हम सिसक सिसक सो जाते है

तेरा मेरी गली से गुजरना, मेरी नजरों पे आके वो रुकना । उन यादों के दामन थामे, हम संभल-संभल रुक जाते हैं।।   तेरी बातों पे मेरा बिखरना, मेरे साये से तेरा लिपटना। उन लम्हों को पास यू पाके, हम मचल-मचल रह जाते हैं।। तेरी रातों में मेरा वो सपना, मेरी सुबहो में तेरा वो जगना। उन यादों को दिल से लगा के, हम सिसक-सिसक … पढ़ना जारी रखें हम सिसक सिसक सो जाते है

मेरे पिता को आता है..

न मेरी मेहबूबा करती है,न अज़ीज़ कर पाता है, वो दिल को खुश समझते है जब आँखे दर्द छुपता है, कही कोने में थी गम की गट्ठर उसे भी ढूंढ निकाला , की मेरा चेहरा पढ़ना सिर्फ मेरे पिता को आता है।     मेरे हाथ जब मेरे अविकसित मूछों को ताव देती है, मुश्किलें खुद पिता की मौजूदगी भांप लेती है, सर पर पैर … पढ़ना जारी रखें मेरे पिता को आता है..

एक ऐसा चेहरा

हल्की सी शर्म, हल्की सी नज़ाकत हो एक अजब सा एहसास, एक गज़ब सी चाहत हो थोड़ी सी नरमी, थोड़ी सी गर्माहट हो हो एक ऐसा चेहरा, जिसमें खो जाने की राहत हो ज़रा सी बेचैनी, ज़रा सी घबराहट हो न कोई साज़िश, न कोई बनावट हो ज़रा सी हंसी, ज़रा सी मुस्कराहट हो हो एक ऐसा चेहरा, जिसमें छा जाने की ताक़त हो हो … पढ़ना जारी रखें एक ऐसा चेहरा

ये जो मर मर के करती हो काम /जान नही है क्या मेरी जान

एक बार में जरा सा काम करना और धप्प्प से बैठ जाना फिर उठना और थोडा और काम करना फिर बैठ लेना लम्बी लम्बी सांस पसीने से तर ब्लाउज का आखिरी हूक खोलना और कहना जैसे चल नही रही सांस कि और सांस लेने को नही बची ताकत माटी हो गई देह को गरियाना कि यही हाथ से कैसे दस किलो आलू का पापड़ बना … पढ़ना जारी रखें ये जो मर मर के करती हो काम /जान नही है क्या मेरी जान

Jab se guzra hoon un raaton se

जब से गुज़रा हूँ इन बातों से

वह औरत जो सुहागिन बनी रहने के लिए करती है लाख जतन टोना-टोटका से मन्दिर में पूजा तक अपने पति से कह रही है — तुम कारगिल में काम आए होते तो पन्द्रह लाख मिलते अब मैं तुम्हारा क्या करूँ जीते जी तुम मकान नहीं बना सकते । कह रहे हैं हमदर्द साठ साल के पिता की बीमारी के बाद वे चले गए होते तो … पढ़ना जारी रखें जब से गुज़रा हूँ इन बातों से

Acharya Balwant

क्या होगा भगवान देश का! -आचार्य बलवंत

खतरे में सम्मान देश का। क्या होगा भगवान देश का! देश में ऐसी हवा चली है, बदल गया ईमान देश का। क्या होगा भगवान देश का! आए दिन घपला-घोटाला दाल में है काला ही काला। झुग्गी-झोपड़ियों के अंदर, सिसक रहा अरमान देश का। क्या होगा भगवान देश का! बदल गयी भावों की भाषा। बदली मूल्यों की परिभाषा। नाम, पता और परिचय बदला, बदल गया परिधान … पढ़ना जारी रखें क्या होगा भगवान देश का! -आचार्य बलवंत

आलसस्य परम सुखम

प्राचीन काल से ही आलस को सामाजिक और व्यक्तिगत बुराई माना जाता रहा हैं. “जो सोवत हैं, वो खोवत हैं” जैसी कहावतो के माध्यम से आलसी लोगो को धमकाने और “अलसस्य कुतो विद्या” जैसे श्लोको के ज़रिये उनको सामाजिक रूप से ज़लील करने /ताने कसने के प्रयास अनंतकाल से जारी हैं. लेकिन फिर भी आज तक (चैंनल नहीं ) आलस और आलसियों का वजूद “सेट … पढ़ना जारी रखें आलसस्य परम सुखम

सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

जब आतंकवाद को सूफीवाद से खत्म किये जाने की बात कही जा रही है, ऐसे में आध्यात्मिक क्रान्ति से कदाचार (अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचारादि) का अंत करने की बात होना, यह सिद्ध करते है कि सूफीमत की रूहानियत ही अध्यात्म-विज्ञान है। यह भी संयोग ‘परवरदिगार’ ने तय किया  ‘‘कदाचार पूर्ण दुर्घर्ष दौर में ‘आर्ट आॅफ लिविंग का विश्व सांस्कृतिक महोत्सव’ एवं ‘विश्व सूफी कांफ्रेंस’  का … पढ़ना जारी रखें सूफीमत की ‘रूहानियत’ ही अध्यात्म-विज्ञान

चरित्रवान भैंस, गर्भवती बुद्धिजीवी

एक थे सुदामा राय..जिला बलिया द्वाबा के भूमिहार,एक मेहनती किसान,एक बड़े खेतिहर. कहतें हैं उनके पास दो गाय और एक भैंस थी.. एक साँझ की बात है..राय साहेब गाय भैंस को खिला पिलाकर झाड़ू लगा रहे थे.तब तक क्षेत्र के एक प्रसिद्ध पशु व्यापारी आ धमके.. व्यापारी जी ने भैंस जी को बड़े प्यार से देखा..आगे-पीछे,दांये-बांये,ऊपर-नीचे…मानों वो भैंस नहीं साक्षात होने वाली महबूबा को देख … पढ़ना जारी रखें चरित्रवान भैंस, गर्भवती बुद्धिजीवी

हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिन्दी अपने भाषा क्षेत्र के राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी, खड़ी आदि उपभाषिक रूपों को एवं इन सबके मेल से बनी सधुक्कड़ी को हिन्दी का अनिवार्य अंग मानकर चली है। इसी प्रसंग में हिन्दी के विद्वानों का ध्यान हिन्दी काव्य भाषा के उद्गम काल के स्वरूप की ओर दिलाना भी अप्रासंगिक न होगा। यह स्वरूप भी हिन्दी की एकाधिक उपभाषाओं के समावेश से बना है। इसका … पढ़ना जारी रखें हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के ज्ञाता जिसे ”विकास” कहते हैं उसे ही और लोग भ्रष्‍ट होना या बिगड़ना कहते हैं। धीरे-धीरे प्राकृत-भाषाएँ, लिखित भाषाएँ हो गईं। सैकड़ों पुस्तकें उनमें बन गईं। उनका व्‍याकरण बन गया। इससे … पढ़ना जारी रखें हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

अंत ही शुरुआत है – विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’

अंत ही शुरूआत है… अंत ही, शुरुआत है,ये जान लो, पीछे मुड़कर देखना, अच्छा नहीं  | रिश्ते , नाते , प्रेम और अपनत्व तो, झूठ ,कपट , जंजाल का ही नाम है आज सच्चाई  कैद स्वयं  में भला, काल की नजरों में, वो बदनाम  है, उम्मीद का भ्रम , पालना अच्छा नहीं  | बहुत उड़ ली देर तक, नभ  में पतंग हाथ जिसके डोर, वो … पढ़ना जारी रखें अंत ही शुरुआत है – विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’

पुश्तैनी घर – डॉ. शुभ्रता मिश्रा

अब मैं पुश्तैनी घर कहा जाता हूँ । हाँ मैं तुम्हारे पुरखों को पनाह दिया करता था। अब तुम्हारी राह तकने का गुनाह किया करता हूँ । हाँ मैंने तुम्हारे पुरखों की किलकारियाँ भी सुनी हैं यहाँ । अब तुम्हारे बच्चों के आने की राह तकता हूँ ।।1।। अब मैं पुश्तैनी घर कहा जाता हूँ । मेरे दरवाजों, दीवारों, गवाक्षों, दालानों, बरामदों, छज्जों में, मेरे … पढ़ना जारी रखें पुश्तैनी घर – डॉ. शुभ्रता मिश्रा

यह  अश्क  जो बहते हैं – ओनिका सेतिया ”अनु ”

यह   अश्क   जो   बहते  है  इस तरह  , जिंदगी से  इनका   नाता  है इस तरह . जिंदगी  चाहे हालातों  से  ना उबर  पाए , अश्क अपना रास्ता  बनायेगे ही इसी तरह . जज्बातों  की जहाँ  में  कोई कद्र नहीं   , अनदेखी  अश्कों  की होती है इस तरह . तकदीर और ज़माने  के सताए  हुए हम , यह  बेवजह तो नहीं बहते  इस तरह . अपने  … पढ़ना जारी रखें यह  अश्क  जो बहते हैं – ओनिका सेतिया ”अनु ”

रिटायर्ड का दर्द – कवि द्रौणाचार्य दुबे

मै बुजुर्ग हूँ रिटायर्ड हूँ पेंशन पर जीता हूँ पेंशन क्या इससे ज्यादा तो टेंशन पर जीता हूँ कोल्हू के बैल-सा घर के सारे काम कर जाता हूँ बदले में सिर्फ अपमान के शब्द ही पाता हूँ हूँ जिँदा मगर मर मर के ही जीता हूँ रोज अपमान के आँसू -गम पीता हूँ राम -सीता से बेटे बहू को मैने है पाया अपने को मिटा … पढ़ना जारी रखें रिटायर्ड का दर्द – कवि द्रौणाचार्य दुबे

एक अजन्मा, अनसुना सा गीत – नंदकिशोर ‘सौम्य’

किसी वीरान हवेली के, अंधेरे कमरे के कुन्ने में एक अजन्मा, अनसुना सा गीत पड़ा कराह रहा है ! वो गीत जिसने करुण क्रंदन से निर्मित शब्दों के बिस्तर की सेज सजाई है ! वो गीत, जो अनदेखे तमाम आँसू अपनी सूखी आँखों में छिपाए बैठा है ! वो गीत, जिसके हर शब्द में — विरह है, विलाप है, एक अधूरा सा मिलाप है… धूप … पढ़ना जारी रखें एक अजन्मा, अनसुना सा गीत – नंदकिशोर ‘सौम्य’

चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

चाहता तो लेख का शीर्षक ”मैं और चूहा” रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया। इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्नी थी, … पढ़ना जारी रखें चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

एक थी माया – विजय कुमार सप्पत्ति

:::: १९८० :::: ::: १ ::: मैं सर झुका कर उस वक़्त बिक्री का हिसाब लिख रहा था कि उसकी  धीमी आवाज सुनाई दी, “अभय, खाना खा लो” ,मैंने सर उठा कर उसकी  तरफ देखा, मैंने उससे कहा ,” माया , मै आज डिब्बा नहीं लाया हूं ।” दरअसल सच तो यही था कि  मेरे घर में उस दिन खाना नहीं बना था । गरीबी … पढ़ना जारी रखें एक थी माया – विजय कुमार सप्पत्ति

आधुनिक हिंदी सहित्य का इतिहास – पूर्णिमा वर्मन

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर के साथ साथ मानव को समान महत्व दिया गया। भावना … पढ़ना जारी रखें आधुनिक हिंदी सहित्य का इतिहास – पूर्णिमा वर्मन

ईसुरी की अलौकिक फाग नायिका रजऊ और बुन्देली परम्पराएँ – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

बुन्देली माटी के यशस्वी कवि ईसुरी की फागें कालजयी हैं. आज भी ग्राम्यांचलों से लेकर शहरों तक, चौपालों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस फागों को केंद्र में रखकर गायन, संगोष्ठियों आदि के आयोजन किये जाते हैं. ईसुरी की फागों में समाज के अन्तरंग और बहिरंग दोनों का जीवंत चित्रण प्राप्य है. मानव जीवन का केंद्र नारी  होती है. माँ, बहिन, दादी-नानी, सखी, भाभी, प्रेयसी, पत्नी, साली, … पढ़ना जारी रखें ईसुरी की अलौकिक फाग नायिका रजऊ और बुन्देली परम्पराएँ – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’