह को गरियाना कि यही हाथ से कैसे दस किलो आलू का पापड़ बना … पढ़ना जारी रखें ये जो मर मर के करती हो काम /जान नही है क्या मेरी जान

Jab se guzra hoon un raaton se

जब से गुज़रा हूँ इन बातों से

वह औरत जो सुहागिन बनी रहने के लिए करती है लाख जतन टोना-टोटका से मन्दिर में पूजा तक अपने पति से कह रही है — तुम कारगिल में काम आए होते तो पन्द्रह लाख मिलते अब मैं तुम्हारा क्या करूँ जीते जी तुम मकान नहीं बना सकते । कह रहे हैं हमदर्द साठ साल के पिता की बीमारी के बाद वे चले गए होते तो … पढ़ना जारी रखें जब से गुज़रा हूँ इन बातों से

Sad

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – हरिवंशराय बच्चन

सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
पढ़ना जारी रखें ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – हरिवंशराय बच्चन

Yamraj

प्रेत का बयान – नागार्जुन

“ओ रे प्रेत -”
कडककर बोले नरक के मालिक यमराज
-“सच – सच बतला !
कैसे मरा तू ?
भूख से , अकाल से ?
बुखार कालाजार से ?
पेचिस बदहजमी , प्लेग महामारी से ?
कैसे मरा तू , सच -सच बतला !”
खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़
काँपा कुछ हाड़ों का मानवीय ढाँचा
नचाकर लंबे चमचों – सा पंचगुरा हाथ
रूखी – पतली किट – किट आवाज़ में
प्रेत ने जवाब दिया – पढ़ना जारी रखें प्रेत का बयान – नागार्जुन

Sad Couple

दर्द दिया है – गोपालदास “नीरज”

दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है, बाती बैरिन श्वास है,
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !

मैं ज्वाला का ज्योति-काव्य
चिनगारी जिसकी भाषा,
किसी निठुर की एक फूँक का
हूँ बस खेल-तमाशा पढ़ना जारी रखें दर्द दिया है – गोपालदास “नीरज”

Love Poem

दोनों ओर प्रेम पलता है – मैथिलीशरण गुप्त

दोनों ओर प्रेम पलता है।
सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है!

सीस हिलाकर दीपक कहता–
’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’
पर पतंग पड़ कर ही रहता
कितनी विह्वलता है!
दोनों ओर प्रेम पलता है। पढ़ना जारी रखें दोनों ओर प्रेम पलता है – मैथिलीशरण गुप्त

Acharya Balwant

क्या होगा भगवान देश का! -आचार्य बलवंत

खतरे में सम्मान देश का। क्या होगा भगवान देश का! देश में ऐसी हवा चली है, बदल गया ईमान देश का। क्या होगा भगवान देश का! आए दिन घपला-घोटाला दाल में है काला ही काला। झुग्गी-झोपड़ियों के अंदर, सिसक रहा अरमान देश का। क्या होगा भगवान देश का! बदल गयी भावों की भाषा। बदली मूल्यों की परिभाषा। नाम, पता और परिचय बदला, बदल गया परिधान … पढ़ना जारी रखें क्या होगा भगवान देश का! -आचार्य बलवंत

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

आस से आसरा -कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कुछ जीवन बचा ले जाते हैं ये शांत दृढ़ मुँडेर, जो आस जगाये रखते जीवित होने का।। एक छह फीटा दरवाजा जो खुलता है, उसकी तरफ, आधी ढ़की छत के साथ, धूप बारिश से बचाने को।। बाँह फैलाये कुछ मन रोज सैर कर आते हैं, नाप आते है अनंत को ,सुनाने को रोज नई कहाँनिया।। कुछ मन आकाश को ताकते हुये, पतंग की भाँति डोर … पढ़ना जारी रखें आस से आसरा -कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

हम किसी से कम नही

हम किसी से कम नही – मनीषा जाजोरिया

न जाने कैसा हुआ ये समां
वो कैसे आया एक झोंका हवा का
दिल तोड़ गया सारे अरमानों का
पिघला गया बने हुए खरे सोने को
कर गया उनका मोल रिश्तो से पढ़ना जारी रखें हम किसी से कम नही – मनीषा जाजोरिया