हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

रेडिकल होना जूझना है वस्तुस्थिति के विपरीत पेंडुलम होना भी है आधुनिकता और परम्परा के बीच। न तो पूर्णतः सम्मानित और न ही नकारने योग्य हम रेडिकल संतानें दुनियां से लड़ते-लड़ते खुद ही हो जाते हैं संक्रमित क्योंकि हमारे वाद को न कोई पचा पाता है न ही ठुकरा पाता है। हमारे तर्कपूर्ण विचार सामने वाले को करता है निरुत्तर तब स्त्री-पुरुष दोनों के शरीर … पढ़ना जारी रखें हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

Maovad.. - Literature in India

माओवाद सही भी है, गलत भी…बस नज़रिए का फर्क है|

नई दिल्ली से धनबाद की यात्रा पर हूँ| लोगों से बहुत सुना था कि झारखंड प्राकृतिक सौन्दर्य को अभी भी संवारे हुए है, इसलिए प्रकृति के इस नायाब करिश्मे और सुन्दरता को देखने का मन हुआ| बहुत सोचने के बाद तय किया कि भारतीय रेल से यात्रा की जाय क्यूंकि रेल की पटरियों के किनारे ही आपको आधी सुन्दरता का दर्शन हो जाएगा| तो फिर क्या था, मैं ठहरा महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन का अनुयायी, चुनाव आते ही अम्बेडकरवाद में पगलाए मेरे देश के नेताओं और लेखकों से कहीं दूर….सैर कर दुनिया की गाफ़िल जिंदगानी फिर कहाँ….को महसूस करने…वास्तव में असली लेखक वही है जो प्रकृति और मानव विज्ञान में निहित प्रेम के दर्पण में खुद की मानवता का प्रतिबिम्ब उद्धृत कर ले| मैंने भी इसी परिपाटी को आगे बढाने की ठानी| मैंने भी सोचा क्यूँ न एक लेखक होने के नाते महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन हो जाया जाय| अथाह सुख की अनुभूति है प्रकृति की बाहों में|

इसी बीच जब मेरे अंदर का मानव जाग जाता है तो मेरी निगाहें पास बैठे लोगों के पास पहुँच जाती है…कुछ लोग मस्त हवा के आनंद में इस कदर जन्म भर से थकाए है कि उंघ रहे है…कुछ दुसरे के कंधे पर सर मार कर सो रहे है और मैं एक बन्दर की तरह सब सुत्तक्कड़ो के बीच प्रकृति की सुन्दरता ही निहार रहा कर अघा रहा हूँ| भले ही ढंग से हिंदी न आती हो लेकिन सुबह होते ही सबके हाथ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया, द हिन्दू और द टेलीग्राफ है| मेरे हाथ में सब अमर उजाला देख कर यूँ घुर रहे है जैसे मैं भारत में नहीं रूस के किसी ट्रेन के डिब्बे में बैठ कर हिंदी अखबार को सबकी निगाहों में चुभने के लिए खोल दिया हूँ| खैर ज्यादा पढ़े – लिखे लोग खतरनाक होते है इसलिए मैं अपनी निगाहों को फिलहाल अपने अखबार में ही समेट कर रखा हूँ| इसी बीच ट्रेन के बीच कुछ अतिसज्जन लोग घुस कर बोल रहे है कि “तनी खिसका हो, काहें इतना दूरे ले बैठल हवा, हमनो के तनी स जगह चाही मतलब चाही…बुझाइल|”
पढ़ना जारी रखें माओवाद सही भी है, गलत भी…बस नज़रिए का फर्क है|

बेटी की विदाई

बेटी की विदाई आती है बड़ी किस्मत से ये घड़ियाँ विदाई की खुशनसीबों को मिलती है ये लड़ियाँ विदाई की बाबुल के अंगना की बुलबुल जायेगी परदेश कैसे देख पाएंगी अखियाँ ये रतियाँ विदाई की किसने बनाई ये रीत रिवायतें ह्रदयविदारक सी कैसे समेट पायेगी बिटिया ये कलियां विदाई की खुशियों का मेला लग रहा है हरसू  आँगन में माँ कैसे संभाले अश्को की बगिया … पढ़ना जारी रखें बेटी की विदाई

हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

राष्ट्रभाषा के मामले को, जो इस देश में बेहद उलझ गया है और उस पर लिखना या बात करना औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाने लगा है। आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा का प्रश्न मानवीय है, खासकर भारत में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा जनता को जनतंत्र से अलग कर रही है। हिन्दी और … पढ़ना जारी रखें हिन्दी भाषा व लिपि – मिथिलेश वामनकर

हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिन्दी अपने भाषा क्षेत्र के राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी, खड़ी आदि उपभाषिक रूपों को एवं इन सबके मेल से बनी सधुक्कड़ी को हिन्दी का अनिवार्य अंग मानकर चली है। इसी प्रसंग में हिन्दी के विद्वानों का ध्यान हिन्दी काव्य भाषा के उद्गम काल के स्वरूप की ओर दिलाना भी अप्रासंगिक न होगा। यह स्वरूप भी हिन्दी की एकाधिक उपभाषाओं के समावेश से बना है। इसका … पढ़ना जारी रखें हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश: भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें वैदिक, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा इतिहास के अध्ययन से अब यह स्पष्ट हो गया है कि वेदों के रचना-काल में तथा उसके भी पूर्ववर्ती युग में जनभाषा में तथा साहित्यिक भाषा में भाषिक ही नहीं, शब्द-रुपों की रचना में भी अन्तर था । यह अन्तर कई स्तरों पर लक्षित होता है। जैसे-कि उच्चारण, रूप-रचना, वैकल्पिक प्रयोग, अन्य भाषाओं से गृहीत शब्दावली, … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश:भाषा-प्रवाह तथा विशेषतायें – मिथिलेश वामनकर

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

खड़ी बोली हिंदी के भाषिक और साहित्यिक विकास में जिन भाषाओं और बोलियों का विशेष योगदान रहा है उनमे  अपभ्रंश और अवहट्ट भाषाएँ भी है| हिंदी को अपभ्रंश और अवहट्ट से जो कुछ भी मिला उसका पूरा लेखा जोखा इन तीनों की भाषिक और साहित्यिक संपत्ति का तुलनात्मक विवेचन करने से प्राप्त होता है | अपभ्रंश और अवहट्ट का व्याकरणिक रूप – अपभ्रंश कुछ -कुछ और अवहट्ट बहुत … पढ़ना जारी रखें अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरंभिक हिंदी का व्याकरणिक और प्रायोगिक रूप

हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के ज्ञाता जिसे ”विकास” कहते हैं उसे ही और लोग भ्रष्‍ट होना या बिगड़ना कहते हैं। धीरे-धीरे प्राकृत-भाषाएँ, लिखित भाषाएँ हो गईं। सैकड़ों पुस्तकें उनमें बन गईं। उनका व्‍याकरण बन गया। इससे … पढ़ना जारी रखें हिंदी भाषा की उत्पत्ति – महावीर प्रसाद द्विवेदी

हिन्दी साहित्य का इतिहास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से   हिन्दी साहित्य पर यदि समुचित परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ हरदेव बाहरी के शब्दों में, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से आरम्भ होता है। यह कहना ही ठीक होगा कि वैदिक भाषा ही हिन्दी है। इस भाषा का दुर्भाग्य रहा … पढ़ना जारी रखें हिन्दी साहित्य का इतिहास

अंत ही शुरुआत है – विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’

अंत ही शुरूआत है… अंत ही, शुरुआत है,ये जान लो, पीछे मुड़कर देखना, अच्छा नहीं  | रिश्ते , नाते , प्रेम और अपनत्व तो, झूठ ,कपट , जंजाल का ही नाम है आज सच्चाई  कैद स्वयं  में भला, काल की नजरों में, वो बदनाम  है, उम्मीद का भ्रम , पालना अच्छा नहीं  | बहुत उड़ ली देर तक, नभ  में पतंग हाथ जिसके डोर, वो … पढ़ना जारी रखें अंत ही शुरुआत है – विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’