उधार – अज्ञेय

सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी। मैनें धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार चिड़िया से कहा: थोड़ी मिठास उधार दोगी? मैनें घास की पत्ती से पूछा: तनिक हरियाली दोगी— तिनके की नोक-भर? शंखपुष्पी से पूछा: उजास दोगी— किरण की ओक-भर? मैने हवा से मांगा: थोड़ा खुलापन—बस एक प्रश्वास, लहर से: एक रोम की … पढ़ना जारी रखें उधार – अज्ञेय

ब्रह्म मुहूर्त : स्वस्ति वाचन – अज्ञेय

जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है उस दुख में नहीं जिसे बेझिझक मैंने पिया है। उस गान में जियो जो मैंने तुम्हें सुनाया है उस आह में नहीं जिसे मै ने तुम से छिपाया है। उस द्वार से गुज़रो जो मैं ने तुम्हारे लिये खोला है उस अंधकार के लिये नहीं जिसकी गहराई को बार बार मैंने तुम्हारी रक्षा की भावना से … पढ़ना जारी रखें ब्रह्म मुहूर्त : स्वस्ति वाचन – अज्ञेय

चाँदनी जी लो – अज्ञेय

शरद चाँदनी बरसी अंजुरी भर कर पी लो ऊँघ रहे हैं तारे सिहरी सिरसी ओ प्रिय कुमुद ताकते अनझिप क्षण में तुम भी जी लो! सींच रही है ओस हमारे गाने घने कुहासे में झिपते चेहरे पहचाने खम्भों पर बत्तियाँ खड़ी हैं सीठी ठिठक गये हैं मानो पल-छिन आने-जाने उठी ललक हिय उमगा अनकही अलसानी जगी लालसा मीठी, खड़े रहो ढिंग गहो हाथ पाहुन मम … पढ़ना जारी रखें चाँदनी जी लो – अज्ञेय

प्राण तुम्हारी पदरज फूली – अज्ञेय

प्राण तुम्हारी पदरज फूली मुझको कंचन हुई तुम्हारे चरणों की यह धूली! प्राण तुम्हारी पदरज फूली! आई थी तो जाना भी था – फिर भी आओगी, दुःख किसका? एक बार जब दृष्टिकरों के पद चिह्नों की रेखा छू ली! प्राण तुम्हारी पदरज फूली! वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी, गीत शब्द का कब अभिलाषी? अंतर में पराग-सी छाई है स्मृतियों की आशा धूली! प्राण तुम्हारी पदरज … पढ़ना जारी रखें प्राण तुम्हारी पदरज फूली – अज्ञेय

उड़ चल हारिल – अज्ञेय

उड़ चल, हारिल, लिये हाथ में यही अकेला ओछा तिनका। उषा जाग उठी प्राची में – कैसी बाट, भरोसा किन का! शक्ति रहे तेरे हाथों में – छूट न जाय यह चाह सृजन की, शक्ति रहे तेरे हाथों में – स्र्क न जाय यह गति जीवन की! ऊपर-ऊपर-ऊपर-ऊपर बढ़ा चीर चल दिग्मंडल अनथक पंखों की चोटों से नभ में एक मचा दे हलचल! तिनका? तेरे … पढ़ना जारी रखें उड़ चल हारिल – अज्ञेय

ताली तो छूट गई – अज्ञेय

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप शहर घूम-घामकर घर लौटे हों और तब आपको याद आया हो कि चाबियों का गुच्छा तो आप कहीं और छोड़ आये हैं? सवाल प्रतीकात्मक ही है, क्योंकि उसका रूप यह भी हो सकता है कि घर केवल एक कमरा रहा हो और चाबियों का गुच्छा केवल एक ताली, और कहीं और छोड़ आने की बजाय आपने … पढ़ना जारी रखें ताली तो छूट गई – अज्ञेय

जयदोल – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

लेफ्टिनेंट सागर ने अपना कीचड़ से सना चमड़े का दस्ताना उतार कर, ट्रक के दरवाजे पर पटकते हुए कहा,”गुरूंग, तुम गाड़ी के साथ ठहरो, हम कुछ बन्दोबस्त करेगा।” गुरूंग सड़ाक से जूतों की एड़ियाँ चटका कर बोला,”ठीक ए सा’ब -” साँझ हो रही थी। तीन दिन मूसलाधार बारिश के कारण नवगाँव में रुके रहने के बाद, दोपहर को थोड़ी देर के लिए आकाश खुला तो … पढ़ना जारी रखें जयदोल – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय” (7 मार्च, 1911- 4 अप्रैल, 1987) को प्रतिभासम्पन्न कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना जाता है।[1] इनका जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान में हुआ। बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीता। बी.एस.सी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़कर बम बनाते हुए पकडे गये और वहाँ से फरार भी हो गए। सन्1930 ई. के … पढ़ना जारी रखें सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”

मेरे देश की आँखें-अज्ञेय

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं पुते गालों के ऊपर नकली भवों के नीचे छाया प्यार के छलावे बिछाती मुकुर से उठाई हुई मुस्कान मुस्कुराती ये आँखें – नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं… तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ – नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं… वन डालियों के बीच से … पढ़ना जारी रखें मेरे देश की आँखें-अज्ञेय