विरहणी

भोर में ही विरहणी आंगन बुहारती, कर्मलीना प्रतिपल सोचती विचारती, तक रही है द्वार को दृष्टि है अनिमेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। उर ज्वलित विरहाग्नि से भस्म होती देह, और भड़काते बरस नयन रूपी मेह, पिय मिलन का ही रहा बस अभीप्सित शेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। थी भरी हर सौख्य से कंत … पढ़ना जारी रखें विरहणी

Advertisements

अधूरे प्रेम की पूरी दुनिया – अंकिता रासुरी

ओ मेरे साथी तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो मैं कर सकती हूँ तुमसे अधूरा प्रेम क्योंकि बहुत कुछ घट जाने के बाद अधूरा हिस्सा ही बचा रह सकता है किसी के जीवन मे पर मैं अब करना भी नहीं चाहती पूरा प्रेम मैं जानती हूँ वह प्रेम हो सकता है खतरनाक किसी भी स्त्री … पढ़ना जारी रखें अधूरे प्रेम की पूरी दुनिया – अंकिता रासुरी

कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं

शब्द नए चुनकर गीत वही हर बार लिखूँ मैं उन दो आँखों में अपना सारा संसार लिखूँ मैं विरह की वेदना लिखूँ या मिलन की झंकार लिखूँ मैं कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं……………

एक ऐसा चेहरा

हल्की सी शर्म, हल्की सी नज़ाकत हो एक अजब सा एहसास, एक गज़ब सी चाहत हो थोड़ी सी नरमी, थोड़ी सी गर्माहट हो हो एक ऐसा चेहरा, जिसमें खो जाने की राहत हो ज़रा सी बेचैनी, ज़रा सी घबराहट हो न कोई साज़िश, न कोई बनावट हो ज़रा सी हंसी, ज़रा सी मुस्कराहट हो हो … पढ़ना जारी रखें एक ऐसा चेहरा

ये जो मर मर के करती हो काम /जान नही है क्या मेरी जान

एक बार में जरा सा काम करना और धप्प्प से बैठ जाना फिर उठना और थोडा और काम करना फिर बैठ लेना लम्बी लम्बी सांस पसीने से तर ब्लाउज का आखिरी हूक खोलना और कहना जैसे चल नही रही सांस कि और सांस लेने को नही बची ताकत माटी हो गई देह को गरियाना कि … पढ़ना जारी रखें ये जो मर मर के करती हो काम /जान नही है क्या मेरी जान

जब से गुज़रा हूँ इन बातों से

Jab se guzra hoon un raaton se

वह औरत जो सुहागिन बनी रहने के लिए करती है लाख जतन टोना-टोटका से मन्दिर में पूजा तक अपने पति से कह रही है -- तुम कारगिल में काम आए होते तो पन्द्रह लाख मिलते अब मैं तुम्हारा क्या करूँ जीते जी तुम मकान नहीं बना सकते । कह रहे हैं हमदर्द साठ साल के … पढ़ना जारी रखें जब से गुज़रा हूँ इन बातों से

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – हरिवंशराय बच्चन

Sad

सोचा करता बैठ अकेले, गत जीवन के सुख-दुख झेले, दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! नहीं खोजने जाता मरहम, होकर अपने प्रति अति निर्मम, उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!