चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

चाहता तो लेख का शीर्षक ”मैं और चूहा” रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया। इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्नी थी, … पढ़ना जारी रखें चूहा और मैं – हरिशंकर परसाई

एक थी माया – विजय कुमार सप्पत्ति

:::: १९८० :::: ::: १ ::: मैं सर झुका कर उस वक़्त बिक्री का हिसाब लिख रहा था कि उसकी  धीमी आवाज सुनाई दी, “अभय, खाना खा लो” ,मैंने सर उठा कर उसकी  तरफ देखा, मैंने उससे कहा ,” माया , मै आज डिब्बा नहीं लाया हूं ।” दरअसल सच तो यही था कि  मेरे घर में उस दिन खाना नहीं बना था । गरीबी … पढ़ना जारी रखें एक थी माया – विजय कुमार सप्पत्ति