कुंजड़-कसाई : अनवर सुहैल

'कुंजड़-कसाइयों को तमीज कहाँ... तमीज का ठेका तो तुम्हारे सैयदों ने जो ले रक्खा है?' मुहम्मद लतीफ कुरैशी उर्फ एम एल कुरैशी बहुत कम बोला करते। कभी बोलते भी तो कफन फाड़कर बोलते। ऐसे कि सामने वाला खून के घूँट पीकर रह जाए। जुलेखा ने घूर कर उन्हें देखा। हर कड़वी बात उगलने से पहले … पढ़ना जारी रखें कुंजड़-कसाई : अनवर सुहैल

Advertisements

आज शाम है बहुत उदास

लोहामंडी... कृषि कुंज... इंदरपुरी... टोडापुर... ठक ठक ठक... खटारा ब्लू लाइन के कंडक्टर ने खिड़की से एक हाथ बाहर निकाल बस के टीन को पीटते हुए जोर से गला फाड़कर आवाज लगाई, मानो सवारियों के घर-दफ्तरों तक से उन्हें खींच लाने का मंसूबा हो। उस ठक-ठक में आस्था अक्सर टीन का रुदन सुना करती थी, … पढ़ना जारी रखें आज शाम है बहुत उदास

रौशनी का टुकड़ा – अभिनव शुक्ल

सूरज की किरणें आकाश में अपने पंख पसार चुकी थीं। एक किरण खिड़की पर पड़े टाट के परदे को छकाती हुई कमरे के भीतर आ गई और सामने की दीवार पर छोटे से सूरज की भाँति चमकने लगी। पीले की बदरंग दीवार अपने उखड़ते हुए प्लास्टर को सँभालती हुई उस किरण का स्वागत कर रही … पढ़ना जारी रखें रौशनी का टुकड़ा – अभिनव शुक्ल

वे – सुशांत सुप्रिय

Terrorism, Terrorist in US

रेलगाड़ी के इस डिब्बे में वे चार हैं, जबकि मैं अकेला । वे हट्टे-कट्टे हैं , जबकि मैं कमज़ोर-सा । वे लम्बे-तगड़े हैं, जबकि मैं औसत क़द-काठी का । जल्दबाज़ी में शायद मैं ग़लत डिब्बे में चढ़ गया हूँ । मुझे इस समय यहाँ इन लोगों के बीच नहीं होना चाहिए -- मेरे भीतर कहीं … पढ़ना जारी रखें वे – सुशांत सुप्रिय

चुनौती – रामकुमार आत्रेय

वृन्दावन गया था। बाँके बिहारी के दर्शन करने के पश्चात् मन में आया कि यमुना के पवित्र जल में भी डुबकी लगाता चलूँ। पवित्र नदियों में स्नान करने का अवसर रोज-रोज थोड़े ही मिलता है। यमुना के घाट सुनसान से थे। हाँ, बन्दरों की सेना अवश्य अपनी इच्छानुसार वहाँ विचरण कर रही थी। सीढ़ियाँ और बारादरियाँ टूटी-फूटी पड़ी थी। लगा कि वहाँ महीनों से सफाई नहीं हुई है। परन्तु मुझे तो स्नान करना ही था। जल में प्रवेश करने से पूर्व मैंने दोर्नो हाथ जोड़कर ऊँची आवाज में कहा-"यमुना मैया, तुम्हारी जय!''

इनाम – नागार्जुन

भेड़िया सारस के नजदीक आया। आँखों में आँसू भरकर और गिड़गिड़ाकर उसने कहा-''भइया, बड़ी मुसीबत में फँस गया हूँ। गले में काँटा अटक गया है, लो तुम उसे निकाल दो और मेरी जान बचाओ। पीछे तुम जो भी माँगोगे, मैं जरूर दूँगा। रहम करो भाई !''

वंशबेल -इंदिरा गोस्वामी

Village

गाँव का महाजन पीतांबर अपने घर के सामने पेड़ के ठूँठ पर बैठा था। वह पचास को पार कर चुका था। कभी वह काफी हट्टा-कट्टा था, लेकिन अब उसे चिंता ने दुबला दिया था। उसकी ठुट्टी के नीचे की खाल ढीली पड़कर लटकने लगी थी। वह दूर निगाहें टिकाए एक बच्चे को देखे जा रहा था, जो अपनी बंसी की फंसी डोरी को छुड़ाने की कोशिश में था। 1 एकाएक उसका ध्यान टूटा। गाँव का पुजारी अपनी खड़खड़ाती आवाज़ में उससे कह रहा था, "तुम्हारा अपना तो कोई बच्चा है नहीं। तब तुम उस बच्चे को भूखी निगाहों से क्यों देखे जा रहे हो, फिर रुककर पूछा, "अब तुम्हारी पत्नी कैसी है?" 1 "कई बार उसे शहर के अस्पताल में ले जा चुका हूँ, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उसके सारे शरीर पर सूजन आ गयी है।" 1 "तब तो उससे बच्चा होने की कोई उम्मीद नहीं। लगता है पीतांबर, तुम्हारा वंश चलाने वाला कोई नहीं रहेगा।" 1