भारतीय नव वर्ष तथा काल गणना – डॉ अ कीर्तिवर्धन

काल खंड को मापने के लिए जिस यन्त्र का उपयोग किया जाता है उसे काल निर्णय, काल निर्देशिका या कलेंडर कहते हैं। दुनिया का सबसे पुराना कलेंडर भारतीय है।  इसे स्रष्टि संवत कहते हैं, इसी दिन को स्रष्टि का प्रथम दिवस माना जाता है। यह संवत १९७२९४९११६ यानी एक अरब, सत्तानवे करोड़, उनतीस लाख, उनचास हज़ार,एक सौ सौलह वर्ष (मार्च २०१६ विक्रम संवत २०७२ के … पढ़ना जारी रखें भारतीय नव वर्ष तथा काल गणना – डॉ अ कीर्तिवर्धन

युवा – डॉ.स्वप्निल सागर जैन

  हे युवा ! तू वायु बन जीवनदाता जीवन रक्षक जीवन को यही चलाती है भारत जीवन तू रक्षक है इसलिए तू इसकी आयु बन हे युवा!तू वायु बन पल पल बहती,हर पल बहती पर रुकना इसका काम नहीं तू भी बहता बहता रहता पर तुझको अपना भान नहीं सही दिशा में बहकर तू सबके मन में दीर्घायु बन हे युवा!तू वायु बन कुछ रावण … पढ़ना जारी रखें युवा – डॉ.स्वप्निल सागर जैन

काट रहे सब, डाल वही – कृष्ण नन्दन मौर्य

काट रहे सब, डाल वही हैं बैठे जिसको थाम। बूढ़ा बरगद सोच रहा दिन कैसे आये राम। बाग, फूल, तितली  बसंत से रंग हुआ गायब झूठे बादल लेकर आता है अषाढ़ भी अब बाढ़, अकाल, भुखमरी का ॠतुयें लातीं पैगाम। भूमि, भाव की सूखी उड़ती है स्वारथ की रेत प्रगतिवाद के सांड़ खा गये नैतिकता के खेत उगे अर्थ के ‘हट’ परार्थ के पीपल हुये … पढ़ना जारी रखें काट रहे सब, डाल वही – कृष्ण नन्दन मौर्य

दरकते उपमान – विनय मूर्ति शर्मा

मैने लिखना छोड़ दिया,तुम्हारी झील सी आँखो को और कहना भी छोड़ दिया,दिल के जज्बातो को छोड़े नये पुराने सब उपमान, चन्द्रबदन वो गजगमन सच कहूँ अब ये जेहन मे आते नही हो नफरत प्यार पर भारीतो ये भाते नही. न मुझे, न कविता को!पर तुम समझ पाते नही क्या कहा! तुम अभी भी काव्य मे तुलनाएँ करोगे जबरन ही सही पर व्यर्थ की उपमाएँ … पढ़ना जारी रखें दरकते उपमान – विनय मूर्ति शर्मा

उषा की लाली; पूर्णिमा; परदेशी – नाम : डॉ महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ‘नन्द’

उषा की लाली रवि रजनी का मिलन मिटा, मिट गयी क्षितिज काली रेखा। परकीया निज प्रिय संग लखिके, छिटकी ऊषा की लाली।।1।। दहने लगा प्रबल इष्र्यानल, झुलसी हिय की हरियाली। नैन बरसने लगे वदन पर, मोती सी सीकर माली।।2।। प्रिया प्रीति विपरीत रीति से, द्विज व्याकुल चिन्ताशाली। स्व सर्वस्व स्वकीया अर्पी, सरस प्रणय नव नय पाली।।3।। मिथुन सार अभिसार मिला जब, श्वेत हुआ स्वर्णिम थाली। … पढ़ना जारी रखें उषा की लाली; पूर्णिमा; परदेशी – नाम : डॉ महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ‘नन्द’

हार की जीत – पंडित सुदर्शन

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे ‘सुल्तान’ कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद … पढ़ना जारी रखें हार की जीत – पंडित सुदर्शन

उसने कहा था – चंद्रधर शर्मा गुलेरी

बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़िवालों की जवान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगाएँ। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के … पढ़ना जारी रखें उसने कहा था – चंद्रधर शर्मा गुलेरी

ईश का सन्देश है वो – संजय वर्मा

फूल की कलियों से कोमल नव धरा की एक हलचल जैसे नभ में तारे झिलमिल अधखिली वो पंखुड़ी है देह से परछाई जैसे सिन्धु से गहराई जैसे मेघ से बरसात जैसे वो सदा मुझसे जुड़ी है तोतले कुछ बोल लेकर एक परी का भेष है वो कुछ अधूरे अनकहे से ईश का सन्देश है वो (अपनी बेटी को समर्पित) – संजय वर्मा साइबर वैली, कोन्दपुर, हैदराबाद पढ़ना जारी रखें ईश का सन्देश है वो – संजय वर्मा

बस याद आता है – प्रतिभा अंश

माँ तेरे हाथो की वो रोटी याद आती है कंडा जोड़ बनाती थी, वो चूल्हा याद आता है वो सोंधी-सोंधी चटनी, जो सिल-बट्टे पर पीसती थी वो खुशबू याद आती है गोधूली बेला में जब पापा संग बतियाते थे वो आँगन याद आता है भाई-बहनों की लड़ाई में, जब डांट तुम्हारी पड़ती थी वो डांट याद आती है बड़ा सुकून मिलता था जब मैं आँचल … पढ़ना जारी रखें बस याद आता है – प्रतिभा अंश

स्नेह – हरि मंगल ‘सलिल’

स्नेह कितना सरल है ,जरा आओ मिल के देंखे। साथ – साथ हम भी , आओ तो चल के देखें॥ सब बैठे हैं घरों में, सूनी हुई हैं गलियाँ। फूल हैं मुरझाए, खिलती नहीं हैं कलियाँ॥ दुनियाँ बड़ी सरस है, पर आज क्यों नीरस है।  इस रसमई धरती में, इंसान क्यों विवस है॥ विवसता मिटा दें, जरा इंसान बन के देखें॥ स्नेह कितना सरल है … पढ़ना जारी रखें स्नेह – हरि मंगल ‘सलिल’

समंदर की चाह में – निखा कुमार

समाज ने सवाल उठाया , सत्य को मिला निष्कासन , मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा , सीता परित्यक्ता हो गयी …. समाज आखिर सत्य पर ही सवाल क्यों उठाता है ? और यदि सत्य का साथ देने की सामर्थ्य नहीं , तो वो सत्पुरुष कैसे ? अपने स्वार्थ पर , समाज में अपने स्थान को बनाये रखने वाले , मर्यादा पुरुषोत्तम राम , कर गए तीन … पढ़ना जारी रखें समंदर की चाह में – निखा कुमार

महिला दिवस पर विशेष – डॉ अ कीर्तिवर्धन

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ०८ मार्च को  मनाया जाता  है | वैसे तो भारतीय सन्दर्भों मे प्रत्येक दिन ही महिला दिवस है क्योंकि सत्ता से घर तक महिलाएं ही सर्वोपरि हैं | फिर भी फाइव स्टार सभ्यता वाली महिलाओं को महिला दिवस की शुभ कामनाएँ | इन महिलाओं से निवेदन है की एक बार घर मे काम कराने वाली बाई को भी महिला दिवस का अहसास … पढ़ना जारी रखें महिला दिवस पर विशेष – डॉ अ कीर्तिवर्धन

मेरा मन सुनो! – प्रीति सुराना

सुनो तुम्हे याद है मैंने एक बार कहा था मैं एक खुली किताब हूं जिसमें रिश्ते-नाते, प्यार-दोस्ती, अपने-पराए, सबने अपनी-अपनी इबारतें लिखी सबकी स्याही के रंग अलग-अलग थे विषय अलग-अलग थे अधिकार-कर्तव्य, आंसू-हंसी खुशी-गम पाना-खोना प्यार -गुस्सा गिले-शिकवे सच-झूठ अरमान-सपने, व्यवहार-व्यापार सपने-हसरतें सभी ने अपने-अपने हिस्से हथिया लिए पर मैंने चोरी से किताब के बीचोबीच का एक बिल्कुल कोरा पन्ना बचाकर तुम्हे दिया था और … पढ़ना जारी रखें मेरा मन सुनो! – प्रीति सुराना

हिंदी उपन्यास का प्रारम्भ

हिंदी उपन्यास का आरम्भ श्रीनिवासदास के “परीक्षागुरु ‘ (१८४३ ई.) से माना जाता है। हिंदी के आरम्भिक उपन्यास अधिकतर ऐयारी और तिलस्मी किस्म के थे। अनूदित उपन्यासों में पहला सामाजिक उपन्यास भारतेंदु हरिश्चंद्र का “पूर्णप्रकाश’ और चंद्रप्रभा नामक मराठी उपन्यास का अनुवाद था। आरम्भ में हिंदी में कई उपन्यास बँगला, मराठी आदि से अनुवादित किए गए। हिंदी में सामाजिक उपन्यासों का आधुनिक अर्थ में सूत्रपात … पढ़ना जारी रखें हिंदी उपन्यास का प्रारम्भ

आखिर क्या है समालोचना – अनामिका

आलोचना शब्द की उत्पत्ति ‘लुच’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है – देखना. साहित्य के सन्दर्भ मे समालोचना भी प्रयोग होता है, जिसका अर्थ है – ‘सम्यक प्रकार से देखना या परखना’. ड्राईडन के अनुसार – आलोचना वह कसौटी है जिसकी सहायता से किसी रचना का मूल्यांकन किया जाता है. वह उन विशेषताओं का लेखा प्रस्तुत करती है जो साधारणतः किसी पात्र को आनंद … पढ़ना जारी रखें आखिर क्या है समालोचना – अनामिका

समरस होना ही नीरस है – शालिनी मिश्रा ‘वैदेही’

ओ चाँद तुम अटल सत्य और सुन्दर। दुःख रुपी काले बादल क्षण के लिए तुम्हे ढक तो सकते हैं, किन्तु तुम पुनः चमककर प्रकाशवान हो जाते हो। क्या हमको सिखाते हो? कि, दुःखों में भी दुखी मत हो अटल रहो हमेशा सत्य पर। विजयी होगे तुम ही। क्या तुम्हारा प्रतिपल परिवर्तित रूप, बताता है हमें? कि, जीवन में समरस होना नीरस है प्रतिपल परिवर्तन ही … पढ़ना जारी रखें समरस होना ही नीरस है – शालिनी मिश्रा ‘वैदेही’

एक इंजीनियर की उसकी कविता के लिए जनून(युवा रचनाकार दिनेश गुप्ता जी का दैनिक जागरण द्वारा साक्षात्कार)

शब्द नए चुनकर गीत नया हर बार लिखूं मैं उन दो आंखों में अपना सारा संसार लिखूं मैं विरह की वेदना या मिलन की झंकार लिखूं मैं कैसे चंद लफ्जों में सारा प्यार लिखूं मैं। ये पंक्तियां हैं कवि दिनेश गुप्ता की किताब ‘कैसे चंद लफ्जों में सारा प्यार लिखूं मैं’ की, जिसका विमोचन पिछले दिनों मुंबई प्रेस क्लब में किया गया। इस अवसर पर … पढ़ना जारी रखें एक इंजीनियर की उसकी कविता के लिए जनून(युवा रचनाकार दिनेश गुप्ता जी का दैनिक जागरण द्वारा साक्षात्कार)

मेरी डायरी के कुछ पन्नें – शक्ति सार्थ्य

1-) कुछ भी कहना ये साबित नहीँ करता कि मैँ वो हूँ… मेरा होना स्वाभाविक है… अक्सर उदास हो जाता हूँ… ये मेरे लिए होना… आप समझ लो कि मैँ स्वंय से नाराज हूँ… मैँ अपने आप से झगड़ता हूँ… जब कभी मैँ बहस मेँ अपने मन से हार जाता हूँ… ये बड़ा जिद्दी है… इसकी बातेँ माननी पड़ती हैँ… ये कुछ भी करा लेता … पढ़ना जारी रखें मेरी डायरी के कुछ पन्नें – शक्ति सार्थ्य

प्रेमचंद की लेखन शैली

प्रेमचंद हिंदी के युग प्रवर्तक रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है।वे सर्वप्रथम उपन्यासकार थे जिन्होंने उपन्यास साहित्य को तिलस्मी और ऐयारी से बाहर निकाल कर उसे वास्तविक भूमि पर ला खड़ा किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। प्रेमचंद की … पढ़ना जारी रखें प्रेमचंद की लेखन शैली

कितना ख़ास है सशक्त लोकतंत्र के मुखिया का सबसे बड़े लोकतंत्र में आगमन?-ठाकुर दीपक सिंह कवि (प्रधान संपादक)

भारत और अमेरिका के सुर अतीत में भले ही एक दूसरे से मेल न खाते रहे हो परंतु आज स्थिति में वांछित बदलाव है। दोनों ही देश के प्रमुख विकास के मुद्दे पर आम सहमति रखने वाले है। वैश्विक मंचो पर दोनों ही देश गर्मजोशी से मिले है और विचारधारा में भी आपसी समन्वय है। रिश्तों और आकांक्षाओं की बात करने से पहले पूर्व में … पढ़ना जारी रखें कितना ख़ास है सशक्त लोकतंत्र के मुखिया का सबसे बड़े लोकतंत्र में आगमन?-ठाकुर दीपक सिंह कवि (प्रधान संपादक)