वंशबेल -इंदिरा गोस्वामी

Village

गाँव का महाजन पीतांबर अपने घर के सामने पेड़ के ठूँठ पर बैठा था। वह पचास को पार कर चुका था। कभी वह काफी हट्टा-कट्टा था, लेकिन अब उसे चिंता ने दुबला दिया था। उसकी ठुट्टी के नीचे की खाल ढीली पड़कर लटकने लगी थी। वह दूर निगाहें टिकाए एक बच्चे को देखे जा रहा था, जो अपनी बंसी की फंसी डोरी को छुड़ाने की कोशिश में था। 1 एकाएक उसका ध्यान टूटा। गाँव का पुजारी अपनी खड़खड़ाती आवाज़ में उससे कह रहा था, "तुम्हारा अपना तो कोई बच्चा है नहीं। तब तुम उस बच्चे को भूखी निगाहों से क्यों देखे जा रहे हो, फिर रुककर पूछा, "अब तुम्हारी पत्नी कैसी है?" 1 "कई बार उसे शहर के अस्पताल में ले जा चुका हूँ, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उसके सारे शरीर पर सूजन आ गयी है।" 1 "तब तो उससे बच्चा होने की कोई उम्मीद नहीं। लगता है पीतांबर, तुम्हारा वंश चलाने वाला कोई नहीं रहेगा।" 1

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ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – हरिवंशराय बच्चन

Sad

सोचा करता बैठ अकेले, गत जीवन के सुख-दुख झेले, दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! नहीं खोजने जाता मरहम, होकर अपने प्रति अति निर्मम, उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं – गुलज़ार

Rishte

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं कुछ इक पल के कुछ दो पल के कुछ परों से हल्के होते हैं बरसों के तले चलते-चलते भारी-भरकम हो जाते हैं

क्या होगा भगवान देश का! -आचार्य बलवंत

Acharya Balwant

खतरे में सम्मान देश का। क्या होगा भगवान देश का! देश में ऐसी हवा चली है, बदल गया ईमान देश का। क्या होगा भगवान देश का! आए दिन घपला-घोटाला दाल में है काला ही काला। झुग्गी-झोपड़ियों के अंदर, सिसक रहा अरमान देश का। क्या होगा भगवान देश का! बदल गयी भावों की भाषा। बदली मूल्यों … पढ़ना जारी रखें क्या होगा भगवान देश का! -आचार्य बलवंत

आस से आसरा -कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कुछ जीवन बचा ले जाते हैं ये शांत दृढ़ मुँडेर, जो आस जगाये रखते जीवित होने का।। एक छह फीटा दरवाजा जो खुलता है, उसकी तरफ, आधी ढ़की छत के साथ, धूप बारिश से बचाने को।। बाँह फैलाये कुछ मन रोज सैर कर आते हैं, नाप आते है अनंत को ,सुनाने को रोज नई कहाँनिया।। … पढ़ना जारी रखें आस से आसरा -कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

हम किसी से कम नही – मनीषा जाजोरिया

हम किसी से कम नही

न जाने कैसा हुआ ये समां वो कैसे आया एक झोंका हवा का दिल तोड़ गया सारे अरमानों का पिघला गया बने हुए खरे सोने को कर गया उनका मोल रिश्तो से

मियाँ तुम होते कौन हो – अनिल रघुराज

Literature in India

जतिन गांधी का न तो गांधी से कोई ताल्लुक है और न ही गुजरात से। वह तो कोलकाता के मशहूर सितारवादक उस्ताद अली मोहम्मद शेख का सबसे छोटा बेटा मतीन मोहम्मद शेख है। अभी कुछ ही दिनों पहले उसने अपना धर्म बदला है। फिर नाम तो बदलना ही था। ये सारा कुछ उसने किसी के कहने पर नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी से किया है। नाम जतिन रख लिया। उपनाम की समस्या थी तो उसे इंदिरा नेहरू और फिरोज खान की शादी का किस्सा याद आया तो गांधी उपनाम रखना काफ़ी मुनासिब लगा। वैसे, इसी दौरान उसे ये चौंकानेवाली बात भी पता लगी कि इंदिरा गांधी के बाबा मोतीलाल नेहरू के पिता मुसलमान थे, जिनका असली नाम ग़ियासुद्दीन गाज़ी था और उन्होंने ब्रिटिश सेना से बचने के लिए अपना नाम गंगाधर रख लिया था। वैसे, आपको बता दें कि मतीन के लिए धर्म बदलना कोई बहुत ज़्यादा सोचा-समझा फ़ैसला नहीं था। यह एक तरह के झोंक में आकर उठाया गया अवसरवादी कदम था। हाँ, इतना ज़रूर है कि वह अपनी पहचान को लेकर लंबे अरसे से परेशान रहा करता था। वह सोचता - ये भी कोई बात हुई कि पेशा ही उसकी पहचान है। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। इत्ती-सी पहचान उसके लिए काफ़ी तंग पड़ती थी। हिंदुस्तानी होने की पहचान ज़रूर है। लेकिन हिंदुस्तानी तो एक अरब दस करोड़ लोग हैं। वह उनसे अलग कैसे हैं? ऐसा नहीं है कि उसे अपने हिंदुस्तानी होने पर नाज़ नहीं है। वह आँखें बंद कर के देखता तो उसके शरीर में छत्तीसगढ़ के पठार, झारखंड के जंगल, उत्तराखंड की पर्वत शृंखलाएँ और पश्चिम बंगाल का सुंदरवन लहराते लगता, उसकी धमनियों में वेस्टर्न घाट के झरने बहते लगते। मगर, आँखें खोलने पर वह खुद को एकदम रीता, ठन-ठन गोपाल महसूस करता। यह उसके अंदर की सतत बेचैनी थी, जिसे लेकर वह उधेड़बुन में लगा रहता, उसी तरह जैसे मध्यकाल में या उससे पहले कोई योगी या संत अपने स्व को, अहम को लेकर परेशान रहा करता होगा।