हिंदी साहित्य का इतिहास काल विभाजन

हिंदी साहित्य का इतिहास प्रथम संस्करण का वक्तव्य -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

हिंदी कवियों का एक वृत्तसंग्रह ठाकुर शिवसिंह सेंगर ने सन् 1833 ई. में प्रस्तुत किया था। उसके पीछे सन् 1889 में डॉक्टर (अब सर) ग्रियर्सन ने ‘मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑव नार्दर्न हिंदुस्तान’ के नाम से एक वैसा ही बड़ा कविवृत्त-संग्रह निकाला। काशी की नागरीप्रचारिणी सभा का ध्यान आरंभ ही में इस बात की ओर गया कि सहस्रों हस्तलिखित हिंदी पुस्तकें देश के अनेक भागों में, … पढ़ना जारी रखें हिंदी साहित्य का इतिहास प्रथम संस्करण का वक्तव्य -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

Kedarnath Singh

केदारनाथ सिंह के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति

केदारनाथ सिंह (७ जुलाई १९३४ – १९ मार्च २०१८), हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष २०१३ का ४९वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के १०वें लेखक थे। केदारनाथ सिंह का जन्म ७ जुलाई १९३४ ई॰ को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया … पढ़ना जारी रखें केदारनाथ सिंह के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति

Nagarjun_Poet

महाकवि नागार्जुन की जयंती पर विशेष

नागार्जुन (30जून 1911- 5 नवम्बर 1998) हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। अनेक भाषाओं के ज्ञाता तथा प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकार नागार्जुन ने हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली संस्कृत एवं बाङ्ला में मौलिक रचनाएँ भी कीं तथा संस्कृत, मैथिली एवं बाङ्ला से अनुवाद कार्य भी किया। नागार्जुन का जन्म १९११ ई० की ज्येष्ठ पूर्णिमा को वर्तमान मधुबनी जिले के सतलखा में हुआ था। … पढ़ना जारी रखें महाकवि नागार्जुन की जयंती पर विशेष

उठो प्रतिभावान स्वर उठो

सुलग रहे अदम्य मन का ज्वाला है घुल रहे असंख्य प्रवीणता का हवाला है बिना घिसे चमक क्या आई है चमकहीन  सभ्यता हमने लाई है प्रेरणा नहीं उनमें, मैं प्रतिशतता भरते जाऊ बिना जले बाती में, मै प्रकाश कहाँ से लाऊ विरले बिना स्वृण के, चमके होगें संकेतन दीप जगत में, जहाँ दमके होगें भूले सार तन खंगाल उठो विकट संकट सवाल उठो सममूल्यता उर … पढ़ना जारी रखें उठो प्रतिभावान स्वर उठो

क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

  क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? आज नहीं क्या हो सकता जो कल होता, सच्चा प्रयत्न  नहीं   कभी   विफल होता, क्या एकता में ही केवल बल होता? क्या अकेला नहीं कोई सफल होता? बौने बामन ने अकेले राजा बलि को बांधा था, तीन पग में नभ, महि और स्वर्ग तक को लांघा था। एक अकेले विप्र ने क्षत्रिय हीन जग था किया, हाथ में … पढ़ना जारी रखें क्या अकेला नहीं कोई सफल होता?

हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

रेडिकल होना जूझना है वस्तुस्थिति के विपरीत पेंडुलम होना भी है आधुनिकता और परम्परा के बीच। न तो पूर्णतः सम्मानित और न ही नकारने योग्य हम रेडिकल संतानें दुनियां से लड़ते-लड़ते खुद ही हो जाते हैं संक्रमित क्योंकि हमारे वाद को न कोई पचा पाता है न ही ठुकरा पाता है। हमारे तर्कपूर्ण विचार सामने वाले को करता है निरुत्तर तब स्त्री-पुरुष दोनों के शरीर … पढ़ना जारी रखें हम रेडिकल संतानें – डॉ. चित्रलेखा अंशु

Vetican City - Short Story by Savita Mishta Akshaja

वेटिकनसिटी – सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

“मेरी बच्ची ! तू सोच रही होगी कि मैंने इस तीसरे अबॉर्शन के लिए सख्ती से मना क्यों नहीं किया !!” ओपीडी के स्ट्रेचर पड़ी बिलखती हुई माँ ने अपने पेट को हथेली से सहलाते हुए कहा। पेट में बच्ची की हल्की-सी हलचल हुई। “तू कह रही होगी कि माँ डायन है ! अपनी ही बच्ची को खाए जा रही है। नहीं! मेरी प्यारी गुड़िया, … पढ़ना जारी रखें वेटिकनसिटी – सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

मेरे सपने- जूनून भी सुकून भी…

पलकों के पालने में सजा है एक सपना, जब मैं जागती तो वो भी जागता, जब मैं सोती तो भी वो जागता ।     एक दिन पूछा मैंने उसको – नींद नहीं आती तुमको ? तो कहा सपने ने मुस्कुराते हुए ,  कौन आता है रोज़ तुम्हे उठाने के लिए ! तू जब भी है सोती , मेरे ही बीज बोती। और जब जागती , तो … पढ़ना जारी रखें मेरे सपने- जूनून भी सुकून भी…

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की -केदारनाथ सिंह

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की, उड़ने लगी बुझे खेतों से झुर-झुर सरसों की रंगीनी, धूसर धूप हुई मन पर ज्यों — सुधियों की चादर अनबीनी, दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की । साँस रोक कर खड़े हो गए लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन, चिलबिल की नंगी बाँहों में — भरने लगा एक खोयापन, बड़ी हो गई कटु … पढ़ना जारी रखें झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की -केदारनाथ सिंह

देवनागरी

देवनागरी एक लिपि है जिसमें अनेक भारतीय भाषाएँ तथा कई विदेशी भाषाएं लिखीं जाती हैं। देवनागरी बायें से दायें लिखी जाती है, इसकी पहचान एक क्षैतिज रेखा से है जिसे ‘शिरिरेखा’ कहते हैं। संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी, नेपाली, नेपाल भाषा (तथा अन्य नेपाली उपभाषाएँ), तामाङ भाषा, गढ़वाली, बोडो, अंगिका, मगही, भोजपुरी, मैथिली, संथाली आदि भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त कुछ स्थितियों में गुजराती, पंजाबी, बिष्णुपुरिया मणिपुरी, रोमानी और उर्दू भाषाएं भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। देवनागरी विश्व में सबसे प्रयुक्त लिपियों में से एक है।   देवनागरी में लिखी ऋग्वेद की पाण्डुलिपि परिचय … पढ़ना जारी रखें देवनागरी

एक थी गौरा – अमरकांत

लंबे कद और डबलंग चेहरे वाले चाचा रामशरण के लाख विरोध के बावजूद आशू का विवाह वहीं हुआ। उन्होंने तो बहुत पहले ही ऐलान कर दिया था कि ‘लड़की बड़ी बेहया है।’   आशू एक व्यवहार-कुशल आदर्शवादी नौजवान है, जिस पर मार्क्स और गाँधी दोनों का गहरा प्रभाव है। वह स्वभाव से शर्मीला या संकोची भी है। वह संकुचित विशेष रूप से इसलिए भी था … पढ़ना जारी रखें एक थी गौरा – अमरकांत

होली और बुरा ना मानो महोत्सव

होली, भारत का प्रमुख त्यौहार है, क्योंकि इस दिन पूरे भारत मे बैंक होली-डे  रहता है अर्थात अवकाश रहता है जिसकी वजह से बैंक में घोटाले होने की संभावना नही रहती है, मतलब होली के दिन केवल आप रंग लगा सकते है, चूना लगाना मुश्किल होता है। इसी कारण से होली देश की समरसता के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए भी पतंजलि … पढ़ना जारी रखें होली और बुरा ना मानो महोत्सव

डर के गठबंधन पर दूरगामी प्रश्नचिन्ह

लगभग दो दशक यानि 1993 के बाद, देश के दो सबसे बड़े क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व को बचाने की कवायद में फिर से एक हो चले हैं| बसपा के संस्थापक कांशीराम और मुलायम सिंह यादव की दोस्ती जब परवान चढ़ी थी तो उस वक़्त मुलायम सिंह यादव द्वारा अस्तित्व में आई समाजवादी पार्टी उत्तरप्रदेश की राजनीति में पाँव ज़माने की कोशिश में लगी हुई थी| … पढ़ना जारी रखें डर के गठबंधन पर दूरगामी प्रश्नचिन्ह

ग्यारह सितंबर के बाद – अनवर सुहैल

ग्यारह सितंबर के बाद करीमपुरा में एक ही दिन, एक साथ दो बातें ऐसी हुर्इं, जिससे चिपकू तिवारी जैसे लोगों को बतकही का मसाला मिल गया। अव्वल तो ये कि हनीफ ने अपनी खास मियाँकट दाढ़ी कटवा ली। दूजा स्कूप अहमद ने जुटा दिया… जाने उसे क्या हुआ कि वह दँतनिपोरी छोड़ पक्का नमाजी बन गया और उसने चिकने चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी बढ़ानी शुरू … पढ़ना जारी रखें ग्यारह सितंबर के बाद – अनवर सुहैल

जीवनसंगिनी – मनीष कुमार

संग संग चलो मेरी जीवनसंगनी रुको नहीं थको नहीं ओ मेरी हृदयनयनी अपलक नयनों के तार जुड़े हैं तेरे मेरे सांसों को बेजार मत करो मृगनयनी संग संग चलो मेरी जीवनसंगनी आसमान की ऊंचाई से , जीवन की गहराई तक धूपो की अगुवाई से , रात्रि की विदाई तक स्वप्नों की अनुभूति से, हकीकत की सच्चाई तक फूलों की पंखुिड़यों से, काँटों  की चुभन तक … पढ़ना जारी रखें जीवनसंगिनी – मनीष कुमार

मनीष कुमार, रांची, झारखण्ड

सबका साथ

सबका साथ सबका हाथ मिलकर बनाएंगे एक नया इतिहास कोई वर्ग न छूटे कोई धर्म के नाम पर न लूटे जीवन की हर सांस पर क़दमों के हर ताल पर सुनेगे और सुनायेंगे हर बात पर जोर लगाएंगे पीछे मुड़कर न आयेंगे मिलकर माशल जलाएंगे एक अनुपम भारत बनाएंगे जहां प्रगति धारा की होगी प्रवाह हर निश्चल मानस का होगा प्रवास न धर्म होगा न … पढ़ना जारी रखें सबका साथ

प्रदूषण

आँख में चुभ रहा, आज प्रतिक्षण यहाँ जान लेकर रहेगा प्रदूषण यहाँ ! रोज बढ़ता हुआ वाहनों का धुआँ वायु में घुल रहा जहर भीषण यहाँ ! उजड़ते वन यहाँ जानता है ख़ुदा चीड़ का हो रहा रोज खण्डन यहाँ ! परत ओज़ोन का तीव्र अवक्षय यहाँ ऊष्मा लाँघता व्योम घर्षण यहाँ ! कोल की कालिमा उगलती चिमनियाँ नित्य बढ़ता हुआ उत्सर्जन यहाँ ! जानते … पढ़ना जारी रखें प्रदूषण

किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा

किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा। मेरी ख्वाबों की दुनिया को ये लश्कर मार डालेगा।। भिखारी आज इक़ फुटपाथ पे देखा ठिठुरता है। यकीनन आज फिर मुझको ये बिस्तर मार डालेगा।। खिलौना मानकर ये खेलता फिर जानवर से है। इसी वहशत में जाने कितने बंदर मार डालेगा।। उसे मैं इसलिये ही खत नहीं हूँ भेजता कोई। मेरा खत फाड़कर के वो … पढ़ना जारी रखें किसी दिन मुझको ही सपनों का ये घर मार डालेगा

हम सिसक सिसक सो जाते है

तेरा मेरी गली से गुजरना, मेरी नजरों पे आके वो रुकना । उन यादों के दामन थामे, हम संभल-संभल रुक जाते हैं।।   तेरी बातों पे मेरा बिखरना, मेरे साये से तेरा लिपटना। उन लम्हों को पास यू पाके, हम मचल-मचल रह जाते हैं।। तेरी रातों में मेरा वो सपना, मेरी सुबहो में तेरा वो जगना। उन यादों को दिल से लगा के, हम सिसक-सिसक … पढ़ना जारी रखें हम सिसक सिसक सो जाते है

विरहणी

भोर में ही विरहणी आंगन बुहारती, कर्मलीना प्रतिपल सोचती विचारती, तक रही है द्वार को दृष्टि है अनिमेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। उर ज्वलित विरहाग्नि से भस्म होती देह, और भड़काते बरस नयन रूपी मेह, पिय मिलन का ही रहा बस अभीप्सित शेष, धिक्कार वह जीवन जो वेदनावशेष। थी भरी हर सौख्य से कंत थे जब पास, है यही जीवन बचा चल रही बस … पढ़ना जारी रखें विरहणी