आलसस्य परम सुखम

प्राचीन काल से ही आलस को सामाजिक और व्यक्तिगत बुराई माना जाता रहा हैं. “जो सोवत हैं, वो खोवत हैं” जैसी कहावतो के माध्यम से आलसी लोगो को धमकाने और “अलसस्य कुतो विद्या” जैसे श्लोको के ज़रिये उनको सामाजिक रूप से ज़लील करने /ताने कसने के प्रयास अनंतकाल से जारी हैं. लेकिन फिर भी आज … पढ़ना जारी रखें आलसस्य परम सुखम

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सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

जब आतंकवाद को सूफीवाद से खत्म किये जाने की बात कही जा रही है, ऐसे में आध्यात्मिक क्रान्ति से कदाचार (अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचारादि) का अंत करने की बात होना, यह सिद्ध करते है कि सूफीमत की रूहानियत ही अध्यात्म-विज्ञान है। यह भी संयोग ‘परवरदिगार’ ने तय किया  ‘‘कदाचार पूर्ण दुर्घर्ष दौर में ‘आर्ट आॅफ … पढ़ना जारी रखें सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

बेटी की विदाई

बेटी की विदाई आती है बड़ी किस्मत से ये घड़ियाँ विदाई की खुशनसीबों को मिलती है ये लड़ियाँ विदाई की बाबुल के अंगना की बुलबुल जायेगी परदेश कैसे देख पाएंगी अखियाँ ये रतियाँ विदाई की किसने बनाई ये रीत रिवायतें ह्रदयविदारक सी कैसे समेट पायेगी बिटिया ये कलियां विदाई की खुशियों का मेला लग रहा … पढ़ना जारी रखें बेटी की विदाई

चरित्रवान भैंस, गर्भवती बुद्धिजीवी

एक थे सुदामा राय..जिला बलिया द्वाबा के भूमिहार,एक मेहनती किसान,एक बड़े खेतिहर. कहतें हैं उनके पास दो गाय और एक भैंस थी.. एक साँझ की बात है..राय साहेब गाय भैंस को खिला पिलाकर झाड़ू लगा रहे थे.तब तक क्षेत्र के एक प्रसिद्ध पशु व्यापारी आ धमके.. व्यापारी जी ने भैंस जी को बड़े प्यार से … पढ़ना जारी रखें चरित्रवान भैंस, गर्भवती बुद्धिजीवी

हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

राष्ट्रभाषा के मामले को, जो इस देश में बेहद उलझ गया है और उस पर लिखना या बात करना औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाने लगा है। आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा का प्रश्न मानवीय है, खासकर भारत में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा … पढ़ना जारी रखें हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिन्दी अपने भाषा क्षेत्र के राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी, खड़ी आदि उपभाषिक रूपों को एवं इन सबके मेल से बनी सधुक्कड़ी को हिन्दी का अनिवार्य अंग मानकर चली है। इसी प्रसंग में हिन्दी के विद्वानों का ध्यान हिन्दी काव्य भाषा के उद्गम काल के स्वरूप की ओर दिलाना भी अप्रासंगिक न होगा। यह स्वरूप भी … पढ़ना जारी रखें हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश: भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें वैदिक, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा इतिहास के अध्ययन से अब यह स्पष्ट हो गया है कि वेदों के रचना-काल में तथा उसके भी पूर्ववर्ती युग में जनभाषा में तथा साहित्यिक भाषा में भाषिक ही नहीं, शब्द-रुपों की रचना में भी अन्तर था । यह अन्तर कई स्तरों पर लक्षित होता है। … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर