रिटायर्ड का दर्द – कवि द्रौणाचार्य दुबे

मै बुजुर्ग हूँ रिटायर्ड हूँ पेंशन पर जीता हूँ पेंशन क्या इससे ज्यादा तो टेंशन पर जीता हूँ कोल्हू के बैल-सा घर के सारे काम कर जाता हूँ बदले में सिर्फ अपमान के शब्द ही पाता हूँ हूँ जिँदा मगर मर मर के ही जीता हूँ रोज अपमान के आँसू -गम पीता हूँ राम -सीता से बेटे बहू को मैने है पाया अपने को मिटा … पढ़ना जारी रखें रिटायर्ड का दर्द – कवि द्रौणाचार्य दुबे

एक अजन्मा, अनसुना सा गीत – नंदकिशोर ‘सौम्य’

किसी वीरान हवेली के, अंधेरे कमरे के कुन्ने में एक अजन्मा, अनसुना सा गीत पड़ा कराह रहा है ! वो गीत जिसने करुण क्रंदन से निर्मित शब्दों के बिस्तर की सेज सजाई है ! वो गीत, जो अनदेखे तमाम आँसू अपनी सूखी आँखों में छिपाए बैठा है ! वो गीत, जिसके हर शब्द में — विरह है, विलाप है, एक अधूरा सा मिलाप है… धूप … पढ़ना जारी रखें एक अजन्मा, अनसुना सा गीत – नंदकिशोर ‘सौम्य’

चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

चाहता तो लेख का शीर्षक ”मैं और चूहा” रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया। इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्नी थी, … पढ़ना जारी रखें चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

एक थी माया – विजय कुमार सप्पत्ति

:::: १९८० :::: ::: १ ::: मैं सर झुका कर उस वक़्त बिक्री का हिसाब लिख रहा था कि उसकी  धीमी आवाज सुनाई दी, “अभय, खाना खा लो” ,मैंने सर उठा कर उसकी  तरफ देखा, मैंने उससे कहा ,” माया , मै आज डिब्बा नहीं लाया हूं ।” दरअसल सच तो यही था कि  मेरे घर में उस दिन खाना नहीं बना था । गरीबी … पढ़ना जारी रखें एक थी माया – विजय कुमार सप्पत्ति

आधुनिक हिंदी सहित्य का इतिहास – पूर्णिमा वर्मन

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर के साथ साथ मानव को समान महत्व दिया गया। भावना … पढ़ना जारी रखें आधुनिक हिंदी सहित्य का इतिहास – पूर्णिमा वर्मन

ईसुरी की अलौकिक फाग नायिका रजऊ और बुन्देली परम्पराएँ – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

बुन्देली माटी के यशस्वी कवि ईसुरी की फागें कालजयी हैं. आज भी ग्राम्यांचलों से लेकर शहरों तक, चौपालों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस फागों को केंद्र में रखकर गायन, संगोष्ठियों आदि के आयोजन किये जाते हैं. ईसुरी की फागों में समाज के अन्तरंग और बहिरंग दोनों का जीवंत चित्रण प्राप्य है. मानव जीवन का केंद्र नारी  होती है. माँ, बहिन, दादी-नानी, सखी, भाभी, प्रेयसी, पत्नी, साली, … पढ़ना जारी रखें ईसुरी की अलौकिक फाग नायिका रजऊ और बुन्देली परम्पराएँ – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

रंगों से रंगी दुनिया – संजय वर्मा ‘दृष्टि’

मैने देखी ही नहीं रंगों से रंगी दुनिया को मेरी आँखें  ही नहीं ख्वाबों के रंग सजाने को |           * कोंन आएगा ,आखों मे समाएगा रंगों के रूप को जब दिखायेगा रंगों पे इठलाने वालों डगर मुझे दिखावो जरा चल संकू मे भी अपने पग से रोशनी  मुझे दिलों जरा ये हकीकत है कि, क्यों दुनिया है खफा मुझसे मैने देखी … पढ़ना जारी रखें रंगों से रंगी दुनिया – संजय वर्मा ‘दृष्टि’

मज़दूर हूँ मैं – जय नारायण कश्यप

आज नकारते हैं जो , कल दुलारते चलेंगे , क्या लिख गया हूँ मैं , कल संभालते चलेंगे , बज रही हैं तूतियाँ , जिनकी आसमान में , मेरी बुड़बुड़ाहटों को , फिर खंगालते चलेंगे , संस्मरण नहीं कोई , न कोई व्यथा कथा , दूर की कौड़ी नहीं , न कोई कल्पित कथा , ज़िंदगी का सार हैं , फोक फैंक आया हूँ , … पढ़ना जारी रखें मज़दूर हूँ मैं – जय नारायण कश्यप

ज्वार आया – प्रीति सुराना

एक रात चांद का दिल भर आया जब भीड़ में महसूस की उसने तनहाई, चांद को जब तनहा रोता देखा तो सितारों की भी आंख भर आई, अब तो रात भी संग लगी रोने, और हवा ने ये खबर सारी सृष्टि मे फैलाई, तब सागर भी दौड़ा दौड़ा आया, और तभी नासमझ मानव चिल्लाया, देखो समुद्र में ज्वार आया,ज्वार आया …..प्रीति सुराना पढ़ना जारी रखें ज्वार आया – प्रीति सुराना

श्वान , तू महान !! – सौरभ मिश्रा

तुम्हारी नज़रो में विश्वास नज़र आता है । बेखौफ हो जाने का अहसास नज़रआता है ॥ तुम्हारी वफादारी मिसाल बन गई है । हर सभ्यता में वो तो कमाल बन गई है ॥ इन्सानियत भी तुमसे अब सबक ले हर दिन । बेपरवाह खुद की जान से कैसे करते वफ़ा पल – छिन ? इक सवाल मुझको हरदम कचोटता है मन के तारों को वह … पढ़ना जारी रखें श्वान , तू महान !! – सौरभ मिश्रा

बेटियाँ – हेमन्त खेतान

किस्मत की चाबी होती है बेटियाँ इक बार दिल पे लगा के तो देखो.. लुटायेगी प्यार  तुमपे ये बेहिसाब जिन्दगी से इन्हें मिला के तो देखो.. ना तोडेगी खुद ना किसी को देगी इक-सा-ही यकीं जता के तो देखो.. आयेगी नजर इन्में अच्छाईयाँ ही वो पर्दा आँखो से हटा के तो देखो.. छूयेगी ये भी वो जुम्बिशे-ए-गगन बदिंशो से रिहाई करा के तो देखो.. पायेंगे … पढ़ना जारी रखें बेटियाँ – हेमन्त खेतान

अनुत्तरित प्रश्न – प्रभुदयाल मिश्र ‘विश्वात्म’

जो नहीं मैं हुआ शेष वह हल सभी प्रश्न को दे दिए मन्त्र निष्फल, निरर्थक हुए शब्द के अर्थ मेरे लिए । हर पतन ने गगन को छुआ सांस का विश्व ऐसा बसा कुछ करूंगा, किया पर नहीं मोड प्रत्येक पर आ रुदन ही हंसा वक्त के ठीक इंतजार में हम ठगे से खडे रह गये  ़ स्वप्न संसार में सृष्टि स्वप्निल, नहीं मानकर मैं … पढ़ना जारी रखें अनुत्तरित प्रश्न – प्रभुदयाल मिश्र ‘विश्वात्म’

हवा और तुम – मृदुल पुरोहित

ह्रदय  आल्हादित हो जाता है गीत गुनगुनाने लगते हैं होंठ बरबस ही मस्ती छा जाती है समूची देह में यह जानकर कि पहुंचने वाली हैं तुम्हें छूकर आने वाली हवाएं। आने दो उन हवाओं को बिना किसी अवरोध के खोकर उनमें, पूछूंगा मैं तुम्हारे दिल की बातें। ये हवाएं ही तो हैं जो मेरे प्रेमसिक्त ह्रदय का संदेश पहुंचाती हैं तुम तक जब नज़र आता … पढ़ना जारी रखें हवा और तुम – मृदुल पुरोहित

कुर्सी – विवेक रंजन श्रीवास्तव

झक सफेद खद्दर की लिबासों में लिपटे अंतर्मन से काले लोग. देश के नक्शे में कुर्सी के लिये एक दौड़. वोट की जोड़ तोड़. कुछ वैसी ही होड़ जैसी कुर्सी दौड़ बचपन में हमने भी दौड़ी है गोल चक्कर में. अंतर केवल इतना है कि तब एक ही कुर्सी कम होती थी दौड़ने वालों की सँख्या से. जिस बच्चे को कुर्सी नही मिलती थी घंटी … पढ़ना जारी रखें कुर्सी – विवेक रंजन श्रीवास्तव

ग़ज़ल – मनीष कुमार ‘सुमन’

लोग कहते हैं वो यहीं का है, ग़म से बिखरा हुआ है वो, बेबसी का है। कल तलक आसमाँ में उसके ही चर्चे थे, गौर से देख लो, आज वो जमीं का है। किसलिये नफ़रतें हैं फैली यहाँ, आदमी दुश्मन आदमी का है। किसने किये हैं कत्ल? है खंजर किसका? घायल मैं हूँ, ये खंजर भी हमीं का है। अँधेरी रात में वो घर से … पढ़ना जारी रखें ग़ज़ल – मनीष कुमार ‘सुमन’

आदमी (ग़ज़ल) – डॉ अखिल बंसल

  देखते देखते कौन क्या हो गया वक़्त की दौड़ में आदमी खो गया।।१।। साथ दें जो यहाँ दोस्त मिलते नहीं क्या फिकर है उन्हें जो गया सो गया।।२।। सिर्फ अपने लिए ही जिए जा रहे कौन दो पल किसी के लिए रो गया।।३।। देख पाया नहीं सुख पराया कभी ताड़ मौका बबूली फसल बो गया।।४।। पापियों को हमीं मान देते अखिल एक डुबकी लगा … पढ़ना जारी रखें आदमी (ग़ज़ल) – डॉ अखिल बंसल

सरोगेट मदर – डॉ. शुभ्रता मिश्रा

  तुम्हें न देख पाने के वचन से बँधी हुई हूँ मैं । संवेदना का कत्ल कर कब से सोई नहीं हूँ मैं । जन्म देकर तुम्हें सौंप दूँगी उन्हें, क्योंकि किराए पर तुम्हें जन्म दे रही हूँ मैं । चिकित्सा के बाज़ार में मजबूर खड़ी हूँ मैं । विज्ञान को विजय दिला, पराजित हुई हूँ मैं । विपन्नतावश  कोख का सौदा करने के लिए, … पढ़ना जारी रखें सरोगेट मदर – डॉ. शुभ्रता मिश्रा

प्रयोगवादी रचनाकार : कुछ विमर्श – डॉo मोo मजीद मिया

1. परिचय : प्रयोग एवं वाद के योग से प्रयोगवाद शब्द का निर्माण हुआ है। प्रयोग शब्द का पहला अर्थ होता है, किसी भी वस्तु या विषय को व्यवहार में लाने का कार्य या उपयोग एवं दूसरा अर्थ नीति, नियम, सिद्धान्त आदि की स्थापना करके उसे कार्य रूप में लाने की प्रक्रिया। जिन रीतिबद्ध(क्लासिकल) समालोचकों ने प्रयोगवादी रचनाओं के बारे में अपने राय व्यक्त किए … पढ़ना जारी रखें प्रयोगवादी रचनाकार : कुछ विमर्श – डॉo मोo मजीद मिया

फेसबूकियन – अनवर सुहैल

साहनी साहब ने फेसबुक  लागिन किया। जूसीपुस्सी69 आन-लाईन मिली। साहनी साहब ने चैटिंग पैड पर टाईप किया-‘‘हैलो बेब’’ तत्काल जवाब मिला-‘‘हाय सैक्सी’’ ‘‘आज क्या पहन रखा है?’’ ‘‘क्या कुछ पहनना जरूरी है?’’ ‘‘ओ, मीन्स?’’ ‘‘इट डज़न्ट मैटर!’’ ‘‘जस्ट आई वान्ट टू सी यू इन पिंक टाप!’’ ‘‘या, आयम इन पिंक टाप’’ अचानक डाटा इनकमिंग में प्राब्लम आई। वार्तालाप में बाधा आई। साहनी साहब ने टाईप … पढ़ना जारी रखें फेसबूकियन – अनवर सुहैल

शिवा -पंकज त्रिवेदी

खड़ा गिरिवर गंभीरा गहन गुहा बस अँधेरा निज दर्शन में अधीरा पलपल बनता है धीरा सूक्ष्म सकल तव शिवा – नाम : पंकज त्रिवेदी ईमेल : vishwagatha@gmail.com आवासीय पता : संपादक -विश्वगाथा गोकुल पार्क सोसाइटी, ८० फीट रोड, सुरेंद्रनगर-३६३००२ गुजरात माता का नाम : शशिकला पिता का नाम : अमृत लाल पढ़ना जारी रखें शिवा -पंकज त्रिवेदी