हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

राष्ट्रभाषा के मामले को, जो इस देश में बेहद उलझ गया है और उस पर लिखना या बात करना औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाने लगा है। आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा का प्रश्न मानवीय है, खासकर भारत में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा जनता को जनतंत्र से अलग कर रही है। हिन्दी और … पढ़ना जारी रखें हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिन्दी अपने भाषा क्षेत्र के राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी, खड़ी आदि उपभाषिक रूपों को एवं इन सबके मेल से बनी सधुक्कड़ी को हिन्दी का अनिवार्य अंग मानकर चली है। इसी प्रसंग में हिन्दी के विद्वानों का ध्यान हिन्दी काव्य भाषा के उद्गम काल के स्वरूप की ओर दिलाना भी अप्रासंगिक न होगा। यह स्वरूप भी हिन्दी की एकाधिक उपभाषाओं के समावेश से बना है। इसका … पढ़ना जारी रखें हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश: भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें वैदिक, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा इतिहास के अध्ययन से अब यह स्पष्ट हो गया है कि वेदों के रचना-काल में तथा उसके भी पूर्ववर्ती युग में जनभाषा में तथा साहित्यिक भाषा में भाषिक ही नहीं, शब्द-रुपों की रचना में भी अन्तर था । यह अन्तर कई स्तरों पर लक्षित होता है। जैसे-कि उच्चारण, रूप-रचना, वैकल्पिक प्रयोग, अन्य भाषाओं से गृहीत शब्दावली, … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

खड़ी बोली हिंदी के भाषिक और साहित्यिक विकास में जिन भाषाओं और बोलियों का विशेष योगदान रहा है उनमे  अपभ्रंश और अवहट्ट भाषाएँ भी है| हिंदी को अपभ्रंश और अवहट्ट से जो कुछ भी मिला उसका पूरा लेखा जोखा इन तीनों की भाषिक और साहित्यिक संपत्ति का तुलनात्मक विवेचन करने से प्राप्त होता है | अपभ्रंश और अवहट्ट का व्याकरणिक रूप – अपभ्रंश कुछ -कुछ और अवहट्ट बहुत … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के ज्ञाता जिसे ”विकास” कहते हैं उसे ही और लोग भ्रष्‍ट होना या बिगड़ना कहते हैं। धीरे-धीरे प्राकृत-भाषाएँ, लिखित भाषाएँ हो गईं। सैकड़ों पुस्तकें उनमें बन गईं। उनका व्‍याकरण बन गया। इससे … पढ़ना जारी रखें हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

हिन्दी साहित्य का इतिहास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से   हिन्दी साहित्य पर यदि समुचित परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ हरदेव बाहरी के शब्दों में, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से आरम्भ होता है। यह कहना ही ठीक होगा कि वैदिक भाषा ही हिन्दी है। इस भाषा का दुर्भाग्य रहा … पढ़ना जारी रखें हिन्दी साहित्य का इतिहास

यूजीसी क्या है?

विकिपीडिया के अनुसार- भारत में उच्च शिक्षा का इतिहास काफी पुराना है। इसके मूल में १९वीं शताब्दी है, जब वाइसरॉय लॉर्ड मैकाले ने अपनी सिफारिशें रखी थीं। उसके बाद बीसवीं शताब्दी में सन् १९२५ में इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसका बाद में नाम भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) पड़ा। इस संस्था के अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षिक, सांस्कृतिक … पढ़ना जारी रखें यूजीसी क्या है?

ज़िंदगी – अजनबी राजा

ज़िंदगी इक पहेली है अनदेखी इक सहेली है कही बेबाक़ नादानियाँ है कही थोडी बचकानियां है खुशियों की बरसात है वही ग़मो का अन्धेरा है कही तपती धूप है तो कही नीम की छाँव है हसरतें है इसमें बचपन की ललक है इसमें ज़िंदगी क्या है चले तो उम्र भर की हमसफ़र है वही पल दो पल की हमराह बस की भीड़ है ज़िंदगी तो … पढ़ना जारी रखें ज़िंदगी – अजनबी राजा

कहानी सरहद की – भूपेन्द्र कुमार दवे

‘सरहद पर तैनात जवानों के सामने प्रकृति की खुली किताब होती है जिस पर ईश्वर की इबारत शायद विश्व के सभी ग्रंथों से ज्यादा जीवन को पवित्रता संपन्न कराने की क्षमता रखती है।  मेरे साथी ने उत्तर-पश्चिम सरहदों का नजारा देखकर यह कहा था। उसने प्रश्न किया था, ‘यह सरहद यहाँ आकर रुक क्यों जाती है? सारे विश्व को यदि यह अपने आगोश में ले … पढ़ना जारी रखें कहानी सरहद की – भूपेन्द्र कुमार दवे

रिटायर्ड का दर्द – कवि द्रौणाचार्य दुबे

मै बुजुर्ग हूँ रिटायर्ड हूँ पेंशन पर जीता हूँ पेंशन क्या इससे ज्यादा तो टेंशन पर जीता हूँ कोल्हू के बैल-सा घर के सारे काम कर जाता हूँ बदले में सिर्फ अपमान के शब्द ही पाता हूँ हूँ जिँदा मगर मर मर के ही जीता हूँ रोज अपमान के आँसू -गम पीता हूँ राम -सीता से बेटे बहू को मैने है पाया अपने को मिटा … पढ़ना जारी रखें रिटायर्ड का दर्द – कवि द्रौणाचार्य दुबे

एक अजन्मा, अनसुना सा गीत – नंदकिशोर ‘सौम्य’

किसी वीरान हवेली के, अंधेरे कमरे के कुन्ने में एक अजन्मा, अनसुना सा गीत पड़ा कराह रहा है ! वो गीत जिसने करुण क्रंदन से निर्मित शब्दों के बिस्तर की सेज सजाई है ! वो गीत, जो अनदेखे तमाम आँसू अपनी सूखी आँखों में छिपाए बैठा है ! वो गीत, जिसके हर शब्द में — विरह है, विलाप है, एक अधूरा सा मिलाप है… धूप … पढ़ना जारी रखें एक अजन्मा, अनसुना सा गीत – नंदकिशोर ‘सौम्य’

चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

चाहता तो लेख का शीर्षक ”मैं और चूहा” रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया। इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्नी थी, … पढ़ना जारी रखें चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

एक थी माया – विजय कुमार सप्पत्ति

:::: १९८० :::: ::: १ ::: मैं सर झुका कर उस वक़्त बिक्री का हिसाब लिख रहा था कि उसकी  धीमी आवाज सुनाई दी, “अभय, खाना खा लो” ,मैंने सर उठा कर उसकी  तरफ देखा, मैंने उससे कहा ,” माया , मै आज डिब्बा नहीं लाया हूं ।” दरअसल सच तो यही था कि  मेरे घर में उस दिन खाना नहीं बना था । गरीबी … पढ़ना जारी रखें एक थी माया – विजय कुमार सप्पत्ति

आधुनिक हिंदी सहित्य का इतिहास – पूर्णिमा वर्मन

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर के साथ साथ मानव को समान महत्व दिया गया। भावना … पढ़ना जारी रखें आधुनिक हिंदी सहित्य का इतिहास – पूर्णिमा वर्मन