कवि और कविता:नरेश मेहता का काव्‍य वैभव – डॉ. दीपक पाण्‍डेय

साहित्‍य की श्रीवृद्धि में अनेक साहित्‍यकारों ने अपने सर्वस्‍व भाव-बोध विविध विधाओं में उडेल दिए हैं जिन्‍हें विस्‍मृत कर पाना संभव नहीं है । इसी कड़ी में अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘दूसरा सप्‍तक’ के कवि नरेश मेहता का नाम साहित्यिक जगत में सम्‍मान से लिया जाता है।15 फरवरी 1922 को मालवा, मध्‍यप्रदेश के शाजापूर के गुजराती ब्राहमण परिवार में जन्‍मे नरेश मेहता का प्रारंभिक नाम ‘पूर्णशंकर शुक्‍ल’ था।मेहता की पदवी उनके पूर्वजों को गुजराज यात्रा के समय मिली जिसे अपने पिता की तरह नरेश मेहता ने भी शुक्‍ल के स्‍थान पर प्रयोग करते रहे।नरेश मेहता समकालीन हिंदी काव्‍य के शीर्षस्‍थ कवि हैं जिन्‍होंने अपने काव्‍य-संसार में शिप्रा-नर्मदा से लेकर गंगा तक फैले जीवन के विस्‍तृत फलक को अभिव्‍यक्ति दी है। मूल्‍यबोध की दृष्टि से भारतीय संस्‍कृति की मिथकीय, जातीय और सारस्‍वत स्‍मृतियों के पुनराविष्‍कार और उसकी रचनात्‍मक परिणतियों से समृद्ध उनका काव्‍य-संसार अपनी अद्वितीय आभा से समकालीन परिदृश्‍य में एक अनिवार्य और अपरिहार्य उपस्थिति है । पढ़ना जारी रखें कवि और कविता:नरेश मेहता का काव्‍य वैभव – डॉ. दीपक पाण्‍डेय