जब हमीरपुर के डीएम ने दी थी मुंशी प्रेमचंद को धमकी

हिंदी साहित्य में प्रेमचंद का कद काफी ऊंचा है और उनका लेखन कार्य एक ऐसी विरासत है, जिसके बिना हिंदी के विकास को अधूरा ही माना जाएगा। मुंशी प्रेमचंद एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता और बहुत ही सुलझे हुए संपादक थे। प्रेमचंद ने हिंदी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया, जिसने एक पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। उनकी लेखनी इतनी समृद्ध थी … पढ़ना जारी रखें जब हमीरपुर के डीएम ने दी थी मुंशी प्रेमचंद को धमकी

प्रेमचंद के जन्मदिवस पर विशेष

दुनिया के महानतम कथाकारों में शुमार मुंशी प्रेमचंद ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गोरखपुर की जिस रावत पाठशाला से पाई थी वहां उनका नामोनिशां तक नहीं है। यही नहीं पाठशाला के आधे से ज्यादा हिस्से की दीवारें दरककर आज जीर्णशीर्ण अवस्था में पड़ी हैं। गोरखपुर नगर निगम ने पिछले साल कुछ काम जरूर कराया लेकिन पाठशाला से उसके अति विशिष्ट छात्र प्रेमचंद के रिश्ते को धरोहर … पढ़ना जारी रखें प्रेमचंद के जन्मदिवस पर विशेष

अमृत – मुंशी प्रेमचंद

१ मेरी उठती जवानी थी जब मेरा दिल दर्द के मजे से परिचित हुआ। कुछ दिनों तक शायरी का अभ्यास करता रहा और धीर-धीरे इस शौक ने तल्लीनता का रुप ले लिया। सांसारिक संबंधो से मुंह मोड़कर अपनी शायरी की दुनिया में आ बैठा और तीन ही साल की मश्क़ ने मेरी कल्पना के जौहर खोल दिये। कभी-कभी मेरी शायरी उस्तादों के मशहूर कलाम से … पढ़ना जारी रखें अमृत – मुंशी प्रेमचंद

अनाथ लड़की

सेठ पुरुषोत्तमदास पूना की सरस्वती पाठशाला का मुआयना करने के बाद बाहर निकले तो एक लड़की ने दौड़कर उनका दामन पकड़ लिया। सेठ जी रुक गये और मुहब्बत से उसकी तरफ देखकर पूछा—क्या नाम है? लड़की ने जवाब दिया—रोहिणी। सेठ जी ने उसे गोद में उठा लिया और बोले—तुम्हें कुछ इनाम मिला? लड़की ने उनकी तरफ बच्चों जैसी गंभीरता से देखकर कहा—तुम चले जाते हो, … पढ़ना जारी रखें अनाथ लड़की

Munshi Premchand

मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

जन्म प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे। जीवन धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों … पढ़ना जारी रखें मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

हार की जीत – पंडित सुदर्शन

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे ‘सुल्तान’ कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद … पढ़ना जारी रखें हार की जीत – पंडित सुदर्शन

उसने कहा था – चंद्रधर शर्मा गुलेरी

बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़िवालों की जवान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगाएँ। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के … पढ़ना जारी रखें उसने कहा था – चंद्रधर शर्मा गुलेरी

ईश का सन्देश है वो – संजय वर्मा

फूल की कलियों से कोमल नव धरा की एक हलचल जैसे नभ में तारे झिलमिल अधखिली वो पंखुड़ी है देह से परछाई जैसे सिन्धु से गहराई जैसे मेघ से बरसात जैसे वो सदा मुझसे जुड़ी है तोतले कुछ बोल लेकर एक परी का भेष है वो कुछ अधूरे अनकहे से ईश का सन्देश है वो (अपनी बेटी को समर्पित) – संजय वर्मा साइबर वैली, कोन्दपुर, हैदराबाद पढ़ना जारी रखें ईश का सन्देश है वो – संजय वर्मा

बस याद आता है – प्रतिभा अंश

माँ तेरे हाथो की वो रोटी याद आती है कंडा जोड़ बनाती थी, वो चूल्हा याद आता है वो सोंधी-सोंधी चटनी, जो सिल-बट्टे पर पीसती थी वो खुशबू याद आती है गोधूली बेला में जब पापा संग बतियाते थे वो आँगन याद आता है भाई-बहनों की लड़ाई में, जब डांट तुम्हारी पड़ती थी वो डांट याद आती है बड़ा सुकून मिलता था जब मैं आँचल … पढ़ना जारी रखें बस याद आता है – प्रतिभा अंश

स्नेह – हरि मंगल ‘सलिल’

स्नेह कितना सरल है ,जरा आओ मिल के देंखे। साथ – साथ हम भी , आओ तो चल के देखें॥ सब बैठे हैं घरों में, सूनी हुई हैं गलियाँ। फूल हैं मुरझाए, खिलती नहीं हैं कलियाँ॥ दुनियाँ बड़ी सरस है, पर आज क्यों नीरस है।  इस रसमई धरती में, इंसान क्यों विवस है॥ विवसता मिटा दें, जरा इंसान बन के देखें॥ स्नेह कितना सरल है … पढ़ना जारी रखें स्नेह – हरि मंगल ‘सलिल’

समंदर की चाह में – निखा कुमार

समाज ने सवाल उठाया , सत्य को मिला निष्कासन , मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा , सीता परित्यक्ता हो गयी …. समाज आखिर सत्य पर ही सवाल क्यों उठाता है ? और यदि सत्य का साथ देने की सामर्थ्य नहीं , तो वो सत्पुरुष कैसे ? अपने स्वार्थ पर , समाज में अपने स्थान को बनाये रखने वाले , मर्यादा पुरुषोत्तम राम , कर गए तीन … पढ़ना जारी रखें समंदर की चाह में – निखा कुमार

महिला दिवस पर विशेष – डॉ अ कीर्तिवर्धन

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ०८ मार्च को  मनाया जाता  है | वैसे तो भारतीय सन्दर्भों मे प्रत्येक दिन ही महिला दिवस है क्योंकि सत्ता से घर तक महिलाएं ही सर्वोपरि हैं | फिर भी फाइव स्टार सभ्यता वाली महिलाओं को महिला दिवस की शुभ कामनाएँ | इन महिलाओं से निवेदन है की एक बार घर मे काम कराने वाली बाई को भी महिला दिवस का अहसास … पढ़ना जारी रखें महिला दिवस पर विशेष – डॉ अ कीर्तिवर्धन

मेरा मन सुनो! – प्रीति सुराना

सुनो तुम्हे याद है मैंने एक बार कहा था मैं एक खुली किताब हूं जिसमें रिश्ते-नाते, प्यार-दोस्ती, अपने-पराए, सबने अपनी-अपनी इबारतें लिखी सबकी स्याही के रंग अलग-अलग थे विषय अलग-अलग थे अधिकार-कर्तव्य, आंसू-हंसी खुशी-गम पाना-खोना प्यार -गुस्सा गिले-शिकवे सच-झूठ अरमान-सपने, व्यवहार-व्यापार सपने-हसरतें सभी ने अपने-अपने हिस्से हथिया लिए पर मैंने चोरी से किताब के बीचोबीच का एक बिल्कुल कोरा पन्ना बचाकर तुम्हे दिया था और … पढ़ना जारी रखें मेरा मन सुनो! – प्रीति सुराना

हिंदी उपन्यास का प्रारम्भ

हिंदी उपन्यास का आरम्भ श्रीनिवासदास के “परीक्षागुरु ‘ (१८४३ ई.) से माना जाता है। हिंदी के आरम्भिक उपन्यास अधिकतर ऐयारी और तिलस्मी किस्म के थे। अनूदित उपन्यासों में पहला सामाजिक उपन्यास भारतेंदु हरिश्चंद्र का “पूर्णप्रकाश’ और चंद्रप्रभा नामक मराठी उपन्यास का अनुवाद था। आरम्भ में हिंदी में कई उपन्यास बँगला, मराठी आदि से अनुवादित किए गए। हिंदी में सामाजिक उपन्यासों का आधुनिक अर्थ में सूत्रपात … पढ़ना जारी रखें हिंदी उपन्यास का प्रारम्भ

प्रेमचंद की लेखन शैली

प्रेमचंद हिंदी के युग प्रवर्तक रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है।वे सर्वप्रथम उपन्यासकार थे जिन्होंने उपन्यास साहित्य को तिलस्मी और ऐयारी से बाहर निकाल कर उसे वास्तविक भूमि पर ला खड़ा किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। प्रेमचंद की … पढ़ना जारी रखें प्रेमचंद की लेखन शैली