क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

  क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? आज नहीं क्या हो सकता जो कल होता, सच्चा प्रयत्न  नहीं   कभी   विफल होता, क्या एकता में ही केवल बल होता? क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? बौने बामन ने अकेले राजा बलि को बांधा था, तीन पग में नभ, महि और स्वर्ग तक को लांघा था। एक अकेले विप्र ने क्षत्रिय हीन जग था किया, हाथ में … पढ़ना जारी रखें क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

रेडिकल होना जूझना है वस्तुस्थिति के विपरीत पेंडुलम होना भी है आधुनिकता और परम्परा के बीच। न तो पूर्णतः सम्मानित और न ही नकारने योग्य हम रेडिकल संतानें दुनियां से लड़ते-लड़ते खुद ही हो जाते हैं संक्रमित क्योंकि हमारे वाद को न कोई पचा पाता है न ही ठुकरा पाता है। हमारे तर्कपूर्ण विचार सामने वाले को करता है निरुत्तर तब स्त्री-पुरुष दोनों के शरीर … पढ़ना जारी रखें हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

मेरे पिता को आता है..

न मेरी मेहबूबा करती है,न अज़ीज़ कर पाता है, वो दिल को खुश समझते है जब आँखे दर्द छुपता है, कही कोने में थी गम की गट्ठर उसे भी ढूंढ निकाला , की मेरा चेहरा पढ़ना सिर्फ मेरे पिता को आता है।     मेरे हाथ जब मेरे अविकसित मूछों को ताव देती है, मुश्किलें खुद पिता की मौजूदगी भांप लेती है, सर पर पैर … पढ़ना जारी रखें मेरे पिता को आता है..

सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

दिन भर आग बबूला होकर
अहंकार का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से
शीतलता पाने पढ़ना जारी रखें सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

जब आतंकवाद को सूफीवाद से खत्म किये जाने की बात कही जा रही है, ऐसे में आध्यात्मिक क्रान्ति से कदाचार (अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचारादि) का अंत करने की बात होना, यह सिद्ध करते है कि सूफीमत की रूहानियत ही अध्यात्म-विज्ञान है। यह भी संयोग ‘परवरदिगार’ ने तय किया  ‘‘कदाचार पूर्ण दुर्घर्ष दौर में ‘आर्ट आॅफ लिविंग का विश्व सांस्कृतिक महोत्सव’ एवं ‘विश्व सूफी कांफ्रेंस’  का … पढ़ना जारी रखें सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

राष्ट्रभाषा के मामले को, जो इस देश में बेहद उलझ गया है और उस पर लिखना या बात करना औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाने लगा है। आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा का प्रश्न मानवीय है, खासकर भारत में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा जनता को जनतंत्र से अलग कर रही है। हिन्दी और … पढ़ना जारी रखें हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिन्दी अपने भाषा क्षेत्र के राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी, खड़ी आदि उपभाषिक रूपों को एवं इन सबके मेल से बनी सधुक्कड़ी को हिन्दी का अनिवार्य अंग मानकर चली है। इसी प्रसंग में हिन्दी के विद्वानों का ध्यान हिन्दी काव्य भाषा के उद्गम काल के स्वरूप की ओर दिलाना भी अप्रासंगिक न होगा। यह स्वरूप भी हिन्दी की एकाधिक उपभाषाओं के समावेश से बना है। इसका … पढ़ना जारी रखें हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश: भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें वैदिक, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा इतिहास के अध्ययन से अब यह स्पष्ट हो गया है कि वेदों के रचना-काल में तथा उसके भी पूर्ववर्ती युग में जनभाषा में तथा साहित्यिक भाषा में भाषिक ही नहीं, शब्द-रुपों की रचना में भी अन्तर था । यह अन्तर कई स्तरों पर लक्षित होता है। जैसे-कि उच्चारण, रूप-रचना, वैकल्पिक प्रयोग, अन्य भाषाओं से गृहीत शब्दावली, … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के ज्ञाता जिसे ”विकास” कहते हैं उसे ही और लोग भ्रष्‍ट होना या बिगड़ना कहते हैं। धीरे-धीरे प्राकृत-भाषाएँ, लिखित भाषाएँ हो गईं। सैकड़ों पुस्तकें उनमें बन गईं। उनका व्‍याकरण बन गया। इससे … पढ़ना जारी रखें हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

हिन्दी साहित्य का इतिहास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से   हिन्दी साहित्य पर यदि समुचित परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ हरदेव बाहरी के शब्दों में, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से आरम्भ होता है। यह कहना ही ठीक होगा कि वैदिक भाषा ही हिन्दी है। इस भाषा का दुर्भाग्य रहा … पढ़ना जारी रखें हिन्दी साहित्य का इतिहास

यूजीसी क्या है?

विकिपीडिया के अनुसार- भारत में उच्च शिक्षा का इतिहास काफी पुराना है। इसके मूल में १९वीं शताब्दी है, जब वाइसरॉय लॉर्ड मैकाले ने अपनी सिफारिशें रखी थीं। उसके बाद बीसवीं शताब्दी में सन् १९२५ में इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसका बाद में नाम भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) पड़ा। इस संस्था के अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षिक, सांस्कृतिक … पढ़ना जारी रखें यूजीसी क्या है?

ज़िंदगी – अजनबी राजा

ज़िंदगी इक पहेली है अनदेखी इक सहेली है कही बेबाक़ नादानियाँ है कही थोडी बचकानियां है खुशियों की बरसात है वही ग़मो का अन्धेरा है कही तपती धूप है तो कही नीम की छाँव है हसरतें है इसमें बचपन की ललक है इसमें ज़िंदगी क्या है चले तो उम्र भर की हमसफ़र है वही पल दो पल की हमराह बस की भीड़ है ज़िंदगी तो … पढ़ना जारी रखें ज़िंदगी – अजनबी राजा

कहानी सरहद की – भूपेन्द्र कुमार दवे

‘सरहद पर तैनात जवानों के सामने प्रकृति की खुली किताब होती है जिस पर ईश्वर की इबारत शायद विश्व के सभी ग्रंथों से ज्यादा जीवन को पवित्रता संपन्न कराने की क्षमता रखती है।  मेरे साथी ने उत्तर-पश्चिम सरहदों का नजारा देखकर यह कहा था। उसने प्रश्न किया था, ‘यह सरहद यहाँ आकर रुक क्यों जाती है? सारे विश्व को यदि यह अपने आगोश में ले … पढ़ना जारी रखें कहानी सरहद की – भूपेन्द्र कुमार दवे

मेरी मुन्नी का कमरा – तरुण कुमार

मेरी मुन्नी का कमरा वो टेडी बियर पूछता है मुझसे तुम्हारा पता, गुमसुम सा तकता वो रेसिंग कारे, वो काठ का घोड़ा, वो गुडिया के उतरे कपडे, जो सोती थी दुबक कर मुन्नी के साथ, कबसे वैसे पड़ी है , मुन्नी तुम्हारे कमरे में सबसे बेह्टर और बोलती हैं दीवारें, तुम्हारी पेंटिंग्स के आगे एम् ऍफ़, पिकासों हैं फीके, मेरा अजंता, एलोरा यही हैं, मुन्नी … पढ़ना जारी रखें मेरी मुन्नी का कमरा – तरुण कुमार

बदनाम न करो राम , खुदा – जय नारायण कश्यप

१- अलिफ से अल्लाह जो कहे , और ॐ कहे दिल से , उनसे कहें , मस्जिद मंदिर , तुम्हारी चले फिर से , हमें उनसे करो आज़ाद जो , इंसान को देखें घिन से , थक गए हैं , पक गए हैं , धर्मांधों के सितम से , तुम लड़ो तो लड़ो खुद के लिए , भूख प्यास , हद के लिए , पर … पढ़ना जारी रखें बदनाम न करो राम , खुदा – जय नारायण कश्यप

घूँघट – डिम्पल गौड़ ‘अनन्या’

“देखो अब घूँघट हटा भी दो !” “नहीं बिल्कुल नहीं…यह घूंघट नहीं हटेगा…कहे देती हूँ |” “अरे ! अभी से धमकी भरे अल्फाज़ ! विवाह के 10 साल पश्चात क्या करोगी !” “जो भी करुँगी आपको बर्दाश्त करना होगा ! आखिर पत्नी हूँ तुम्हारी ! और हाँ एक बात और… मुझे कॉफ़ी पीने की इच्छा है जाइए बनाकर लाइए अभी कि अभी !” “हे भगवान् … पढ़ना जारी रखें घूँघट – डिम्पल गौड़ ‘अनन्या’

||| स्त्री के मन के रंग |||- विजय कुमार सप्पति

“सिलवटों की सिहरन” अक्सर तेरा साया एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है ….. मेरे हाथ, मेरे दिल की तरह कांपते है, जब मैं उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ ….. तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छु जाता है जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था, मैं सिहर सिहर … पढ़ना जारी रखें ||| स्त्री के मन के रंग |||- विजय कुमार सप्पति