हम सिसक सिसक सो जाते है

तेरा मेरी गली से गुजरना, मेरी नजरों पे आके वो रुकना । उन यादों के दामन थामे, हम संभल-संभल रुक जाते हैं।।   तेरी बातों पे मेरा बिखरना, मेरे साये से तेरा लिपटना। उन लम्हों को पास यू पाके, हम मचल-मचल रह जाते हैं।। तेरी रातों में मेरा वो सपना, मेरी सुबहो में तेरा वो जगना। उन यादों को दिल से लगा के, हम सिसक-सिसक … पढ़ना जारी रखें हम सिसक सिसक सो जाते है

समझदारी आने पर यौवन सचमुच चला जाता है और पैसा और स्थायित्व आ जाने पर साहस – हिम्मत रूपी टायर की हवा निकल जाती है !

#चलकहींदूरनिकलजाएँ समझदारी आने पर यौवन सचमुच चला जाता है और पैसा और स्थायित्व आ जाने पर साहस – हिम्मत रूपी टायर की हवा निकल जाती है ! जैसे मायके से बुलावा आने पर तंग करने वाले ससुरालियों को छोड़कर नवेली बहू भागती है वैसे ही दो दिन की भी छुट्टियां आ जाने पर हम दिल्ली छोड़ पहाड़ों की ओर भाग खडे़ होते थे ! ना … पढ़ना जारी रखें समझदारी आने पर यौवन सचमुच चला जाता है और पैसा और स्थायित्व आ जाने पर साहस – हिम्मत रूपी टायर की हवा निकल जाती है !

अलग्योझा – मुंशी प्रेमचंद

1 भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने बाद दूसरी सगाई की, तो उसके लड़के रग्घू के लिए बुरे दिन आ गए। रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी। चैन से गॉँव में गुल्ली-डंडा खेलता फिरता था। मॉँ के आते ही चक्की में जुतना पड़ा। पन्ना रुपवती स्त्री थी और रुप और गर्व में चोली-दामन का नाता है। वह अपने हाथों … पढ़ना जारी रखें अलग्योझा – मुंशी प्रेमचंद

रौशनी का टुकड़ा – अभिनव शुक्ल

सूरज की किरणें आकाश में अपने पंख पसार चुकी थीं। एक किरण खिड़की पर पड़े टाट के परदे को छकाती हुई कमरे के भीतर आ गई और सामने की दीवार पर छोटे से सूरज की भाँति चमकने लगी। पीले की बदरंग दीवार अपने उखड़ते हुए प्लास्टर को सँभालती हुई उस किरण का स्वागत कर रही थी। बिस्तर पर पड़े-पड़े अनिमेष ने अपनी आँखें खोल कर … पढ़ना जारी रखें रौशनी का टुकड़ा – अभिनव शुक्ल

जो सार्थक है, वही सकारात्मक है

अग्रज कवि राजेश जोशी का यह आलेख दैनिक भास्कर के गत ५ अक्टूबर के अंक में पढ़ने को मिला. सहज तरीके से कई महत्त्वपूर्ण बातें करते इस आलेख को यहां सहेजने और अपने मित्रों के बीच साझा करने की आवश्यकता महसूस हुई. दैनिक भास्कर को आभार सहित यह आलेख यहां प्रस्तुत है. मिस्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कथाकार नजीब महफूज़ की एक बहुत छोटी-सी कहानी है – प्रार्थना … पढ़ना जारी रखें जो सार्थक है, वही सकारात्मक है

District Magistrate Office

डिप्टी कलक्टरी – अमरकांत

शकलदीप बाबू कहीं एक घंटे बाद वापस लौटे। घर में प्रवेश करने के पूर्व उन्होंने ओसारे के कमरे में झाँका, कोई भी मुवक्किल नहीं था और मुहर्रिर साहब भी गायब थे। वह भीतर चले गए और अपने कमरे के सामने ओसारे में खड़े होकर बंदर की भाँति आँखे मलका-मलकाकर उन्होंने रसोईघर की ओर देखा। उनकी पत्नी जमुना, चौके के पास पीढ़े पर बैठी होंठ-पर-होंठ दबाए … पढ़ना जारी रखें डिप्टी कलक्टरी – अमरकांत

दोपहर का भोजन – अमरकांत

सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रख कर शायद पैर की उँगलियाँ या जमीन पर चलते चीटें-चीटियों को देखने लगी।

अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास नहीं लगी हैं। वह मतवाले की तरह उठी ओर गगरे से लोटा-भर पानी ले कर गट-गट चढ़ा गई। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह हाय राम कह कर वहीं जमीन पर लेट गई।

आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़ी रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गई, आँखों को मल-मल कर इधर-उधर देखा और फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छह वर्षीय लड़के प्रमोद पर जम गई।

लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियाँ साफ दिखाई देती थीं। उसके हाथ-पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हंडिया की तरह फूला हुआ था। उसका मुख खुला हुआ था और उस पर अनगिनत मक्खियाँ उड़ रही थीं। पढ़ना जारी रखें दोपहर का भोजन – अमरकांत

मर्द – चित्रा मुद्गल

आधी रात में उठकर कहां गई थी?”

शराब में धुत्त पति बगल में आकर लेटी पत्नी पर गुर्राया।

“आंखों को कोहनी से ढांकते हुए पत्नी ने जवाब दिया, “पेशाब करने!”

“एतना देर कइसे लगा?”

“पानी पी-पीकर पेट भरेंगे तो पानी निकलने में टेम नहीं लगेगा?” पढ़ना जारी रखें मर्द – चित्रा मुद्गल

चुनौती – रामकुमार आत्रेय

वृन्दावन गया था। बाँके बिहारी के दर्शन करने के पश्चात् मन में आया कि यमुना के पवित्र जल में भी डुबकी लगाता चलूँ। पवित्र नदियों में स्नान करने का अवसर रोज-रोज थोड़े ही मिलता है।

यमुना के घाट सुनसान से थे। हाँ, बन्दरों की सेना अवश्य अपनी इच्छानुसार वहाँ विचरण कर रही थी। सीढ़ियाँ और बारादरियाँ टूटी-फूटी पड़ी थी। लगा कि वहाँ महीनों से सफाई नहीं हुई है। परन्तु मुझे तो स्नान करना ही था। जल में प्रवेश करने से पूर्व मैंने दोर्नो हाथ जोड़कर ऊँची आवाज में कहा-“यमुना मैया, तुम्हारी जय!” पढ़ना जारी रखें चुनौती – रामकुमार आत्रेय

Maovad.. - Literature in India

माओवाद सही भी है, गलत भी…बस नज़रिए का फर्क है|

नई दिल्ली से धनबाद की यात्रा पर हूँ| लोगों से बहुत सुना था कि झारखंड प्राकृतिक सौन्दर्य को अभी भी संवारे हुए है, इसलिए प्रकृति के इस नायाब करिश्मे और सुन्दरता को देखने का मन हुआ| बहुत सोचने के बाद तय किया कि भारतीय रेल से यात्रा की जाय क्यूंकि रेल की पटरियों के किनारे ही आपको आधी सुन्दरता का दर्शन हो जाएगा| तो फिर क्या था, मैं ठहरा महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन का अनुयायी, चुनाव आते ही अम्बेडकरवाद में पगलाए मेरे देश के नेताओं और लेखकों से कहीं दूर….सैर कर दुनिया की गाफ़िल जिंदगानी फिर कहाँ….को महसूस करने…वास्तव में असली लेखक वही है जो प्रकृति और मानव विज्ञान में निहित प्रेम के दर्पण में खुद की मानवता का प्रतिबिम्ब उद्धृत कर ले| मैंने भी इसी परिपाटी को आगे बढाने की ठानी| मैंने भी सोचा क्यूँ न एक लेखक होने के नाते महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन हो जाया जाय| अथाह सुख की अनुभूति है प्रकृति की बाहों में|

इसी बीच जब मेरे अंदर का मानव जाग जाता है तो मेरी निगाहें पास बैठे लोगों के पास पहुँच जाती है…कुछ लोग मस्त हवा के आनंद में इस कदर जन्म भर से थकाए है कि उंघ रहे है…कुछ दुसरे के कंधे पर सर मार कर सो रहे है और मैं एक बन्दर की तरह सब सुत्तक्कड़ो के बीच प्रकृति की सुन्दरता ही निहार रहा कर अघा रहा हूँ| भले ही ढंग से हिंदी न आती हो लेकिन सुबह होते ही सबके हाथ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया, द हिन्दू और द टेलीग्राफ है| मेरे हाथ में सब अमर उजाला देख कर यूँ घुर रहे है जैसे मैं भारत में नहीं रूस के किसी ट्रेन के डिब्बे में बैठ कर हिंदी अखबार को सबकी निगाहों में चुभने के लिए खोल दिया हूँ| खैर ज्यादा पढ़े – लिखे लोग खतरनाक होते है इसलिए मैं अपनी निगाहों को फिलहाल अपने अखबार में ही समेट कर रखा हूँ| इसी बीच ट्रेन के बीच कुछ अतिसज्जन लोग घुस कर बोल रहे है कि “तनी खिसका हो, काहें इतना दूरे ले बैठल हवा, हमनो के तनी स जगह चाही मतलब चाही…बुझाइल|”
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सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

जब आतंकवाद को सूफीवाद से खत्म किये जाने की बात कही जा रही है, ऐसे में आध्यात्मिक क्रान्ति से कदाचार (अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचारादि) का अंत करने की बात होना, यह सिद्ध करते है कि सूफीमत की रूहानियत ही अध्यात्म-विज्ञान है। यह भी संयोग ‘परवरदिगार’ ने तय किया  ‘‘कदाचार पूर्ण दुर्घर्ष दौर में ‘आर्ट आॅफ लिविंग का विश्व सांस्कृतिक महोत्सव’ एवं ‘विश्व सूफी कांफ्रेंस’  का … पढ़ना जारी रखें सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

कबहू उझकि कबहू उलटि !

कबहू उझकि कबहू उलटि ! (मधुगीति १६०३०६ ब) कबहू उझकि कबहू उलटि, ग्रीवा घुमा जग कूँ निरखि; रोकर विहँसि तुतला कभी, जिह्वा कछुक बोलन चही ! पहचानना आया अभी, है द्रष्टि अब जमने लगी; हर चित्र वह देखा किया, ग्रह घूम कर जाना किया ! लोरी सुने बतियाँ सुने, गुनगुनाने उर में लगे; कीर्तन भजन मन भावने, लागा है शिशु सिख बूझने ! नानी कहानी … पढ़ना जारी रखें कबहू उझकि कबहू उलटि !

बेटी की विदाई

बेटी की विदाई आती है बड़ी किस्मत से ये घड़ियाँ विदाई की खुशनसीबों को मिलती है ये लड़ियाँ विदाई की बाबुल के अंगना की बुलबुल जायेगी परदेश कैसे देख पाएंगी अखियाँ ये रतियाँ विदाई की किसने बनाई ये रीत रिवायतें ह्रदयविदारक सी कैसे समेट पायेगी बिटिया ये कलियां विदाई की खुशियों का मेला लग रहा है हरसू  आँगन में माँ कैसे संभाले अश्को की बगिया … पढ़ना जारी रखें बेटी की विदाई

हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

राष्ट्रभाषा के मामले को, जो इस देश में बेहद उलझ गया है और उस पर लिखना या बात करना औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाने लगा है। आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा का प्रश्न मानवीय है, खासकर भारत में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा जनता को जनतंत्र से अलग कर रही है। हिन्दी और … पढ़ना जारी रखें हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिन्दी अपने भाषा क्षेत्र के राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी, खड़ी आदि उपभाषिक रूपों को एवं इन सबके मेल से बनी सधुक्कड़ी को हिन्दी का अनिवार्य अंग मानकर चली है। इसी प्रसंग में हिन्दी के विद्वानों का ध्यान हिन्दी काव्य भाषा के उद्गम काल के स्वरूप की ओर दिलाना भी अप्रासंगिक न होगा। यह स्वरूप भी हिन्दी की एकाधिक उपभाषाओं के समावेश से बना है। इसका … पढ़ना जारी रखें हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश: भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें वैदिक, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा इतिहास के अध्ययन से अब यह स्पष्ट हो गया है कि वेदों के रचना-काल में तथा उसके भी पूर्ववर्ती युग में जनभाषा में तथा साहित्यिक भाषा में भाषिक ही नहीं, शब्द-रुपों की रचना में भी अन्तर था । यह अन्तर कई स्तरों पर लक्षित होता है। जैसे-कि उच्चारण, रूप-रचना, वैकल्पिक प्रयोग, अन्य भाषाओं से गृहीत शब्दावली, … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

खड़ी बोली हिंदी के भाषिक और साहित्यिक विकास में जिन भाषाओं और बोलियों का विशेष योगदान रहा है उनमे  अपभ्रंश और अवहट्ट भाषाएँ भी है| हिंदी को अपभ्रंश और अवहट्ट से जो कुछ भी मिला उसका पूरा लेखा जोखा इन तीनों की भाषिक और साहित्यिक संपत्ति का तुलनात्मक विवेचन करने से प्राप्त होता है | अपभ्रंश और अवहट्ट का व्याकरणिक रूप – अपभ्रंश कुछ -कुछ और अवहट्ट बहुत … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के ज्ञाता जिसे ”विकास” कहते हैं उसे ही और लोग भ्रष्‍ट होना या बिगड़ना कहते हैं। धीरे-धीरे प्राकृत-भाषाएँ, लिखित भाषाएँ हो गईं। सैकड़ों पुस्तकें उनमें बन गईं। उनका व्‍याकरण बन गया। इससे … पढ़ना जारी रखें हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

हिन्दी साहित्य का इतिहास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से   हिन्दी साहित्य पर यदि समुचित परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ हरदेव बाहरी के शब्दों में, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से आरम्भ होता है। यह कहना ही ठीक होगा कि वैदिक भाषा ही हिन्दी है। इस भाषा का दुर्भाग्य रहा … पढ़ना जारी रखें हिन्दी साहित्य का इतिहास

यूजीसी क्या है?

विकिपीडिया के अनुसार- भारत में उच्च शिक्षा का इतिहास काफी पुराना है। इसके मूल में १९वीं शताब्दी है, जब वाइसरॉय लॉर्ड मैकाले ने अपनी सिफारिशें रखी थीं। उसके बाद बीसवीं शताब्दी में सन् १९२५ में इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसका बाद में नाम भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) पड़ा। इस संस्था के अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षिक, सांस्कृतिक … पढ़ना जारी रखें यूजीसी क्या है?