हम किसी से कम नही – मनीषा जाजोरिया

हम किसी से कम नही

न जाने कैसा हुआ ये समां वो कैसे आया एक झोंका हवा का दिल तोड़ गया सारे अरमानों का पिघला गया बने हुए खरे सोने को कर गया उनका मोल रिश्तो से

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मियाँ तुम होते कौन हो – अनिल रघुराज

Literature in India

जतिन गांधी का न तो गांधी से कोई ताल्लुक है और न ही गुजरात से। वह तो कोलकाता के मशहूर सितारवादक उस्ताद अली मोहम्मद शेख का सबसे छोटा बेटा मतीन मोहम्मद शेख है। अभी कुछ ही दिनों पहले उसने अपना धर्म बदला है। फिर नाम तो बदलना ही था। ये सारा कुछ उसने किसी के कहने पर नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी से किया है। नाम जतिन रख लिया। उपनाम की समस्या थी तो उसे इंदिरा नेहरू और फिरोज खान की शादी का किस्सा याद आया तो गांधी उपनाम रखना काफ़ी मुनासिब लगा। वैसे, इसी दौरान उसे ये चौंकानेवाली बात भी पता लगी कि इंदिरा गांधी के बाबा मोतीलाल नेहरू के पिता मुसलमान थे, जिनका असली नाम ग़ियासुद्दीन गाज़ी था और उन्होंने ब्रिटिश सेना से बचने के लिए अपना नाम गंगाधर रख लिया था। वैसे, आपको बता दें कि मतीन के लिए धर्म बदलना कोई बहुत ज़्यादा सोचा-समझा फ़ैसला नहीं था। यह एक तरह के झोंक में आकर उठाया गया अवसरवादी कदम था। हाँ, इतना ज़रूर है कि वह अपनी पहचान को लेकर लंबे अरसे से परेशान रहा करता था। वह सोचता - ये भी कोई बात हुई कि पेशा ही उसकी पहचान है। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। इत्ती-सी पहचान उसके लिए काफ़ी तंग पड़ती थी। हिंदुस्तानी होने की पहचान ज़रूर है। लेकिन हिंदुस्तानी तो एक अरब दस करोड़ लोग हैं। वह उनसे अलग कैसे हैं? ऐसा नहीं है कि उसे अपने हिंदुस्तानी होने पर नाज़ नहीं है। वह आँखें बंद कर के देखता तो उसके शरीर में छत्तीसगढ़ के पठार, झारखंड के जंगल, उत्तराखंड की पर्वत शृंखलाएँ और पश्चिम बंगाल का सुंदरवन लहराते लगता, उसकी धमनियों में वेस्टर्न घाट के झरने बहते लगते। मगर, आँखें खोलने पर वह खुद को एकदम रीता, ठन-ठन गोपाल महसूस करता। यह उसके अंदर की सतत बेचैनी थी, जिसे लेकर वह उधेड़बुन में लगा रहता, उसी तरह जैसे मध्यकाल में या उससे पहले कोई योगी या संत अपने स्व को, अहम को लेकर परेशान रहा करता होगा।

रबर बैंड – अन्विता अब्बी

कहानी

उसका बिस्तर से उठने का मन नहीं कर रहा था। करवट लेने पर उसे लगा कि बिस्तर बेहद ठंडा है। उसने आँखों पर हाथ रखा, उसे वे भी ठंडी लगीं प़लकें उसे भीगी लग रही थीं। तो क्या वह रो रही थी? नहीं, वह क्यों रोएगी? और उसने फिर अपनी पलकों को छुआ। उसने पलकें झपकाईं। उसे बहुत खिंचाव का अनुभव हो रहा था। वह चाहकर भी पूरी तरह आँख नहीं खोल पा रही थी मानो किसी ने जबरदस्ती उसकी पलकें पकड़ लीं हों। उसे लगा उसे बाथरूम में जाकर 'वॉश' कर लेना चाहिए। पर वह नहीं चाह रही थी कि दिन इतनी जल्दी शुरू हो जाय। रात कैसे इतनी जल्दी खत्म हो गई? उसे लग रहा था कि यह पहाड़-सा दिन उससे काटे नहीं कटेगा। उसकी पीठ के नीचे कुछ चुभ रहा था। हाथ डालकर देखा उसकी चोटी का 'रबर बैण्ड' था। उसने अपनी चोटी आगे की ओर कर ली और तभी उसे खयाल आया कि वह सारी रात अजीबो-गरीब सपने देखती रही है। किसी ने उसके बाल काट दिए हैं उसको सपने वाली अपनी शक्ल याद आ रही थी उफ कितनी घृणित लग रही थी वह। उसने याद करने की कोशिश की, वह बाल काटने वाला कौन था? उसकी शक्ल बहुत-कुछ भाई से मिलती-जुलती थी। उस भाई जैसी शक्ल वाले ने उसके बाल काटकर उसे खम्भे से बांध दिया था। और उसे सैमसन याद आ रहा था। उसकी हालत ठीक सैमसन की तरह हो रही थी वह चीखती जा रही थी और जोर-जोर से खम्भे को हिलाने की कोशिश कर रही थी। उसने आँखें बन्द कर लीं। उसके सामने सपने वाला दृश्य ज्यों-का-त्यों आ गया था। उसे लग रहा था कि उसमें सैमसन वाली शक्ति क्यों नहीं आ गई थी काश वह खम्भे को गिरा सकती। और तभी उसे लगा कि वह बेकार की बातें सोच रही हैं। सपना केवल सपना होता है किसी सपने का कोई अर्थ नहीं होता और यदि होता भी है तो कम-से-कम आज के दिन उसे कुछ नहीं समझना हैं।

रेलगाड़ी – अजय कुमार गुप्ता

रेलगाड़ी - अजय कुमार गुप्ता

'यह जीवन तो एक रेलगाड़ी के सदृश्य है, जो एक स्टेशन से चलकर गंतव्य तक जाती है। न जाने कितने स्टेशनों से होकर गुज़रती है। मार्ग में अगणित पथिक आपके साथ हो लेंगे और अगणित सहयात्री आपसे अलग हो जाएँगे। कुछ सहयात्री लंबी अवधि के लिए आपके साथ होंगे, जिन्हें अज्ञानवश हम मित्र-रिश्तेदार समझते हैं, परंतु शीघ्र ही वे भी अलग हो जाएँगे। लंबी अवधि की यात्रा भी सदैव मित्रतापूर्वक नहीं बीत सकती, तो कभी कोई छोटी-सी यात्रा भी आपके जीवन में परिवर्तन ला सकती है, संपूर्ण यात्रा को अविस्मरणीय बना सकती है।' विजय चेन्नई रेलवे स्टेशन पर बैठकर एक आध्यात्मिक पुस्तक के पन्ने पलटते हुए यह गद्यांश देख रहा था। चारो ओर जनसमूह, परंतु नीरव और सूना। एक वही अकेला नहीं था। उसने चारो ओर नज़र दौडाई, सभी लोग भीड़ में, परंतु अकेले। किसी को किसी और की सुध नहीं। इधर-उधर देखा, चाय की दुकान, फल की दुकान, मैग्ज़ीन कार्नर और दूर एक पानी पीने का नल, हर जगह विशाल जन समूह। सभी लड़ रहे हैं, झगड़ रहे हैं, क्यों? समय नहीं है किसी के पास, यह भी जानने के लिए। उद्घोषणा हुई कि राप्ती सागर एक्सप्रेस निश्चित समय से दो घंटे विलंब से आएगी। विजय को इसी ट्रेन की प्रतीक्षा थी, सो समय पर्याप्त से भी ज़्यादा उपलब्ध हो गया था। कैसे काटे वह ये समय! पुस्तक को हैंडबैग में डालकर वह रेलवे स्टेशन के सूक्ष्म निरीक्षण में लग गया। सामान के नाम पर केवल एक हैंडबैग यात्रा को सहज बना देते हैं। सामान ज़्यादा रहना, चिंता व मुश्किलों को आमंत्रण देने जैसा है। परंतु विजय के विपरीत, कई लोग विवश होकर अथवा शौकिया भारी भरकम सामान के साथ चलना पसंद करते हैं। उनके सामान को देखकर विजय ने अपने आप को काफी आरामदायक स्थिति में महसूस किया।

सतह से ऊपर – अंबरीष मिश्रा

अंबरीष मिश्रा

तिलक राज पाँचवी कक्षा का हमारा साथी था। बहुत पहले तिलक राज का परिवार अपनी तीन बहनों तथा माँ के साथ हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बँटवारे से प्रभावित होकर अलीगढ़ मे आकर बसा था। माँ ही घर की मुखिया थी, पिता की मृत्यु बहुत पहले ही हो गई थी। हम लोग साथ-साथ स्कूल जाते। समय से पहले हम तिलक राज के घर पहुँच जाया करते। पन्द्रह सीढ़ियों को चढ़ने के बाद दरवाजे से होते हुये ठीक उसके आँगन में पहुँच जाते। पहली सीढ़ी से ही पराठों के बनने से निकलने वाली घी के धुएँ की सुगन्ध नाक में आती। दो-तीन पराठों का नाश्ता करता तिलक राज। तीन पर्तों वाले लाल-लाल सिके पराठों को माँ गोल सा करके गुपली बना कर तिलक राज के हाथों में दे देती। तिलक राज पहले पराठे का बड़ा सा गस्सा खाता, फिर उसके बाद लम्बे गिलास में भरी चाय के दो घूँट भरता। बीच-बीच में तिलक राज की तीन बहनों में से एक उसके सर में तेल डाल जाती, तो दूसरी कंघे से उसके बाल काढ़ जाती और तिलक राज बिना यह ख्याल किए कि स्कूल को देर हो रही है, पराठे की गोल गुपली से गस्सा खाता, फिर उसके बाद चाय के दो घूँट। हम आँगन के दरवाजे के पास खड़े होकर एक-एक चीज देखते, उसके साथ-साथ हमारे मुँह का स्वाद भी बदल जाता। सोचते, तीन पर्तों के लाल-लाल सिके पराठों के साथ चाय का स्वाद अवश्य ही अच्छा होता होगा। फिर कोई बहन बस्ता तैयार करके देती और हम लोग फिर पन्द्रह सीढ़ियाँ उतर कर पुलिस चौकी वाले छ: नम्बर के प्राइमरी स्कूल को चल पड़ते। हमें भी लगता और लोग भी मानते कि तिलक राज हमारा पक्का दोस्त था, पर शायद उन दिनों पक्के दोस्त की परिभाषा भी न जानते थे हम।

नरेश मेहता

नरेश मेहता | Naresh Mehta

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के यशस्वी कवि श्री नरेश मेहता उन शीर्षस्थ लेखकों में हैं जो भारतीयता की अपनी गहरी दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। नरेश मेहता ने आधुनिक कविता को नयी व्यंजना के साथ नया आयाम दिया। रागात्मकता, संवेदना और उदात्तता उनकी सर्जना के मूल तत्त्व है, जो उन्हें प्रकृति और समूची सृष्टि के प्रति पर्युत्सुक बनाते हैं। आर्ष परम्परा और साहित्य को श्रीनरेश मेहता के काव्य में नयी दृष्टि मिली। साथ ही, प्रचलित साहित्यिक रुझानों से एक तरह की दूरी ने उनकी काव्य-शैली और संरचना को विशिष्टता दी।

देवकीनन्दन खत्री | Devki Nandan Khatri

देवकीनन्दन खत्री | Devki Nandan Khatri

बाबू देवकीनन्दन खत्री (29 जून 1861 - 1 अगस्त 1913) हिंदी के प्रथम तिलिस्मी लेखक थे। उन्होने चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, काजर की कोठरी, नरेंद्र-मोहिनी,कुसुम कुमारी, वीरेंद्र वीर, गुप्त गोंडा, कटोरा भर, भूतनाथ जैसी रचनाएं की। 'भूतनाथ' को उनके पुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री ने पूरा किया। हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार में उनकेउपन्यास चंद्रकांता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस उपन्यास ने सबका मन मोह लिया। इस किताब का रसास्वादन के लिए कई गैर-हिंदीभाषियों ने हिंदी सीखी। बाबू देवकीनंदन खत्री ने 'तिलिस्म', 'ऐय्यार' और 'ऐय्यारी' जैसे शब्दों को हिंदीभाषियों के बीच लोकप्रिय बनाया। जितने हिन्दी पाठक उन्होंने (बाबू देवकीनन्दन खत्री ने) उत्पन्न किये उतने किसी और ग्रंथकार ने नहीं।