Advertisements

Literature in India

हिंदी भाषा प्रेमियों द्वारा सामूहिक रूप से संचालित हिंदी साहित्य एवं समाचार का मायाजाल

यूजीसी नेट हिंदी पाठ्य सामग्री

आधिकारिक पाठ्क्रम सूचना – यूजीसी नेट हिंदी पाठ्यक्रम

यूजीसी नेट रिजल्ट –  यूजीसी नेट परिणाम देखें

यूजीसी नेट में प्राप्तांक देखें – यूजीसी नेट में अपने प्राप्तांक देखें

यूजीसी नेट हिंदी की पुस्तक – यूजीसी नेट हिंदी की उपकार प्रकाशन की पुस्तक

यूजीसी नेट हिंदी की पाठ्यपुस्तक के पीडीऍफ़ को प्राप्त करने हेतु हमें मेल करें – adteam@literatureinindia.com

यूजीसी नेट की तैयारी कैसे करें

संदेश आचार्य

(यूजीसी) नई दिल्ली द्वारा शोध को बढ़ावा देने हेतु एवं शिक्षकों की पात्रता निर्धारण करने हेतु राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) का आयोजन वर्ष 1948 से किया जा रहा है। उक्त परीक्षा वर्ष में दो बार जून एवं दिसंबर माह में आयोजित की जाती है।

परीक्षा के दो मुख्य उद्देश्य है। प्रथम करने हेतु छात्रवृत्ति प्रदान करना एवं द्वितीय शिक्षकों हेतु पात्रता मापदंड निर्धारित करना है। किसी भी विषय के स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त एवं अंतिम वर्ष में अध्ययनरत छात्र परीक्षा में प्रतिभागी हो सकते हैं।

इस परीक्षा में तीन प्रश्न-पत्रों का आयोजन एक ही दिन में किया जाता है। प्रथम एवं द्वितीय प्रश्न-पत्र का वस्तुनिष्ठ प्रकार के जबकि तृतीय प्रश्न-पत्र वर्णात्मक प्रकार का होता है। प्रथम प्रश्न-पत्र का पाठ्यक्रम समस्त विद्यार्थियों हेतु एक समान है, जबकि द्वितीय एवं तृतीय प्रश्न-पत्र विद्यार्थी के स्नातकोत्तर विषय की विषय वस्तु पर आधारित होते हैं।

नेट परीक्षा का प्रथम प्रश्न-पत्र मुख्यतः शिक्षण एवं शोध अभिवृत्ति पर आधारित है। साथ ही तर्क एवं गणितीय अभिक्षमता, सून प्रौद्योगिकी, पर्यावरण तथा अपठित गद्यांश से संबंधित प्रश्नों का समावेश भी इस प्रश्न-पत्र में होता है। इस प्रश्न-पत्र में कुल 60 प्रश्न पूछे जाते हैं। जिन में से 50 प्रश्नों को 75 मिनट में हल करना होता है। परीक्षा में ऋणात्मक अंकन नहीं किया जाता है। इस प्रश्न-पत्र से संबंधित विषयवस्तु की तैयारी निम्न प्रकार से की जा सकती हैः-

(1) शिक्षण एवं शोध अभिवृत्ति : इस विषय वस्तु से संबंधित अध्ययन हेतु बीए एवं एमएड की पाठ्य पुस्तकें सहायक सिद्ध हो सकती है। शिक्षा मनोविभाग, शैक्षिक शोध एवं शैक्षिक तकनीकी आदि से संबंधित पाठ्य पुस्तकों के अध्ययन से संबंधित विषय वस्तु के अध्ययन कर शिक्षण एवं शोध अभिवृत्ति के प्रश्न को हल किया जा सकता है।

(2) तार्किक एवं गणितीय अभिक्षमता : नेट परीक्षा में चित्रात्मक एवं कथनात्मक दोनों प्रकार के तार्किक प्रश्नों के साथ सामान्य गणितीय अभिक्षमता एवं ग्रॉफिय निरूपण के प्रश्नों का समावेश होता है। इस हेतु बैंक प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें एवं कक्षा 5-10 तक की गणित विषय की पाठ्य पुस्तकों को प्रयोग में लाया जा सकता है। साथ ही इस विषय वस्तु हेतु प्रतिदिन अभ्यास की भी आवश्यकता होती है तभी विद्यार्थी गति एवं शुद्धता के मापदंडों तक पहुंच कर इन प्रश्नों का हल करने में सक्षम होगा।

(3) सूचना प्रौद्योगिकी : इस विषय वस्तु से संबंधित प्रश्न मुख्यतः इंटरनेट, सम्प्रेषण एवं ऑपरेटिंग तंत्र पर आधारित होते है। साथ ही कुछ प्रश्न इस क्षेत्र की नवीनतम जानकारी से भी जुड़े होते है। इस हेतु कम्प्यूटर की आधारभूत पुस्तकों का अध्ययन मददगार साबित हो सकता है। इस क्षेत्र की नवीनतम जानकारियों हेतु कम्प्यूटर से संबंधित प्रकाशित पत्रिकाएं, दैनिक समाचार-पत्रों का अध्ययन कर सफलता प्राप्त की जा सकती है।

(4) पर्यावरण विज्ञान : नेट के प्रथम प्रश्न-पत्र में पर्यावरण विज्ञान से संबंधित प्रश्नों का समावेश भी होता है। जिसमें पर्यावरणीय समस्याओं, सम्मेलनों व नवीनतम जानकारी से जुड़े प्रश्न होते हैं। इस हेतु विभिन्न प्रकाशनों के पर्यावरण विशेषांक, कक्षा 6-10 तक की पर्यावरण से संबंधित पाठ्य पुस्तकों आदि का अध्ययन कर उक्त प्रश्नों को हल किया जा सकता है।

अगर आप यूजीसी की परीक्षा में सफल होना चाहते हैं तो आपके लिए बेहतर यही है कि आप सिर्फ रिवीजन करें। अगर आप रिवीजन कम समय में बेहतर तरीके से करते हैं, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है…
सफल होने वाले लोग पहले से योजना बनाते हैं और उसी के अनुरूप तैयारी करते हैं। किसी भी  परीक्षा में आप बेहतर प्रदर्शन तभी कर पाएंगे, जब आप इस परीक्षा की तैयारी सिलेबस के अनुरूप करेंगे। आप इस परीक्षा की तैयारी कर लिए होंगे, लेकिन अब इसे फाइनल टच देने का समय आ गया है।

कई स्टूडेंट्स बेहतर पढ़ाई करने के बावजूद रिविजन के अभाव में परीक्षा में सफल नहीं होते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि वे फाइनल टच नहीं देते हैं। इस समय टीचिंग का जॉब इस समय काफी हॉट हो रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इस जॉब में सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ ही हैवी सैलरी मिलती है। इसके साथ ही सरकारी नौकरी करने का अलग से एडवांटेज होता है। इस कारण काफी संख्या में स्टूडेंट्स सम्मिलित होते हैं। अगर आप भी पढऩे और पढ़ाने के शौकीन हैं और कॉलेज में लेक्चरर बनकर ज्ञान से स्टूडेंट्स को लाभान्वित  करना चाहते हैं, तो आपके लिए इस समय बेहतरीन अवसर है।

पैसा के साथ डिग्री
इस परीक्षा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सबसे अधिक माक्र्स लानेवाले स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप की सुविधा मिलती है। अगर आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, तो स्कॉलरशिप के माध्यम से आप अपनी पढ़ाई आसानी से कर सकते हैं। जो स्टूडेंट्स इस परीक्षा में सबसे अधिक अंक लाते हैं, उनकी मेरिट लिस्ट बनाई जाती है और इनमें से कुछ को जूनियर रिसर्च फेलोशिप यानी जेआरएफ और शेष को नेट यानी नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट के लिए चुना जाता है। जेआरएफ में चुने गए स्टूडेंट्स को रिसर्च के लिए स्कॉलरशिप दिए जाते हैं, जबकि नेट क्वालीफाई को स्कॉलरशिप नहीं दिए जाते हैं। इस परीक्षा को उत्तीर्ण करनेवाले स्टूडेंटस ही लेक्चरर या रीडर पद के योग्य होते हैं।

 

आवश्यक योग्यता
सामान्य अभ्यर्थियों के लिए संबंधित विषय में कम से कम 55 प्रतिशत अंकों के साथ किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से अपनी विषयों में स्नातकोत्तर अनिवार्य है। एससी, एसटी तथा समाज के विकलांग व्यक्तियों के लिए 50 प्रतिशत अंकों से स्नातकोत्तर होना जरूरी है।  लेक्चरर पद की पात्रता प्राप्त करने की चाह रखने वाले अभ्यर्थियों के लिए उम्र सीमा का कोई बंधन नहीं है, वहीं जेआरएफ के लिए उम्र सीमा सामान्य उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम 19 और अधिकतम 28 वर्ष है, जबकि एससी, एसटी तथा विकलांग व्यक्तियों को अधिकतम उम्र सीमा में पांच वर्ष की छूट का प्रावधान है।

एक्यूरेसी है महत्वपूर्ण
इस परीक्षा में आप तभी  सफल हो सकते हैं, जब आप स्पीड और एक्यूरेसी का ध्यान रखेंगे। ऑब्जेक्टिव परीक्षा में इसका काफी महत्व होता है। आपके लिए बेहतर होगा कि निर्धारित समय सीमा के अंदर प्रश्नों को एक्यूरेसी के साथ हल करने का अभ्यास करें। यदि आप इसका अभ्यास करते हैं, तो समय रहते कमजोरी का पता चल जाएगा, जिसे आप आसानी से दूर कर सकते हैं। इस परीक्षा में  बेहतर अंक तभी ला सकते हैं, जब आपका अपनी विषय पर पकड़ होगा। इस कारण सबसे पहले आप अपनी विषय से रिलैटेड प्रश्नों का हल करें। बाजार मे इससे संबंधित काफी पुस्तक उपलब्ध होते हैं। करेंट रिसर्च पर गहरी निगाह रखें। इस परीक्षा की तैयारी कुछ दिनों में संभव नहीं है। इसकी पूरी तैयारी आप तभी कर पाएंगे, जब आप प्लानिंग से तैयारी करेंगे।

 

विषय पर पकड़ जरूरी
प्रश्नों का स्तर स्नातकोत्तर स्तर का होता है। इस कारण उसके सिलेबस और विषय की समझ पहले विकसित करें। बेहतर स्ट्रेटेजी यह होगा कि आप प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करें। उसके बाद संक्षिप्त नोट्स बनाएं और उसी को बार-बार पढ़ें। इस तरह की रणनीति अपनाने से फायदा यह होगा कि आप कम समय में बेहतर तैयारी कर पाएंगे और परीक्षा के समय बेहतर प्रदर्शन करेंगे।

 

बाजार में इसके लिए नोट्स भी मिलते हैं। यदि आप चाहें, तो इसकी सहायता ले सकते हैं। तैयारी के लिए महत्वपूर्ण अध्याय को एक जगह नोट भी कर सकते हैं। इस लिस्ट में उन्हीं को शामिल करें, जिससे हर वर्ष या सर्वाधिक प्रश्न पूछे जा रहे हैं। प्राय: ऑब्जेक्टिव टाइप के प्रश्नों में अभ्यर्थियों के समक्ष तीन तरह के प्रश्न रहते हैं। पहला-आसान, दूसरा-50-50 और तीसरा लकी। इस परीक्षा में निगेटिव मार्किंग का प्रावधान है। इस कारण दो विकल्प को अपनाना कारगर हो सकता है। परीक्षा और सिलेबस के बारे में विस्तृत रूप से जानना चाहते हैं, तो वेबसाइट देख सकते हैं।

http://www.ugcnetonline.in

यूजीसी क्या है?

ज्ञान विज्ञान विमुक्तये
विकिपीडिया के अनुसार-

भारत में उच्च शिक्षा का इतिहास काफी पुराना है। इसके मूल में १९वीं शताब्दी है, जब वाइसरॉय लॉर्ड मैकाले ने अपनी सिफारिशें रखी थीं। उसके बाद बीसवीं शताब्दी में सन् १९२५ में इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसका बाद में नाम भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) पड़ा। इस संस्था के अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षिक, सांस्कृतिक और संबंधित क्षेत्रों के बारे में सूचना का आदान-प्रदान किया जाने लगा था। भारतीय स्वतंत्रता उपरांत १९४८ में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन की नींव रखी गई। इसके अंतर्गत देश में शिक्षा की आवश्यकताओं और उनमें सुधार पर काम किए जाने पर विचार किया जाता था। इस आयोग ने सलाह दी कि आजादी पूर्व के यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिटी को फिर से गठित किया जाए। उसका एक अध्यक्ष हो और उसके साथ ही देश के बड़े शिक्षाविदों को भी इस समिति के साथ जोड़ा जाए।

सन् १९५२ में सरकार ने निर्णल लिया कि केंद्रीय और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों को दी जाने वाले वित्तीय सहयोग के मामलों को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के अधीन लाया जाएगा। इस तरह २८ दिसंबर १९५३ को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने औपचारिक तौर पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की नींव रखी थी। इसके बाद हालांकि १९५६ में जाकर ही यूजीसी को संसद में पारित एक विशेष विधेयक के बाद सरकार के अधीन लाया गया और तभी औपचारिक तौर पर इसे स्थापित माना गया। भारत भर में क्षेत्रीय स्तर पर अपने कार्यो को सुचारू रूप से आरंभ करने के लिए यूजीसी ने कई स्थानों पर अपने कार्यालय खोले। विकेंद्रीकरण की इस प्रक्रिया में यूजीसी ने देश में छह स्थानों पर अपने कार्यालय खोले।

 

हमारे देश में उच्च शिक्षा की शुरुआत का इतिहास बहुत पुराना है। इसकी जड़ें उन्नीसवीं सदी तक जाती हैं जब लॉर्ड मैक्कॉले ने अपनी सिफारिशें रखी थीं। उसके बाद बीसवीं सदी में सन् 1925 में इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसका बाद में नाम एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज पड़ा। इस संस्था के अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षिक, सांस्कृतिक और संबंधित क्षेत्रों के बारे में सूचना का आदान-प्रदान किया जाने लगा था।

आजादी के बाद 1948 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन की नींव रखी गई। इसके अंतर्गत देश में शिक्षा की जरूरतों और उनमें बेहतरी पर काम किए जाने पर विचार किया जाता था। इस कमीशन ने सलाह दी कि आजादी पूर्व के यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिटी को फिर से गठित किया जाए। जिसका एक चेयरमैन हो और उसके साथ ही देश के बड़े शिक्षाविदों को भी इस कमिटी के साथ जोड़ा जाए।

सन् 1952 में सरकार ने केंद्रीय और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों को दी जाने वाले वित्तीय सहयोग के मामलों को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के अधीन लाया जाएगा। इस तरह 28 दिसंबर 1953 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने औपचारिक तौर पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की नींव रखी थी। इसके बाद हालांकि 1956 में जाकर ही यूजीसी को संसद में पारित एक विशेष विधेयक के बाद सरकार के अधीन लाया गया और तभी औपचारिक तौर पर इसे स्थापित माना गया।

देश भर में क्षेत्रीय स्तर पर अपने कार्यो को सुचारू रूप से अंजाम देने के लिए यूजीसी ने कई स्थानों पर अपने कार्यालय खोले। विकेंद्रीकरण की इस प्रक्रिया में यूजीसी ने देश में छह स्थानों पर अपने कार्यालय खोले। यूजीसी के मौजूदा चेयरमैन सुखदेव थोराट हैं जो फरवरी 2006 से इस पद पर आसीन हैं।

उच्च शिक्षा हेतु शिक्षा प्रत्यायन कार्य विश्वविद्यालय अनुदाय आयोग के निम्न १५ संस्थानों द्वारा किया जाता है।

 

हिंदी भाषा और उसका विकास
हिन्दी” वस्तुत: फारसी भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ है-हिन्दी का या हिंद से सम्बन्धित। हिन्दी शब्द की निष्पत्ति सिन्धु -सिंध से हुई है क्योंकि ईरानी भाषा में “स” को “ह” बोला जाता है। इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है। कालांतर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय बनकर उभरा । इसी “हिंद” से हिन्दी शब्द बना।

आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते है,वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है। आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है,जो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी। वैदिक भाषा में वेद,संहिता एवं उपनिषदों – वेदांत का सृजन हुआ है। वैदिक भाषा के साथ-साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थी,जिसे लौकिक संस्कृत भी कहा जाता है। संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाता है। अनुमानत: ८ वी.शताब्दी ई.पू.में इसका प्रयोग साहित्य में होने लगा था। संस्कृत भाषा में ही रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रन्थ रचे गये। वाल्मीकि ,व्यास,कालिदास,अश्वघोष,भारवी,माघ,भवभूति,विशाख,मम्मट,दंडी तथा श्रीहर्ष आदि संस्कृत की महान विभूतियाँ है। इसका साहित्य विश्व के समृद्ध साहित्य में से एक है।

संस्कृतकालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा परिवर्तित होते-होते ५०० ई.पू.के बाद तक काफ़ी बदल गई,जिसे “पालि” कहा गया। महात्मा बुद्ध के समय में पालि लोक भाषा थी और उन्होंने पालि के द्वारा ही अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया। संभवत: यह भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही। पहली ईसवी तक आते-आते पालि भाषा और परिवर्तित हुई,तब इसे “प्राकृत” की संज्ञा दी गई। इसका काल पहली ई.से ५०० ई.तक है। पालि की विभाषाओं के रूप में प्राकृत भाषायें- पश्चिमी,पूर्वी ,पश्चिमोत्तरी तथा मध्य देशी ,अब साहित्यिक भाषाओं के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी,जिन्हें मागधी,शौरसेनी,महाराष्ट्री,पैशाची,ब्राचड तथा अर्धमागधी भी कहा जा सकता है।

आगे चलकर,प्राकृत भाषाओं के क्षेत्रीय रूपों से अपभ्रंश भाषायें प्रतिष्ठित हुई। इनका समय ५०० ई.से १००० ई.तक माना जाता है। अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यत: दो रूप मिलते है – पश्चिमी और पूर्वी । अनुमानत: १००० ई.के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ। अपभ्रंश से ही हिन्दी भाषा का जन्म हुआ। आधुनिक आर्य भाषाओं में,जिनमे हिन्दी भी है, का जन्म १००० ई.के आसपास ही हुआ था,किंतु उसमे साहित्य रचना का कार्य ११५० या इसके बाद प्रारम्भ हुआ। अनुमानत: तेरहवीं शताब्दी में हिन्दी भाषा में साहित्य रचना का कार्य प्रारम्भ हुआ,यही कारण है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी को ग्राम्य अपभ्रंशों का रूप मानते है। आधुनिक आर्यभाषाओं का जन्म अपभ्रंशों के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से इस प्रकार माना जा सकता है –

अपभ्रंश ………………………………………….आधुनिक आर्य भाषा तथा उपभाषा

पैशाची …………………………………………….लहंदा ,पंजाबी
ब्राचड ………………………………………………सिन्धी
महाराष्ट्री …………………………………………..मराठी.
अर्धमागधी………………………………………..पूर्वी हिन्दी.
मागधी …………………………………………….बिहारी ,बंगला,उड़िया ,असमिया.
शौरसेनी …………………………………………..पश्चिमी हिन्दी,राजस्थानी ,पहाड़ी,गुजराती.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि हिन्दी भाषा का उद्भव ,अपभ्रंश के अर्धमागधी ,शौरसेनी और मागधी रूपों से हुआ है.

हिन्दी साहित्य का इतिहास

हिन्दी साहित्य पर यदि समुचित परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ हरदेव बाहरी के शब्दों में, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से आरम्भ होता है। यह कहना ही ठीक होगा कि वैदिक भाषा ही हिन्दी है। इस भाषा का दुर्भाग्य रहा है कि युग-युग में इसका नाम परिवर्तित होता रहा है। कभी ‘वैदिक’, कभी ‘संस्कृत‘, कभी ‘प्रकृत’, कभी ‘अपभ्रंश’ और अब – हिन्दी[1] आलोचक कह सकते हैं कि वैदिक संस्कृत और हिन्दी में तो जमीन-आसमान का अन्तर है। पर ध्यान देने योग्य है कि हिब्रू, रूसी, चीनी, जर्मन और तमिल आदि जिन भाषाओं को ‘बहुत पुरानी’ बताया जाता है, उनके भी प्राचीन और वर्तमान रूपों में जमीन-आसमान का ही अन्तर है। पर लोगों ने उन भाषाओं के नाम नहीं बदले और उनके परिवर्तित स्वरूपों को ‘प्राचीन’, ‘मध्यकालीन’, ‘आधुनिक’ आदि कहा गया जबकि हिन्दी के सन्दर्भ में प्रत्येक युग की भाषा का नया नाम रखा जाता रहा।

किन्तु हिन्दी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में प्रचलित धारणाओं पर विचार करते समय हमारे सामने हिन्दी भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न दसवीं शताब्दी के आसपास की प्राकृताभास भाषा तथा अपभ्रंश भाषाओं की ओर जाता है। अपभ्रंश शब्द की व्युत्पत्ति और जैन रचनाकारों की अपभ्रंश कृतियों का हिन्दी से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए जो तर्क और प्रमाण हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में प्रस्तुत किये गए हैं उन पर विचार करना भी आवश्यक है। सामान्यतः प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उस समय अपभ्रंश के कई रूप थे और उनमें सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही पद्य रचना प्रारम्भ हो गई थी।

साहित्य की दृष्टि से पद्यबद्ध जो रचनाएँ मिलती हैं वे दोहा रूप में ही हैं और उनके विषय, धर्म, नीति, उपदेश आदि प्रमुख हैं। राजाश्रित कवि और चारण नीति, शृंगार, शौर्य, पराक्रम आदि के वर्णन से अपनी साहित्य-रुचि का परिचय दिया करते थे। यह रचना-परम्परा आगे चलकर शैरसेनी अपभ्रंश या प्राकृताभास हिन्दी में कई वर्षों तक चलती रही। पुरानी अपभ्रंश भाषा और बोलचाल की देशी भाषा का प्रयोग निरन्तर बढ़ता गया। इस भाषा को विद्यापति ने देसी भाषा कहा है, किन्तु यह निर्णय करना सरल नहीं है कि हिन्दी शब्द का प्रयोग इस भाषा के लिए कब और किस देश में प्रारम्भ हुआ। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में हिन्दी शब्द का प्रयोग विदेशी मुसलमानों ने किया था। इस शब्द से उनका तात्पर्य ‘भारतीय भाषा’ का था।

हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन का इतिहास

आरंभिक काल से लेकर आधुनिक व आज की भाषा में आधुनिकोत्तर काल तक साहित्य इतिहास लेखकों के शताधिक नाम गिनाये जा सकते हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास शब्दबद्ध करने का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण था।

हिन्दी साहित्य के इतिहासकार और उनके ग्रन्थ

हिन्दी साहित्य के मुख्य इतिहासकार और उनके ग्रन्थ निम्नानुसार हैं –

1. गार्सा द तासी : इस्तवार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐंदुस्तानी (फ्रेंच भाषा में; फ्रेंच विद्वान, हिन्दी साहित्य के पहले इतिहासकार)

2. शिवसिंह सेंगर : शिव सिंह सरोज

3. जार्ज ग्रियर्सन : द मॉडर्न वर्नेक्यूलर लिट्रैचर आफ हिंदोस्तान

4. मिश्र बंधु : मिश्र बंधु विनोद

5. रामचंद्र शुक्ल : हिंदी साहित्य का इतिहास

6. हजारी प्रसाद द्विवेदी : हिन्दी साहित्य की भूमिका; हिन्दी साहित्य का आदिकाल; हिन्दी साहित्य :उद्भव और विकास

7. रामकुमार वर्मा : हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास

8. डॉ धीरेन्द्र वर्मा : हिन्दी साहित्य

9. डॉ नगेन्द्र : हिन्दी साहित्य का इतिहास; हिन्दी वांड्मय 20वीं शती

10. रामस्वरूप चतुर्वेदी : हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1986

11. बच्चन सिंह : हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली

12. डा० मोहन अवस्थी  : हिन्दी साहित्य का अद्यतन इतिहास

13. बाबू गुलाब राय : हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास

हिन्दी साहित्य के विकास के विभिन्न काल

हिन्दी साहित्य का आरंभ आठवीं शताब्दी से माना जाता है। यह वह समय है जब सम्राट् हर्ष की मृत्यु के बाद देश में अनेक छोटे छोटे शासनकेन्द्र स्थापित हो गए थे जो परस्पर संघर्षरत रहा करते थे। विदेशी मुसलमानों से भी इनकी टक्कर होती रहती थी। धार्मिक क्षेत्र अस्तव्यस्त थे। इन दिनों उत्तर भारत के अनेक भागों में बौद्ध धर्म का प्रचार था। बौद्ध धर्म का विकास कई रूपों में हुआ जिनमें से एक वज्रयान कहलाया। वज्रयानी तांत्रिक थे और सिद्ध कहलाते थे। इन्होंने जनता के बीच उस समय की लोकभाषा में अपने मत का प्रचार किया। हिन्दी का प्राचीनतम साहित्य इन्हीं वज्रयानी सिद्धों द्वारा तत्कलीन लोकभाषा पुरानी हिन्दी में लिखा गया। इसके बाद नाथपंथी साधुओं का समय आता है। इन्होंने बौद्ध, शांकर, तंत्र, योग और शैव मतों के मिश्रण से अपना नया पंथ चलाया जिसमें सभी वर्गों और वर्णों के लिए धर्म का एक सामान्य मत प्रतिपादित किया गया था। लोकप्रचलित पुरानी हिन्दी में लिखी इनकी अनेक धार्मिक रचनाएँ उपलब्ध हैं। इसके बाद जैनियों की रचनाएँ मिलती हैं। स्वयंभू का “पउमचरिउ‘ अथवा रामायण आठवीं शताब्दी की रचना है। बौद्धों और नाथपंथियों की रचनाएँ मुक्तक और केवल धार्मिक हैं पर जैनियों की अनेक रचनाएँ जीवन की सामान्य अनुभूतियों से भी संबद्ध हैं। इनमें से कई प्रबंधकाव्य हैं। इसी काल में अब्दुलरहमान का काव्य “संदेशरासक’ भी लिखा गया जिसमें परवर्ती बोलचाल के निकट की भाषा मिलती है। इस प्रकार ग्यारहवीं शताब्दी तक पुरानी हिन्दी का रूप निर्मित और विकसित होता रहा।

आदिकाल (1000 से 1300 ई)

ग्यारहवीं सदी के लगभग देशभाषा हिन्दी का रूप अधिक स्फुट होने लगा। उस समय पश्चिमी हिन्दी प्रदेश में अनेक छोटे छोटे राजपूत राज्य स्थापित हो गए थे। ये परस्पर अथवा विदेशी आक्रमणकारियों से प्राय: युद्धरत रहा करते थे। इन्हीं राजाओं के संरक्षण में रहनेवाले चारणों और भाटों का राजप्रशस्तिमूलक काव्य वीरगाथा के नाम से अभिहित किया गया। इन वीरगाथाओं को रासो कहा जाता है। इनमें आश्रयदाता राजाओं के शौर्य और पराक्रम का ओजस्वी वर्णन करने के साथ ही उनके प्रेमप्रसंगों का भी उल्लेख है। रासो ग्रन्थों में संघर्ष का कारण प्राय: प्रेम दिखाया गया है। इन रचनाओं में इतिहास और कल्पना का मिश्रण है। रासो वीरगीत (बीसलदेवरासो और आल्हा आदि) और प्रबंधकाव्य (पृथ्वीराजरासो, खमनरासो आदि) – इन दो रूपों में लिखे गए। इन रासो ग्रन्थों में से अनेक की उपलब्ध प्रतियाँ चाहे ऐतिहासिक दृष्टि से संदिग्ध हों पर इन वीरगाथाओं की मौखिक परंपरा अंसदिग्ध है। इनमें शौर्य और प्रेम की ओजस्वी और सरस अभिव्यक्ति हुई है।

इसी कालावधि में मैथिल कोकिल विद्यापति हुए जिनकी पदावली में मानवीय सौंदर्य ओर प्रेम की अनुपम व्यंजना मिलती है। कीर्तिलता और कीर्तिपताका इनके दो अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। अमीर खुसरो का भी यही समय है। इन्होंने ठेठ खड़ी बोली में अनेक पहेलियाँ, मुकरियाँ और दो सखुन रचे हैं। इनके गीतों, दोहों की भाषा ब्रजभाषा है।

भक्तिकाल (1300 से 1650 ई.)

तेरहवीं सदी तक धर्म के क्षेत्र में बड़ी अस्तव्यस्तता आ गई। जनता में सिद्धों और योगियों आदि द्वारा प्रचलित अंधविश्वास फैल रहे। थे, शास्त्रज्ञानसंपन्न वर्ग में भी रूढ़ियों और आडंबर की प्रधानता हो चली थी। मायावाद के प्रभाव से लोकविमुखता और निष्क्रियता के भाव समाज में पनपने लगे थे। ऐसे समय में भक्तिआंदोलन के रूप में ऐसा भारतव्यापी विशाल सांस्कृतिक आंदोलन उठा जिसने समाज में उत्कर्षविधायक सामाजिक और वैयक्तिक मूल्यों की प्रतिष्ठा की।

भक्ति आंदोलन का आरंभ दक्षिण के आलवार संतों द्वारा दसवीं सदी के लगभग हुआ। वहाँ शंकराचार्य के अद्वैतमत और मायावाद के विरोध में चार वैष्णव संप्रदाय खड़े हुए। इन चारों संप्रदायों ने उत्तर भारत में विष्णु के अवतारों का प्रचारप्रसार किया। इनमें से एक के प्रवर्तक रामानुजाचार्य थे, जिनकी शिष्यपरंपरा में आनेवाले रामानंद ने (पंद्रहवीं सदी) उत्तर भारत में रामभक्ति का प्रचार किया। रामानंद के राम ब्रह्म के स्थानापन्न थे जो राक्षसों का विनाश और अपनी लीला का विस्तार करने के लिए संसार में अवतीर्ण होते हैं। भक्ति के क्षेत्र में रामानंद ने ऊँचनीच का भेदभाव मिटाने पर विशेष बल दिया। राम के सगुण और निर्गुण दो रूपों को माननेवाले दो भक्तों – कबीर और तुलसी को इन्होंने प्रभावित किया। विष्णुस्वामी के शुद्धाद्वैत मत का आधार लेकर इसी समय बल्लभाचार्य ने अपना पुष्टिमार्ग चलाया। बारहवीं से सोलहवीं सदी तक पूरे देश में पुराणसम्मत कृष्णचरित्‌ के आधार पर कई संप्रदाय प्रतिष्ठित हुए, जिनमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली वल्लभ का पुष्टिमार्ग था। उन्होंने शांकर मत के विरुद्ध ब्रह्म के सगुण रूप को ही वास्तविक कहा। उनके मत से यह संसार मिथ्या या माया का प्रसार नहीं है बल्कि ब्रह्म का ही प्रसार है, अत: सत्य है। उन्होंने कृष्ण को ब्रह्म का अवतार माना और उसकी प्राप्ति के लिए भक्त का पूर्ण आत्मसमर्पण आवश्यक बतलाया। भगवान्‌ के अनुग्रह या पुष्टि के द्वारा ही भक्ति सुलभ हो सकती है। इस संप्रदाय में उपासना के लिए गोपीजनवल्लभ, लीलापुरुषोत्तम कृष्ण का मधुर रूप स्वीकृत हुआ। इस प्रकार उत्तर भारत में विष्णु के राम और कृष्णअवतारों प्रतिष्ठा हुई।

इस प्रकार इन विभिन्न मतों का आधार लेकर हिन्दी में निर्गुण और सगुण के नाम से भक्तिकाव्य की दो शाखाएँ साथ साथ चलीं। निर्गुणमत के दो उपविभाग हुए – ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी। पहले के प्रतिनिधि कबीर और दूसरे के जायसी हैं। सगुणमत भी दो उपधाराओं में प्रवाहित हुआ – रामभक्ति और कृष्णभक्ति। पहले के प्रतिनिधि तुलसी हैं और दूसरे के सूरदास

ज्ञानश्रयी शाखा के प्रमुख कवि कबीर पर तात्कालिक विभिन्न धार्मिक प्रवृत्तियों और दार्शनिक मतों का सम्मिलित प्रभाव है। उनकी रचनाओं में धर्मसुधारक और समाजसुधारक का रूप विशेष प्रखर है। उन्होंने आचरण की शुद्धता पर बल दिया। बाह्याडंबर, रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर उन्होंने तीव्र कशाघात किया। मनुष्य की क्षमता का उद्घोष कर उन्होंने निम्नश्रेणी की जनता में आत्मगौरव का भाव जगाया। इस शाखा के अन्य कवि रैदास, दादू हैं।

प्रेमाश्रयी धारा के सर्वप्रमुख कवि जायसी हैं जिनका “पदमावत’ अपनी मार्मिक प्रेमव्यंजना, कथारस और सहज कलाविन्यास के कारण विशेष प्रशंसित हुआ है। इनकी अन्य रचनाओं में “अखरावट’ और “आखिरी कलाम’ आदि हैं, जिनमें सूफी संप्रदायसंगत बातें हैं१ इस धारा के अन्य कवि हैं कुतबन, मंझन, उसमान, शेख, नबी और नूर मुहम्मद आदि।

आज की दृष्टि से इस संपूर्ण भक्तिकाव्य का महत्व उसक धार्मिकता से अधिक लोकजीवनगत मानवीय अनुभूतियों और भावों के कारण है। इसी विचार से भक्तिकाल को हिन्दी काव्य का स्वर्ण युग कहा जा सकता है।

रीतिकाल (1650 से 1850 ई.)

१७०० ई. के आस पास हिन्दी कविता में एक नया मोड़ आया। इसे विशेषत: तात्कालिक दरबारी संस्कृति और संस्कृतसाहित्य से उत्तेजना मिली। संस्कृत साहित्यशास्त्र के कतिपय अंशों ने उसे शास्त्रीय अनुशासन की ओर प्रवृत्त किया। हिन्दी में ‘रीति’ या ‘काव्यरीति’ शब्द का प्रयोग काव्यशास्त्र के लिए हुआ था। इसलिए काव्यशास्त्रबद्ध सामान्य सृजनप्रवृत्ति और रस, अलंकार आदि के निरूपक बहुसंख्यक लक्षणग्रन्थों को ध्यान में रखते हुए इस समय के काव्य को ‘रीतिकाव्य’ कहा गया। इस काव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों की पुरानी परंपरा के स्पष्ट संकेत संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी और हिन्दी के आदिकाव्य तथा कृष्णकाव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों में मिलते हैं।

रीतिकाव्य रचना का आरंभ एक संस्कृतज्ञ ने किया। ये थे आचार्य केशवदास, जिनकी सर्वप्रसिद्ध रचनाएँ कविप्रिया, रसिकप्रिया और रामचंद्रिका हैं। केशव के कई दशक बाद चिन्तामणि से लेकर अठारहवीं सदी तक हिन्दी में रीतिकाव्य का अजस्र स्रोत प्रवाहित हुआ जिसमें नर-नारी-जीवन के रमणीय पक्षों और तत्संबंधी सरस संवेदनाओं की अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्ति व्यापक रूप में हुई।

रीतिकाल के कवि राजाओं और रईसों के आश्रय में रहते थे। वहाँ मनोरंजन और कलाविलास का वातावरण स्वाभाविक था। बौद्धिक आनंद का मुख्य साधन वहाँ उक्तिवैचित्रय समझा जाता था। ऐसे वातावरण में लिखा गया साहित्य अधिकतर शृंगारमूलक और कलावैचित्रय से युक्त था। पर इसी समय प्रेम के स्वच्छंद गायक भी हुए जिन्होंने प्रेम की गहराइयों का स्पर्श किया है। मात्रा और काव्यगुण दोनों ही दृष्टियों से इस समय का नर-नारी-प्रेम और सौंदर्य की मार्मिक व्यंजना करनेवाला काव्यसाहित्य महत्वपूर्ण है।

रीतिकाव्य मुख्यत: मांसल शृंगार का काव्य है। इसमें नर-नारीजीवन के स्मरणीय पक्षों का सुंदर उद्घाटन हुआ है। अधिक काव्य मुक्तक शैली में है, पर प्रबंधकाव्य भी हैं। इन दो सौ वर्षों में शृंगारकाव्य का अपूर्व उत्कर्ष हुआ। पर धीरे धीरे रीति की जकड़ बढ़ती गई और हिन्दी काव्य का भावक्षेत्र संकीर्ण होता गया। आधुनिक युग तक आते आते इन दोनों कमियों की ओर साहित्यकारों का ध्यान विशेष रूप से आकृष्ट हुआ।

आधुनिक काल (1850 से अब तक)

इन्हें भी देखें –

हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल,
आधुनिक हिंदी पद्य का इतिहास,
आधुनिक हिंदी गद्य का इतिहास

उन्नीसवीं शताब्दी

यह आधुनिक युग का आरंभ काल है जब भारतीयों का यूरोपीय संस्कृति से संपर्क हुआ। भारत में अपनी जड़ें जमाने के काम में अँगरेजी शासन ने भारतीय जीवन को विभिन्न स्तरों पर प्रभावित और आंदोलित किया। नई परिस्थितियों के धक्के से स्थितिशील जीवनविधि का ढाँचा टूटने लगा। एक नए युग की चेतना का आरंभ हुआ। संघर्ष और सामंजस्य के नए आयाम सामने आए।

नए युग के साहित्यसृजन की सर्वोच्च संभावनाएँ खड़ी बोली गद्य में निहित थीं, इसलिए इसे गद्य-युग भी कहा गया है। हिन्दी का प्राचीन गद्य राजस्थानी, मैथिली और ब्रजभाषा में मिलता है पर वह साहित्य का व्यापक माध्यम बनने में अशक्त था। खड़ीबोली की परंपरा प्राचीन है। अमीर खुसरो से लेकर मध्यकालीन भूषण तक के काव्य में इसके उदाहरण बिखरे पड़े हैं। खड़ी बोली गद्य के भी पुराने नमूने मिले हैं। इस तरह का बहुत सा गद्य फारसी और गुरुमुखी लिपि में लिखा गया है। दक्षिण की मुसलिम रियासतों में “दखिनी’ के नाम से इसका विकास हुआ। अठारहवीं सदी में लिखा गया रामप्रसाद निरंजनी और दौलतराम का गद्य उपलब्ध है। पर नई युगचेतना के संवाहक रूप में हिन्दी के खड़ी बोली गद्य का व्यापक प्रसार उन्नीसवीं सदी से ही हुआ। कलकत्ते के फोर्ट विलियम कालेज में, नवागत अँगरेज अफसरों के उपयोग के लिए, लल्लू लाल तथा सदल मिश्र ने गद्य की पुस्तकें लिखकर हिन्दी के खड़ी बोली गद्य की पूर्वपरंपरा के विकास में कुछ सहायता दी। सदासुखलाल और इंशाअल्ला खाँ की गद्य रचनाएँ इसी समय लिखी गई। आगे चलकर प्रेस, पत्रपत्रिकाओं, ईसाई धर्मप्रचारकों तथा नवीन शिक्षा संस्थाओं से हिन्दी गद्य के विकास में सहायता मिली। बंगाल, पंजाब, गुजरात आदि विभिन्न प्रान्तों के निवासियों ने भी इसकी उन्नति और प्रसार में योग दिया। हिन्दी का पहला समाचारपत्र “उदंत मार्तड‘ १८२६ ई. में कलकत्ते से प्रकाशित हुआ। राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मणसिंह हिन्दी गद्य के निर्माण और प्रसार मैं अपने अपने ढंग से सहायक हुए। आर्यसमाज और अन्य सांस्कृतिक आंदोलनों ने भी आधुनिक गद्य को आगे बढ़ाया।

गद्यसाहित्य की विकासमान परंपरा उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से अग्रसर हुई। इसके प्रवर्तक आधुनिक युग के प्रवर्तक और पथप्रदर्शक भारतेंदु हरिश्चंद्र थे जिन्होंने साहित्य का समकालीन जीवन से घनिष्ठ संबंध स्थापित किया। यह संक्रांति और नवजागरण का युग था। अँगरेजों की कूटनीतिक चालों और आर्थिक शोषण से जनता संत्रस्त और क्षुब्ध थी। समाज का एक वर्ग पाश्चात्य संस्कारों से आक्रांत हो रहा था तो दूसरा वर्ग रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था। इसी समय नई शिक्षा का आरंभ हुआ और सामाजिक सुधार के आंदोलन चले। नवीन ज्ञान विज्ञान के प्रभाव से नवशिक्षितों में जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण विकसित हुआ जो अतीत की अपेक्षा वर्तमान और भविष्य की ओर विशेष उन्मुख था। सामाजिक विकास में उत्पन्न आस्था और जाग्रत समुदायचेतना ने भारतीयों में जीवन के प्रति नया उत्साह उत्पन्न किया। भारतेंदु के समकालीन साहित्य में विशेषत: गद्यसाहित्य में तत्कालीन वैचारिक और भौतिक परिवेश की विभिन्न अवस्थाओं की स्पष्ट और जीवंत अभिव्यक्ति हुई। इस युग की नवीन रचनाएँ देशभक्ति और समाजसुधार की भावना से परिपूर्ण हैं। अनेक नई परिस्थितियों की टकराहट से राजनीतिक और सामाजिक व्यंग की प्रवृत्ति भी उद्बुद्ध हुई। इस समय के गद्य में बोलचाल की सजीवता है। लेखकों के व्यक्तित्व से संपृक्त होने के कारण उसमें पर्याप्त रोचकता आ गई है। सबसे अधिक निबंध लिखे गए जो व्यक्तिप्रधान और विचारप्रधान तथा वर्णनात्मक भी थे। अनेक शैलियों में कथासाहित्य भी लिखा गया, अधिकतर शिक्षाप्रधान। पर यथार्थवादी दृष्टि और नए शिल्प की विशिष्टता श्रीनिवासदास के “परीक्षागुरु‘ में ही है। देवकीनंदन का तिलस्मी उपन्यास ‘चंद्रकांता’ इसी समय प्रकाशित हुआ। पर्याप्त परिमाण में नाटकों और सामाजिक प्रहसनों की रचना हुई। भारतेंदु, प्रतापनारायण, श्री निवासदास, आदि प्रमुख नाटककार हैं। साथ ही भक्ति और शृंगार की बहुत सी सरस कविताएँ भी निर्मित हुई। पर जिन कविताओं में सामाजिक भावों की अभिव्यक्ति हुई वे ही नए युग की सृजनशीलता का आरंभिक आभास देती हैं। खड़ी बोली के छिटफुट प्रयोगों को छोड़ शेष कविताएँ ब्रजभाषा में लिखी गई। वास्तव में नया युग इस समय के गद्य में ही अधिक प्रतिफलित हो सका।

बीसवीं शताब्दी

इस कालावधि की सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ दो हैं – एक तो सामान्य काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली की स्वीकृति और दूसरे हिन्दी गद्य का नियमन और परिमार्जन। इस कार्य में सर्वाधिक सशक्त योग सरस्वती संपादक महावीरप्रसाद द्विवेदी का था। द्विवेदी जी और उनके सहकर्मियों ने हिन्दी गद्य की अभिव्यक्तिक्षमता को विकसित किया। निबंध के क्षेत्र में द्विवेदी जी के अतिरिक्त बालमुकुंद, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पूर्णसिंह, पद्मसिंह शर्मा जैसे एक से एक सावधान, सशक्त और जीवंत गद्यशैलीकार सामने आए। उपन्यास अनेक लिखे गए पर उसकी यथार्थवादी परंपरा का उल्लेखनीय विकास न हो सका। यथार्थपरक आधुनिक कहानियाँ इसी काल में जनमी और विकासमान हुई। गुलेरी, कौशिक आदि के अतिरिक्त प्रेमचंद और प्रसाद की भी आरंभिक कहानियाँ इसी समय प्रकाश में आई। नाटक का क्षेत्र अवश्य सूना सा रहा। इस समय के सबसे प्रभावशाली समीक्षक द्विवेदी जी थे जिनकी संशोधनवादी और मर्यादानिष्ठ आलोचना ने अनेक समकालीन साहित्य को पर्याप्त प्रभावित किया। मिश्रबंधु, कृष्णबिहारी मिश्र और पद्मसिंह शर्मा इस समय के अन्य समीक्षक हैं पर कुल मिलाकर इस समय की समीक्षा बाह्यपक्षप्रधान ही रही।

सुधारवादी आदर्शों से प्रेरित अयोध्यासिंह उपाध्याय ने अपने “प्रियप्रवास’ में राधा का लोकसेविका रूप प्रस्तुत किया और खड़ीबोली के विभिन्न रूपों के प्रयोग में निपुणता भी प्रदर्शित की। मैथिलीशरण गुप्त ने “भारत भारती’ में राष्ट्रीयता और समाजसुधार का स्वर ऊँचा किया और “साकेत’ में उर्मिला की प्रतिष्ठा की। इस समय के अन्य कवि द्विवेदी जी, श्रीधर पाठक, बालमुकुंद गुप्त, नाथूराम शर्मा, गयाप्रसाद शुक्ल आदि हैं। ब्रजभाषा काव्यपरंपरा के प्रतिनिधि रत्नाकर और सत्यनारायण कविरत्न हैं। इस समय खड़ी बोली काव्यभाषा के परिमार्जन और सामयिक परिवेश के अनुरूप रचना का कार्य संपन्न हुआ। नए काव्य का अधिकांश विचारपरक और वर्णनात्मक है।

सन्‌ १९२०-४० के दो दशकों में आधुनिक साहित्य के अंतर्गत वैचारिक और कलात्मक प्रवृत्तियों का अनेक रूप उत्कर्ष दिखाई पड़ा। सर्वाधिक लोकप्रियता उपन्यास और कहानी को मिली। कथासाहित्य में घटनावैचित्य की जगह जीते जागते स्मरणीय चरित्रों की सृष्टि हुई। निम्न और मध्यवर्गीय समाज के यथार्थपरक चित्र व्यापक रूप में प्रस्तुत किए गए। वर्णन की सजीव शैलियों का विकास हुआ। इस समय के सर्वप्रमुख कथाकार प्रेमचंद हैं। वृंदावनलाल वर्मा के ऐतिहासिक उपन्यास भी उल्लेख्य है। हिन्दी नाटक इस समय जयशंकर प्रसाद के साथ सृजन के नवीन स्तर पर आरोहण करता है। उनके रोमांटिक ऐतिहासिक नाटक अपनी जीवंत चारित्र्यसृष्टि, नाटकीय संघर्षों की योजना और संवेदनीयता के कारण विशेष महत्व के अधिकारी हुए। कई अन्य नाटककार भी सक्रिय दिखाई पड़े। हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में रामचंद्र शुक्ल ने सूर, तुलसी और जायसी की सूक्ष्म भावस्थितियों और कलात्मक विशेषताओं का मार्मिक उद्घाटन किया और साहित्य के सामाजिक मूल्यों पर बल दिया। अन्य आलोचक है श्री नंददुलारे वाजपेयी, डा. नगेंद्र तथा डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी।

काव्य के क्षेत्र में यह छायावाद के विकास का युग है। पूर्ववर्ती काव्य वस्तुनिष्ठ था, छायावादी काव्य भावनिष्ठ है। इसमें व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों का प्राधान्य है। स्थूल वर्णन विवरण के स्थान पर छायावादी काव्य में व्यक्ति की स्वच्छंद भावनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति हुई। स्थूल तथ्य और वस्तु की अपेक्षा बिंबविधायक कल्पना छायावादियों को अधिक प्रिय है। उनकी सौंदर्यचेतना विशेष विकसित है। प्रकृतिसौंदर्य ने उन्हें विशेष आकृष्ट किया। वैयक्तिक संवेगों की प्रमुखता के कारण छायावादी काव्य मूलत: प्रगीतात्मक है। इस समय खड़ी बोली काव्यभाषा की अभिव्यक्तिक्षमता का अपूर्व विकास हुआ। जयशंकर प्रसाद, माखनलाल, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला’, महादेवी, नवीन और दिनकर छायावाद के उत्कृष्ट कवि हैं।

सन्‌ १९४० के बाद छायावाद की संवेगनिष्ठ, सौंदर्यमूलक और कल्पनाप्रिय व्यक्तिवाद प्रवृत्तियों के विरोध में प्रगतिवाद का संघबद्ध आंदोलन चला जिसकी दृष्टि समाजबद्ध, यथार्थवादी और उपयोगितावादी है। सामाजिक वैषम्य और वर्गसंघर्ष का भाव इसमें विशेष मुखर हुआ। इसने साहित्य को सामाजिक क्रांति के अस्त्र के रूप में ग्रहण किया। अपनी उपयोगितावादी दृष्टि की सीमाओं के कारण प्रगतिवादी साहित्य, विशेषत: कविता में कलात्मक उत्कर्ष की संभावनाएँ अधिक नहीं थीं, फिर भी उसने साहित्य के सामाजिक पक्ष पर बल देकर एक नई चेतना जाग्रत की।

प्रगतिवादी आंदोलन के आरंभ के कुछ ही बाद नए मनोविज्ञान या मनोविश्लेषणशास्त्र से प्रभावित एक और व्यक्तिवादी प्रवृत्ति साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हुई थी जिसे सन्‌ १९४३ के बाद प्रयोगवाद नाम दिया गया। इसी का संशोधित रूप वर्तमानकालीन नई कविता और नई कहानियाँ हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि द्वितीय महायुद्ध और उसके उत्तरकालीन साहित्य में जीवन की विभीषिका, कुरूपता और असंगतियों के प्रति अंसतोष तथा क्षोभ ने कुछ आगे पीछे दो प्रकार की प्रवृत्तियों को जन्म दिया। एक का नाम प्रगतिवाद है, जो मार्क्स के भौतिकवादी जीवनदर्शन से प्रेरणा लेकर चला; दूसरा प्रयोगवाद है, जिसने परंपरागत आदर्शों और संस्थाओं के प्रति अपने अंसतोष की तीव्र प्रतिक्रियाओं को साहित्य के नवीन रूपगत प्रयोगों के माध्यम से व्यक्त किया। इसपर नए मनोविज्ञान का गहरा प्रभाव पड़ा।

प्रगतिवाद से प्रभावित कथाकारों में यशपाल, उपेंद्रनाथ अश्क, अमृतलाल नागर और नागार्जुन आदि विशिष्ट हैं। आलोचकों में रामविलास शर्मा,नामवर सिंह, विजय देव नारायण साही प्रमुख हैं। कवियों में केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, रांगेय राघव, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। निबन्ध विधा में इस दौर में आछार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, विद्या निवास मिश्र और कुबेरनाथ राय ने विशेष ख्याति अर्जित की|

नए मनोविज्ञान से प्रभावित प्रयोगों के लिए सचेष्ट कथाकारों में अज्ञेय प्रमुख हैं। मनोविज्ञान से गंभीर रूप में प्रभावित इलाचंद्र जोशी और जैनेंद्र हैं। इन लेखकों ने व्यक्तिमन के अवचेतन का उद्घाटन कर नया नैतिक बोध जगाने का प्रयत्न किया। जैनेंद्र और अज्ञेय ने कथा के परंपरागत ढाँचे को तोड़कर शैलीशिल्प संबंधी नए प्रयोग किए। परवर्ती लेखकों और कवियों में वैयक्तिक प्रतिक्रियाएँ अधिक प्रखर हुईं। समकालीन परिवेश से वे पूर्णत: संसक्त हैं। उन्होंने समाज और साहित्य की मान्यताओं पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। व्यक्तिजीवन की लाचारी, कुंठा, आक्रोश आदि व्यक्त करने के साथ ही वे वैयक्तिक स्तर पर नए जीवनमूल्यों के अन्वेषण में लगे हुए हैं। उनकी रचनाओं में एक ओर सार्वभौम संत्रास और विभीषिका की छटपटाहट है तो दूसरी ओर व्यक्ति के अस्तित्व की अनिवार्यता और जीवन की संभावनाओं को रेखांकित करने का उपक्रम भी। हमारा समकालीन साहित्य आत्यंतिक व्यक्तिवाद से ग्रस्त है और यह उसकी सीमा है। पर उसका सबसे बड़ा बल उसकी जीवनमयता है जिसमें भविष्य की सशक्त संभावनाएँ निहित हैं।

हिन्दी एवं उसके साहित्य का इतिहास

संस्कृत का उद्गम

  • ३२२ ईसा पूर्व – मौर्यों द्वारा ब्राह्मी लिपि का विकास।
  • २५० ईसा पूर्व – आदि संस्कृत का विकास। (आदि संस्कृत ने धीरे धीरे १०० ईसा पूर्व तक प्राकति का स्थान लिया।)
  • ३२० ए. डी. (ईसवी)- गुप्त या सिद्ध मात्रिका लिपि का विकास।

अपभ्रंश तथा आदि-हिन्दी का विकास

अपभ्रंश का अस्त तथा आधुनिक हिन्दी का विकास

  • १२८३अमीर ख़ुसरो की पहेली तथा मुकरियाँ में “हिन्दवी” शव्द का सर्वप्रथम उपयोग।
  • १३७० – “हंसवाली” की आसहात ने प्रेम कथाओं की शुरुआत की।
  • १३९८-१५१८कबीर की रचनाओं ने निर्गुण भक्ति की नींव रखी।
  • १४००-१४७९ – अपभ्रंश के आखरी महान कवि रघु
  • १४५० – रामानन्द के साथ “सगुण भक्ति” की शुरुआत।
  • १५८० – शुरुआती दक्खिनी का कार्य “कालमितुल हकायत्” — बुर्हनुद्दिन जनम द्वारा।
  • १५८५नाभादास ने “भक्तमाल” लिखी।
  • १६०१बनारसीदास ने हिन्दी की पहली आत्मकथा “अर्ध कथानक” लिखी।
  • १६०४गुरु अर्जुन देव ने कई कवियों की रचनाओं का संकलन “आदि ग्रन्थ” निकाला।
  • १५३२-१६२३गोस्वामी तुलसीदास ने “रामचरित मानस” की रचना की।
  • १६२३जाटमल ने “गोरा बादल की कथा” (खडी बोली की पहली रचना) लिखी।
  • १६४३आचार्य केशव दास ने “रीति” के द्वारा काव्य की शुरुआत की।
  • १६४५उर्दू का आरंभ

आधुनिक हिन्दी

  • १७९६ – देवनागरी रचनाओं की शुरुआती छ्पाई।
  • २००० – आधुनिक हिंदी का अंतर्राष्ट्रीय विकास
Advertisements
%d bloggers like this: