क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

  क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? आज नहीं क्या हो सकता जो कल होता, सच्चा प्रयत्न  नहीं   कभी   विफल होता, क्या एकता में ही केवल बल होता? क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? बौने बामन ने अकेले राजा बलि को बांधा था, तीन पग में नभ, महि और स्वर्ग तक को लांघा था। एक अकेले विप्र ने क्षत्रिय हीन जग था किया, हाथ में … पढ़ना जारी रखें क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

मेरे पिता को आता है..

न मेरी मेहबूबा करती है,न अज़ीज़ कर पाता है, वो दिल को खुश समझते है जब आँखे दर्द छुपता है, कही कोने में थी गम की गट्ठर उसे भी ढूंढ निकाला , की मेरा चेहरा पढ़ना सिर्फ मेरे पिता को आता है।     मेरे हाथ जब मेरे अविकसित मूछों को ताव देती है, मुश्किलें खुद पिता की मौजूदगी भांप लेती है, सर पर पैर … पढ़ना जारी रखें मेरे पिता को आता है..

आत्माराम – मुंशी प्रेमचंद

1 वेदों-ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने सायबान में प्रात: से संध्या तक अँगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था। यह लगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह बंद हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीज गायब हो गयी। वह नित्य-प्रति एक बार प्रात:काल अपने तोते का पिंजड़ा लिए … पढ़ना जारी रखें आत्माराम – मुंशी प्रेमचंद

आख़िरी मंज़िल – मुंशी प्रेमचंद

१ आह ? आज तीन साल गुजर गए, यही मकान है, यही बाग है, यही गंगा का किनारा, यही संगमरमर का हौज। यही मैं हूँ और यही दरोदीवार। मगर इन चीजों से दिल पर कोई असर नहीं होता। वह नशा जो गंगा की सुहानी और हवा के दिलकश झौंकों से दिल पर छा जाता था। उस नशे के लिए अब जी तरस-जरस के रह जाता है। … पढ़ना जारी रखें आख़िरी मंज़िल – मुंशी प्रेमचंद

सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

दिन भर आग बबूला होकर
अहंकार का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से
शीतलता पाने पढ़ना जारी रखें सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

अंजाम-ए-नजीर

बटवारे के बाद जब फ़िर्का-वाराना फ़सादात शिद्दत इख़्तियार कर गए और जगह जगह हिंदूओं और मुस्लमानों के ख़ून से ज़मीन रंगी जाने लगी तो नसीम अख़तर जो दिल्ली की नौ-ख़ेज़ तवाइफ़ थी अपनी बूढ़ी माँ से कहा “चलो माँ यहां से चलें” बूढ़ी बाइका ने अपने पोपले मुँह में पानदान से छालिया के बारीक बारीक टुकड़े डालते हुए उस से पूछा “कहाँ जाऐंगे बेटा ” … पढ़ना जारी रखें अंजाम-ए-नजीर

1919 की एक बात

ये 1919-ई- की बात है भाई जान जब रौलट ऐक्ट के ख़िलाफ़ सारे पंजाब में एजीटेशन हो रही थी। मैं अमृतसर की बात कररहा हूँ। सर माईकल ओडवायर ने डीफ़ैंस आफ़ इंडिया रूल्ज़ के मातहत गांधी जी का दाख़िला पंजाब में बंद कर दिया था। वो इधर आरहे थे कि पलवाल के मुक़ाम पर उन को रोक लिया गया और गिरफ़्तार करके वापस बमबई भेज … पढ़ना जारी रखें 1919 की एक बात

Child Abuse, Child in India, Khel, Play, Childhood

खेल – जैनेन्द्र कुमार

मौन-मुग्ध संध्या स्मित प्रकाश से हँस रही थी। उस समय गंगा के निर्जन बालुकास्थल पर एक बालक और बालिका सारे विश्व को भूल, गंगा-तट के बालू और पानी से खिलवाड़ कर रहे थे। बालक कहीं से एक लकड़ी लाकर तट के जल को उछाल रहा था। बालिका अपने पैर पर रेत जमाकर और थोप-थोपकर एक भाड़ बना रही थी। बनाते-बनाते बालिका भाड़ से बोली- “देख … पढ़ना जारी रखें खेल – जैनेन्द्र कुमार

District Magistrate Office

डिप्टी कलक्टरी – अमरकांत

शकलदीप बाबू कहीं एक घंटे बाद वापस लौटे। घर में प्रवेश करने के पूर्व उन्होंने ओसारे के कमरे में झाँका, कोई भी मुवक्किल नहीं था और मुहर्रिर साहब भी गायब थे। वह भीतर चले गए और अपने कमरे के सामने ओसारे में खड़े होकर बंदर की भाँति आँखे मलका-मलकाकर उन्होंने रसोईघर की ओर देखा। उनकी पत्नी जमुना, चौके के पास पीढ़े पर बैठी होंठ-पर-होंठ दबाए … पढ़ना जारी रखें डिप्टी कलक्टरी – अमरकांत

Kunwar Bechain Ghazal

कुँअर बेचैन की ग़ज़लें

(1) दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर अच्छा किया जो आपने सपने चुरा लिए चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास हमने खुशी के पाँवों में काँटे चुभा लिए सुख, जैसे बादलों में नहाती हों बिजलियाँ दुख, बिजलियों की आग में बादल नहा लिए जब हो … पढ़ना जारी रखें कुँअर बेचैन की ग़ज़लें

Literature in India

समस्या अहंकार की खुराक की भांति – ओशो

अहंकार छोटे-मोटे टीलों से खुश नहीं होता, राजी नहीं होता, उसे पहाड़ चाहिए। अगर दुख भी हो तो भी टीला न हो, गौरीशंकर हो। अगर वह दुखी भी है तो साधारण रूप से दुखी होना नहीं चाहता, वह असाधारण रूप से दुखी होना चाहता है।

लोग घिसटते रहते हैं, शून्य से बड़ी-बड़ी समस्याएं पैदा करते हैं। मैंने हजारों लोगों से उनकी समस्याओं के बारे में बात की है और अब तक मैं वास्तविक समस्या खोज नहीं सका। सारी समस्याएं बोगस हैं। तुम उन्हें इसलिए बनाते हो क्योंकि समस्याओं के बगैर तुम खालीपन अनुभव करते हो। कुछ करने को नहीं है, किसीसे लडना नहीं है, न कहीं जाना है। लोग एक गुरु से दूसरे गुरु जाते हैं, एक मास्टर से दूसरे मास्टर के पास, एक मनश्चिकित्सक से दूसरे मनश्चिकित्सक के पास, एक एनकाउण्टर ग्रूप से दूसरे एनकाउण्टर ग्रूप के पास, क्योंकि अगर वे नहीं जाएंगे तो खाली अनुभव करेंगे। और अचानक उन्हें जीवन की व्यर्थता का बोध होगा। तुम समस्याएं इसलिए पैदा करते हो ताकि तुम्हें ऐसा लगे कि जीवन एक महान काम है, एक विकास है और तुम्हें कठोर संघर्ष करना है।

अहंकार संघर्ष में ही जी सकता है, ध्यान रहे, जब वह लड़ता है तभी। अगर मैं तुमसे कहूं कि तीन मक्खियों को मार दो तो तुम बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाओगे तो तुम मेरा विश्वास नहीं करोगे। तुम कहोगे, ‘ तीन मक्खियां?’ इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। और इससे मैं बुद्ध हो जाऊंगा? यह संभव नहीं मालूम होता। अगर मैं कहूंगा कि तुम्हें सात सौ शेर मारने होंगे, तो वह संभव लगता है। समस्या जितनी बड़ी हो उतनी बड़ी चुनौती। और चुनौती के साथ तुम्हारा अहंकार उभरता है, ऊंची उड़ान भरता है। तुम समस्याएं पैदा करते हो, समस्याएं होती नहीं।

और पुरोहित, और मनोविश्लेषक और गुरु प्रसन्न होते हैं क्योंकि उनका सारा धंधा तुम्हारे कारण चलता है। यदि तुम नाकुछ से टीले नहीं बनाते और यदि तुम अपने टीलों को पर्वत नहीं बनाते तो गुरु तुम्हारी मदद कैसे करेंगे? पहले तुम्हें उस स्थिति में होना चाहिए जहां तुम्हारी मदद की जा सके।

वास्तविक सद्गुरु कुछ और ही बात करते हैं। वे कहते रहे हैं, ‘ कृपा करके जो तुम कर रहे हो उसे देखो, जो बेवकूफी कर रहे हो उसे देखो। पहले तो तुम समस्या पैदा करते हो, और फिर समाधान की खोज में जाते हो। ज्ररा देखो, तुम समस्या कयों पैदा कर रहे हो? ठीक शुरुआत में, जब तुम समस्या पैदा कर रहे हो, वहीं समाधान है। उसे पैदा मत करो। लेकिन यह तुम्हें रास नहीं आएगा क्योंकि तब फिर तुम अपने ऊपर जा गिरोगे, चारो खाने चीत हो जाओगे। कुछ करना नहीं? न कोई बुद्धत्व, न सतोरी, न कोई समाधि? और तुम गहनता से बेचैन हो, खाली हो, और किसी भी चीज से अपने आप को भरने को तत्पर हो।

केवल इतना ही समझना है कि तुम्हारी कोई समस्या नहीं है। इसी क्षण तुम सब समस्याएं मिटा सकते हो क्योंकि उन्हें बनानेवाले तुम ही हो। अपनी समस्याओं को गौर से देखो: तुम जितना गहरे देखोगे उतनी वे छोटी मालूम होंगी। नजर गड़ाकर उन्हें देखते जाओ, तो धीरे-धीरे वे नदारद हो जाएंगी। उन्हें देखते चले जाओ, और तुम पाओगे, वहां सिर्फ खालीपन है– एक सुंदर खालीपन तुम्हें घेर लेता है। न कुछ करना है, न कुछ होना है, क्योंकि तुम वह हो ही।] पढ़ना जारी रखें समस्या अहंकार की खुराक की भांति – ओशो

सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

जब आतंकवाद को सूफीवाद से खत्म किये जाने की बात कही जा रही है, ऐसे में आध्यात्मिक क्रान्ति से कदाचार (अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचारादि) का अंत करने की बात होना, यह सिद्ध करते है कि सूफीमत की रूहानियत ही अध्यात्म-विज्ञान है। यह भी संयोग ‘परवरदिगार’ ने तय किया  ‘‘कदाचार पूर्ण दुर्घर्ष दौर में ‘आर्ट आॅफ लिविंग का विश्व सांस्कृतिक महोत्सव’ एवं ‘विश्व सूफी कांफ्रेंस’  का … पढ़ना जारी रखें सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

राष्ट्रभाषा के मामले को, जो इस देश में बेहद उलझ गया है और उस पर लिखना या बात करना औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाने लगा है। आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा का प्रश्न मानवीय है, खासकर भारत में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा जनता को जनतंत्र से अलग कर रही है। हिन्दी और … पढ़ना जारी रखें हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिन्दी अपने भाषा क्षेत्र के राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी, खड़ी आदि उपभाषिक रूपों को एवं इन सबके मेल से बनी सधुक्कड़ी को हिन्दी का अनिवार्य अंग मानकर चली है। इसी प्रसंग में हिन्दी के विद्वानों का ध्यान हिन्दी काव्य भाषा के उद्गम काल के स्वरूप की ओर दिलाना भी अप्रासंगिक न होगा। यह स्वरूप भी हिन्दी की एकाधिक उपभाषाओं के समावेश से बना है। इसका … पढ़ना जारी रखें हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश: भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें वैदिक, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा इतिहास के अध्ययन से अब यह स्पष्ट हो गया है कि वेदों के रचना-काल में तथा उसके भी पूर्ववर्ती युग में जनभाषा में तथा साहित्यिक भाषा में भाषिक ही नहीं, शब्द-रुपों की रचना में भी अन्तर था । यह अन्तर कई स्तरों पर लक्षित होता है। जैसे-कि उच्चारण, रूप-रचना, वैकल्पिक प्रयोग, अन्य भाषाओं से गृहीत शब्दावली, … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

खड़ी बोली हिंदी के भाषिक और साहित्यिक विकास में जिन भाषाओं और बोलियों का विशेष योगदान रहा है उनमे  अपभ्रंश और अवहट्ट भाषाएँ भी है| हिंदी को अपभ्रंश और अवहट्ट से जो कुछ भी मिला उसका पूरा लेखा जोखा इन तीनों की भाषिक और साहित्यिक संपत्ति का तुलनात्मक विवेचन करने से प्राप्त होता है | अपभ्रंश और अवहट्ट का व्याकरणिक रूप – अपभ्रंश कुछ -कुछ और अवहट्ट बहुत … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के ज्ञाता जिसे ”विकास” कहते हैं उसे ही और लोग भ्रष्‍ट होना या बिगड़ना कहते हैं। धीरे-धीरे प्राकृत-भाषाएँ, लिखित भाषाएँ हो गईं। सैकड़ों पुस्तकें उनमें बन गईं। उनका व्‍याकरण बन गया। इससे … पढ़ना जारी रखें हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

हिन्दी साहित्य का इतिहास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से   हिन्दी साहित्य पर यदि समुचित परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ हरदेव बाहरी के शब्दों में, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से आरम्भ होता है। यह कहना ही ठीक होगा कि वैदिक भाषा ही हिन्दी है। इस भाषा का दुर्भाग्य रहा … पढ़ना जारी रखें हिन्दी साहित्य का इतिहास

यूजीसी क्या है?

विकिपीडिया के अनुसार- भारत में उच्च शिक्षा का इतिहास काफी पुराना है। इसके मूल में १९वीं शताब्दी है, जब वाइसरॉय लॉर्ड मैकाले ने अपनी सिफारिशें रखी थीं। उसके बाद बीसवीं शताब्दी में सन् १९२५ में इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसका बाद में नाम भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) पड़ा। इस संस्था के अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षिक, सांस्कृतिक … पढ़ना जारी रखें यूजीसी क्या है?

यूजीसी नेट की तैयारी कैसे करें – संदेश आचार्य

  विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) नई दिल्ली द्वारा शोध को बढ़ावा देने हेतु एवं शिक्षकों की पात्रता निर्धारण करने हेतु राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) का आयोजन वर्ष 1948 से किया जा रहा है। उक्त परीक्षा वर्ष में दो बार जून एवं दिसंबर माह में आयोजित की जाती है। परीक्षा के दो मुख्य उद्देश्य है। प्रथम शोध कार्य करने हेतु छात्रवृत्ति प्रदान करना एवं द्वितीय शिक्षकों … पढ़ना जारी रखें यूजीसी नेट की तैयारी कैसे करें – संदेश आचार्य